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बारादरी: कांग्रेस के भगवा आतंकवाद के कुप्रचार का लाभ मिला पाकिस्तान को

विश्व हिंदू परिषद के कार्यवाहक अध्यक्ष आलोक कुमार का कहना है कि राम जन्मभूमि पर भव्य मंदिर बनाने का आंदोलन अपनी परिणति तक पहुंच रहा है और इसमें भटकाव की कोई बात नहीं है। अदालत में विचाराधीन इस मसले पर उन्होंने कहा कि अगर फैसला अनुकूल नहीं आया तो देश की जनता संसद से आग्रह करेगी कि वह कानून बनवाए। बारादरी का संचालन किया कार्यकारी संपादक मुकेश भारद्वाज ने।

आर्येंद्र उपाध्याय : विश्व हिंदू परिषद में चुनाव की परंपरा नहीं रही है। इस बार चुनाव हुए, तो इसके पीछे क्या कारण था?

आलोक कुमार : सहमति बनना, एक परंपरा की बात है। चुनाव होना एक संवैधानिक व्यवस्था है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में भी हर तीन साल पर नियमित और ईमानदारी से चुनाव होता है। यह भी सच है कि उसमें कंटेस्ट नहीं हुआ। ऐसा कोई अवसर नहीं आया, जब दो प्रत्याशी हों। हम लोग मिलजुल कर तय कर लेते हैं। इस बार भी हमने प्रयत्न किया, और मिलजुल कर आम सहमति नहीं बन पाई। तो संवैधानिक व्यवस्था है। दो लोगों ने कहा कि हम तो जरूर लड़ेंगे, तो चुनाव हो गया। विश्व हिंदू परिषद जैसे आध्यात्मिक संगठन में चुनाव हो, इसका दुख है। पर संविधान की व्यवस्था में वह अपरिहार्य हो जाए, तो कराना भी पड़ेगा।

मनोज मिश्र : प्रवीण तोगड़िया ने अभी कहा है कि जिन मुद्दों को लेकर विश्व हिंदू परिषद की स्थापना हुई थी, सरकार उसे उन मुद्दों से भटका रही है। इस पर आपका क्या कहना है?
’मुझे लगता है कि चुनाव में हारने के बाद कुछ गुस्सा उपजता है। इस गुस्से में कुछ दृष्टिकोण संकीर्ण हो जाता है और कुछ खीज में ऐसी बातें कही जाती हैं। विश्व हिंदू परिषद सरकार के तहत काम नहीं करती। इसलिए हम अपने किसी भी मुद्दे पर किसी भी तरह से भटक नहीं रहे हैं। अदालत में सुनवाई शुरू हो गई है। और ऐसी संभावना हम देख रहे हैं कि इस तरह की सुनवाई अगर नियमित चली, तो पूरी हो जाएगी। हमारे वकीलों की ऐसी समझ है कि हमारा केस बहुत अच्छा है, और हम विजयी होंगे। अदालत से विजय होती है तो उसके द्वारा और अगर कोर्ट का निर्णय कुछ ऐसा आता है कि उसमें कानून की आवश्यकता है, तो देश की जनता संसद से आग्रह करेगी कि वह कानून बनाए। मुझे लगता है कि राम जन्मभूमि पर भव्य मंदिर बनने का आंदोलन अपनी परिणति तक पहुंच रहा है। इसमें भटकाव की कोई बात नहीं है।

मुकेश भारद्वाज : जब तय है कि राम मंदिर का निर्माण कोर्ट के फैसले से होना है, तो भारतीय जनता पार्टी हर बार अपने चुनाव घोषणा-पत्र में यह क्यों कहती है कि हम मंदिर बनवा देंगे? जब पता है कि आप बनवा ही नहीं सकते, तो लोगों को गुमराह करने वाली बात क्यों करते हैं?
’अभी मैंने कहा कि अगर कोर्ट का फैसला अनुकूल नहीं आया तो देश की जनता संसद से आग्रह करेगी कि वह कानून बनाए। वह फैसला अनुकूल आएगा, ऐसा अंदाजा है। जहां तक भारतीय जनता पार्टी से जुड़ा प्रश्न है, उसका जवाब आपको उनसे लेना होगा। मैं उनका कोई प्रवक्ता नहीं हूं।

