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बारादरी: लोकप्रिय हुआ तो लुगदी का ठप्पा लगा दिया

गल्पकार सुरेंद्र मोहन पाठक का कहना है कि टीवी और इंटरनेट की बढ़ती तकनीक ने उनके वे पाठक छीन लिए हैं, जो फुर्सत मिलते ही उनकी किताबें लेकर पढ़ने बैठ जाते थे। इसके साथ ही अब नए पाठक नहीं बन रहे हैं। उन्होंने उस खेमेबंदी पर भी सवाल उठाया, जो उन जैसे आम लोगों के लिए लिखने वाले लोकप्रिय रचनाकारों पर ‘लुगदी लेखक’ की चिप्पी लगा देती है। पाठक ने कहा कि वे स्वांत: सुखाय नहीं लिखते, उनके लिखे का लोगों तक पहुंचना भी जरूरी होता है। कार्यक्रम का संचालन किया कार्यकारी संपादक मुकेश भारद्वाज ने।

सूर्यनाथ सिंह : आपने क्यों लिखना शुरू किया?
सुरेंद्र मोहन पाठक : अब तो इसलिए लिखता हूं कि आदत पड़ गई है। एक यही काम किया सारी जिंदगी, सो लिखता हूं। और लिखना शुरू क्यों किया, इसके कई कारण हैं। कुछ तो सोहबत का असर, कुछ इसलिए कि पढ़ता बहुत था, तो उससे मेरे भीतर दबाव बना कि मैं भी लिखूं। उन दिनों जिंदगी इतनी मसरूफ नहीं होती थी। वक्त बहुत होता था। तब न केबल होता था, न इंटरनेट होता था। बस एक ही चीज का भरोसा था-सिनेमा। पर रोज तो नई फिल्म लगती नहीं है और सिनेमा भी कोई मुफ्त में दिखाता नहीं, तो पढ़ना ही एक काम था। जब आप पढ़ते बहुत हैं, तो ओवरफ्लो से भी आदमी लेखक बनता है।

मृणाल वल्लरी : सस्ता कागज बनाम सस्ता साहित्य की आपने बात की थी। लुगदी साहित्यकार की चिप्पी के खिलाफ आप बोलते रहे हैं। अपनी छवि के बारे में आप क्या कहेंगे?
’दरअसल, लुगदी शब्द उस कागज के लिए प्रयोग किया जाता है, जिस पर ये कम कीमत की किताबें छपती हैं। अगर वही किताब सफेद कागज पर छपती तो उसकी कीमत पांच गुना ज्यादा होती। लुगदी की वजह से किताब घर-घर दिखाई देती है। मगर जो पके हुए साहित्यकार हैं, उन्होंने इस कागज पर छपे साहित्य को भी लुगदी बना दिया! उन्होंने लेखक को ही लुगदी कह दिया। यह भी कोई इंसाफ हुआ? और विचित्र है कि इस किस्म के फतवे जो लोग जारी करते हैं, उनमें से अस्सी फीसद लोगों ने भी मेरे जैसे लेखकों की कोई किताब नहीं पढ़ी। वह कौवा के कान ले जाने वाली बात है कि अगर एक ने किसी बात की निंदा की है तो मेरा भी फर्ज है कि मैं भी निंदा करूं। वे चाहते हैं कि हमारी महंती बनी रहे, इसलिए इन्हें अछूत घोषित कर दो। सवाल है कि आप कौन होते हैं अछूत घोषित करने वाले? आपको पसंद नहीं है तो मत पढ़ो। यहां तक तो खुशी की बात है, पर ऐसा नहीं होता। उन्हें कुढ़न इस बात को लेकर है कि ये इतने लोकप्रिय लेखक क्यों बने हुए हैं।

