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बारादरी: नाटक सिर्फ मनोरंजन की वस्तु नहीं

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के निदेशक और मकबूल रंगकर्मी वामन केंद्रे का मानना है कि सिनेमा और इंटरनेट से जुड़े मनोरंजन के माध्यमों ने आम लोगों को रंगमंच से दूर किया है। दुनिया के किसी भी देश में नाटकों के लिए आदर्श स्थिति नहीं है। उन्होंने कहा कि हमने भरत मुनि से लेकर मोहन राकेश जैसे नाटककारों को कभी दुनिया के सामने रखने का प्रयास नहीं किया। एनएसडी की अगुआई में इस बार आठवें थिएटर ओलंपिक्स की मेजबानी भारत कर रहा है, इसी बहाने लोक बनाम रंगमंच पर बातचीत और बहस भी शुरू हुई। जनसत्ता बारादरी में कार्यक्रम का संचालन किया कार्यकारी संपादक मुकेश भारद्वाज ने।

मनोज मिश्र : नाटकों से लोगों का जुड़ाव कम हो रहा है। इसकी क्या वजह है और इसे बढ़ाने के लिए क्या प्रयास होने चाहिए?

वामन केंद्रे : इसमें कोई दो राय नहीं कि जो नाटक पहले मनोरंजन का मुक्त माध्यम हुआ करता था, अब सांस्कृतिक परिदृश्य में उसकी जगह सिकुड़ती गई है। इसकी एक सामान्य वजह यह है कि अब टेलीविजन, फिल्म, यू-ट्यूब, सोशल मीडिया जैसे मनोरंजन के अनेक माध्यम विकसित हो गए हैं। मगर यह सच नहीं है कि नाटकों में लोगों की दिलचस्पी कम हो रही है। हां, यह सच जरूर है कि लोगों के पास अब विकल्प ज्यादा हैं। घर बैठे मनोरंजन के अनेक साधन उपलब्ध हैं। ऐसे में अब हमारे सामने चुनौती है कि कैसे लोगों में नाटकों के प्रति जुड़ाव पैदा किया जा सके। तो, इस दिशा में पिछले कई सालों से राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय बहुत सक्रिय रूप से काम कर रहा है। पिछले उन्नीस सालों से हम लगातार एक अंतरराष्ट्रीय स्वरूप का भारत रंग महोत्सव करते हैं। लेकिन पिछले तीन-चार सालों से हमें लग रहा था कि इतना करने के बाद भी भारतीय नाटक की दुनिया में कोई पहचान नहीं बन पाई है। जबकि भारतीय नाट्य परंपरा दुनिया की कुछ प्राचीन नाट्य परंपराओं में से है। जैसे ग्रीक नाटक के समांतर हमारा भी नाटक है। हमारे पास संस्कृत शैली के नाटक हैं, लोक नाटक हैं, जनजातीय नाटक हैं। इतना कुछ होने के बावजूद हमारा नाटक भारत की सीमाएं लांघ कर बाहर नहीं जा पा रहा है। इसकी बड़ी वजह यही है कि हम जागरूक नहीं हैं। जिस तरह ब्रिटिश समाज ने शेक्सपियर को दुनिया भर में प्रतिष्ठित किया, उसके लिए प्रयास किया वैसा हमारे यहां नहीं हो पाया। इसी तरह बर्तोल्त ब्रेख्त के नाटकों को जर्मनी के समाज और सरकार ने अपने प्रयास से दुनिया भर में पहुंचाया। ऐसे उदाहरण नार्वे और रूस के भी हैं। पर हमारे यहां कोई ऐसा नाटककार या रचनाकार नहीं है, जिसे दुनिया के सामने हमने रखने का प्रयास किया। हमारे यहां इतनी सारी गहराई है, इतना सारा वैविध्य है, इतने सारे साहित्यिक मूल्य हैं। भरत मुनि का नाट्यशास्त्र दुनिया भर में मानक हो सकता है। पर हमने कभी उसे दुनिया के सामने नहीं रखा। कालिदास, भवभूति, भास, शूद्रक जैसे नाटककारों, उनके आगे रवींद्रनाथ ठाकुर, भारतेंदु हरिश्चंद्र, जयशंकर प्रसाद, प्रेमचंद, गिरीश कर्नाड, बादल सरकार, मोहन राकेश जैसे रचनाकारों को हमने दूर-दराज तक पहुंचाने का प्रयास नहीं किया। इसी तरह हमने नाट्य निर्देशकों को दुनिया के पटल पर लाने का प्रयास नहीं किया, जबकि उनमें अनेक श्रेष्ठ नाम हैं। ऐसे में हमने सोचा कि कुछ करके दुनिया का ध्यान अपनी तरफ आकर्षित करने की जरूरत है। इसलिए हमने थिएटर ओलंपिक्स के बारे में सोचा। रूस, चीन, जापान, अमेरिका आदि कर सकते हैं तो हम क्यों नहीं। इस तरह जो सांस्कृतिक जगह हमने खोई है, उसे पाने के लिए हम कोशिश कर सकते हैं। देश भर में चल रहे इस आयोजन से जुड़ी अभी तक जो खबरें आ रही हैं, उससे पता चल रहा है कि लोग इसे लेकर उत्साहित हैं, इससे जुड़ रहे हैं।

