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बारादरी- आत्महंता हो रहे हैं साहित्यकार

प्रतिष्ठित कथाकार चित्रा मुद्गल का मानना है कि गुटबंदी ने साहित्यकारों को आत्महंता बना दिया है। कुछ आलोचकों ने मान रखा है कि अगर उदय प्रकाश ने नहीं लिखा तो किसानों के बारे में कुछ लिखा ही नहीं गया। महिलाओं में पहचान की राजनीति हावी है तो स्त्री विमर्श को तोड़ने के लिए लेखिकाओं को देह का खतरनाक औजार पकड़ा दिया गया है कि आपके जीवन में क्या हुआ, यौन संबंधों में किसके साथ और क्या किया! साहित्य का बंटाधार करते साहित्योत्सवों पर तीखा वार करते हुए उन्होंने पूछा कि पुरस्कार वापसी करने वाले अशोक वाजपेयी और अन्य लेखक उन मंचों पर क्यों चले जाते हैं, जहां आशुतोष राणा का पोस्टर लगा होता है और धीरे से अशोक वाजपेयी और मृदुला गर्ग की फोटो टांग देते हैं। जनसत्ता बारादरी का संचालन किया कार्यकारी संपादक मुकेश भारद्वाज ने।
साहित्यकार चित्रा मुद्गल।

चित्रा मुद्गल क्यों
अगर साहित्य राजनीति के आगे चलने वाली मशाल है तो चित्रा मुद्गल वह कलमकार हैं, जिनकी रचनाएं एक खास राजनीतिक समझ के साथ सामने आती हैं। वह समाज और साहित्य का राजनीति से संवाद करवाती हैं। आज जब साहित्योत्सव का बाजार लेखकों और लेखिकाओं को पॉपुलर कल्चर का औजार पकड़ा रहा है, साहित्य से किसानों, कामगारों, हाशिए पर पड़े लोगों को बेदखल कर उसे शयनकक्ष तक सीमित किया जा रहा है तो ऐसे वक्त में साहित्य के बृहत्तर परिदृश्य पर बात करने के लिए चित्रा मुद्गल से बेहतर चेहरा और कौन होता?

सूर्यनाथ सिंह : आपकी दृष्टि में स्त्री स्वातंत्र्य का क्या अर्थ है?

’यह बात मैं बहुत बार कह चुकी हूं। मैं मानती हूं कि जिस तरह का संघर्ष हम लोग करते रहे हैं, सबसे पहले तो हम यह मान कर चल रहे हैं कि हमारी स्वायत्तता ही स्वाधार की नींव का पत्थर है। चेतन की स्वायत्तता। शिक्षा उसे जागृत करती है। बहुत से लोग डिग्रियां लेकर भी जागृत नहीं हो पाते, वह अलग चीज है। पर स्त्री स्वातंत्र्य को लेकर हम लोग जिस तरह से चले अपने संघर्ष में, वह पटरी से उतर चुका है। मुझे दुख है कि साहित्य में यह एक फार्मूलाबद्ध तरीके से चल रहा है और हमारी नई पीढ़ी उसे एक ऐसी पुड़िया के रूप में लेकर चल रही है जिससे उसे लगता है कि रातों-रात प्रसिद्धि मिल जाएगी। फिल्मों में तो ऐसे नुस्खे अपनाए जाते रहे हैं, पर साहित्य में नहीं। जब साहित्य में स्त्री स्वातंत्र्य की चर्चा शुरू हुई तो वह कहां लेकर गया- शरीर के धड़ के निचले हिस्से में? कैसा मूर्ख बनाया है! विज्ञापन कंपनियां तो यह काम कर ही रही हैं, साहित्य को तो यह काम नहीं करना चाहिए था। अगर धड़ के निचले हिस्से से काम सधता है, तो फिर साहित्य की जरूरत ही नहीं है। यौन संबंधों को लेकर बहुत-से लोगों ने लिखा, मगर किसी ने उसे फार्मूलाबद्ध नहीं किया था कि यह पुड़िया है! और साहित्य में यह पुड़िया नई पीढ़ी को राजेंद्र यादव ने पकड़ाया।

