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बारादरी: पूर्णबंदी से थमी कोरोना की रफ्तार

कोरोना के कहर के बाद जब सारी दुनिया घर में कैद हो गई है और घर से दफ्तर का विकल्प चुना गया है तो बहुत से लोगों के पास यह सुरक्षित विकल्प नहीं है। चिकित्सा कर्मी, सफाई कर्मी, पुलिस स्क्रीन में कैद होकर आभासी रूप से काम नहीं कर सकते हैं। इन लोगों को घर से निकल कर कोरोना के संक्रमण का प्रत्यक्ष सामना करना ही है। चिकित्सा क्षेत्र के योद्धाओं का मनोबल तब और ऊंचा हो जाता है जब वे अपने अगुआ को स्क्रीन पर नहीं बल्कि अपने सामने खतरों और चुनौतियों के बीच पाते हैं। स्क्रीन के सुरक्षित दायरे से निकल कोरोना योद्धाओं के साथ खड़े रहने वाले डॉक्टर हर्षवर्धन ने ऑनलाइन माध्यम से ई-बारादरी में सवालों के जवाब दिए। बातचीत का संचालन किया कार्यकारी संपादक मुकेश भारद्वाज ने।

Author Published on: May 13, 2020 12:37 AM
ऑनलाइन माध्यम से जनसत्ता ई-बारादरी में सवालों के जवाब देते केंद्रीय चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री डॉ. हर्षवर्धन।

डॉक्टर हर्षवर्धन: दिल्ली में चांदनी चौक से दूसरी बार सांसद बने भाजपा नेता डॉक्टर हर्षवर्धन जननेता के साथ एक कुशल चिकित्सक भी हैं। 13 दिसंबर, 1954 को दिल्ली में जन्म। एमबीबीएस और कान, नाक व गला में कानपुर के जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज से विशेषज्ञता हासिल की है। सहज और सरल व्यक्तित्व के साथ अपनी अलग पहचान रखते हैं। दिल्ली विधानसभा के पांच बार सदस्य रह चुके हैं। मौजूदा समय में केंद्र सरकार की कैबिनेट में चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण, विज्ञान एवं तकनीक और पृथ्वी विज्ञान जैसे अहम मंत्रालयों की जिम्मेदारी निभा रहे हैं। कोरोना महामारी जैसे विकट समय में इनकी भूमिका पर पूरी दुनिया की निगाहें हैं।

संजय शर्मा : पूर्णबंदी को तीसरी बार बढ़ाने की जरूरत क्यों हुई?
डॉक्टर हर्षवर्धन : आज विश्व के 215 देश कोरोना के संक्रमण से जूझ रहे हैं। भारत में 25 मार्च को पहली पूर्णबंदी लागू की गई। इससे पहले प्रधानमंत्री की अपील पर देश भर में 22 मार्च को जनता कर्फ्यू लगाया गया था। यह स्वैच्छिक कर्फ्यू जनता द्वारा, जनता के लिए, जनता के हित में लगाया गया था। जनता कर्फ्यू को भावी पूर्णबंदी का पूर्वाभ्यास भी माना गया। इससे पता चला कि देश की जनता आने वाले समय में किसी भी प्रकार के उपाय में सहयोग देने को तैयार है। जनता कर्फ्यू को मिले समर्थन की तरह 25 मार्च से 13 अप्रैल तक चली पूर्णबंदी का लोगों ने न केवल समर्थन किया अपितु इसे सफल बनाने के लिए अपेक्षा से अधिक सहयोग दिया।

इस पूर्णबंदी का मकसद मृत्यु दर में कमी लाना, संक्रमित लोगों के ठीक होने की दर मे सुधार लाना और मामलों की वृद्धि पर लगाम लगाने के लिए स्वास्थ्य के बुनियादी ढांचे को और अधिक मजबूत बनाकर विस्तार करना तथा पूर्णबंदी के निर्देशों के प्रति जागरूकता विकसित करके इस संक्रमण के खिलाफ जन अभियान विकसित करना था। इक्कीस दिन के दौरान मामलों के बढ़ने की गति सामान्य रही और ऐसा लगा कि हम तेजी से स्थिरता की दिशा में बढ़ सकेंगे। इस तरह पहली पूर्णबंदी के अच्छे परिणाम मिले। लेकिन संक्रमण को पूरी तरह काबू करने के लिए 21 दिन का समय पर्याप्त नहीं लगा इसलिए पूर्णबंदी को बढ़ाना जरूरी था। देश में अब तीसरी पूर्णबंदी के पालन में जनता सहयोग दे रही है।

