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जीएसटी एक कड़वी, पर जरूरी दवा

भाजपा के राज्यसभा सांसद और बुद्धिजीवी विनय सहस्त्रबुद्धे का कहना है कि इस समय देश में अस्तित्व की लड़ाई चल रही है। रोजगार के मसले पर उन्होंने कहा कि आज उद्यमिता ही सबसे बड़ा साधन है, जिस पर चर्चा होनी चाहिए और सारे पक्षों का समेकित मूल्यांकन होना चाहिए। उनका दावा है कि समाज में रोजगार को लेकर नई सोच बन रही है। बातचीत कार्यक्रम का संचालन किया कार्यकारी संपादक मुकेश भारद्वाज ने।

बारादरी की बैठक में विनय सहस्रबुद्धे। सभी फोटो : आरुष चोपड़ा

मुकेश भारद्वाज : ऐसा क्यों है कि बाहर रहते हुए लोग जो बातें कहते हैं, सत्ता में आने के बाद उन पर चुप्पी साध जाते हैं? जो बातें सामने आनी चाहिए, वे नहीं आ पातीं?

विनय सहस्रबुद्धे : इस समय एक तरह से अस्तित्व की लड़ाई चल रही है। इसमें समाज के सारे क्षेत्र शामिल हैं। टिके रहने के लिए लोग लोकलुभावन बातों का बहुत ज्यादा सहारा ले रहे हैं। शायद इसका कारण यह भी है कि उनमें एक आंतरिक असुरक्षा है। इसकी वजह हो सकती है, पर कई बार यह बेवजह भी हो सकती है। जीवन में यांत्रिकता आई है, जो औपचारिकता होती थी, वह संबल देती थी। वह समाप्त-सी हो गई है। इसलिए लोग अकेला महसूस करते हैं। और एक आतंरिक असुरक्षा के कारण छोटी-छोटी चीजों से भी हम इस पद्धति से डरते हैं कि लोग क्या कहेंगे। लोग क्या कहेंगे का ही एक स्वरूप है लोकलुभावन। इसी का व्यापक रूप है लोकप्रियता। मैं मानता हूं कि अखबारों, समाचार चैनलों, साहित्य आदि में भी यही सब दिख रहा है। यह तो ठीक है कि बाजार का दबाव है। इस दबाव में लोगों को जो अच्छा लगता है, वह तो आप दे रहे हैं, पर लोगों को क्या अच्छा लगे, उसमें क्या आपकी कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए! मैं मानता हूं कि हमारी राजनीति, हमारे प्रसार माध्यमों और हमारी बौद्धिक गतिविधियों, विशेषकर साहित्य और कलाओं पर यह सवार है। इसलिए समाज को इनसे जो प्रबोधन मिलना चाहिए, वह नहीं मिल पा रहा। जो समाज को दिशा देने वाले थे, आज वे शिथिल पड़ गए हैं। यही वजह है कि लोकतांत्रिकता भी प्रश्नांकित होने लगी है। आज लोकतंत्र आश्वस्त नहीं कर पा रहा है कि लोककल्याण का रास्ता हमारे घर से ही होकर गुजरता है।