सूर्यनाथ सिंह : तमाम प्रयासों के बावजूद हकीकत यह है कि कुछ बड़े शहरों को छोड़ दें तो देश भर में कायदे के थिएटरों की कमी है, जहां रंगकर्मी अपने ढंग से नाटक खेल सकते हैं। ऐसे में क्या भारतीय रंगमंच की अंतरराष्ट्रीय पहचान बन पाएगी?
’नाटक के मामले में किसी भी देश में आदर्श स्थिति नहीं है। वे चाहे विकसित देश ही क्यों न हों। जो व्यावसायिक थिएटर करने वाले हैं, उनके लिए तो सब कुछ है, पर प्रयोगधर्मी थिएटर, नई खोज करने वाले थिएटर, नई दिशा में जाने वाले थिएटर, नए तरीकों को ढूंढ़ने वाले थिएटर के लिए दुनिया में कहीं भी आदर्श जगह नहीं है। यह दुर्भाग्य है। पर हमारे देश में वह होनी चाहिए। कम से कम जिला मुख्यालयों में तो एक अच्छा थिएटर होना चाहिए। क्योंकि जैसे ही एक थिएटर बन जाता है, वहां गतिविधियां शुरू हो जाती हैं। हमें भी इस समस्या का बहुत सामना करना पड़ा। जब हम चाहते थे कि यह थिएटर ओलंपिक्स आयोजन सिर्फ दिल्ली में सिमट कर न रह जाए, और राज्यों में भी जाए, तो हमारी परेशानी यही थी कि हम अंतरराष्ट्रीय मंडली को तो बुला रहे हैं, पर वहां थिएटर है क्या? कई जगह पर ऐसे थिएटर नहीं मिले, इसलिए वहां कार्यक्रम करने का विचार छोड़ना पड़ा। यह एक सच्चाई है कि हमारे पास बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं। पर जब सुविधाएं होंगी, तब होंगी, तब तक के लिए हम हाथ पर हाथ धरे बैठ नहीं सकते। जो है, उसे ठीक करने का प्रयास किया गया है, बेहतर से बेहतर बनाया गया है। तो, हम सरकार से भी विनती कर रहे हैं कि वह देश में नाटक के लिए आदर्श मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराए।

मीना : आपके यहां से जो बड़े कलाकार निकले हैं, उनका उपयोग इन कामों के लिए क्यों नहीं करते?
’देखिए, एनएसडी एक छोटी संस्था है। हम थोड़े-से विद्यार्थियों के लिए जगह बना पाते हैं। इसके बावजूद इतना कुछ कर रहे हैं, यही बड़ी बात है। लोग कहते हैं कि यह फेस्टीवल करने वाला संस्थान बन गया है। अरे, जब नाटक ही नहीं करोगे, तो क्या करोगे! उस संस्था का प्रभाव पूरे देश में जाना है, तो उसका दूसरा तरीका क्या हो सकता है। और जहां तक थिएटर से निकले बड़े कलाकारों की बात है, निस्संदेह उनका दाय तो इस तरफ बनता है। पर इसके लिए बड़ी पहल की जरूरत है। कुछ प्रयास पहले हुए, पर उनका कोई नतीजा नहीं निकला।