मनोज मिश्र : तो क्या स्त्री विमर्श के नाम पर जो कुछ लिखा जा रहा है, वह पर्याप्त नहीं है?
’उसकी दिशा गलत है। उन्हें भ्रमित किया जा रहा है। पिछले पंद्रह-सोलह वर्षों में स्त्री विमर्श को धकेल दिया गया है। स्त्रियों का संघर्ष पटरी से उतर चुका है।

अजय पांडेय : आपका एक पक्ष कामगार संगठनों का भी रहा है। आज साहित्य में कामगार संगठनों के संघर्ष को लेकर प्राय: नहीं लिखा जाता। इस पर आप क्या कहेंगी?
’कामगार संगठन की मैं एक प्रतिबद्ध कार्यकर्ता हुआ करती थी, नेता नहीं। कार्यकर्ता होता है जो नारा लगाता है, सड़कों पर उतरता है, पुलिस आती है और उसे पकड़ कर ले जाती है। कामगार संगठनों का काम है, श्रमिकों की शक्ति को प्रदर्शित करना, उसे रेखांकित करना। मगर उनके साथ काम करते-करते मुझे बहुत शिद्दत से लगा कि ऐसा क्यों होता है कि जो सपना श्रमिकों को पकड़ाया जाता है, जहां हम उसे एक उम्मीद बंधाते हैं, जो उसका दाय है, अधिकारी है, वह उसे मिल नहीं पाता। आखिरकार उसे वापस अपने गांव-घर लौटना पड़ता है, इसलिए कि कामगार संगठनों के नेता पूंजीपतियों से समझौता कर लेते हैं और अंत में यह होता है कि न तेरी न मेरी! इस तरह कामगार संगठनों के प्रति मेरी अंधश्रद्धा टूटी। मुझे लगा कि बहुत कुछ गलत हो रहा है। मुंबई में अब तक की सबसे बड़ी हड़ताल हुई, ऐतिहासिक हड़ताल। दत्ता सावंत की अगुआई में अठारह महीने की श्रमिक हड़ताल। मगर मैंने देखा और फिर महसूस किया कि अरे ये क्या हुआ! ये लोग तो उजड़ गए!

राजेंद्र राजन : एक लेखिका के रूप में क्या आपको कभी ऐसा लगा कि पुरुष और महिला लेखक के साथ समीक्षा का ढंग और व्यवहार कुछ बदल जाता है?
’महिलाओं की यह शिकायत रही है। कुछ महिलाओं को शायद यह भी लगता है कि वे जो कुछ लिखती हैं, बहुत अच्छा लिखती हैं। मैंने जबसे आलोचकों के बारे में सोचना शुरू किया है, मुझे लगा कि एक जो पूर्व धारणा रही है औरतों के बारे में कि ये तो जनानियां हैं, ये क्या करेंगी (अपनी नई आने वाली किताब ‘नकटौरा’ में मैंने इसका जिक्र भी किया है)! ये तो बस पुरुषों का स्वांग करेंगी, इनका अपना स्वतंत्र चिंतन तो है नहीं! वही धारणा शायद स्त्रियों के लेखन के मूल्यांकन में रही होगी। पर ऐसा नहीं है। अगर ऐसा रहा होता तो मन्नू भंडारी, कृष्णा सोबती, उषा प्रियंवदा की तिगड़ी बना कर इस कदर बात न हुई होती। और आश्चर्य की बात तो यह है कि औरतें तो बदल रही हैं, अनुभवों से भी बदल रही हैं, उसको कहने के तरीके से भी बदल रही हैं। नामवर जी ने एक बार कहा था कि बहुत-सी महिलाएं इसलिए छप रही हैं कि वे महिला हैं।

