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बारादरी: सतत मूल्यांकन से पहले समस्या को समझें

इस देश में नीतियों की कमी नहीं है। समस्या है, तो उनके क्रियान्वयन की। अब तक जितनी भी बातें मैंने कीं, उनमें से एक भी नीति से जुड़ी नहीं है। सब क्रियान्वन से जुड़ी हैं।

बारहवीं और दसवीं की केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) की बोर्ड परीक्षाओं ने कई तरह के सवाल खड़े किए। दसवीं की परीक्षा के परचे लीक होने से यह केंद्रीय एजंसी कठघरे में आई तो बोर्ड परीक्षा की वापसी के बाद परीक्षार्थियों की खुदकुशी के मामलों ने चौंकाया। सतत एवं समग्र मूल्यांकन (सीसीई) की नाकामी भी पूछ रही है कि आखिर हमारी व्यवस्था में गलती कहां है? केंद्रीय स्कूल शिक्षा सचिव अनिल स्वरूप का कहना है कि हमें इन सबसे निपटने के लिए समस्या के मूल में जाना होगा। उन्होंने कहा कि हमारे पास विचारों और दिशा-निर्देशों की कमी नहीं है, जरूरत है तो उन्हें बेहतर तरीके से लागू करने की। कार्यक्रम का संचालन किया कार्यकारी संपादक मुकेश भारद्वाज ने।

अनिल स्वरूप

मूल रूप से उत्तर प्रदेश के अनिल स्वरूप का अड़तीस सालों का प्रशासकीय अनुभव रहा है। कोयला सचिव के रूप में भी अपने कामकाज को लेकर वे सराहे गए। मानव संसाधन विकास मंत्रालय में स्कूल शिक्षा सचिव के रूप में इनके कार्यकाल में ऐसे मामले आए, जिनसे पूरे देश में बहस छिड़ी। पाठ्यपुस्तकों में बदलाव से लेकर दसवीं में बोर्ड परीक्षाओं की वापसी ऐसे ही मुद्दे थे। खासकर सीबीएसई की दसवीं की परीक्षा के परचे लीक होने के बाद संस्थान की छवि ठीक करने के लिए इन्हें काफी जूझना पड़ा। ये वैसे नौकरशाहों में से हैं जो समय के साथ चलने में यकीन करते हैं। अपने कार्यकाल में लगभग सभी राज्यों का दौरा कर वहां की खामियों और खूबियों को समझते रहे। ये कहते हैं कि उत्तर प्रदेश के किसी गांव के स्कूल की परेशानी का हल दिल्ली में बैठ कर नहीं निकाला जा सकता। इस महीने के आखिर में सेवानिवृत्त हो रहे अनिल स्वरूप सोशल मीडिया पर भी खासे सक्रिय रहते हैं।

मनोज मिश्र : फिर से दसवीं में बोर्ड परीक्षाएं शुरू कर दी गई हैं। इस बार के नतीजों के बाद कुछ विद्यार्थियों ने खुदकुशी कर ली। यह व्यवस्था कहां तक उचित है।

अनिल स्वरूप : मेरा मानना है कि जीवन खुद एक परीक्षा है। व्यक्ति जितनी जल्दी उसके लिए अभ्यस्त हो जाए, उतना ही अच्छा है। परीक्षाएं तो होनी चाहिए। कैसे होनी चाहिए, इस पर चर्चा हो सकती है। लेकिन परीक्षा ही न हो, यह मेरे विचार से उचित नहीं है। मेरा व्यक्तिगत रूप से यह भी मानना है कि अगर मेरी परीक्षा नहीं हुई होती तो शायद मैं पढ़ता ही नहीं। यह हमारी मानसिकता है। वैसे तो परीक्षाओं के बजाय सतत मूल्यांकन होते रहना चाहिए, ताकि उसके अनुसार व्यक्ति निरंतर अपने को सुधारता चले। मगर किसी भी विचार का मूल्यांकन वस्तुस्थिति के आधार पर धरातल पर हो सकता है। हमें देखना होगा कि उसकी उपादेयता क्या है, व्यावहारिकता क्या है।