संजय स्वतंत्र : पूर्णबंदी से आम लोग परेशान हो रहे हैं। इसके क्या फायदे हैं जिससे वे इस परेशानी को झेलने के लिए तैयार हो जाएं?
डॉक्टर हर्षवर्धन : जहां तक पूर्णबंदी से फायदे की बात है, सभी जानते हैं कि फायदे हुए हैं। इन फायदों में स्वस्थ होने वाले रोगियों की दर बढ़कर 31.15 फीसद होना, मृत्यु दर विश्व के मुकाबले न्यूनतम रहना, मामलों के दोगुना होने की दर में सुधार होना शामिल है। इसके अलावा सरकार ने स्वास्थ्य के बुनियादी ढांचे में जो विस्तार और सुधार किया उसके परिणाम भी पूर्णबंदी के दौरान बेहतर रहे।

प्रेम प्रकाश : अब तक हुई पूर्णबंदी के नतीजों को सकारात्मक माना जा सकता है?
डॉक्टर हर्षवर्धन :  जी हां, काफी सकारात्मक परिणाम मिले हैं। बारह राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों-अंडमान निकोबार, अरुणाचल प्रदेश, दादर नागर हवेली, गोवा, असम, चंडीगढ़, छत्तीसगढ़, लद्दाख, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम और पुडुचेरी में पिछले 24 घंटे में संक्रमण का कोई भी मामला सामने नहीं आया है। चार राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों- दमन दीव, सिक्किम, नगालैंड और लक्ष्य द्वीप में अब तक कोई भी मामला सामने नहीं आया।

देश में 207 जिलों में अब तक कोई मामला समाने नहीं आया है। इनमें 56 जिले ऐसे हैं, जिनमें सात दिन के बाद किसी मामले का पता नहीं चला। वहीं 32 जिले ऐसे हैं जिनमें 14 दिन के बाद किसी मामले की रिपोर्ट नहीं है। इसी तरह 16 जिलों में 21 दिन पूरे होने के बाद भी कोई मामला सामने नहीं आया। इसके अलावा 52 जिलों में 28 दिन पूरे होने के बाद भी किसी मामले की रिपोर्ट नहीं मिली। इससे पता चलता है कि बड़ी संख्या में जिले संक्रमण-मुक्त होने की दहलीज पर हैं। इसे देखते हुए स्थिति को संतोषजनक कह सकते हैं।

दीपक रस्तोगी : लोगों में ऐसी आशंका है कि पूर्णबंदी की तीसरी अवधि पूरी होने के बाद भी उन्हें सभी तरह की छूट नहीं मिलेगी। लोगों की आशंकाएं कितनी सही हैं?
डॉक्टर हर्षवर्धन : फिलहाल तीसरी पूर्णबंदी की अवधि खत्म नहीं हुई है। इसके अलावा अभी हम कोरोना वायरस से युद्ध में सफलता की ओर बढ़ रहे हैं। सजग लोग यह बात समझते हैं कि इस समय धैर्य की आवश्यकता है। पूर्णबंदी के 50 दिन बीत जाने के बाद भी कुछ लोगों को इसका अर्थ और इसके उद्देश्य समझने में कठिनाई हो रही है।

सभी को सावधानियां बरतने और सरकारी प्रयासों में दिल से सहयोग देना होगा और समाज की स्वयंसेवी संस्थाओं को इसके लिए लोगों को शिक्षित और जागरूक करना होगा। जहां तक पूर्णबंदी से छूट दिए जाने की बात है, यह स्पष्ट है कि रेड जोन में और संक्रमित इलाकों में विशेष छूट देने का फिलहाल प्रश्न नहीं उठता। जिन इलाकों में छूट देने के बावजूद लापरवाही जारी है उन इलाकों में अधिक छूट देने से नुकसान होने की आशंका है।