मृणाल वल्लरी : यथार्थ और लोक संस्कृति की बात तो की जा रही है लेकिन कुछ दिनों से थिएटर में भी यथार्थ और लोक की भाषा बर्दाश्त नहीं की जा रही, नाटककारों तक पर मुकदमे हो रहे।
’इसके लिए एक उदाहरण देता हूं। सखाराम बाइंडर नाटक को लेकर पूरे महाराष्ट्र में विरोध हुआ। उस पर बहुत दबाव डालने की कोशिश हुई। इसी तरह मेरा जुलुवा नाटक था। जो लड़कियां येल्लेमा देवी को चढ़ाई जाती हैं, वे देवदासी से अलग हैं, वे तो घर वापस जा नहीं सकतीं, उस रास्ते पर सेवा के लिए कटिबद्ध होना पड़ता है। सेवा क्या! जो भी पुरुष आए, उसका मनोरंजन करना! जिस तरीके से भी वह चाहता है। ऐसी स्थिति में जब हम उनके ऊपर नाटक करना चाहते थे, एनएसडी में तो उसमें से करीब तीन चौथाई संवाद काटने को कहा गया। तब हमने विनती की कि आप उत्तेजना पैदा करने वाले संवाद काटें, वह तो ठीक, पर जो संवाद उस चरित्र से जुड़े हैं, उसे उभारते हैं, उसे कैसे चित्रित किया जा सकता है। उन पात्रों के मुंह से संस्कृत तो नहीं बुलवाया जा सकता। कहने का तात्पर्य यह कि जो विषय की मांग है, उसे न रोका जाए। एक कलाकार के रूप में हमारी भी तो कोई नैतिकता है, हम उसका पालन करते हैं। जैसे हमारे यहां नग्नता को मंजूरी नहीं दी जा सकती, पर बैंडिट क्वीन में से उसे हटा देंगे, तो फिर बात कैसे बनेगी। वह तो उसकी आत्मा है। अगर उस चरित्र की बोली की जरूरत है, तो वह वैसे ही बोलेगा। और मुझे लगता है कि उसे वैसे बोलने में किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। आप रास्ते में जो भाषा सुनते हैं और रास्ते का चरित्र अगर मंच पर आ रहा है, तो वह वही भाषा बोलेगा न!

प्रीती जायसवाल : पहले नाटक लोगों को जोड़ते थे, अब वे धीरे-धीरे संभ्रांत लोगों के बीच सिमटता गया है। नाटक से लोगों को जोड़ने के लिए क्या प्रयास होने चाहिए?
’आज एक चलन यह बन गया है कि जो ग्लैमरस लोग हैं, उन्हें नाटक में लाकर लोकप्रियता बढ़ाई जाए। ऐसे नाटक को हम नाटक नहीं मानते। नाटक तो एक आम आदमी के बीच की चीज है। उसमें अगर आम आदमी नहीं हिलेगा-डुलेगा, आएगा-जाएगा, कुछ करेगा, देखेगा, तब तक नाटक नाटक नहीं होता। जो पांच हजार, दस हजार रुपए के टिकट वाले नाटक होते हैं, वे अपवाद हैं, सीरी फोर्ट आडिटोरियम में होते हैं। मगर जो नाटक श्रीराम सेंटर में होता है, अभिमंच में होता है, उसका अधिकतम दो सौ और न्यूनतम पचास रुपए टिकट होता है। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय इस समस्या से लगातार जूझ रहा है कि वह कैसे आम आदमी के नाटक को उस तक पहुंचाए, प्रोत्साहित करे। इसलिए इस बार हमने दिल्ली में ज्यादातर क्षेत्रीय भाषाओं के नाटकों का मंचन रखा। क्योंकि हिंदी का नाटक तो यहां साल भर होता है। नाटक को नाटक की तरह देखने की आदत जब तक हम नहीं डालेंगे, तब तक नाटक को बल नहीं मिलेगा। हमारी पहचान सिनेमा के स्टार से नहीं, थिएटर के स्टार से होनी चाहिए।