अजय पांडेय : मंदिर का मामला अदालत में चले जाने और उसमें सक्रियता कम दिखने की वजह से क्या विश्व हिंदू परिषद की प्रासंगिकता कम हुई है?
’मैं इस बात से सहमत नहीं हूं कि हमारा आग्रह कम हुआ है। हमारा आग्रह उतना ही बलवती है। राम मंदिर बनाने के लिए जितनी र्इंटों की जरूरत है, वे सब गांव के लोगों ने पूजित करके भेजी हैं। जितने खंभे चाहिए, वे सब वहां शिल्पित हो चुके हैं। वकीलों का एक बड़ा दल सुप्रीम कोर्ट में लड़ने की तैयारी के साथ है। मैं समझता हूं कि जो-जो लोकतांत्रिक कदम होने चाहिए थे और हमारी परंपराओं से सुसंगत होने चाहिए थे, वे सब हम उठा रहे हैं। यह आग्रह हमारा बिल्कुल कम नहीं हुआ है।

मृणाल वल्लरी : अक्सर देखा जाता है कि नेतृत्व परिवर्तन के साथ संगठन में कुछ बदलाव आते हैं। तो क्या यह उम्मीद की जाए कि प्रवीण तोगड़िया के बाद संगठन में कुछ बदलाव आएंगे?
’नेतृत्व बदला है, एजंडा नहीं बदला है। यह बात ठीक है कि तोगड़िया जी की और मेरी कोई तुलना नहीं है। मैं इसे बड़ी विनम्रता से स्वीकार करता हूं। वे हाई प्रोफाइल थे, हाई फ्लाइंग थे। विश्व हिंदू परिषद में सबसे बड़ा, ऊंचा दिखने का उनका स्वभाव था। मैं हाई फ्लाइंग नहीं हूं, लो प्रोफाइल हूं। एक टीम वर्क से विश्व हिंदू परिषद का नेतृत्व सामूहिक काम करेगा। मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूं कि मेरी साधारणता बनी रहे। इसलिए शैली का अंतर तो होगा, पर एजंडे का बिल्कुल नहीं होगा।

पारुल शर्मा : मान कर चला जाता है कि विश्व हिंदू परिषद पर भाजपा का सीधा प्रभाव पड़ता है, फिर आप कैसे अपने को उससे अलग करते हैं?
’देखिए, कांग्रेस जो करती है, उसका भी असर हम पर पड़ता है। यह बात ठीक है कि राष्टÑीय स्वयंसेवक संघ के विचारवान कार्यकर्ता भाजपा में काम कर रहे हैं, यहां भी कर रहे हैं। इस मामले में हम एक हैं, पर हम अलग संगठन हैं। हम अपनी नीतियों का निर्धारण करते हैं। उनके बारे में प्रश्नों का उत्तर वे देंगे, हमारे बारे में प्रश्नों का उत्तर हम देंगे।

मृणाल वल्लरी : आपको नहीं लगता कि यह थोड़ी सुविधा की बात है? जब सत्ता में भागीदारी करनी हो, तब तो भाजपा के साथ रहेंगे, पर जब उनसे जुड़े किसी मुद्दे पर जवाब देना हो तो अलग हो जाएंगे!

’मुझे यह सुविधा नहीं लगती। हम अपने-अपने क्षेत्रों की मर्यादा का पालन करते हैं। राजनीति में काम करने वाला कोई व्यक्ति हमारे यहां कार्यकर्ता नहीं हो सकता। जहां-जहां देशहित में तालमेल करने की आवश्यकता है, पूरे संघ परिवार के लोगों ने कांग्रेस की सरकारों के साथ भी काम किया है। 1965 की लड़ाई से पहले स्वयं प्रधानमंत्री ने उस समय के सर संघ संचालक से बात की थी। उनके युद्ध प्रयत्नों में हम सब शामिल हुए। 1962 के आक्रमण में स्वयंसेवकों ने जो मदद की थी, उसके बाद 1963 के छब्बीस जनवरी के जुलूस में सरकार ने आमंत्रित कर राष्टÑीय स्वयंसेवक संघ के लोगों को भाग लेने के लिए आमंत्रित किया था। राष्ट्रहित में हम सबसे तालमेल करते हैं, भाजपा से भी तालमेल करते हैं। और जहां सरकार को चेताने की आवश्यकता पड़ेगी, वहां हम वह भी करेंगे। इसलिए हमारे बीच में जो दूरी है, वह मूलभूत दूरी है।

अरविंद शेष : मौका मिलेगा तो क्या आप कांग्रेस के साथ काम करेंगे?
’बिल्कुल। राष्ट्रहित के मुद्दों पर करेंगे। मगर सवाल है कि कांग्रेस इसे स्वीकार करेगी कि नहीं। हम हिंदू संगठन हैं और हिंदुओं के मुद्दों को व्यापक स्तर पर उठाते हैं। हम उन सभी लोगों की बात उठाते हैं, जो भारतीय हैं। इसलिए अगर कांग्रेस साझा मुद्दे पर काम करना चाहती है, तो हम उसका समर्थन करेंगे।