लोग भी समझ रहे हैं कि सब कुछ उनके स्वास्थ्य की रक्षा के लिए किया जा रहा है और उनके इलाकों में संक्रमण में कमी दिखाई देने पर ही छूट देना उचित होगा। तीसरी पूर्णबंदी के बाद की स्थिति और संक्रमण में कमी आने के स्तर तथा राज्यों के साथ विचार-विमर्श करके और आगे की रणनीति पर निर्णय होगा। प्रधानमंत्री जी ने सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों तथा केंद्र शासित प्रदेशों के उपराज्यपालों से पांचवी बार वीडियो कांफ्रेंसिंग से विचार-विमर्श किया है।

प्रधानमंत्री चाहते हैं कि स्थिति शीघ्र सामान्य हो। वे अथक प्रयास कर रहे हैं कि लोगों को राहत मिले, अर्थव्यवस्था पटरी पर लौटे और धीरे-धीरे हालात सुधरें। इसलिए सरकार ने आंशिक रूप से रेल सेवा बहाल कर दी है। प्रधानमंत्री जी ने उदारता से गरीबों के लिए विशाल पैकेज के अंतर्गत जरूरतमंद लोगों तक आर्थिक सहायता पहुंचाई है ताकि जान के साथ जहान सक्रिय रहे।

आर्येंद्र उपाध्याय : कोरोना विषाणु के संक्रमण को रोकने में जांच को सबसे अहम माना जा रहा है। ऐसे में हिंदुस्तान में जांच की संख्या कब तक बढ़ सकेगी?
डॉक्टर हर्षवर्धन : आपके प्रश्न में कोविड-19 की जांच को लेकर चिंता व्यक्त की गई है और आप जानना चाहते हैं कि देश में जांच की संख्या कब बढ़ेगी? यह प्रश्न वर्तमान स्थिति में प्रासंगिक नहीं लगता। मैं यह स्पष्ट करना चाहता हूं कि सरकार ने उन सभी लोगों की जांच करने की व्यवस्था की है जिनके लिए यह जांच जरूरी है। हमारा यह लक्ष्य नहीं है कि जांच कम की जाए। देश में कोविड-19 के लक्षण वाले उन सभी व्यक्तियों की जांच की जा रही है जिनमें जांच के लिए निर्धारित लक्षण हों। जांच उसी व्यक्ति की कराई जा रही है जिसकी जांच डॉक्टर, आइसीएमआर के दिशानिर्देशों के आधार पर जरूरी समझते हैं।

इसके अलावा सभी संदिग्ध व्यक्तियों, उसके परिजनों और उसके संपर्क में आए सभी लोगों की जांच की जा रही है जबकि अन्य देशों में केवल लक्षण वाले व्यक्ति की ही जांच की जाती है। हमारी जनसंख्या 135 करोड़ है। इसे देखते हुए लगता होगा कि जांच कम की जा रही है। हमने अपनी तैयारियों के बल पर मामलों की संख्या बढ़ने नहीं दी। आज से चार महीने पहले हमारे देश में वायरस की जांच के लिए केवल एक प्रयोगशाला पुणे में थी। अभी देश भर के सभी राज्यों में जांच की प्रयोगशालाएं है।

इस समय हमारे पास 345 सरकारी प्रयोगशालाएं और 131 निजी प्रयोगशालाएं हैं। हमारी प्रतिदिन जांच करने की क्षमता एक लाख हो गई है जबकि मैंने यह लक्ष्य 31 मई तक पूरा करने के लिए अपने वैज्ञानिकों को निर्देश दिया था। एक दिन पहले 86,368 व्यक्तियों की जांच की गई। अब तक कुल 16 लाख नौ हजार 777 व्यक्तियों की जांच की गई। प्रत्यक्ष आंकड़े ही आपके सवाल का प्रभावी उत्तर देते हैं।

