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बारादरीः जनतंत्र में हिंसा की कोई जगह नहीं

भाजपा सांसद और दलित चिंतक उदित राज का कहना है कि सामाजिक न्याय लाने की दिशा में भारत का बौद्धिक वर्ग नाकाम रहा है।

बारादरी

भाजपा सांसद और दलित चिंतक उदित राज का कहना है कि सामाजिक न्याय लाने की दिशा में भारत का बौद्धिक वर्ग नाकाम रहा है। अनुसूचित जाति/ जनजाति अत्याचार निरोधक अधिनियम पर सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देश के बाद हुए भारत बंद को लेकर उन्होंने कहा कि यह आंदोलन राजनीतिक नेतृत्व के बिना स्वत: शुरू हुआ। भाजपा सांसद के मुताबिक, गृहयुद्ध जैसे हालात बनने के पहले हम मान लें कि कमजोर तबकों में आक्रोश है और इसका समाधान निकाला जाए। बारादरी का संचालन किया कार्यकारी संपादक मुकेश भारद्वाज ने।

मनोज मिश्र : सर्वोच्च न्यायालय ने अनुसूचित जाति/ जनजाति संबंधी कानून में जो बदलाव किया, क्या वह ऐसा है कि उसके लिए इतना बड़ा अंदोलन खड़ा हो गया?
उदित राज : सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा बदलाव किया है। अब तब तक गिरफ्तारी नहीं हो सकती, जब तक कि आरोपी के बारे में उसका नियोक्ता या ऊपर का अधिकारी लिख कर नहीं दे देता। इसके लिए उसे कारण भी बताना होगा कि उसे क्यों गिरफ्तार किया जाना चाहिए। सामान्य लोगों के मामले में एसएसपी को लिख कर देना पड़ेगा। दोनों स्थितियों में पक्षपात और पूर्वग्रहग्रस्त होने या रिश्वत लेकर मामले को बदल देने की आशंका बनी रहेगी। इसके अलावा राजनीतिक दबाव में भी पक्षपात किया जा सकता है। माना कि इस कानून का कुछ दुरुपयोग हुआ है, पर इसे इतना डाइल्यूट करने की जरूरत नहीं थी। इसे लेकर नाराजगी इसलिए भी है कि इसी नजरिए से दूसरे कानूनों को क्यों नहीं देखा। आज स्थिति यह है कि चाहे कोई बड़ा अधिकारी हो या मंत्री हो, वह किसी महिला से अकेले में नहीं मिलना चाहता। किसी महिला को कमरे में बिठा देता है। इस तरह नुकसान महिलाओं का ज्यादा हुआ है। महिलाओं की नियुक्तियां कम हो गई हैं। इसी तरह दहेज निरोधक कानून का भी खूब दुरुपयोग होता था। इस कदर कि कनाडा में बैठे व्यक्ति को भी गिरफ्तार कर लिया जाता था। अब जाकर उस कानून में कुछ बदलाव किया गया है। इस तरह समाज में कई तरह की विकृतियां आई हैं। इन स्थितियों को भी दुरुस्त करने की जरूरत है।

मृणाल वल्लरी : महिलाओं पर अत्याचार खूब बढ़े और दुरुपयोग के चुनिंदा मामले। और, आप महिलाओं के लिए बने कानूनों के दुरुपयोग का हवाला दे रहे हैं कि इस वजह से उन्हें नौकरी नहीं मिल रही?
’नहीं, मैं हर तरह के कानून के दुरुपयोग के खिलाफ हूं। कई ऐसे कानून हैं, जिनका दुरुपयोग होता है। महिलाओं से जुड़े कानूनों में पुलिस चाहते हुए भी उनके दुरुपयोग को रोक नहीं सकती। वह जानता है कि गलत है, पर उसकी बाध्यता है कि उसे एफआइआर लिखनी पड़ेगी।