कुछ महिलाएं इसीलिए आप लोगों द्वारा प्रशंसित हुर्इं कि वे महिला हैं। तो, आलोचना का यह स्तर है। अब जब महिलाएं उन क्षेत्रों को, जो वर्जित थे उनके लिए, उन क्षेत्रों में जाकर वे अपना अनुभव बना रही हैं। यह साहित्य में भी हो रहा है। इसलिए आलोचना को थोड़ा अपनी रूढ़ियों से टकराना चाहिए। हालांकि अब आलोचना जैसी कोई चीज रह गई है, कहना मुश्किल है। औरतों को भी इस मुगालते से बाहर आना चाहिए कि हम ऐसा कुछ लिख रहे हैं, जो हिंदी साहित्य को अलग तरह के अवदान से परिपूर्ण कर दे। अब मूल्यांकन की दृष्टि में कृति होनी चाहिए। आलोचना में विचारधारा का घेरा रचनात्मकता को भंग करता है। कई बार तो लेखक से पहले आलोचक बोलना शुरू कर देता है। कुछ लोगों ने मान लिया है कि अमुक लेखक कुछ भी लिखेगा, वह अच्छा ही और सही ही लिखेगा। उस विचारधारा के लोग छतरी लेकर उसके पीछे खड़े हो जाएंगे। जैसे उदय प्रकाश कुछ भी लिखेंगे, वह अच्छा ही होगा! इस प्रवृत्ति से कुछ लोगों के लेखन का सही मूल्यांकन नहीं हो पाता। लेखक की प्रतिबद्धता समाज है। विचारधारात्मक छुआछूत से साहित्य का भला नहीं हो रहा।

मनोज मिश्र : यही विचारधारा पुरस्कार वापसी पर भी हावी रही!
’लेखक के सामने पहली चीज तो है कि वह अपनी असहमति को व्यक्त कैसे करे। उसके पास कोई तलवार तो है नहीं कि लेकर मैदान में उतर जाए। वह उन्हीं चीजों से लड़ेगा, जो उसके पास हैं। उनके पास पुरस्कार था, जिसके लायक उन्हें समझा गया था, तो अगर उसे उन्होंने हथियार बनाया, तो मुझे लगता है कि सरकार को उस पर गौर करना चाहिए था। सरकार खुद उस पर दक्षिणपंथी और वामपंथी करने बैठ गई!

प्रतिभा शुक्ल : तो क्या जिस वजह से पुरस्कार वापसी अभियान चला कि असहिष्णुता बढ़ रही है, वैसा आप भी मानती हैं?
’लेखक के पास पुरस्कार से बड़ा हथियार कोई नहीं है। पर लेखक को यह भी सोचने की जरूरत है कि उससे भी बड़ा हथियार उसका लेखन है। आप लिखिए न, सरकार का ध्यान उस पर जाएगा। मगर वैसा नहीं हुआ, इसलिए वह सारा अभियान कुछ प्रायोजित-सा लगा मुझे। कहने का मतलब यह कि लेखक के पास उसका सबसे बड़ा हथियार कलम है। जिनके पास पुरस्कार नहीं था और विरोध में खड़े हुए थे, क्या वे लेखक नहीं हैं!