सुशील राघव : देश में संक्रमण के मामलों के दोगुने होने की रफ्तार नियंत्रित है। लेकिन संक्रमण के नए मामले प्रतिदिन बढ़ रहे हैं। हम इसमें कब से कमी की उम्मीद कर रहे हैं?
डॉक्टर हर्षवर्धन : इस समय पिछले तीन दिन में मामले दोगुना होने की दर 12 दिन है जबकि 25 मार्च को तीन दिन में मामलों के दोगुना होने की दर तीन दिन थी। जहां तक राज्यों का सवाल है देश में आठ राज्यों में मामले दोगुना होने की दर 10 दिन से कम है, नौ राज्यों में मामले दोगुना होने की दर 10 से 20 दिन के बीच है। देश के चार राज्यों में यह दर 20 से 40 दिन के बीच है और चार अन्य राज्यों में मामले दोगुना होने की दर 40 से अधिक दिन है।

हमने कोविड-19 के संक्रमण की चुनौती को विशाल और जटिल नहीं बनने दिया। देश में संक्रमित रोगियों के स्वस्थ होने की दर से यह संतोष होता है और देश का मनोबल बढ़ा है। नए मामलों की वृद्धि विशेष रूप से केवल कुछ शहरों में हो रही है। जहां बड़ी झुग्गी बस्तियां हैं और सामाजिक दूरी आदि व्यावहारिक तौर पर अच्छी तरह कर पाना संभव नहीं है, एक-एक घर में अनेक लोग रहते हैं। इलाके घने बसे हैं और संकरी गलियां हैं।

हमने लोगों को जागरूक करने के लिए मोबाइल फोन पर वार्तालाप शुरू होने से पहले 11 भाषाओं में 117 करोड़ उपभोक्ताओं के लिए रिकार्डेड संदेश बजाए, 547 करोड़ संदेश मोबाइल फोन पर दिए, सोशल मीडिया पर प्रचार किया, सरकार ने आरोग्य सेतु ऐप की शुरुआत की जो इस ऐप को मोबाइल पर डाउनलोड किए जाने के बाद व्यक्ति को संक्रमण के जोखिम के बारे में सचेत करता है और अन्य जानकारियां भी देता है।

पंकज रोहिला : डॉक्टरों के आरोप हैं कि देश में डॉक्टरों के लिए निजी सुरक्षा उपकरणों (पीपीई) की कमी है। ऐसे में सरकार ने डॉक्टरों को अधिक से अधिक संख्या में पीपीई किट उपलब्ध कराने के लिए क्या कदम उठाए हैं?
डॉक्टर हर्षवर्धन : हमारे देश में राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों तथा केंद्रीय संस्थानों को 38 लाख पीपीई वितरित किए गए हैं। हमने ‘मेक इन इंडिया’ पहल के तहत देश में पीपीई को बनाने के लिए 109 विनिर्माताओं का चयन किया और उन्हें सहायता दी। देश में पीपीई किट बनाने के लिए आवश्यक कपड़ा पहले चीन से आयात किया जाता था। भारत सरकार के वस्त्र मंत्रालय द्वारा हमारे लिए ऐसे कपड़े की व्यवस्था करने से हम ‘मेक इन इंडिया’ पहल को इस दौरान और मजबूत कर सके। हमने इन निर्माताओं को दो करोड़ 23 लाख पीपीई खरीदने के आर्डर दे दिए हैं।

जहां तक एन-95 मास्क की कमी का सवाल है हमने लगभग 72 लाख ऐसे मास्क राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों तथा केंद्रीय संस्थानों को वितरित किए हैं। इन्हें देश में बनाने के लिए दस विनिर्माताओं का चयन कर दो करोड़ 48 लाख ऐसे मास्क खरीदने के उन्हें आदेश दिए गए हैं। एन-95 मास्क सबके लिए जरूरी नहीं होता। यह केवल अस्पताल में रोगी के संपर्क में आने वाले डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों के लिए आवश्यक होता है। ऐसे में पीपीई और मास्क की कमी का दावा करना निस्संदेह निराधार लगता है। आजकल हर रोज तीन लाख से ज्यादा पीपीई किट हम राज्य सरकारों को भेजते हैं।