मृणाल वल्लरी : लोकतांत्रिक देशों पर सवाल तब उठे जब वे रोजगार के मोर्चे पर नाकाम रहे। भाजपा के 2019 के संकल्प पत्र में रोजगार की कोई बात नहीं की गई है। तो क्या यह मान लिया जाए कि आपके पास इसका कोई रास्ता नहीं है?
’नहीं, ऐसा नहीं है। रोजगार के लिए पहली बात तो यह कि निवेश आना बहुत जरूरी है। जब तक उद्यम नहीं बढ़ेंगे तब तक रोजगार का सृजन संभव नहीं है। मैं मानता हूं कि भारत में निवेश पहले की अपेक्षा कुछ बढ़ा है। उद्योग आएंगे, ऐसा हम मान कर चलते हैं। दूसरी बात कि रोजगार की व्याख्या भी बदले हुए समय में बदली हुई है। अब दस से पांच तक नौकरी करने की संकल्पना नहीं रही है। मुस्तकिल नौकरी, जहां प्रोविडेंट फंड, ग्रेच्युटी वगैरह मिलते हों, उसकी भी संकल्पना बदली है। अनुबंध पर नौकरियां मिलने लगी हैं। अगर हम रोजगार का अर्थ वही मानेंगे जो राष्ट्रीय सांख्यिकी संगठन मानता है, तो उसमें रोजगार के अवसरों का पता नहीं चलेगा। आज वर्क फ्रॉम होम भी है। कितनी सारी महिलाएं घर पर रह कर छोटी-छोटी उद्यमिता के सहारे कुछ न कुछ कमा लेती हैं। अभी जो मुद्रा लोन वगैरह की व्यवस्था की गई है, उससे उद्यमिता बढ़ी है। आज उद्यमिता ही एकमात्र रोजगार का साधन है। रोजगार की संकल्पना आज आजीविका में तब्दील हो गई है। मेरा मानना है कि वह निश्चित रूप में बढ़ी है। कई युवाओं में मैं यह ललक देखता हूं कि वे दो-तीन साल नौकरी कर लेते हैं, फिर उसे छोड़ कर अपना कुछ करने लगते हैं। यह स्वागत योग्य है। उसके अनुकूल वातावरण बना है कि नहीं, इसकी भी चर्चा करनी चाहिए। उसमें कमी है, तो उस पर भी चर्चा करनी चाहिए। मगर बस शोर मचाया जा रहा है कि रोजगार नहीं है, रोजगार नहीं है। ऐसा नहीं है। सारे पक्षों का समेकित मूल्यांकन होना चाहिए। मैं यह नहीं कहता कि स्थिति आदर्श है, पर समाज में रोजगार को लेकर एक नए तरह की सोच बन रही है।

सूर्यनाथ सिंह : आप कह रहे हैं कि उद्यमिता बढ़ी है, पर हकीकत यह है कि लोगों की क्रय शक्ति का तेजी से ह्रास हुआ है। इससे अनेक क्षेत्रों में उत्पादन पर बुरा असर पड़ा है। यह विरोधाभास कैसे उत्पन्न हुआ?
’मैं कोई अर्थशास्त्र का विद्यार्थी नहीं हूं, इसलिए सभी बातों का विश्लेषण मेरे पास होगा, जरूरी नहीं। मगर इसके दो कारण तो स्पष्ट हैं- जीएसटी और नोटबंदी। अभी इसके बारे में बहस हो सकती है। पर मैं मानता हूं कि जीएसटी के बारे में तो कोई मतभेद नहीं था कि इसे लाया जाना चाहिए कि नहीं। और जब लाया गया, तो उसके बाद दो साल होने को आए, जीएसटी काउंसिल की बैठक में ऐसा कोई मौका नहीं आया जब किसी निर्णय के लिए मतदान कराने की जरूरत पड़ी हो। सर्वसहमति के आधार पर निर्णय हुए। इसलिए इसका ठीकरा केवल जीएसटी पर फोड़ना ठीक नहीं। जीएसटी एक ऐसी कड़वी दवा थी, जिसे देना जरूरी था। हां इस बात पर बहस हो सकती है कि अमुक प्रावधान ऐसे नहीं ऐसे होने चाहिए। और इसका निर्णय काउंसिल में ही हो सकता है। ऐसे बदलाव जब आते हैं, तो उसका कुछ प्रभाव पड़ता है। घिसी-पिटी पद्धतियों से काम नहीं चलता। कुछ नई पद्धतियां भी आ रही हैं, उनकी कीमत भी चुकानी पड़ रही है, यह बात सही है।

