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दिल्ली के लिए बड़ा नुकसान साबित हुए हैं केजरीवाल

दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री साहिब सिंह वर्मा के पुत्र प्रवेश वर्मा ने किरोड़ीमल कॉलेज से शिक्षा प्राप्त की है। पश्चिमी दिल्ली से सांसद हैं और दूसरी बार रिकार्ड जीत के साथ लोकसभा में पहुंचे हैं। इन्होंने लोकसभा चुनाव में 5,78,486 के बड़े अंतर से अपनी जीत दर्ज कराई थी। यह अब तक की सबसे बड़ी जीत है। 2013 में विधानसभा का चुनाव भी महरौली विधानसभा से लड़ा था और पूर्व विधानसभा अध्यक्ष योगानंद शास्त्री को हराया था। भाजपा के तेज-तर्रार युवा चेहरों में से हैं। अपने संसदीय क्षेत्र में सक्रिय रहने के साथ आम आदमी पार्टी सरकार की नीतियों के खिलाफ हमलावर रहते हैं।

Author Updated: November 25, 2019 4:37 PM
भाजपा के सांसद प्रवेश वर्मा

भाजपा के सांसद प्रवेश वर्मा का कहना है कि अरविंद केजरीवाल जनता को मुफ्त बिजली-पानी और बस का सफर कोई अपनी जेब से नहीं दे रहे, यह करदाताओं का ही पैसा है। जनता को कुछ निजी फायदों की बात छोड़ दें, तो आम आदमी पार्टी की सरकार ने बुनियादी ढांचे में सुधार के लिए एक भी काम नहीं किया है। दिल्ली में प्रदूषण के लिए पूरी तरह से अरविंद केजरीवाल को जिम्मेदार ठहराया। बातचीत का संचालन किया कार्यकारी संपादक मुकेश भारद्वाज ने।

मनोज मिश्र : आपका निर्वाचन क्षेत्र हरियाणा से लगा हुआ है। इस बार हरियाणा में जाटों ने भाजपा का साथ नहीं दिया। क्या दिल्ली में भी उसका असर पड़ेगा?
प्रवेश वर्मा : हरियाणा की राजनीति बिल्कुल अलग है। वहां के समीकरण बिल्कुल अलग हैं। वहां पर हमारी सरकार चल रही थी। दिल्ली में हमारी सरकार नहीं है। जब भी राज्यों के चुनाव होते हैं, तो उनमें स्थानीय मुद्दे प्रमुख होते हैं। राष्ट्रीय मुद्दे उतने प्रभावी नहीं होते। तो, हरियाणा के मुद्दे भी अलग हैं, उनकी मांगें भी अलग हैं, उनके काम भी अलग हैं। दिल्ली के मुद्दे बिल्कुल अलग हैं। तो, वहां के चुनाव का दिल्ली में असर पड़ेगा, ऐसा मैं नहीं मानता। वहां ग्रामीण इलाकों के लोगों के नाराज होने के कारण अलग हो सकते हैं। जब कोई सरकार पांच साल चलती है और काम करती है तो उसमें स्वभाविक रूप से कुछ न कुछ नाराजगी रहती है। यहां हम सत्ता में न होकर विपक्ष में हैं। तो, यहां के लोग हमसे नाराज न होकर सत्ता पक्ष से नाराज होंगे।

