ताज़ा खबर
 

बारादरी: सीलिंग का व्यावहारिक हल निकालना जरूरी

आम आदमी पार्टी के बीस विधायकों के अयोग्य करार दिए जाने का मामला हो या सीलिंग का, देश की राजधानी से जुड़े इन मुद्दों पर देश की नजर है। भाजपा के दिल्ली प्रभारी श्याम जाजू का दावा है कि राजधानी के लोग जिस तरह से कांग्रेस और आम आदमी पार्टी से हताश हैं, उसके बाद अगला चुनाव हम ही जीतेंगे। उन्होंने कहा कि सीलिंग का मुद्दा सुप्रीम कोर्ट की निगरानी समिति के पास है और उसमें केंद्र सरकार और एमसीडी की कोई भूमिका नहीं है। इस पर शांति से विचार कर इसके समाधान का व्यावहारिक रास्ता निकालना चाहिए। उन्होंने 2019 के बाबत कहा कि भाजपा की राह में रोड़ा अटकाने के लिए कोई गठबंधन बन भी जाए तो उसका कोई भविष्य नहीं है। कार्यक्रम का संचालन किया कार्यकारी संपादक मुकेश भारद्वाज ने।

बारादरी की बैठक में श्याम जाजू (फोटो: आरुष चोपड़ा)

मनोज मिश्र : दिल्ली नगर निगम का चुनाव तो आपने जीत लिया, पर विधानसभा के मामले में कैसे कमजोर साबित हुए?

श्याम जाजू : दिल्ली में भारतीय जनता पार्टी की जड़ें बहुत पुरानी हैं। देश में जब हम कहीं नहीं थे, तब भी दिल्ली में थे। गढ़ माना जाता है दिल्ली को भाजपा का। एमसीडी लगातार कई बार से हमारे पास रहा है। सातों सांसद हमारे हैं। छोटे-मोटे सब चुनाव हम जीते हैं। विधानसभा में इस बार का चुनाव अपवाद था। नहीं तो तीस के नीचे हम कभी आए नहीं। तो, एक बराबरी का स्थान रहा है। किन्हीं वजहों से पंद्रह सालों से कांग्रेस को बहुमत मिलता रहा है। और, इस बार आम आदमी पार्टी को। पर अगला चुनाव हम निश्चित रूप से जीतेंगे। दरअसल, जिस उम्मीद से लोगों ने आम आदमी पार्टी को जिताया था, वह पूरी नहीं हो पाई। आज लोग बहुत हताश, निराश हैं।

अनिल बंसल : बीस विधायकों के अयोग्य करार दिए जाने के बाद आम आदमी पार्टी में काफी टूट-फूट की संभावना बताई जा रही है। क्या आप इसका फायदा उठाएंगे?
’हमें ऐसा करने की जरूरत नहीं है। नहीं तो, यह स्थिति पहले भी आई थी। आम आदमी पार्टी की जिस तरह की आंतरिक कार्यशैली है, इससे उनके लोग खुश नहीं हैं। वे मौके की तलाश में थे। उनमें से कुछ लोगों ने बीच में हमसे संपर्क भी किया था, पर उस पर हमने भरोसा नहीं किया। वैसा करना ठीक नहीं समझा। इसलिए अब लोगों को भी यह यकीन हो गया है कि जिन उम्मीदों के साथ उन्हें सत्ता दी थी, उस पर ये खरे नहीं उतर पाए। उनके चौदह और लोगों पर मुकदमे हैं। उन पर भी जल्दी फैसला आने वाला है।

अजय पांडेय : क्या आपको लगता है कि अरविंद केजरीवाल के सामने मनोज तिवारी एक बेहतर चेहरा साबित होंगे?
’आज केजरीवाल का वह चेहरा नहीं बचा है, जो चार साल पहले था। अभी सूरत में जीएसटी को लेकर उनकी इतनी बड़ी सभा हुई, पर आम आदमी पार्टी को वहां एक सौ इकहत्तर वोट मिले। ये देश में जहां जाएंगे, उन्हें सुनने के लिए भीड़ तो इकट्ठा हो जाएगी, पर वोट नहीं मिलेगा। जहां तक भाजपा की बात है, उसके सांगठनिक अगुआ स्वाभाविक रूप से मनोज तिवारी हैं। उनके नेतृत्व में ही हमने एमसीडी का चुनाव जीता है। पर आगे क्या होगा, कहना ठीक नहीं। जरूरी नहीं कि पार्टी नेता पहले घोषित ही करे। हर राज्य के हिसाब से पार्टी की रणनीति तय होती है।