पंकज रोहिला : दिल्ली में सीलिंग के मसले पर कोई व्यावहारिक नीति अभी तक क्यों नहीं बन पाई है?
’इसमें न्यायिक प्रक्रिया की बड़ी भूमिका है। हम न्यायिक प्रक्रिया को रोक नहीं सकते। न्यायालय अपने विवेक के आधार पर काम करते हैं। इसका निर्णय न्यायालय करेगा। मगर इस पर मेरा निजी विचार यह है कि हमारे महानगरों की बढ़ती आबादी और उससे उभरने वाले प्रश्नों को हम कब तक टालते रहेंगे! आप दिल्ली की बात कर रहे हैं, मुंबई की स्थिति भी कुछ ठीक नहीं है। कोई भी महानगर लीजिए, वहां की स्थितियां कोई अच्छी नहीं हैं। तो फिर घूम-फिर कर बात आती है ग्रामीण लोगों पर। खेती पर निर्भर जनसंख्या कम होनी चाहिए और उसके लिए खेती-पूरक उद्यमिता की व्यवस्था होनी चाहिए। खेती में अगर किसी किसान के चार लड़के हैं और उसके पास बीस एकड़ जमीन है, तो आने वाले समय में वे तो सीमांत किसान बन जाएंगे। तो सीमांत किसान बनने से रोकने के लिए उनमें से दो को किसी और उद्यमिता में ले जाना पड़ेगा। इसमें नई पद्धति से सोचना पड़ेगा। शहरी विकास के बारे में भी नए ढंग से सोचना पड़ेगा।

मनोज मिश्र : उद्यमिता को लेकर पहले भी प्रयास हो रहे थे, जिसमें खादी का बड़ा योगदान था। पर हकीकत यह है कि सरकारें उस पर गंभीरता से ध्यान नहीं दे पार्इं। दरअसल, सरकारों का जोर भी शहरीकरण को बढ़ावा देने पर है। वर्तमान सरकार ने इस दिशा में क्या प्रयास किया है?
’ग्रामीण विकास मंत्रालय ने उद्यमिता के लिए काफी काम किया है। पर केवल उद्यमिता के लिए काम करने से कुछ नहीं होगा। जब तक ग्रामीण लोगों के साथ खुद को समरस नहीं करेंगे, तब तक इस समस्या का समाधान नहीं होगा। खुद तो शहर का ही सपना देखते हैं। हमारे समाज में जो मूल्य बदले हैं कि अंग्रेजी बोलना आना चाहिए, अच्छे कपड़े पहनना चाहिए, ये जो गंवार आदि शब्द चलन में आए उसे बदलना जरूरी है। जब तक हमारी बुनियादी सोच में बदलाव नहीं होगा, तब तक सरकार कितनी भी योजनाएं लाए, सही मायने में बदलाव नहीं होगा। यह बहुत जटिल काम है।

अजय पांडेय : अगर एनडीए को पूर्ण बहुमत नहीं आया तो क्या आप दूसरे दलों से भी सहयोग लेने को तैयार हैं?
’मैं इस संभावना को खारिज करता हूं कि हमें पूर्ण बहुमत नहीं मिलेगा। निश्चित मिलेगा और एक अच्छी, मजबूत सरकार आएगी। देश में जो रुझान हमें समझ में आ रहा है, उसमें देश में मोदी जी की सरकार बनी रहेगी। जहां तक गठबंधन की राजनीति की बात है, उसमें आवाजाही बनी रहती है। प्रश्न तो उन लोगों को तय करने का है कि क्या वे जिस पार्टी को अधिक सीटें मिली हैं, उसके साथ जाएंगे, या नहीं जाएंगे।

अरविंद शेष : जैसे-जैसे चुनाव समाप्ति की ओर बढ़ रहा है, सरकार के कुछ बयानों को लेकर विवाद भी उठ रहे हैं। राजनीति में इस तरह की भाषा को आप कहां तक उचित मानते हैं?
’आप कालखंड के एक टुकड़े को, एक छेद को सामने रख कर इसकी चर्चा नहीं कर सकते। हमारे देश में राजनीतिक विमर्श में ‘नानी याद आएगी’ से लेकर फिसलन होती गई है। फिर ‘मौत का सौदागर’। तो, ऐसा किसी को नहीं करना चाहिए। सभी राजनीतिक दलों को मिल कर एक अचार संहिता बनानी चाहिए कि कौन से विषय उठाएं, कौन से विषय न उठाएं। पर इसमें भी मैं कह रहा हूं कि इस तरह के विमर्श हम-आप ही बनाते हैं। मीडिया ऐसी ही बातों को ज्यादा उछालता है। जो काम की बातें हम कहते हैं, उसे तो प्रकाशित नहीं किया जाता, पर कहीं कुछ गलत हो जाए, संसद में कुछ गलत हो जाए तो उसे आठ कॉलम में छापते हैं। जब नकारात्मकता को ही इतनी प्रबलता मिलेगी, तो यही होगा। अच्छाई को उभारने का काम हम सबका है। अगर हम यह मान कर चलेंगे कि अच्छाई का बाजार नहीं है, तो हम समाज का नुकसान करेंगे। हालांकि इसके लिए केवल मीडिया नहीं, राजनीतिक दल भी जिम्मेदार हैं।