अजय पांडेय : आज जब टीवी और इंटरनेट का प्रसार बढ़ गया है, क्या आपकी किताबों की प्रासंगिकता कम हो गई है?
’इन संसाधनों के आने से एक बुनियादी फर्क यह पड़ा है कि नए पाठक नहीं बन रहे हैं। जो पढ़ रहे हैं, उन्होंने पढ़ना नहीं छोड़ा है। अभी इंटरनेट का रोब इतना गालिब नहीं हो गया है कि अगर वहां कोई चीज पसंद आ गई है तो मैं किताब को हाथ नहीं लगाऊंगा। हां, आजकल यह जरूर हो गया है कि नई पीढ़ी अंग्रेजी पढ़ने, अंग्रेजी किताब बगल में दबा कर घूमने, उन पर चर्चा करने में फख्र महसूस करती है। बहुत से लोग ऐसे हैं, जिनकी खरीदने की क्षमता है और वे किसी किताब की कहीं चर्चा सुनते हैं, तो वे उस किताब को खरीद कर घर में सजा लेते हैं। पढ़ते नहीं हैं। ऐसी अस्सी फीसद किताबें पढ़ी नहीं जातीं। उनके बारे में बस होता यही है कि कहीं चर्चा चलती है कि तुमने फलां किताब देखी, तो वे कहते हैं-हां, मैंने देखी। फिर उनसे पूछो कि पढ़ी? तो वे कहते हैं, नहीं अभी पढ़ी तो नहीं है, जल्दी ही पढ़ लूंगा, पर सच्चाई यह है कि वे कभी उसे नहीं पढ़ते। इसकी सबसे बड़ी मिसाल अरुंधति राय की गॉड ऑफ स्मॉल थिंग्स है। यह है तो सबके पास, पर उनमें से पंद्रह फीसद लोगों ने भी मुश्किल से पढ़ी है। वह पढ़ने के काबिल है भी नहीं।

मुकेश भारद्वाज : जिस तरह आप अरुंधति राय को खारिज कर रहे हैं, उसी तरह वे आपको करती हैं, इस पर एतराज की क्या बात है?
’करते हैं, तो करें। मेरी किताब पटरियों पर कौड़ियों के भाव बिकते कहीं नहीं दिखेगी, पर अरुंधति राय की तीन सौ रुपए की किताब पटरियों पर साठ रुपए में बिकती है। और ये कैसे बेस्ट सेलर हैं- चेतन भगत- जिन्होंने झंडा खड़ा किया हुआ है कि उनकी किताब पच्चीस लाख बिकती है। क्या किसी ने सर्वे किया कि पच्चीस लाख बिक गई? आप पैसे वाले प्रकाशक हैं, छापने को पचास लाख छाप लें, पर वह बाद में किलो के भाव से बिके, तो यह लेखक की हैसियत बनाने वाली बात तो नहीं हुई। फ्लिपकार्ट ने रूपा पब्लिशर्स से चेतन भगत की पांच लाख किताबें लीं, पर वे नहीं बिकीं। उन्होंने रूपा से कहा कि वापस ले लो, पर उन्होंने नहीं ली। तो उन्होंने सारी किताब किलो के भाव बेच दी। वह किताब पटरी पर आ गई। यह कोई बेस्ट सेलर तो नहीं हुआ।

पारुल शर्मा : आपके हिसाब से बेस्ट सेलर का क्या मानदंड होना चाहिए?
’मैं बेस्ट सेलर वाली बात से सहमत नहीं हूं। इसे कौन प्रमाणित करता है! जैसे अखबारों की प्रसार संख्या एबीसी बताता है, उसी तरह बेस्ट सेलर का प्रमाणपत्र देने वाली क्या कोई संस्था है? हिंदुस्तान में आप कोई भी किताब छाप कर उसे बेस्ट सेलर बता दें, कोई आपका मुंह तो पकड़ नहीं लेगा। हालत तो यह है कि एक हजार किताब छपती है, उसमें से पांच सौ प्रतियां लेखक खुद अपने पड़ोसियों, रिश्तेदारों को बांटता है। उसकी छपाई का खर्चा भी लेखक खुद उठाता है। उसके बाद किताब पर कोई गोष्ठी होती है, उसमें उसकी वाहवाही हो जाती है। इस तरह वह घोषित कर दी जाती है बेस्ट सेलर। यह कोई बेस्ट सेलर थोड़े है। बेस्ट सेलर वह है, जो जन-जन में चर्चा का विषय बने।

दीपक रस्तोगी : अपने उपन्यासों की विषय-वस्तु अपराध पर केंद्रित की तो क्या उसके पीछे मकसद यह था कि अपराध लोगों को अधिक आकर्षित करता है?
’तीस-पैंतीस साल पहले तो यह सवाल मायने रखता था, पर अब नहीं है। अब तो कोई भी अखबार उठा कर देख लीजिए, हर जगह अपराध भरा पड़ा है। मैं तो छह महीने में एक किताब लिखता हूं। तो, मैं समाज को ज्यादा नुकसान पहुंचा रहा हूं कि ये दैनिक अखबार पहुंचा रहे हैं? अखबार तो अपराध को महिमामंडित करते हैं। क्यों अपराध की खबर मुखपृष्ठ पर छपती है, क्या वह बीच के किसी पन्ने पर नहीं छप सकती? मैंने अपने जीवन में, अपनी किसी किताब में कभी अपराध को महिमामंडित नहीं किया। मैंने हमेशा पश्चाताप का माहौल बनाते हुए उपन्यास लिखे हैं।