मुकेश भारद्वाज : आप कह रहे हैं कि आपको सत्ता विरोधी लहर का फायदा मिलेगा, मगर दिल्ली में माना जा रहा है कि केजरीवाल के खिलाफ कोई बहुत नाराजगी नहीं है। लोगों को बिजली मिल रही है, पानी मिल रहा है, शिक्षा मिल रही है और शुल्कों आदि में बढ़ोतरी नहीं हुई है। क्या आप मानते हैं कि यह मुद्दा होगा?
’दिल्ली की जनता उलझ गई है। अगर आप किसी से पूछें तो यह ठीक है कि जो उनको मुफ्त की सुविधाएं मिल रही हैं, उससे केजरीवाल के काम से वे प्रभावित हो सकते हैं। तो, लोग एक हजार रुपए के पानी के बिल की माफी को ही बड़ी उपलब्धि समझ रहे हैं। उनकी सड़कें टूटी हुई हैं, उनकी सीवर लाइन नहीं डली, उनके क्षेत्र में कोई अस्पताल नहीं बना, कोई कॉलेज, कोई स्टेडियम नहीं बना, वह सब उन्हें नहीं दिखाई दे रहा है। उन्हें अगर एक हजार रुपए का अपना व्यक्तिगत फायदा दिखाई दे रहा है तो वह केजरीवाल कोई अपनी जेब से नहीं दे रहे हैं, वह दिल्ली के ही करदाताओं का पैसा है। इससे लंबे समय तक कोई फायदा नहीं मिलने वाला। इससे दिल्ली का विकास नहीं होने वाला। दिल्ली की परिवहन व्यवस्था का हाल यह है कि जब केजरीवाल ने सत्ता की कमान संभाली थी तो इस विभाग का घाटा साढ़े नौ सौ करोड़ का था, वह घाटा अब बढ़ कर साढ़े उन्नीस सौ करोड़ तक पहुंच गया है। यह घाटा इसलिए बढ़ा कि वहां का राजस्व जो उस महकमे में लगाया जाना था, उसे वहां लगाने के बजाय उससे अपने विज्ञापन दे रहे हैं। शीला जी के समय में विज्ञापन पर छब्बीस करोड़ रुपए खर्च होते थे, जब हमारी पार्टी की सरकार थी, तब खर्च होते थे चार करोड़ रुपए, पर आज इनके कार्यकाल में छह सौ करोड़ रुपए खर्च होते हैं। अगर इतने पैसे से कोई दूसरे काम हुए होते तो लोगों को जमीन पर दिखाई देते। ये कहते हैं कि मैं यह काम करूंगा, वह काम करूंगा। ये कभी नहीं कहते कि हमने यह काम किया, हमने अस्पताल बनवाए, कॉलेज बनवाया। मैंने अपने प्रयास से इतनी सड़कें, इतने फ्लाईओवर बनवाए। मगर ये एक र्इंट नहीं दिखाते, जो इन्होंने लगाई है। क्या कोई मुख्यमंत्री अपने पांच साल के कार्यकाल के बाद यह कह सकता है कि मैं यह करूंगा, वह करूंगा? जब साढ़े चार साल में नहीं कर सके, तो अब तीन महीनों में क्या कर लेंगे? साढ़े चार साल तक तो यही कहते रहे कि प्रधानमंत्री और उपराज्यपाल मुझे काम नहीं करने दे रहे। अब क्यों करने दे रहे हैं। आप एक आरटीआइ लगाकर देखिए, तो पता चलेगा कि इन्होंने काम के बदले विज्ञापन पर कहां-कहां पैसे बांटे।

दीपक रस्तोगी : प्रदूषण का स्तर लगातार बढ़ रहा है। यह दिल्ली ही नहीं, सभी प्रदेशों में बढ़ रहा है। केंद्र सरकार कोई पहल क्यों नहीं करती कि इस पर अंकुश लगे?
’जो काम जिसके जिम्मे है, उसे वही कर सकता है। दिल्ली में प्रदूषण की जहां तक बात है, तो उसमें सबसे नीचे का कारण है पराली का। उससे ऊपर कारण है गैसों का, धूल का और सबसे ऊपर कारण है वाहनों से निकलने वाला धुआं। ये कारण तो दिल्ली सरकार को समाप्त करने हैं। इसमें भारत सरकार क्या करेगी? पिछले साढ़े चार साल में एक भी बैठक ऐसी बता दीजिए, जो अरविंद केजरीवाल ने प्रदूषण पर की हो। एक बार ऐसा बता दीजिए कि दिल्ली के मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री जी से इस विषय पर समय मांगा हो। एक बार ऐसा बता दीजिए जब मुख्यमंत्री ने दिल्ली के सातों सांसदों को इस विषय पर चर्चा के लिए बुलाया हो। एक बार ऐसा बता दीजिए जब उन्होंने पंजाब और हरियाणा के मुख्यमंत्रियों से मिलकर इस पर चर्चा की हो, जबकि केंद्र सरकार ने इस्टर्न-वेस्टर्न पेरीफेरल रोड बनाया, जिससे साठ हजार व्यावसायिक वाहन दिल्ली में घुसने के बजाय बार्डर से बाहर निकल जाते हैं। राष्ट्रीय राजमार्ग 24 को चौड़ा किया भारत सरकार ने। दिल्ली में बीएस-6 लागू किया भारत सरकार ने। तो, जो काम भारत सरकार को करना चाहिए, वह तो कर ही रही है। दिल्ली सरकार को जो करना चाहिए, वह नहीं कर रही है। वह तो सिर्फ विज्ञापन देती है। सत्तर करोड़ रुपए सिर्फ सम-विषम योजना के विज्ञापन पर खर्च हुए हैं। इन पैसों से दिल्ली सरकार एअर प्यूरीफायर टावर क्यों नहीं लगाती?