मृणाल वल्लरी : संसद की कार्यवाही कई बार पंद्रह दिन, कई बार इक्कीस दिन चलती है। उस दौरान कभी कोई अशोभनीय घटना घट जाती है। मगर बाकी सारे दिनों की खबरें भी तो मीडिया में आती हैं। आप केवल एक दिन की घटना की नजीर दे रहे हैं। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि सदन में वह घटना घटे ही नहीं, ताकि हमें छापना पड़े?
’मैं कोई मीडिया और राजनीति के द्वंद्व की बात नहीं कर रहा हूं। एक प्रवृत्ति की बात कर रहा हूं। मैं यही कह रहा हूं कि दायित्व हम सभी का है। फर्ज कीजिए कि मीडिया यह तय कर ले कि संसद में सभापति के आसन तक पहुंचने वाले लोगों के बारे में एक भी खबर नहीं छापेंगे, देंगे भी तो कहीं अंदर छोटी सी खबर देंगे और जिन्होंने अच्छा भाषण किया उनकी बड़ी खबर देंगे, तो लोग जब यह समझ जाएंगे कि उनकी गलत हरकतों को तवज्जो ही नहीं दे रहे हैं, तो वे वैसा करना छोड़ देंगे।

आर्येंद्र उपाध्याय : महाराष्ट्र में राज ठाकरे खुद चुनाव नहीं लड़ रहे, पर आपके खिलाफ प्रचार कर रहे हैं। इसका कितना असर आपकी पार्टी पर पड़ेगा?
’मुझे नहीं लगता कि बहुत बड़ा असर होगा। राज ठाकरे जी के बारे में एक बात स्पष्ट कर दूं कि जब उन्हें लोगों ने अवसर दिया था, तब वे थोड़ी मेहनत करके जनता में जाते, तो उनका प्रभाव बनता। मगर हमारे यहां दुर्भाग्य यह है कि पार्टी पॉलिटिक्स केवल चुनाव तक सीमित रह गई है। राज ठाकरे जी के प्रति शुरू-शुरू में लोग आकर्षित जरूर हुए थे, पर जब वे लोगों के बीच कभी गए नहीं, तो उनका प्रभाव खत्म हो गया। उनकी सभा में बेशक लोग मनोरंजन के लिए जमा हो जाते हों, पर उनकी बातों को गंभीरता से लेंगे, मुझे नहीं लगता।

पंकज रोहिला : दूसरे दलों से बहुत सारे लोग आकर आपकी पार्टी से चुनाव लड़ रहे हैं। इसे आप किस रूप में देखते हैं?
’राजनीति तो एक कारवां की तरह होती है। उसमें जो भी साथ आता है, उसे लेकर चलना होता है। मगर बाहर से आने वाला हमारी मूल प्रकृति, हमारी मूल पद्धति पर प्रभाव डाल पाएगा, ऐसा मैं नहीं मानता। वह आएगा, उसे हम साथ लेकर चलेंगे। हमारा अनुभव है कि उनमें से कई लोग हमारे साथ समरस हो जाते हैं, कुछ लोग नहीं भी हो पाते हैं, वे छोड़ कर चले जाते हैं।