मुकेश भारद्वाज : आपका मुख्य चरित्र सुरेंदर सिंह सोहल अपराध करता है, वेश्यावृत्ति करता है, वह क्या है?
’मैंने उसे एक सहानुभूति के पात्र के रूप में गढ़ा है। वह चरित्र एक करिश्मा माना जाता है। एक आदमी अपराध करता है, वह कबूल करता है कि मैंने अपराध किया है। लोगों की उससे हमदर्दी है, उसे छिपा लेते हैं।… एक बात मैं स्पष्ट कर दूं कि मैं कोई लेखक नहीं हूं। व्यवसायी हूं। मेरा व्यवसाय है लिखना। इसलिए जब मुझे इसी धंधे में रहना है तो कुछ वेरायटी बनाने का अधिकार है या नहीं! मैंने कभी अपने को साहित्यकार का दर्जा नहीं दिया। मैं यह भी नहीं कहता कि जो पक्के साहित्यकार हैं, उनकी परछार्इं भी हूं। पर मेरी अपनी एक जगह है। इसलिए किसी साजिश के तहत मुझे वहां से धक्का देकर नहीं हटाया जा सकता।

राजेंद्र राजन : आप जैसे लेखकों का दौर अब खत्म क्यों हो गया?
’इसकी वजह भी इंटरनेट, टीवी वगैरह है। चौबीस घंटे का टीवी हो गया। वहां गुलशन नंदा, रानू जैसी कहानियों के धारावाहिक आने लगे हैं। जो गृहिणियां दोपहर का खाना बनाने के बाद किताबें पढ़ा करती थीं, वे अब टीवी देखती हैं। रात के बारह-साढ़े बारह बजे तक टीवी देखती हैं। यही जलवा और जलाल उस वक्त किताबों का हुआ करता था। अस्सी और नब्बे के दशक में किताबों का सुनहरा दौर था। सबने तरक्की की, प्रकाशकों ने, लेखकों ने, डीलरों ने। सिनेमा तो बनने में दो साल लगते थे, पर किताब छप कर तीन महीने में आ जाती थी। वे किताबें सिनेमा का मजा देती थीं। गुलशन नंदा तो इस मामले में सिद्धहस्त थे। वे लिखते ही इस तरह थे जैसे फिल्म की पटकथा लिख रहे हों। इसलिए गुलशन नंदा और रानू जैसे लेखक खूब मशहूर हुए। अब किताबों की वह जरूरत नहीं रह गई।

सूर्यनाथ सिंह : आप एक तरफ अपने लेखन को तो धंधा बता रहे हैं और दूसरी तरफ गंभीर साहित्य को खारिज कर रहे हैं। यह क्या बात हुई!
’देखिए, उनमें और मुझमें फर्क सिर्फ इतना है कि मैं मुंह खोल कर पैसा मांगता हूं और वे रॉयल्टी के लिए प्रकाशक से झगड़ा करते हैं। अगर वे सचमुच साहित्य साधना करते हैं, तो उन्हें पैसे के लिए झगड़ा ही क्यों करना चाहिए। प्रकाशकों और लेखकों के बीच रॉयल्टी को लेकर मुकदमेबाजी के अनेक किस्से हैं। इनमें महाश्वेता देवी को उदाहरण के तौर पर देख सकते हैं…। सारा मेला ही पैसे का है।

पारुल शर्मा : वह कौन-सी बात थी, जिससे आप अपराध-लेखन की तरफ बढ़े?
’मैं घोर गरीबी में पला-बढ़ा। दो वक्त के खाने की भी दिक्कत थी। तब मुझे लगा कि इस धंधे में मैं पूरी जिंदगी रह सकता हूं, तो मैंने इसे अपना लिया और मैंने खुद को साबित किया। इसमें कोई खराबी तो है नहीं। मैंने इसमें मेहनत की। लोग छह घंटे काम करते हैं तो रोते हैं, मैंने सत्रह घंटे काम किए हैं एक दिन में। मैं सुबह छह बजे लिखने बैठता था, यह तय करके कि आज कम से कम बीस पन्ने लिखने हैं और मैं लिखता था, चाहे रात के बारह बज जाएं।