पंकज रोहिला : अभी दिल्ली के पानी की गुणवत्ता को लेकर जो रिपोर्ट आई है, उस पर केजरीवाल सरकार का कहना है कि भाजपा ने अपनी राजनीति चमकाने के लिए झूठी रिपोर्ट बनवाई है। आपका इस पर क्या कहना है?
’कुछ लोगों को शायद ऊपर वाले का आशीर्वाद प्राप्त होता है कि वे चाहे कितना भी पाप कर लें, उन पर लोगों का भरोसा बना रहेगा। पहले तो ये अपने बच्चों की कसमें खाते रहे कि मैं ये नहीं लूंगा, वो नहीं लूंगा फिर सब ले लिया। क्या कुछ किया नहीं, पर विज्ञापन हर काम का देते रहे। स्कूल एक नहीं बनवाया, पर बताते रहे कि हमने नए कमरे बनवा दिए। उन कमरों को बनाने का ठेका टेंडर से नहीं दिया गया। उसका भुगतान किया गया अट्ठासी सौ रुपए प्रति वर्ग फुट, जबकि पांच सितारा होटल बनाने का खर्च भी साढ़े चार हजार रुपए से अधिक नहीं बैठता है। अगर इन्होंने नियमों के तहत काम कराया होता, तो बारह सौ रुपए प्रति वर्ग गज से अधिक नहीं आती। मगर ये घोटाले करते रहे और खुद को साफ-सुथरा बताते रहे। इनका यही चल रहा है।

निर्भय कुमार पांडेय : दिल्ली में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर सवाल उठते रहते हैं। केजरीवाल कहते हैं कि अगर पुलिस हमारे पास होती, तो हम इस पर काबू पा लेते। इस पर आपका क्या कहना है?
’अगर उनके पास पुलिस होती, तो शायद दिल्ली में अब तक आतंक का माहौल होता। दिल्ली में हर व्यक्ति की जिम्मेदारी होनी चाहिए कि वह अपने आसपास होने वाले अपराध की सूचना पुलिस को दे। आज दिल्ली में करीब एक लाख पुलिस बल है। हम सोचें कि वह हर आदमी की मानसिकता को ही बदल देगी, तो ऐसा संभव ही नहीं है। अगर किसी महिला के साथ कोई अपराध होता है, तो लोग अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाते, पुलिस को सूचना नहीं देते, कोई मदद नहीं करते। जब हर आदमी अपनी जिम्मेदारी समझने लगेगा तो दिल्ली में सुरक्षा का माहौल हो जाएगा। दिल्ली के मुख्यमंत्री ने कहा था कि यहां की बसों में सुरक्षाकर्मी तैनात करेंगे, पर उन्होंने इस दिशा में कोई एक काम किया हो तो बता दीजिए।