मृणाल वल्लरी : नाटक लेखन के मामले में हम मोहन राकेश के बाद जैसे ठहर से गए हैं। पठकथा लेखन में हम कमजोर क्यों हो रहे हैं?
’दरअसल, हमें पहले यह समझना पड़ेगा कि किस भाषा में यह स्थिति है। भारत कई टुकड़ों में बंटा हुआ है। उसकी परंपराएं, संस्कृति की अनेक शृंखलाएं हैं। अभी महाराष्ट्र में पांच पीढ़ी के नाटककार अब भी लिख रहे हैं। रत्नाकर मदकरी, सतीश आलेकर, महेश एलकुंचवार, शफात खान, जयंत पवार, संजय पवार, प्रशांत दल और बिल्कुल युवा लेखक वहां लिख रहे हैं। क्योंकि वहां नाटक करने की परंपरा है और वहां बॉक्स आफिस पर नाटक बिकता है। यानी जो लिख रहा है उसे भरोसा है कि कोई उसका नाटक खेलेगा। इसी तरह बंगाल, कर्नाटक, गुजरात में नाटक लिखा जा रहा है। तो, एक सच्चाई यह है। और दूसरी सच्चाई यह भी है कि मोहन राकेश के बाद नाटक लिखने की परंपरा कुछ कमजोर जरूर दिखती है, पर आज भी सुरेंद्र वर्मा, नंदकिशोर आचार्य जैसे लोग सशक्त नाटक लिख रहे हैं। पर जहां तक नाटक लेखन में आंदोलन की बात है, वह तब होगा, जब उसे करने वालों के बीच आंदोलन होगा। दुर्भाग्य से हिंदी क्षेत्र में नाटक समाज के जनजीवन का हिस्सा अभी भी नहीं बन पाया है। इसीलिए उसमें नाटक लिखने की परंपरा क्षीण है।

सूर्यनाथ सिंह : थिएटर में आमतौर पर अभिनय और निर्देशन को ही अधिक महत्त्व मिल पाता है, जबकि प्रकाश व्यवस्था, मंच सज्जा, ध्वनि प्रभाव आदि दूसरे आनुषंगिक विषय भी हैं। उन पर इतना जोर क्यों नहीं दिया जा पाता?
’इन सबके लिए हमारे यहां तीन साल का एक विशेष पाठ्यक्रम है। स्टेज डिजाइनिंग ऐंड स्टेज टेकनीक्स। अभी हमारे पास पच्चीस से तीस बहुत दक्ष डिजाइनर हैं, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्यात हैं। हमारी ही फैकल्टी में चार-पांच लोग मंच सज्जा की विशेषज्ञता वाले लोग हैं। यहां तक कि फिल्म उद्योग में वस्त्र सज्जा आदि में जो महत्तवपूर्ण काम हो रहे हैं, उनमें से ज्यादातर एनएसडी से गए हुए लोग कर रहे हैं। यहां तक कि जो बड़े-बड़े इवेंट हो रहे हैं, इन्नोवेशन हो रहे हैं, वे थिएटर के लोग कर रहे हैं। रतन थियाम भी प्रकाश व्यवस्था के विशेषज्ञ हैं। ऐसे बहुत से लोग हैं। इसके अलावा हम यह भी पढ़ा रहे हैं कि न्यू मीडिया के प्रभाव से कैसे पार पाना है।