अजय पांडेय : सर्वोच्च न्यायालय का फैसला तो अब आया है, पर इसके पहले कई ऐसी घटनाएं हुर्इं, जिससे दलित समुदाय के बीच आक्रोश था। क्या आपको नहीं लगता कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला तात्कालिक कारण बना उस सारे आक्रोश के फूटने का?
’सही बात है। इसके पीछे कई कारण हैं। एक कमजोर वर्ग से ऐसी उम्मीद नहीं थी कि भारत बंद कर देगा। सशक्त जातियां जैसे जाट, गुर्जर, पटेल तो बंद कर देते थे, पर दलित इस तरह एकजुट होंगे, किसी को अंदाजा नहीं था। इसमें राजनीतिक लोगों का बिल्कुल योगदान नहीं रहा। उस दिन जरूर कुछ लोगों ने भुनाने का प्रयास किया। यह आक्रोश बेरोजगार युवाओं का था। पिछले कुछ सालों से देखा जा रहा है कि रोजगार के नए अवसर नहीं उपलब्ध हो पा रहे हैं। ठेका पद्धति लागू हो गई है। इसे लेकर लंबे समय से युवाओं में आक्रोश जमा था। यह एक दिन में नहीं हुआ। वह भी इस आंदोलन में फूटा।

पारुल शर्मा : इस तरह के विरोध से बचने का उपाय क्या है?
’इसमें विरोध कई तरह का है। मिलाजुला। सुप्रीम कोर्ट की वजह से तो है ही। इसमें सिर्फ सुप्रीम कोर्ट नहीं, बल्कि पूरी न्यायपालिका को लेकर विरोध भरा हुआ है। एक उदाहरण से इसे समझें- अगर कोई न्यायाधीश महोदय किसी वकील का नाम जज के लिए प्रस्तावित करते हैं, तो उस वकील की परीक्षा नहीं होती। उसका इंटरव्यू नहीं होता। उनके द्वारा लड़े गए मुकदमों का विश्लेषण भी नहीं होता। मुख्य न्यायाधीश किसी को भी न्यायाधीश बना देते हैं। आप देखें कि बीस घरानों के इर्द-गिर्द सारे जजों की नियुक्ति सिमटी हुई है। जहां कोई मेरिट नहीं, वे देश का मेरिट तय कर रहे हैं! उसमें अनुसूचित जाति/ जनजाति/ अन्य पिछड़ा वर्ग को कभी चुना ही नहीं। तो, इस तरह बहुत दिनों से चला आ रहा था कि न्यायपालिका हमारी दुश्मन है। इसी तरह पदोन्नति के मामले में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को लेकर भी आक्रोश था। फिर हजारों सालों से जातीय भेदभाव के कारण दलितों को जो अपमान सहना करना पड़ रहा है, उसका दंश तो है ही। यह सब मिल कर फूटा। यह एक तरह से आंतरिक संघर्ष ही है। और यह सब एकदम से नहीं बदलेगा। जब तक इन वर्गों की भागीदारी नहीं बढ़ेगी, तब तक सिर्फ नारों या अखबारों में लेख लिख देने से नहीं बदलाव होगा।

सूर्यनाथ सिंह : यह आंदोलन बिना किसी राजनीतिक नेतृत्व के, स्वत: शुरू हुआ था। क्या यह इस बात का संकेत है कि इन वर्गों के लोगों का राजनीतिक नेतृत्व पर भरोसा कमजोर हुआ है?
’यह आंदोलन राजनीतिक नेतृत्व के बिना हुआ। इसे राजनीतिकों से मोहभंग भी कह सकते हैं। दरअसल, अंदर-अंदर यह बात लंबे समय से सुलग रही थी और उबर आई। इसमें किसी राजनीतिक दल का योगदान नहीं है। बेहतर है कि हम सच्चाई को स्वीकार करें। हम मान लें कि लोगों में आक्रोश है और इसका समाधान निकाला जाए। वही देश के हित में है।