मृणाल वल्लरी : दिल्ली पर पहले ही अनियोजित ढांचों का भारी दबाव है। ऐसे में अनधिकृत कॉलोनियों को नियमित करने के फैसले का क्या प्रभाव पड़ेगा?
’हम अनधिकृत नहीं बोलते हैं उसे। वह कॉलोनी है। वह अनधिकृत इसलिए बनी कि डीडीए का काम था दिल्ली में लोगों को घर देना। वह नहीं दे पाया। लोग बाहर से आते गए, उन्हें रहने को घर तो चाहिए। डीडीए तो घर दे नहीं रहा था, तो लोग कहीं तो घर बनाएंगे। तो गांवों में जितने भी खेत थे, वहां पर उन्होंने कॉलोनियां बसानी शुरू कर दीं। निजी जमीन थी, लोगों ने पैसा दिया और वहां पर अपने मकान बनाए। इसलिए वे अनधिकृत नहीं हैं। डीडीए ने उनका नक्शा पास नहीं किया, बस इतनी बात है। आज डीडीए उनका नक्शा पास कर रही है। यह दिल्ली वालों के लिए बहुत बड़ी सौगात है। उन कॉलोनियों में सड़क, सीवर, पानी वगैरह का बंदोबस्त हो सकेगा।

सूर्यनाथ सिंह : आप कॉलोनियों को अनधिकृत नहीं मानते, मगर कहीं मस्जिद बन गई है, तो उसे अनधिकृत क्यों मानते हैं? फिर यह कि अगर केजरीवाल चुनाव के मद्देनजर फैसले और घोषणाएं कर रहे हैं, तो केंद्र ने भी तो चुनाव के समय ही अनधिकृत कॉलोनियों को नियमित करने का फैसला किया है। यह कहां तक उचित है?
’मैं हर उस चीज को अवैध मानता हूं, जो सरकारी जमीन पर कब्जा करके बनाई गई है। मेरे ही लोकसभा क्षेत्र में पचास से ज्यादा मस्जिदें सरकारी जमीन पर कब्जा करके बनी हैं। लोगों ने कहा कि आपने मंदिर क्यों नहीं कहा? तो मैंने कहा कि कोई एक भी मंदिर ऐसा दिखा दो जो सरकारी जमीन पर कब्जा करके बनाया गया हो। कोई नहीं दिखा। खुद अल्पसंख्यक समिति मान चुकी है कि उस क्षेत्र में पैंतीस मस्जिदें सरकारी जमीन पर कब्जा करके बनाई गई हैं। बाकी बीस मस्जिदों के बारे में उनका कहना है कि वे भी सरकारी जमीन पर बनी हैं। पर उन्होंने डीडीए के पास आवेदन किया है कि उन्हें वह जमीन आबंटित कर दी जाए। ऐसा कहीं होता है क्या? अनधिकृत कॉलोनियों को नियमित करने की जिम्मेदारी दिल्ली सरकार की थी, पर जब उसने नहीं किया, तो केंद्र को यह कदम उठाना पड़ा। इससे यही संकेत दिया गया कि लोगों को झूठे सपने मत दिखाओ कि मैं इन कॉलोनियों के नक्शे पास करूंगा। इसे खत्म करने के लिए ही भारत सरकार ने अपने अधिकारों का इस्तेमाल किया।

पंकज रोहिला : दिल्ली में एक और बड़ी समस्या है सीलिंग की। इस पर आप क्या कहेंगे?
’दिल्ली में मॉल बनाने के लिए जमीनों की नीलामी 2004-2005 में शुरू हुई थी। जब ये मॉल बन गए, तो उनकी दुकानें नहीं बिक रही थीं। फिर सारे बिल्डर इकट्ठा हो गए। उन्होंने दबाव बनाया कि जहां भी रिहाइशी इलाकों में दुकानें चल रही हैं, उन्हें बंद कर दो ताकि लोग मजबूर होकर शॉपिंग मॉल में भागें। तो 2006 में निगरानी समिति बन गई। उसने इस तरह की सारी दुकानों को सील करने का आदेश दे दिया। फिर शॉपिंग मॉल वालों ने अपनी दुकानों की कीमतें बढ़ा दीं। फिर जब भाजपा की सरकार आई, तो जो सीलिंग की गई थी, उसे खोल दिया। तो लोग वापस शॉपिंग मॉल छोड़ कर भागे। 2006 में जो निगरानी समिति बनी थी, वही आज तक चल रही है। मैं कहता हूं उसे भंग कर देना चाहिए।