कक्षा दस की परीक्षाओं के संबंध में काफी चर्चा हुई और यह तय पाया गया कि हम एक फिल्टर बनाएं, जिससे कि बच्चा परीक्षाओं के प्रति जागरूक हो सके। अगर आप कक्षा दस और बारह की कक्षाओं की तुलना करें, तो बारहवीं परीक्षाओं का बिल्कुल अलग महत्त्व है। वहां से आप उच्च कक्षाओं में दाखिले के लिए जाते हैं। तुलनात्मक रूप से कक्षा दस का उतना महत्त्व नहीं है। फिर भी वह बच्चे को कक्षा बारहवीं के लिए तैयार करता है। शिक्षा का अधिकार कानून में हम फिनलैंड की नकल पर फेल न करने की नीति तो ले आए, पर उसका अर्थ परीक्षा से मुक्ति लगा लिया गया। उसका नतीजा यह हुआ कि राष्ट्रीय प्रतिभा विकास परीक्षा में पैंतीस-छत्तीस फीसद बच्चे ही पास कर पाए। यानी अगर हम उसे पहले से तैयार नहीं करेंगे, तो वह कहीं न कहीं जाकर फंसेगा। इसलिए परीक्षाएं होती रहनी चाहिए।

अजय पांडेय : बारहवीं की परीक्षा में इस बार मानविकी, यहां तक कि साहित्य के पर्चे में भी बच्चों ने सौ में से निन्यानबे अंक हासिल किए। यह कैसे संभव है?

’यह पहली बार नहीं हुआ है। पर मेरी व्यक्तिगत राय है कि इस पर विचार किया जाना चाहिए। साहित्य में सौ में सौ अंक पाना आसान नहीं है। इस पर चर्चा होनी चाहिए। चर्चा हो रही है। सौ में सौ अंक देने का मतलब है कि व्यक्ति पूरी तरह परफेक्ट है। पर कोई पूरी तरह परफेक्ट कैसे हो सकता है। इसलिए इस पर विचार होना चाहिए।

पारुल शर्मा : सीबीएसई के फैसले ठीक से लागू क्यों नहीं हो पाते?

’हमारा एक संघीय ढांचा है। केंद्र सरकार की उसमें एक भूमिका है। मेरा मानना है कि हमें अपनी भूमिका के दायरे में काम करना चाहिए। दूसरे की भूमिका में अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। केंद्र सरकार के माध्यम से हम प्रमुख रूप से केंद्रीय विद्यालय और नवोदय विद्यालय चलाते हैं। जो अन्य स्कूल हैं उनका पंजीकरण राज्य सरकारें करती हैं। उनका दायित्व भी राज्य सरकारों का है। इसके अलावा हम सीबीएसई के जरिए थोड़ा-बहुत नियंत्रण करते हैं। लेकिन सीबीएसई बोर्ड लगभग बीस हजार स्कूलों पर ही नियंत्रण रखता है। इसके अलावा हजारों की संख्या में स्कूल हैं। वे सब राज्य सरकारों के अधीन हैं। तो, जब कोई सुझाव आता है तो हम उनसे चर्चा करते हैं और उनसे अनुरोध करते हैं कि आप इस पर इस तरह से विचार कीजिए। जैसे मैंने अभी जम्मू-कश्मीर सरकार से अनुरोध किया कि आप एनसीईआरटी की पुस्तकें क्यों नहीं लागू करते। वे इस पर राजी हो गए। इसी तरह उत्तर प्रदेश सरकार से बात की, तो वे भी मान गए। मेरा मानना है कि केंद्र सरकार के नाते हमें किसी पर कोई चीज थोपनी नहीं है।

मनोज मिश्र : कोयला खदानों में गड़बड़ी की क्या वजह थी?

’लोग समझते हैं कि कोयला खदानों की नीलामी में गड़बड़ी थी, पर वास्तव में इसका मुख्य कारण था कोयले की कमी। अब आप कल्पना कीजिए कि कोयले की कमी थी फिर भी लोग कोयला खदानें खरीदने के लिए क्यों उतावले हो रहे थे? जब सीटें सीमित होती हैं और लोग ज्यादा होते हैं, तो टिकट ब्लैक होने लगता है। ऐसे में सीटें बढ़ा दीजिए, ब्लैक की समस्या खत्म हो जाएगी। उसी तरह मुझे समझ में आया कि समस्या कहीं और है। कोयले की कमी असली समस्या है। जब मैंने कोयला विभाग का काम संभाला तब बहुत खराब स्थिति थी। करीब सत्ताईस खदानें बहुत बुरी हालत में थीं। बिजली घरों के पास मुश्किल से तीन-चार दिन का कोयला होता था। कोयले की कमी इसलिए थी कि जो जमीन चाहिए होती है, कोयला निकालने के लिए वह जमीन ही नहीं मिलती थी। जब जमीन मिल जाती थी तो वन विभाग से अनापत्ति प्रमाणपत्र नहीं मिल पाता था। ऐसे में कोयला निकलेगा कहां से। फिर कोयला निकल भी गया, तो ऐसी दुरूह जगहों पर वह निकलता था कि वहां से उसे लाना एक बड़ा काम होता था। तो, हमने तीनों स्थितियों के लिए रणनीति बनाई। उस रणनीति के तहत हमें जमीन मिलने लगी, वन विभाग ने भी सहयोग किया और रेलवे ने मदद की। उसका नतीजा हुआ कि 2014-15 में हमने पिछले वर्ष की तुलना में चौंतीस मीलियन टन अधिक कोयला उत्पादन किया। इस तरह स्थिति बिल्कुल बदल गई और यह होने लगा कि कोयला विभाग लोगों के पास जाने लगा कि कोयला ले लीजिए, हमारे पास देर तक रखने की गुंजाइश नहीं है। इस तरह जो कोयले को लेकर माफिया और खदान खरीदने वालों की भगदड़ मची हुई थी, वह बंद हो गई। शिक्षा विभाग में भी हम वही करने का प्रयास कर रहे हैं। वहां तो माफिया ऊपर से दिख जाता था, यहां माफिया भूमिगत है, उसे ढूंढ़ कर निकालना है।