आर्येंद्र उपाध्याय : अयोध्या राम मंदिर का मुद्दा अब आप नहीं उठा रहे। तो क्या मान लिया जाए कि भाजपा ने उसे छोड़ दिया?
’नहीं, ऐसा नहीं है। शुरू से राम मंदिर का मुद्दा हमारे घोषणापत्र का हिस्सा रहा है। अब भी है। इसकी चर्चा नहीं हो रही है, इसके कुछ स्पष्ट कारण हैं। पहले बातचीत के जरिए इसका समाधान निकालने का प्रयास हुआ, पर वह नहीं हो पाया। अभी मामला अदालत के समक्ष है। वहां से परिणाम निकल कर आए तो अच्छा ही है। इसके अलावा एक रास्ता है कि इसके लिए हम कोई कानून बनाएं। पर उसके लिए हमारे पास संसद के दोनों सदनों में पर्याप्त संख्या नहीं है। इसलिए न्यायालय को गुहार लगाई गई है। वह अपनी पद्धति से काम कर रहा है। इसलिए हम उसमें बंधे हुए हैं।

अरविंद शेष : आपने लोकतंत्र के प्रति लोगों का विश्वास कमजोर होने की बात कही। राजनीतिक दलों का काम लोकतंत्र को मजबूत करना है या फिर उसे बाधित करने की दिशा में ले जाना?
’चुनौती तो यही है कि लोकतंत्र को हम मजबूत कैसे बनाएं। लोकतंत्र में उदारवादी मूल्यों को बनाए रखते हुए राज्य के निर्माण का प्रयास होना चाहिए। प्रशासनिक और राज्य संचालन की जो व्यवस्थाएं हैं, उन्हें कारगर बनाना पड़ेगा। हमारे यहां हुआ यह है कि जनतंत्र का मतलब मतभेद, चुनाव, मनमाने तरीके से खबरें छापना आदि मान लिया गया है। अगर यहीं तक सीमित रहेंगे, तो गड़बड़ होगा। राज्य निर्माण पर हमारा जोर होना चाहिए। राज्य की व्यवस्था को सुचारु बनाना होगा। अभी प्रधानमंत्री ने इस दिशा में कई उल्लेखनीय काम किए हैं।

अजय पांडेय : सरकार के सात मंत्री चुनाव क्यों नहीं लड़ रहे हैं?
’जो राज्यसभा में हैं, वही चुनाव नहीं लड़ रहे हैं। फिर जरूरी नहीं कि हर कोई लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए बना है।

सूर्यनाथ सिंह : आप गडकरी जी के बहुत निकट हैं। ऐसा क्यों है कि बीच-बीच में गडकरी जी कुछ ऐसा बोल देते हैं, जिससे संदेश कुछ का कुछ चला जाता है?
’मैं गडकरी जी को बहुत निकट से जानता हूं। उनकी भावना गलत नहीं है। पर राजनीति में होता यह है कि जब आप कुछ बेबाकी से बोल देते हैं, तो उसकी बहुत सारी गलत व्याख्याएं भी होने लगती हैं। वे बेबाकी से बोलते हैं, इसलिए उनकी कई बार गलत व्याख्याएं हो जाती हैं।

विनय सहस्रबुद्धे
छात्र जीवन से ही सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक सरोकारों से जुड़े रहे डॉक्टर विनय प्रभाकर सहस्रबुद्धे का जन्म महाराष्ट्र के नाशिक में 10 नवंबर, 1957 को हुआ। सहस्रबुद्धे की शिक्षा-दीक्षा मुंबई में हुई। मौजूदा समय में राज्यसभा सांसद हैं और भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। 1975 में आपातकाल के दौरान जेल भी जा चुके हैं। छात्र जीवन में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के राष्ट्रीय सचिव भी रहे हैं। 2013 से 2015 के बीच सहस्रबुद्धे 208 साल पुरानी एशियाटिक सोसाइटी आॅफ मुंबई के उपाध्यक्ष रहने के साथ कई संस्थाओं से जुड़े रहे। भाजपा के थिंक टैंक के रूप में जाने जाते हैं। इन्होंने कई किताबें लिखी हैं।

बारादरी की बैठक में विनय सहस्रबुद्धे सभी फोटो : आरुष चोपड़ा

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