आर्येंद्र उपाध्याय : केंद्र सरकार अनुच्छेद 370 को खत्म करना अपनी बड़ी उपलब्धि मानती है। महाराष्ट्र और हरियाणा के विधानसभा चुनावों में इसे बड़ा मुद्दा बनाया गया, मगर इसका असर कुछ खास नहीं दिखा। इसकी क्या वजह है?
’हरियाणा में भाजपा का जलवा नया है। जब पिछली बार हमने सरकार बनाई, तो हमारी सैंतालीस सीटें थीं। तो एक ऐसा राज्य जहां हमारी कभी सरकार ही नहीं रही, वहां हमने पांच साल सरकार चलाई और हमारी सीटें सैंतालीस से घट कर चालीस हो गर्इं, तो मैं नहीं मानता कि हमारा कोई बहुत बड़ा घाटा हो गया। महाराष्ट्र में भी हमारा प्रदर्शन बुरा नहीं रहा। इन दोनों राज्यों में हमारा प्रदर्शन और अच्छा हो सकता था, अगर हमारा टिकट वितरण का प्रबंधन और अच्छा होता।

अरविंद शेष : अभी बनारस में संस्कृत के एक मुसलिम अध्यापक को लेकर भाजपा की छात्र इकाई के विद्यार्थी विरोध कर रहे हैं, इसे आप कैसे देखते हैं?
’मैं हर धर्म में विश्वास करता हूं। भाजपा कभी बांटने की राजनीति नहीं करती है। चाहे वह तीन तलाक का मामला था, राम मंदिर का मामला था या फिर अनुच्छेद 370 का मामला था, ये ऐसे मामले थे जिनकी वजह से देश आगे नहीं बढ़ पा रहा था। इसलिए इन मुद्दों को हमने खत्म किया। बाकी दूसरे राज्यों में कहां क्या हो रहा है, वहां की सरकारें उसे देखेंगी।

पंकज रोहिला : जेएनयू में जो चल रहा है, उस पर आपकी क्या राय है?
’जैसे जेहाद में लोगों का माइंड वॉश हो जाता है, वैसे ही जेएनयू में बच्चों का माइंड वॉश हो जाता है। निस्संदेह वहां से कई गणमान्य लोग पढ़ कर निकले हैं, पर जब विवेकानंद की मूर्ति का अपमान होता है, तो उससे जाहिर है कि लोगों का माइंड वॉश होता है, लोगों को वहां जहर पिलाया जाता है। हमारी पूरी कोशिश है कि वहां का माहौल ठीक हो जाए।

मुकेश भारद्वाज : वहां फीस बहुत ज्यादा बढ़ा दी गई। उस पर आप क्या कहना चाहते हैं?
’बहुत सारे लोग कहते हैं कि जहां के बच्चे यह बोलते हैं कि भारत माता तेरे टुकड़े होंगे, वहां करदाता का पैसा क्यों लगाया जा रहा है। वहां इतनी सबसिडी दी जा रही है। अगर कोई भी संस्थान अपने पैरों पर खड़Þा हो जाए, तो इसमें किसी को आपत्ति क्यों होनी चाहिए? देश के किसी भी संस्थान को सबसिडी नहीं मिलनी चाहिए, सबको अपने पैरों पर खड़ा होना चाहिए।

मृणाल वल्लरी : जब सारी सबसिडी ही खत्म हो जाएगी, सरकारी कंपनियों को बेच दिया जाएगा, तो फिर लोकतंत्र में सरकार की क्या भूमिका होगी?
’मैं तो कहता हूं कि अशोका होटल, सम्राट होटल को भी बेच देना चाहिए। सरकार को होटल क्यों चलाना चाहिए। लोगों के कर का पैसा किसी होटल में लगाने में सरकार की रुचि ही क्यों होनी चाहिए। वह हर ऐसा क्षेत्र, जिसमें हमारी आंतरिक सुरक्षा को चुनौती नहीं मिलती हो, उसका निजीकरण कर देना चाहिए।

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