अनुराग अन्वेषी : इस बार का आंदोलन जिस तरह हिंसक हुआ, उसे किस रूप में देखते हैं?
’दलित वर्ग का सत्ता से बहुत लेना-देना है नहीं। इसकी जड़ समाज में है। सरकार चाहे जिस पार्टी की आए, वह दबाने का काम करेगी। हां, थोड़ा-बहुत फर्क पड़ सकता है। यह जो आंकड़े गिनाए जाते हैं कि अमुक सरकार में इतने दलित प्रतिनिधि हैं, अमुक में इतने थे, वह सब फिजूल है। जब तक समाज के भीतर बदलाव नहीं होता, तब तक ये चीजें समाप्त नहीं होंगी। हमारे देश में अब तक सामाजिक बदलाव हुआ नहीं। इसमें दो बड़े मुद्दे मैं मानता हूं। एक, जाति का प्रश्न और दूसरा महिला का। इन दोनों वर्गों को संबोधित किया ही नहीं गया। सरकारी पद देकर महिलाओं का उत्थान नहीं किया जा सकता, जब तक कि उन्हें आजादी न दी जाए। इसी तरह जब तक सामाजिक बदलाव का प्रयास नहीं होगा, तब तक दलित वर्गों का उत्थान नहीं हो सकता। इसमें बौद्धिक वर्ग की भूमिका भी सवालों के घेरे में है।

आर्येंद्र उपाध्याय : सुप्रीम कोर्ट में बालाकृष्णन भी जज हुए, फिर यह कैसे कहा जा सकता है कि इस वर्ग के लोगों को वहां जगह नहीं मिल पाती!
’सत्तर सालों में इक्का-दुक्का उदाहरणों से बात नहीं बनती। केआर नारायणन साहब न होते, तो शायद बालाकृष्णन भी वहां नहीं पहुंच पाए होते। राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति अधिनियम में बदलाव का प्रस्ताव लाया गया था, मगर न्यायपालिका ने उसमें अडंÞगा लगा दिया। अगर वह बदलाव होता तो कुछ बेहतरी आ सकती थी। दुनिया में कहीं ऐसी न्यायपालिका नहीं है, जहां जज की नियुक्ति जज करता है। इंग्लैंड में जूडिशियल कमीशन है, अमेरिका में सीनेट नियुक्त करती है और रूस में आधे जज निर्वाचित होकर आते हैं, आधे वहां का राष्ट्रपति चुनता है। मगर यहां पर तो जरा-सी बात होती है तो उसे हस्तक्षेप मान लिया जाता है। वे खुद कहने लगते हैं कि यह न्यायपालिका के कामकाज में हस्तक्षेप है। संविधान में न्यायपालिका को इतना ही अधिकार दिया गया है कि वह विधायिका के बनाए कानूनों की व्याख्या करेगी, उसका पालन करेगी, कानून बनाने का काम नहीं करेगी। मगर आज संसद से ज्यादा सुप्रीम कोर्ट कानून बना रहा है। यहां पर मान लिया गया है कि जज भगवान हैं, वे गलती नहीं कर सकते। क्यों आज इतने मुकदमे लटके पड़े हैं। क्यों आज मध्यवर्ग का आदमी सुप्रीम कोर्ट में जा नहीं सकता। वकील की फीस दस लाख, ग्यारह लाख रुपए है। गरीब आदमी वहां तक जाने की सोच भी नहीं सकता। वकीलों की फेस वैल्यू के हिसाब से फीस बढ़ती रहती है। यह फेस वैल्यू किसने बनाना शुरू किया? जजों ने। 1993 के बाद से जब कालिजियम प्रणाली से जजों की नियुक्तियां होने लगीं, तो इसकी सारी जिम्मेदारी जजों पर जाती है। खबरों की सुर्खियों में आने में उनकी दिलचस्पी अधिक है, मुकदमे निपटाने में कम है।