सूर्यनाथ सिंह : देखने में आता है कि आलोचना के नाम पर कुछ गुट बन गए हैं, इससे साहित्य पर क्या असर पड़ रहा है?
’मुझे लगता है, गुटबाजी ने जितना नुकसान किया है साहित्य का, उतना किसी ने नहीं किया है। पहले भी विरोध होता था साहित्य में। प्रेमचंद का एक स्कूल था, तो प्रसाद का भी एक स्कूल था और निराला का भी एक अलग स्कूल था। लेकिन कोशिश होती थी कि अच्छे साहित्य को सामने लाया जाए। मगर आज तो हालत इतनी खराब है कि क्या कहें। अगर वैश्विक स्तर पर हिंदी साहित्य का कोई नामलेवा नहीं है, तो इसकी वजह गुटबाजी ही है। अभी जैसा मैं कह रही थी, एक आलोचक, जिन्होंने ‘इंडिया टुडे’ में सूची जारी की है लेखकों की, उसमें सारे नाम उनकी विचारधारा के हैं। मुझे अचरज हुआ यह देख कर। इस पड़ाव पर पहुंच कर उनसे ऐसी अपेक्षा नहीं की जाती। रचना ही केंद्र में होनी चाहिए। ठीक है, आप दक्षिणपंथ के नाम पर कुछ पौराणिक कथाओं को अलग कर दीजिए, पर कुछ लोग ऐसे होंगे, जो आपकी इस गुटबाजी के चलते, प्रतिबद्धता के बावजूद, प्रगतिशीलता के बावजूद आपके यहां नाम लिखाने नहीं आएंगे। मगर इसका मतलब यह तो नहीं कि आप उनका नाम नहीं लेंगे!… ‘पीली छतरी वाली लड़की’ पढ़ कर मैं हतप्रभ थी। हम क्या कर रहे हैं? घृणा के बदले और घृणा फैलाने का काम कर रहे हैं? साहित्य की दृष्टि एक विवेकपूर्ण संतुलन की तलाश में रहती है। एक गांव में रहने वाले दलित और शहर में रहने वाले एक दलित के बीच भी विषमता आ गई है। शहर का दलित अपने बच्चे को कलक्टर बनाने के लिए पांच लाख रुपए खर्च करके ट्यूशन दिलवा सकता है, पर गांव का दलित ऐसा नहीं कर सकता। इस विसंगति को आप केवल वर्णन करके तो दूर नहीं कर सकते! इसी गुटबंदी के कारण अच्छी कृतियां पीछे छूट गर्इं। आप कहते हैं कि किसानों के बारे में कुछ लिखा नहीं जा रहा है। अरे भइया, देखेंगे तब पता चलेगा न! लेकिन आपने तो मान रखा है कि जब तक उदय प्रकाश नहीं लिखेंगे किसानों के बारे में, तब तक किसान के बारे में बात नहीं करेंगे। उदय प्रकाश से मेरा कोई विरोध नहीं है, मैं उनकी प्रशंसिका हूं, पर यह जो सामंतवाद आलोचकों ने पैदा किया है, इससे साहित्य कब मुक्त होगा, समझ नहीं आता!

मृणाल वल्लरी : स्त्री शोषण का मुद्दा पहचान की राजनीति में बदल गया है। अब महिलाओं में भी हर तरह की गुटबंदी है। स्त्री संघर्ष की साझी राह कैसे बने?
’महिला महिला है। कहा जाता है कि दलित विमर्श राजेंद्र यादव ने शुरू किया। ऐसा नहीं है। कमलेश्वर जी ने दया पवार के साथ बैठ कर शुरू की थी। ‘सारिका’ की फाइलें पलट कर देखें तो पता चलेगा। ‘हंस’ में तो केवल हिंदी के लेखक छपते थे, सारिका में सभी भारतीय भाषाओं के लेखक छपते थे। तो, महिला शोषण के मुद्दे पर दया पवार की बेटी उर्मिला पवार ने उसी समय लिखना शुरू कर दिया था कि इसे इस तरह न देखिए कि उसका शोषण इसलिए हो रहा है कि वह दलित या ब्राह्मण है। महिलाओं के शोषण की वजह उनकी जाति नहीं, उसकी देह है। किसी भी जाति-बिरादरी के पुरुष के लिए महिला सिर्फ एक देह है। कहने का अर्थ यह है कि इन सारी चीजों को जोड़ कर स्त्री विमर्श का जो मुद्दा बनना चाहिए था, उसे बिखरा दिया गया। आज दलित स्त्री सोचती है कि उनके साथ जाति की वजह से भेदभाव होता है। अभी सुशीला टाकभौरे ने नया ज्ञानोदय में कहा है कि उनकी रचनाओं पर आलोचक ध्यान नहीं देते, वे सिर्फ समर्थ महिलाओं पर लिखते हैं। उन्होंने यह नहीं कहा कि वे उनसे अच्छा लिखती होंगी या हम भी अच्छा लिखना चाहते हैं। सुशीला से मैं कहना चाहती हूं कि तुमने ऐसा कैसे सोचा कि तुमने सब कुछ अच्छा लिखा। तो वे कहेंगी कि पाठकों से पता चला। तो, पाठक तो तुम्हारे साथ खड़ा है! अब महिलाओं में पहचान विभाजित कर दिया गया है- दलित लेखन, स्त्री लेखन वगैरह। इधर हमारी मृदुला गर्ग को लग रहा होगा, हमारी राजी सेठ को लग रहा होगा, हमारी कई महिलाओं को लग रहा होगा कि हमारा तो कोई नोटिस नहीं लिया जाता और मैत्रेयी जी की एक किताब आती है और उस पर खगेंद्र ठाकुर भी लिख रहे हैं, मैनेजर पांडेय भी लिख रहे हैं, वो भी लिख रहे हैं, ये भी लिख रहे हैं! इसमें उनका दोष नहीं है। अगर तकलीफ है तो यह है कि वे उसके विमर्श को, स्त्री विमर्श को तोड़ दिया है। स्त्री विमर्श को तोड़ने के इतने औजार बना लिए गए हैं कि ये आपस में रहेंगी तो लड़ेंगी। यह बहुत खतरनाक खेल साहित्य में हुआ है। इसके अलावा फार्मूले पकड़ाए गए कि तुम इस पर लिखो। यह सिर्फ नई पीढ़ी की लड़कियों को नहीं पकड़ाया गया, पुरुषों को भी पकड़ाया गया कि आप भी बताइए कि आपके जीवन में क्या-क्या हुआ, यौन संबंधों में किस-किस के साथ गए, क्या किया!