प्रियरंजन : मध्य प्रदेश से रिपोर्ट है कि वहां पर डॉक्टरों की लापरवाही से कई स्थानों पर संक्रमण फैला। ऐसे डॉक्टरों के खिलाफ क्या कार्रवाई होनी चाहिए?
डॉक्टर हर्षवर्धन : जिन घटनाओं का आप उल्लेख कर रहे हैं, उनकी मुझे विस्तृत जानकारी नहीं है। कोई डॉक्टर जानबूझकर किसी मरीज का ऐसा नुकसान नहीं कर सकता। वे जिम्मेदारी से रोगियों की जान बचाने के भरसक प्रयास करते हैं और लोगों को भी संक्रमण से बचने की सलाह देते हैं। अनजाने में यदि कोई संक्रमित विदेशी यात्री अस्पताल में आकर डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों को संक्रमित करता है और वे संक्रमण से पीड़ित हो जाते हैं या उनमें बहुत कमजोर स्तर का संक्रमण भीतर से नुकसान पहुंचाने की कोशिश करता है, ऐसे में डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों को इसका भान नहीं होता और वे उपचार में जुटे रहते हैं। इसे उनकी लापरवाही नहीं कहा जा सकता।

संदीप भूषण : लोगों को क्या-क्या सावधानियां बरतनी चाहिए ताकि वे संक्रमण से दूर रहें?
डॉक्टर हर्षवर्धन : मैं अक्सर कहता हूं कि वर्तमान संक्रमण को बढ़ने से रोकने के लिए बेहद साधारण सावधानियां जादू का काम करती हैं। आपको घर से बाहर निकलते समय चेहरा ढकना है, जिसके लिए सामान आप आसानी से घर में ही तैयार कर सकते हैं। मास्क आप तक संक्रमण को पहुंचने से रोकने के लिए दीवार बनता है। घर से तभी बाहर निकलें जब बहुत जरूरी हो। विशेष रूप से बुजुर्गों और उन बुजुर्गों, जिनमें हृदय रोग, मधुमेह, गुर्दा और उच्च रक्तचाप की बीमारी भी हो, उनकी विशेष देखभाल करें और उन्हें बाहर नहीं जाने दें।

बच्चों और गर्भवती महिलाओं के बारे में भी ऐसा ही किया जाना चाहिए। बार-बार अच्छी तरह साबुन से हाथ धोएं और नाक, कान और मुंह को छुएं नहीं। भीड़-भाड़ वाले स्थानों पर नहीं जाएं और आपस में दो गज की दूरी रखें। यह मजबूरी नहीं बल्कि जरूरी है। पूर्णबंदी के समय में दो गज की दूरी शायद हम सबके लिए सबसे बड़ा सामाजिक उपचार है।

मृणाल वल्लरी : विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री कह रहे कि संक्रमण का सामुदायिक स्तर पर प्रसार हो रहा है। केंद्र सरकार का इस पर क्या रुख है?
डॉक्टर हर्षवर्धन : देश भर में यह धारणा है कि भारत में कोविड-19 का फैलाव अभी तीसरे चरण या यूं कहिए कि सामुदायिक संक्रमण की स्थिति में नहीं पहुंचा। यहां अधिकांश मामले ऐसे हैं जो विदेशों से आए यात्रियों के साथ संपर्क में आने के कारण हुए। कुछ विदेशी यात्रियों ने एकांतवास से बचने के लिए अपनी सूचानाओं को छिपाया और तब तक लोगों से मिलते रहे जब तक उनमें संक्रमण के लक्षण दिखाई नहीं दिए। इस दौरान कुछ इलाकों में संक्रमण के छिटपुट मामले सामने आए और इससे कोविड-19 के संक्रमण पर काबू पाने के प्रयासों को आघात पहुंचा।

ऐसे छिटपुट मामलों से यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि देश में सामुदायिक स्तर पर संक्रमण की शुरुआत हो गई है। वर्तमान में ऐसा कोई पुख्ता प्रमाण नहीं मिलता जिसके आधार पर हम यह कह सकें कि हम तीसरे चरण में प्रवेश कर चुके हैं। विश्व में सामुदायिक संक्रमण की कोई स्वीकार्य परिभाषा नहीं है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी अनेक बार इस बात की पुष्टि की है कि हम संक्रमण के दूसरे चरण में हैं। इसलिए यह प्रश्न उचित नहीं है कि भारत दूसरे चरण से तीसरे चरण में जा रहा है।

प्रस्तुति : मृणाल वल्लरी/सुशील राघव

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