मुकेश भारद्वाज : क्या अपको लगता है कि वकीलों की फीस निर्धारण की दिशा में सरकार को काम करना चाहिए, ताकि उन तक आम आदमी की पहुंच संभव हो सके?
’सरकार नहीं, जज खुद यह काम कर सकते हैं। जजों का व्यवहार बदलना पड़ेगा। चाहे वह जूनियर वकील हो या सीनियर, उसकी बहसों को उसे बराबरी की नजर से तवज्जो देना चाहिए। एक सीनियर वकील तो जज को भी डांट लेता है, पर एक जूनियर वकील भले बहुत काबिल हो, पर उसकी बात ठीक से सुनी तक नहीं जाती। जब तक जज फेस वैल्यू का ध्यान रखेंगे, तब तक उनकी फीस बढ़ती रहेगी। जज हमारे यहां पक्षपाती हैं। जिस दिन जज चेहरे के बजाय मेरिट पर बहसों को सुनने लगेंगे, उस दिन वकीलों की फीस अपने आप नीचे आ जाएगी। फिर इसमें बदलाव होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग को न बनने देकर गलत किया। वह बनता तो भी इस स्थिति में कुछ बदलाव आ सकता था। संविधान की धारा 312 में न्यायिक नियुक्तियों का प्रावधान है, जैसे आएएस, आइपीएस की नियुक्तियां होती हैं। उसे ये जज लागू नहीं होने दे रहे हैं।

अजय पांडेय : क्या वजह है कि दिल्ली में आपकी पार्टी को दलितों का वोट बहुत कम मिलता है?
’जो लोग कहते हैं कि जिस पार्टी में दलित प्रतिनिधियों की संख्या अधिक होती है, वह दलितों के करीब होती है, वह बिल्कुल गलत बात है। दलित निर्णायक मतदाता नहीं होता। वह तो दस-पंद्रह फीसद होगा। वह जीतता है दूसरी जातियों के सहयोग से। इसलिए जिस दल के साथ दलित अधिक होंगे उसके सांसद-विधायक कम आएंगे। वहां चूंकि सवर्ण का वोट जाता है, ओबीसी का वोट जाता है, इसलिए दलित प्रतिनिधि जीत जाते हैं। क्योंकि अस्सी-नब्बे फीसद दूसरी जाति के लोग हैं, इसलिए जो दलितों के जनाधार वाली पार्टी होगी, वे उसे वोट ही नहीं देंगे। जहां दलित होंगे, वहां दूसरे नहीं होंगे।

पारुल शर्मा : जब कोई व्यक्ति किसी खास समुदाय के हितों को ध्यान में रख कर कोई आंदोलन करता है तो उसे उस समुदाय का समर्थन मिलता है, पर जब वही व्यक्ति सरकार के साथ हाथ मिला लेता है तो क्या उससे उस समुदाय का मोहभंग नहीं होता?
’राजनीति में समझौते करने पड़ते हैं। राजनीति स्वार्थ की होती है, मैं इस बात को स्वीकार करता हूं। और मैं वहां गया हूं तो इसलिए कि हाशिए के समाज की समस्याओं को उठा सकूं। फिर मैं यह भी कहता हूं कि मैं किसी से बंधा नहीं हूं। अगर दलितों और महिलाओं का अधिकार छीना जाता है, तो मेरे लिए पार्टी बड़ी नहीं है। उस समुदाय के लोगों का अधिकार बड़ा है। दूसरी बात कि हर सांसद और विधायक एक तरह से नौकरी करता है। इसके अलावा जब कोई व्यक्ति आंदोलन शुरू करता है, अधिकारों की लड़ाई शुरू करता है तो वह लड़ते-लड़ते थक जाता है। समाज भी उसका साथ नहीं देता। समाज भी सत्ता के साथ जाता है।

अरविंद शेष : आपकी पहचान दलित आंदोलन से बनी है, पर अब आपको संघ की विचारधारा के साथ काम करना पड़ रहा है। कैसे तालमेल बिठा पाते हैं?
’देखिए, सामाजिक और धार्मिक विचारधारा का राजनीतिक विचारधारा से साम्य होना जरूरी नहीं है। राजनीति में राजनीतिक कार्यक्रमों से तालमेल बिठाना होता है। भाजपा में ईसाई भी हैं, मुसलमान भी हैं, दलित भी हैं। पर जरूरी नहीं कि वे भाजपा के धार्मिक दर्शन से सहमत हों। हम राजनीतिक कार्यक्रम से जुड़े हुए हैं। हर पार्टी का राजनीतिक कार्यक्रम होता है। मैं उनकी सामाजिक विचारधारा से नहीं जुड़ा हूं। इसलिए तालमेल बिठाने की समस्या है ही नहीं।