अजय पांडेय : उस जमाने में खड़ी बोली हिंदी को जन-जन तक पहुंचाना बड़ी चुनौती थी। आपके साहित्य ने इसमें कितना योगदान किया?
’हफीज अपनी बोली मोहब्बत की बोली, न हिंदी न उर्दू न हिंदुस्तानी। मैं तो किसी एक भाषा में लिखता ही नहीं। मेरी भाषा चार भाषाओं की खिचड़ी है- हिंदी, उर्दू, पंजाबी, इंग्लिश। मैंने अपनी एक जुबान बनाई हुई है। मुझे खड़ी बोली, बैठी बोली से कुछ लेना-देना नहीं।

दीपक रस्तोगी : आपकी किताबें पूरे हिंदी क्षेत्र में बिकती हैं, पर आपके सारे नायक पंजाबी हैं, ऐसा क्यों?
’हां, पर एक चरित्र बंगाली भी है। वह भी इत्तेफाक से है। तब मैं जानता ही नहीं था कि चक्रवर्ती बंगाली होते हैं। मैं एक अच्छा-सा नाम तलाश कर रहा था, उसी में उसे चक्रवर्ती उपनाम दे दिया। यह सब स्वाभाविक रूप से हुआ, मैंने जानबूझ कर नहीं किया। मैं बहुत सुगम बातें लिखना चाहता हूं। फैंसी के चक्कर में नहीं पड़ता।
अजय पांडेय : आरोप लगा दिया जाता है कि आप जैसा लेखन सिर्फ पैसे के लिए किया जाता है।
’वे कहते हैं कि मैं स्वांत: सुखाय लेखक हूं। मैं मुद्रा सुखाय लेखक हूं। यह जो स्वांत: सुखाय वाली बात है, इससे बड़ा पाखंड तो साहित्यकारों में पैदा ही नहीं हुआ। लिखते तो स्वांत: सुखाय हैं और रॉयल्टी के लिए मारे-मारे फिरते हैं!

मृणाल वल्लरी : आपने खुद स्वीकार किया कि आपके जैसा साहित्य मर रहा है, फिर इसके टिके रहने की क्या संभावनाएं हैं?
’देखिए, मैं अकेला हूं, जो अब तक चल रहा हूं। बाकी सब खत्म हो गए। जिस नब्बे के दशक की बात मैं कर रहा था, उसमें साठ-सत्तर प्रकाशक हुआ करते थे, ऐसा साहित्य छापने वाले। हर हफ्ते छह-सात किताबें बाजार में आती थीं। आज हाल यह है कि सिर्फ एक प्रकाशक दिल्ली में है और दो मेरठ में हैं। अब वे लेखक को चिराग लिए ढूंढ़ते फिरते हैं। इसकी वजह यह भी है कि वे नए लेखक को पास नहीं फटकने देते कि पता नहीं चलेगा कि नहीं चलेगा। फिर एक नामी लेखक कितने प्रकाशकों के लिए लिखेगा! वे इस बात को समझते ही नहीं कि भाई, मैं भी जब नया लेखक था तो किसी ने छापा ही था न!

अजय पांडेय : जब हमने पढ़ना शुरू किया तो आपकी किताबें छिप कर पढ़नी पड़ती थीं। ऐसी किताबें पढ़ना अच्छा नहीं माना जाता था। इसलिए आपके साहित्य को गंभीर साहित्य लिखने वालों ने नहीं, बल्कि समाज ने दूसरी श्रेणी का माना।
’कृपया मुझे उस श्रेणी में न रखें। मैंने कभी कोई वाहियात बात नहीं लिखी। पूरी दुनिया में इस तरह की किताबों को लोकप्रिय बनाने के दो बड़े मसाले माने जाते हैं। एक है सेक्स और दूसरा है हिंसा। मैंने कभी इन दोनों चीजों का सहारा नहीं लिया। मैं इन बातों से बचता हूं।

पारुल शर्मा : किस किताब या फिल्म ने आपको सबसे अधिक प्रभावित किया?
’मैंने ‘गॉड फादर’ बीस बार पढ़ी है। जब-जब इसे पढ़ता हूं, करिश्मा महसूस करता हूं। हर लाइन में भेद दिखाई देता है।

प्रस्तुति: सूर्यनाथ सिंह / मृणाल वल्लरी