मुकेश भारद्वाज : सतत एवं समग्र मूल्यांकन यानी सीसीई हिंदुस्तान में फेल क्यों हो गया? क्या इसलिए कि उसे यूपीए सरकार लेकर आई थी और इस सरकार ने उस पर ध्यान नहीं दिया?

’सवाल है कि जब हमारे यहां पच्चीस प्रतिशत अध्यापक स्कूल में जाते ही नहीं तो सीसीई क्या करेगा? जब तक हम समस्या के मूल में नहीं पहुंचेंगे और समझेंगे कि बाहर से लाकर कुछ लगा देंगे, तो वह समस्या हल हो जाएगी, तो वैसा नहीं होगा। फिनलैंड में आप किसी से बात कीजिए और बताइए कि हमारे यहां बीस से पच्चीस फीसद अध्यापक स्कूल नहीं जाते, तो वह हैरान होगा। वहां से लाकर आपने सीसीई लागू कर दिया। पर सोचने की बात है कि क्या हमारे यहां वास्तव में उसकी जरूरत है? हमें सीसीई लागू करने से पहले बुनियादी समस्याओं को समझने की जरूरत है। मैं चाहता हूं कि अध्यापक स्कूल जाए, वहां सीखे, थोड़ा प्रतिबद्ध हो। जब लोग उदाहरण स्थापित करें और लोग गर्व से कहें कि मैं वहां पढ़ाता हूं, तब आप सीसीई लागू कीजिए तो बात बनेगी। सीसीई निश्चित रूप से अच्छा है, पर उसका क्रियान्वयन इसलिए ठीक से नहीं हो पाया कि हमने मूल समस्या पर ध्यान नहीं दिया।

आर्येंद्र उपाध्याय : आज समस्या यह भी है कि बहुत सारे लोग वास्तव में स्कूल अध्यापक की नौकरी मजबूरी में करते हैं। वे अध्यापक बनना ही नहीं चाहते। इस समस्या का क्या निदान है?

’पहले कहा जाता था कि शिक्षकों को बहुत कम पैसा मिलता है। इसलिए तब वे अध्यापक नहीं बनना चाहते थे। आज की तारीख में गांवों में सबसे अमीर आदमी शिक्षक है। आज सरकार का अस्सी प्रतिशत पैसा शिक्षक की तनख्वाह में जाता है। यह सही बात है कि वह बहुत बाद में तय करता है कि उसे अध्यापन में जाना है। इसके लिए हमने व्यवस्था की है कि चार साल का कोर्स हो जाने के बाद उसे बारहवीं कक्षा पास करते ही निर्णय करना होगा कि उसे अध्यापक बनना है या कहीं और जाना है। हालांकि मैं नहीं कहता कि इससे सारी समस्या का हल हो जाएगा, पर हम इस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।

अजय पांडेय : परीक्षा से पहले परचे बाहर आ जा रहे हैं, इसे रोकने के लिए क्या उपाय किया जा रहा है?

’पेपर लीक बिल्कुल नहीं होना चाहिए। हमारा प्रयास होना चाहिए कि तकनीक के सहयोग से इसे रोक सकें। जब इस तरह की घटना होती है, तो सब उस महकमे के अधिकारी को निलंबित करने की मांग उठाना शुरू कर देते हैं। अरे भाई, यह तो सोचो कि गड़बड़ी की असली वजह क्या है, गलती कहां हुई है। अगर यह बात एक बार समझ में आ जाए कि कमी सीबीएसई में नहीं, प्रक्रियात्मक है, तो उसका समाधान निकालने में आसानी हो जाएगी। इसलिए तकनीक के जरिए इसका समाधान निकालने पर चर्चा चल रही है।

सूर्यनाथ सिंह : अभी तक नई शिक्षा नीति बनाने की दिशा में कोई काम क्यों नहीं हो पाया?