राजेंद्र राजन : आपका नाम दलित थिएटर से भी जोड़ा जाता है। क्या वजह है कि साहित्य में तो दलित आंदोलन सक्रिय है, पर थिएटर में नहीं दिखाई देता?
’किसी समय लगा था कि दलित संवेदना, दलित वेदना को एक मंच पर लाने की जरूरत है, जिसकी शुरुआत दरअसल, साहित्य से ही हुई। बहुत सारा साहित्य लिखा गया, तब दलित थिएटर आंदोलन की भी शुरुआत हुई, जिससे जुड़ने का मुझे मौका मिला। कुछ समय तक यह आंदोलन तो चला, पर जिस स्तर पर उसे जाना चाहिए था, वह नहीं हुआ। साहित्य में तो चलता रहा, पर नाटक की पकड़ से वह कहीं न कहीं छूट गया। इसके पीछे अभाव भी एक वजह हो सकती है। दलित बस्ती में जाकर उसकी समस्या को पेश करने से बात नहीं बनेगी, उसे मुख्यधारा के नाटक से जोड़ने की जरूरत है। उस आंदोलन ने एक अंगड़ाई जरूर ले ली है, अब लोग उसे मुख्यधारा थिएटर में लेकर आ रहे हैं। महाराष्ट्र में दलित थिएटर के बजाय बोधि थिएटर के रूप में वह काम कर रहा है। पर दूसरे राज्यों में जो होना चाहिए वह नहीं हो रहा।

मुकेश भारद्वाज : क्या नाटक से कोई आंदोलन संभव है?
’चाहे वह साहित्य हो, नाटक हो, सिनेमा, चित्रकला या दूसरी कलाएं हों, वे आंदोलन खड़ा करने का माध्यम बनें न बनें पर यह बात जरूर है कि इनके जरिए आदमी को संवेदनशील बनाया जा सकता है। उसको परिवर्तन की भाषा सिखाई जा सकती है। उसे प्रभावशाली संवाद की भाषा सिखाई जा सकती है। मुझे लगता है कि नाटक में एक अर्थवत्ता होनी जरूरी है। जब तक अर्थवत्ता नहीं होगी, तब तक वह नाटक, नाटक नहीं होता। वह सतही स्तर का मनोरंजन भर करके रह जाएगा। मैं समझता हूं कि श्रेष्ठ साहित्य या नाटक वह है जिसे पढ़ने या देखने के बाद आप उसे अपनी स्मृति से चाह कर भी मिटाना चाहें तो न मिटा पाएं। वही कला का मूल उद्देश्य है।

वामन केंद्रे
रंगमंच को वृहत्तर मनुष्यता का छोटा-सा हिस्सा मानने वाले नाटककार वामन केंद्रे किसान से लेकर कामगार तक के खांचे में फिट बैठते हैं और किसी खास सांचे में कैद भी नहीं दिखते। थिएटर को लोकतांत्रिक संस्था मानने वाले केंद्रे बीस गुणा तीस के आधुनिक स्टेज पर भरत मुनि के नाट्य वैभव के लिए सामयिक रंगभाषा बनाने में जुटे हैं। जिस देश में कई किलोमीटर के दायरे में फैला मैदान रामलीला के दर्शकों के लिए छोटा पड़ जाता है वहां थिएटर को लोक से जोड़ने की कोशिश में रंगकर्म को एक आंदोलन की तरह शुरू किया। भास की शास्त्रीयता से लेकर देवदासियों और हिजड़ों तक की वेदना को रंगकर्म से जोड़ा। हिंदी और मराठी नाटकों की खास पहचान हैं, तो केरल के अनुष्ठानपरक नाट्य के शोधार्थी भी। इनका नाटक ‘गजब तेरी अदा’ युद्ध के खिलाफ उठी श्रेष्ठ रचनात्मक आवाजों में से एक माना जाता है। मोहे पिया, जुलुवा, जानेमन, गधे की बारात, सैंया भए कोतवाल, लागी लगन जैसे नाटकों के रचयिता हैं और देश में रंगकर्म से जुड़ी कई संस्थाओं में अहम भूमिका निभा चुके हैं। अभी राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) के निदेशक केंद्रे ने आठवें थिएटर ओलंपिक्स की मेजबानी भारत को दिलाने में अहम भूमिका निभाई है।

प्रस्तुति: सूर्यनाथ सिंह / मृणाल वल्लरी

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