मनोज मिश्र : आप लोगों का फोकस सिर्फ राम मंदिर पर क्यों है, जबकि देहदान जैसे अभियान भी छेड़ रखे हैं। ऐसे मसलों पर आपका ध्यान केंद्रित क्यों नहीं हो पाता।

’दरअसल, जब हम कोई आंदोलन छेड़ते हैं तो उस पर तो लोगों का ध्यान बहुत जाता है, पर हम दूसरे कई महत्त्वपूर्ण काम कर रहे हैं, उस तरफ लोग ध्यान नहीं देते। हम पचास हजार से ज्यादा गांवों में एकल विद्यालय भी चलाते हैं। इसके अलावा हमने झोला डॉक्टर बनाए हैं, जो नियमित डॉक्टर नहीं हैं, पर गांव में आपातकालीन सेवाएं देते हैं, जो प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों का काम है। दस हजार से ज्यादा गांवों में हम यह काम करते हैं।

अजय पांडेय : आप समरसता कायम करने की बात करते हैं, पर हमारे समाज में आज भी ऐसे वर्ग हैं, जिनके बच्चे घोड़ी पर बैठ कर बारात नहीं निकाल सकते। क्या इस मामले में विश्व हिंदू परिषद को कोई भूमिका नहीं निभानी चाहिए?

’बिल्कुल निभानी चाहिए। इससे बड़े शर्म की क्या बात हो सकती है कि हमारे समाज में ऐसा हो रहा है। गांधीजी, बाबा आंबेडकर आदि इतने लोगों के प्रयत्नों के बाद भी अभी तक ऐसा हो रहा है, यह निस्संदेह शर्म की बात है। सर संघ संचालक ने एक सर्वे कराया था, जिससे पता चलता है कि कम से कम दिल्ली में ऐसा नहीं है। यहां न तो किसी मंदिर में प्रवेश की कोई बंदिश है और न सिर पर मैला ढोने की प्रथा है। पर अनेक जगहों पर हो रहा है, यह शर्म की बात है। इसके लिए सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक स्तरों पर समरसता के प्रयास होने चाहिए। विश्व हिंदू परिषद यह काम करता है।

आर्येंद्र उपाध्याय : कमजोर तबकों पर अत्याचार के मामले में जो सर्वोच्च न्यायालय का आदेश आया, उससे यही संदेश गया कि उनके साथ अन्याय हो रहा है। आपका क्या कहना है?

’मैं दलितों की चिंता से सहमत हूं। उन्हें लगता है कि उनकी शिकायत को सही तरीके से नहीं सुना जाएगा। गांव में जहां घोड़ी पर बैठने पर मारते हैं, वहां किस दलित की हिम्मत है कि सुपरिंटेंडेट के पास अपनी श्किायत लेकर जाएगा। मुझे ईमानदारी से लगता है कि सुप्रीम कोर्ट ने इस अधिनियम को डाइल्यूट किया है। इसलिए इसे लेकर जो गुस्सा है, उससे मैं सहमत हूं।

सूर्यनाथ सिंह : हिंदुत्व के नाम पर पिछले कुछ दिनों में जिस तरह दूसरे समुदाय के लोगों पर हमले हुए हैं, उससे आपको नहीं लगता कि सामाजिक समरसता भंग हुई है?

’मेरी एक शिकायत है। मुंबई के एक पांच सितारा होटल पर हमला हुआ। सबने कहा कि बहुत बुरा हुआ, उसकी जांच होनी चाहिए, दोषियों को सजा होनी चाहिए। पर इसका दोष किसी एक समुदाय पर नहीं मढ़ा जाना चाहिए। ऐसा सब जगह छपा। मगर मुंबई के किसी पब में कोई अनजान संगठन शराब पीते हुए किसी लड़के-लड़की को थप्पड़ मारता है, तो अखबार छापते हैं कि हिंदुत्व ताकतों ने उन्हें मारा। तो, जो न्याय आप उनके साथ करते हैं कि जो हुआ बुरा हुआ, पर पूरा समुदाय जिम्मेदार नहीं है, वैसे न्याय के अधिकारी हम लोग क्यों नहीं हैं। पनसारे सहित जिन तीन लोगों की हत्या हुई, उनमें दो जगह तो सरकार उनकी थी। उनकी जांच में कहीं नहीं आया कि संघ परिवार का कोई व्यक्ति किसी भी रूप में सामिल था। जब आप हिंदुत्व कहते हैं, तो उसमें आप सभी हिंदुओं को समेट लेते हैं और सभी अपराधी प्रतीत होने लगते हैं, जबकि वह काम कुछ उन्मादी तत्त्वों का होता है। इसलिए उन्मादी तत्त्वों के काम को हम पर मत लादिए।