राजेंद्र राजन : मगर आप जिस सामाजिक बदलाव की बात कर रहे हैं, वह कैसे संभव होगा, जब आप जैसे लोग खुद इस तरह राजनीतिक समझौता करेंगे?
’देखिए, हम संसद में इसलिए गए हैं कि अपने वर्ग के लोगों की समस्याओं के बारे में आवाज उठा सकें। चाहे वह पार्टी कोई भी हो, हम उससे जुड़ कर अपना काम कर रहे हैं। यह अलग बात है कि इसके लिए कुछ समझौता भी करना पड़ता है। सबको समझौता करना पड़ता है। हमने बारह सालों तक संघर्ष किया, पर जहां तक पहुंचना चाहिए था, वहां तक नहीं पहुंच पाए, क्योंकि न हम उतना पैसा इकट्ठा कर सकते थे और न मैंने कभी जाति का इस्तेमाल किया। इसलिए इस तरह संसद में पहुंच कर अपनी बात कह रहे हैं।

मुकेश भारद्वाज : दलित आंदोलन के दौरान हुई हिंसा को आप कितना उचित मानते हैं?
’किसी भी तरह की हिंसा को मैं उचित नहीं मानता। जनतंत्र में किसी के लिए भी हिंसा का स्थान नहीं है। इसमें हुई हिंसा के लिए केवल दलित जिम्मेदार नहीं हैं। उससे जुड़े तथ्य अब सामने आ चुके हैं। दूसरे लोगों ने बदनाम करने के लिए भी किया। इसलिए सारे मामले की जांच होनी चाहिए।

उदित राज – उत्तर प्रदेश के रामनगर में जन्मे उदित राज दलित आंदोलन का मजबूत चेहरा हैं। इंडियन जस्टिस पार्टी के संस्थापक राज ने फरवरी 2014 में भारतीय जनता पार्टी में अपनी पार्टी का विलय कर लिया था। वर्तमान में उत्तर पश्चिमी दिल्ली से भाजपा के सांसद उदित राज दलित आंदोलनों से लेकर उच्च शिक्षा के निजीकरण के खिलाफ चल रहे अभियानों में भी मुखर आवाज रहे हैं। हाल ही में विश्वविद्यालयों में रोस्टर में बदलाव कर कॉलेजों के बजाय विभाग को इकाई मान कर नियुक्तियां करने के खिलाफ इन्होंने आवाज उठाई। वे मानते हैं कि भाजपा में दलित भागीदारी संभव है। इनका मानना है कि आंबेडकर को किसी दल या जाति विशेष से जोड़ने पर दलित चेतना का विकास अवरुद्ध होगा। राजनीतिक समझौतों के सवाल पर असहज हुए बिना बेहिचक कहते हैं कि राजनीति में समझौता करना पड़ता है। हम संसद में इसलिए गए हैं कि अपने वर्ग के लोगों की समस्याओं के बारे में आवाज उठा सकें। चाहे वह पार्टी कोई भी हो, हम उससे जुड़ कर अपना काम कर रहे हैं। यह अलग बात है कि इसके लिए कुछ समझौते भी करने पड़ते हैं। सबको समझौता करना पड़ता है। हमने बारह सालों तक संघर्ष किया, पर जहां पहुंचना चाहिए था, वहां तक नहीं पहुंच पाए, क्योंकि न हम उतना पैसा इकट्ठा कर सकते थे और न मैंने कभी जाति का इस्तेमाल किया। इसलिए इस तरह संसद में पहुंच कर अपनी बात कह रहे हैं।

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