’इस देश में नीतियों की कमी नहीं है। समस्या है, तो उनके क्रियान्वयन की। अब तक जितनी भी बातें मैंने कीं, उनमें से एक भी नीति से जुड़ी नहीं है। सब क्रियान्वन से जुड़ी हैं। और हमने चिह्नित ही उन चीजों को किया है, जो नीति में नहीं है और वास्तव में उनकी जरूरत है, जैसे कोठारी आयोग की सिफारिशें, उन पर चर्चा करें कि आखिर अब तक उन पर काम क्यों नहीं हो पाया। जब हम इस मुद्दे पर जाएंगे कि क्यों नहीं हुआ तो समाधान मिल जाएगा। मेरा मानना है कि ज्यादातर सिफारिशें इसलिए लागू नहीं हो पातीं कि उनके व्यावहारिक पहलुओं पर चर्चा नहीं करते। इस बार जब नई शिक्षा नीति पर मुझसे चर्चा हुई, तो मैंने कहा कि दो लाइन की नीति बनाइए कि हर बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिले। उसके बाद आप कार्ययोजना बनाइए कि क्या किया जाना चाहिए, कैसे किया जाना चाहिए, कौन इसे करेगा और कब किया जाएगा। मुझे कार्ययोजना में विश्वास है। नीति आवश्यक है, पर उसका क्रियान्वयन उससे अधिक आवश्यक है।

मुकेश भारद्वाज : इतनी लंबी सेवा में आप राजनीतिक हस्तक्षेप से कैसे निपटे?

’अगर हम अपनी भूमिका को स्पष्ट समझ लें, कि उनकी भूमिका क्या है और मेरी क्या है, तो समस्या नहीं आएगी। मुझे कभी ऐसी कोई समस्या नहीं आई। मैंने उत्तर प्रदेश में अलग-अलग पार्टियों के मुख्यमंत्रियों के साथ काम किया, यहां कई मंत्रियों के साथ काम किया, पर ऐसी कोई दिक्कत नहीं आई। असहमति होती है, वह होनी चाहिए, लेकिन अगर आपमें अपनी बात सही ढंग से रखने की क्षमता है, तो उससे पार पा जाते हैं। मेरा बहुत स्पष्ट मत है कि अगर कोई बात नियम के विरुद्ध है, तो मैं उसे निश्चित रूप से नहीं करूंगा। यह नेता भी समझते हैं, इसलिए कभी किसी ने मुझसे नियम के विरुद्ध कुछ करने को नहीं कहा। इसलिए कभी ऐसा टकराव नहीं हुआ कि आप अपनी गली जाइए, मैं अपनी गली जाऊंगा।

अरविंद शेष : अभी देश में शिक्षा का स्तर दो तरह का बन गया है। इसे कैसे दूर किया जा सकता है?

’हर जगह चीजें एक जैसी नहीं होतीं, कुछ अच्छी होती हैं, कुछ बुरी होती हैं। अब इसमें देखना यह चाहिए कि जहां कुछ अच्छा हो रहा है, उसे अपनाया जाए। जैसे कई स्कूल केंद्रीय विद्यालयों के अनुरूप मॉडल स्थापित कर रहे हैं। तो, अगर आपके पास एक अच्छा उदाहरण है, तो आप उसकी आलोचना करने के बजाय उससे सबक लें।

सूर्यनाथ सिंह : देखा जाता है कि राजनीतिक दल अपनी विचारधारा को पाठ्य पुस्तकों में थोपने का प्रयास करते हैं। इसे रोकने का क्या उपाय है?

’ऐसा कोई परिवर्तन तो नहीं हुआ है पाठ्य पुस्तकों में, जिसे लेकर बहुत परेशान होने की जरूरत है। थोड़ा-बहुत परिवर्तन तो होता रहता है। और आप एक बात बताइए, कि इस पूरे परिवेश में मैं इन छोटी-छोटी चीजों को देखूं या जो बड़े मुद्दे हैं, उन्हें देखूं? मेरा सामने तो इससे बहुत बड़ी समस्याएं हैं शिक्षा के क्षेत्र में। ये सब इतनी छोटी चीजें हैं कि इन पर मुझे ध्यान देने की जरूरत नहीं है।