राजेंद्र राजन : मगर माना जाता है कि उन्मादी तत्त्वों को मुख्यधारा से शह मिलती है। पिछली सरकार ने तो भगवा आतंकवाद होने की बात तक कह दी थी।

’जहां तक शह की बात है, कलबुर्गी, पनसारे वगैरह की जो हत्याएं हुर्इं, उसमें जो चार्जशीट फाइल हुई उसमें तो किसी ने भी नहीं माना कि मुख्यधारा से कोई संबंध था। बंगलुरू के पब में जो हो रहा था उसमें भी किसी ने नहीं माना। भगवा आतंकवाद के संदर्भ में मैं चार बातें कहना चाहता हूं। एक, ऐसा कुछ नहीं है। दो, उस समय की सरकार को भी मालूम था कि ऐसा कुछ नहीं है। मुसलिम आतंकवाद- उस समय एक बात कही जाती थी कि हर मुसलमान आतंकवादी नहीं होता। पर हर आतंकवादी मुसलमान है। और यह सही है कि आतंक को एक धार्मिक शह है। उससे कमांड मिल रही है। उसके सामने संघ आंदोलन को बदनाम करना, उसको दबाना, उसके लोगों पर मुकदमे चलाना- यह सब करके एक मिथ्या आरोप चस्पां किया गया। राहुल गांधी ने एक विदेशी राजनयिक से कहा था कि जेहादी आतंक से ज्यादा खतरनाक हिंदू आतंकवाद है। तीसरा, इसका लाभ किसको मिला? सुरक्षा परिषद की बैठक में या जहां कहीं भी जिहादी आतंकवाद का मुद्दा उठता था, उसमें पाकिस्तान ने इन सारी बातों को अपने सबूत के तौर पर इस्तेमाल किया। इस तरह इसका लाभ अगर किसी को मिला तो एकमात्र पाकिस्तान को मिला। चौथा, मुझे खुशी है कि अब वह कुप्रचार बेपरदा हो चुका है।

अमर छाबड़ा : बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ सरकार का नारा है, पर जिस तरह आए दिन लड़कियों के साथ बदसलूकी की घटनाएं हो रही हैं, इसे लेकर आप कोई जन-जागरण चलाएंगे?
’हम सब लोग इस दिशा में लगातार काम कर रहे हैं। इसे और आगे बढ़ाने की जरूरत है। मैं सहमत हूं आपकी बात से। विश्व हिंदू परिषद समेत हम सबकी जिम्मेदारी है इस दिशा में काम करने की।

सूर्यनाथ सिंह : हिंदू राष्ट्र में मुसलमानों और दूसरे समुदाय के लोगों के लिए कितनी जगह होगी?
’उन्हें हमारे जगह देने की बात नहीं है। हमारा मानना है कि हमारे देश में जो मुसलमान और ईसाई हैं वे भी पूरी तरह इस देश के नागरिक हैं। पर हम यह जरूर चाहेंगे, जैसा कि दूसरे देशों में कहा जाता है कि वे इस देश के मूल्यों को, इस देश की परंपराओं को स्वीकार कर लें। क्या अमेरिका में रह कर कोई भी व्यक्ति यह कह सकता है कि मुझे लोकतंत्र नहीं चाहिए? लोकतंत्र, बहुमत उनकी शासन प्रणाली का मूल तत्त्व है। भारत में रह कर हम लोग ऐसा क्यों नहीं कर सकते। भारत की भूमि हमारे लिए आदरणीय है, इसको क्यों नहीं मानना चाहिए? यहां लोगों ने वंदे मातरम् गाने से इसलिए इनकार किया कि उनके मजहब में खुदा के अलावा किसी और के आगे सिर झुकाने पर मनाही है। पर मुसलिम देशों में लोग क्या अपनी मातृभूमि को नमन नहीं करते? हमने दस देशों के राष्ट्रगान का अध्ययन किया। उन सबमें अपने देश को मां कहा गया है। अगर हम कहते हैं कि भारत में रहते हो, तो भारत का आदर करो, तो क्या बुरा है। वे मस्जिद जाएं, हमें आपत्ति नहीं है। और जब हम हिंदू कहते हैं, तो उसका दायरा संकुचित नहीं है। उसमें हम सब धर्मों के लोगों को शामिल मानते हैं।

अमर छाबड़ा : आरक्षण के बारे में आपकी क्या राय है?
’इसे जारी रहना चाहिए। इस देश में सामाजिक, आर्थिक विषमताएं हैं, इसलिए इसे जारी रहना चाहिए। यह हमारे सभी हिंदू संगठनों की स्पष्ट राय है।

प्रस्तुति: सूर्यनाथ सिंह / मृणाल वल्लरी

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