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बारादरी: ‘फिल्म उद्योग में सरोकार की कमी नहीं’

दृश्य माध्यम जितना सशक्त तरीके से आम लोगों पर अपना प्रभाव छोड़ता है वह किसी और माध्यम से नहीं हो सकता। सिनेमा के संवाद, दृश्य और एक खास तरह की नाटकीयता दर्शकों को अपनी तरफ बांधती है और सिनेमा का दिखाया हुआ उसे सबसे ज्यादा याद रहता है। -मुकेश त्यागी, फिल्म अभिनेता

फिल्म अभिनेता मुकेश त्यागी

फिल्म अभिनेता मुकेश त्यागी का कहना है कि भारतीय फिल्म उद्योग में सरोकार की कमी नहीं है लेकिन किसी तरह के सामूहिक मंच के अभाव में एक सन्नाटा सा दिखता है। जनसत्ता बारादरी के मेहमान मुकेश त्यागी ने फिल्म उद्योग के राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, सामाजिक, वैचारिक व सांस्कृतिक पक्षों पर अपनी बात रखते हुए फिल्म उद्योग की दिक्कतों, कमजोरियों व उम्मीदों और संभावनाओं पर बात की। ‘फैशन’, ‘हेट स्टोरी’ और ‘साहब बीवी व गैंगस्टर’ जैसी फिल्मों में उल्लेखनीय भूमिका निभाने वाले मुकेश त्यागी ने दिल्ली में हाल ही में राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों के संदर्भ में हुए विवाद के संदर्भ में कहा कि अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए 60 से अधिक कलाकारों ने विरोध किया जो अपने आप में ऐतिहासिक है। ऐन राष्ट्रीय पुरस्कारों के समय डमी कैंडिडेट रखे गए, नामपट्टिका हटाई गई। लेकिन इस बड़े विरोध को महज एक खबर के तौर पर लिया गया और फिल्म उद्योग ने इस मुद्दे पर किसी तरह की खुली बहस से परहेज किया। उन्होंने कहा कि बहुत से फिल्मकारों ने अलग-अलग समय पर उत्पीड़न झेला है लेकिन मुश्किल है कि इन उत्पीड़नों के खिलाफ वे संगठित नहीं हो पाते, और उसकी एक बड़ी वजह आर्थिक और राजनीतिक है।

उन्होंने कहा, ‘रामगोपाल शर्मा जब अपनी फिल्म इंदु सरकार बना रहे थे तो उन्हें बुरी तरह से डराया-धमकाया जा रहा था। हालत इतनी बुरी थी कि उन्हें अपनी बेटी के साथ होटल के कमरे में बंद हो जाना पड़ा। इसी तरह कंगना रनौत और ऋतिक रोशन के विवाद में भी लोगों ने अपने-अपने समीकरणों के तहत पक्ष लिया। आज की तारीख में कोई राजनीतिक फिल्म बनाने से पहले सौ बार सोचता है कि किसकी सरकार है, कोई बखेड़ा तो नहीं हो जाएगा। यहां एकता की बहुत कमी है जिस वजह से कायरपना दिखता है।’ सिनेमा, समाज और सत्ता के संबंधों को जोड़ते हुए त्यागी ने कहा कि सरकार किसी भी विचारधारा की आए लेकिन उसे सिनेमा जैसे जन से जुड़े माध्यम पर लगाम नहीं लगानी चाहिए। उन्होंने कहा कि भारतीय समाज में बहुत तरह के बंधन हैं, उत्पीड़न हैं। जिस समाज में जितना ज्यादा बंधन होगा, वह समाज उतनी ज्यादा फैंटेसी में जिएगा। इसलिए वह खास तरह के इश्क और नाच-गाने वाली फिल्में पसंद करने लगता है, अपने यथार्थ से घबराने लगता है। लेकिन ये यथार्थवादी या कह लीजिए समांतर सिनेमा बहुत जरूरी है, लोगों को मीठे सपनों से जगा कर जमीनी हालात दिखाना जरूरी है। सरकार को इसके लिए खास बजट और फंड बनाना चाहिए।

सरकार फिल्मों के कथानक, कथ्य और संदेश पर दखलंदाजी न करे और सामाजिक संदेशों की फिल्में बनवाने में सहयोग दे। और, ऐसे सिनेमा को दर्शकों तक पहुंचाने के लिए यह भी जरूरी है कि ज्यादा से ज्यादा सरकारी सिनेमाघर और प्रेक्षागृह हों, जहां न्यूनतम शुल्क देकर आम दर्शक सिनेमा तक अपनी पहुंच बना सके। इसके लिए सामूहिक फंडिग भी हो, नागरिक समाज और गैर सरकारी संस्थाओं का योगदान भी हो। उन्होंने सेंसर बोर्ड जैसी संस्थाओं को गैरजरूरी बताते हुए कहा कि कला को मुक्त छोड़ देना चाहिए, बंधन के बाद कला के पास कोई संदेश नहीं रह जाता है और वह बेजान हो जाती है।

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