मुकेश भारद्वाज : आज साहित्य की पहचान शत्रुघ्न सिन्हा, अनुपम खेर, कुमार विश्वास की उपस्थिति से बनाने की कोशिश हो रही है। हर साहित्योत्सव में उन्हें बुलाया जाता है। इसे आप कैसे देखती हैं?
’मुझे लगता है कि साहित्य को नुकसान पहुंचाने में जो कमी रह गई थी, उसका बंटाधार करके रख दिया है, इन साहित्य महोत्सवों ने। साहित्य को प्रोत्साहित करने के लिए हो रहे हैं ये सब। ‘आजतक’ ने शुरू किया! ‘आजतक’ के मुझे तो सुरेंद्र प्रताप सिंह याद हैं!… अब जब आजतक ने साहित्योत्सव किया तो दिल्ली में बड़े-बड़े पोस्टर लगे आशुतोष राणा के, अनुपम खेर के, जिन्होंने अपनी-अपनी जीवनी लिखी। मुझे हैरानी हुई कि वे कौन-से साहित्यकार हैं! पूरे भारत में इस तरह के प्रायोजित कार्यक्रम हो रहे हैं। अभी देहरादून में हुआ। आजतक के कार्यक्र में मैंने इसलिए जाने से मना किया कि वहां जावेद अख्तर और शबाना आजमी को बुलाया गया था। मैं पूछती हूं कि जब शबाना आजमी की कोई फिल्म आती है तो क्या वे उसके प्रदर्शन के समय हमारे साहित्य के मैनेजर पांडेय या किसी व्यक्ति को बुला कर बिठाते हैं? तो फिर हम उन्हें साहित्य के समारोह में क्यों बुलाते हैं।

प्रस्तुति: सूर्यनाथ सिंह / मृणाल वल्लरी

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  1. Gopal Ji Rai
    Dec 4, 2017 at 4:24 pm
    बहुत दिनों बाद किसी महिला साहित्यकार का बड़ी बहादुरी के साथ अपनी बात को कहना पढ़ने को मिला ,पूरी टीम के सवालो के जवाब बेबाकी के साथ दिया जिसे पढ़ कर बड़ी ख़ुशी हुई . महिला साहित्यकार केवल महिलाओ के बारे में लिखेगी यह कोई बंधन है क्या वह किसी भी विषय पर लिखे , साहित्यकार साहित्यकार है महिला और पुरुष ,सवर्ण और दलित में बांटना ठीक नहीं है
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