अनिल बंसल : यानी अभी तय नहीं है कि मनोज तिवारी ही चेहरा होंगे?
’पार्टी आखिरी समय में इसका फैसला करती है। कोई भी पार्टी इतना पहले से अपना चेहरा घोषित नहीं करती।

मुकेश भारद्वाज : आपने कहा कि दिल्ली में आम आदमी पार्टी के असंतुष्टों को लेकर सरकार नहीं बनाना चाहते। मगर बाकी कई राज्यों में ऐसा करने से आपको कोई गुरेज क्यों नहीं रहा?
’दूसरी पार्टियों से टूट कर आए लोगों को जगह देना बुरी बात नहीं है। आखिर ऐसे लोगों को कोई न कोई विकल्प तो चाहिए होता है। यहां भाजपा छोड़ कर उनके सामने दूसरा कोई विकल्प था नहीं। दिल्ली में जो हुआ, उसमें हमने आग में घी डाल कर भड़काना उचित नहीं समझा। हमने सोचा कि लोगों को इस बात का अहसास होने दो, उचित समय पर लोगों के सामने भी आ जाएगा और हमारा परफार्मेंस भी दिखेगा।

मृणाल वल्लरी : पर उत्तराखंड में तो आधी से ज्यादा सरकार आपने कांग्रेस के लोगों को लेकर बनाई है?
’वहां कांग्रेस से टूट कर लोग आ गए, तो उन्हें लेने में क्या हर्ज था। वे सभी सम्मानित लोग हैं। भाजपा लोकतांत्रिक पार्टी है, कोई परिवार की पार्टी तो है नहीं। वे सभी चुनाव से पहले आए थे, चुनाव के बाद थोड़े आए! तो, आने वाले सभी लोगों को अपने साथ लेकर उन्हें लोकतांत्रिक ढंग से अपनी पार्टी के मुताबिक ढालना कोई बुरी बात नहीं है। यह तो हर पार्टी करती है। जहां भी लोगों को अपनी पार्टी छोड़ कर दूसरी पार्टी में जाना होगा, लोग उसी पार्टी में जाना चाहेंगे, जिसका भविष्य बेहतर होगा।

पारुल शर्मा : अभी शरद यादव ने फिर से विपक्षी दलों को एकजुट करने और फिर से महागठबंधन बनाने की पहल की है। 2019 में इसका क्या असर पड़ेगा?
’कहीं का पत्थर कहीं का रोड़ा, भानुमती ने कुनबा जोड़ा! यह देश कभी पसंद नहीं करता। खाली नकारात्मकता के चलते लोग इकट्ठा हो जाएं, जिनमें नेतृत्व की कोई क्षमता नहीं है, कार्यपद्धति समान नहीं है, केवल भाजपा की राह में रोड़ा अटकाने के लिए कोई गठबंधन बन भी जाए, तो उसका कोई भविष्य नहीं है। नकारात्मकता पर लोग कभी भरोसा नहीं करते। मुझे नहीं लगता कि गठबंधन ज्यादा टिकेगा, ज्यादा चलेगा।

श्याम जाजू

सूर्यनाथ सिंह : भाजपा की चुनावी जीत को किस तरह से देखते हैं।
’आज देश में भाजपा के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं दिख रहा। मोदी जी के प्रधानमंत्री बनने के बाद जिन-जिन राज्यों में चुनाव हुए हैं, पंजाब, बिहार और दिल्ली को छोड़ कर सब जगह भाजपा की सरकारें बनी हैं। महाराष्ट्र में हमने कभी सोचा भी नहीं था कि वहां अकेले चुनाव जीत पाएंगे, पर शिवसेना से गठबंधन तोड़ने के बावजूद नंबर एक पर आए। पंजाब में भी चार से चालीस तक पहुंचे। झारखंड में आज तक पूरे बहुमत से सत्ता किसी की नहीं आई, किसी न किसी से गठबंधन करके ही वहां सरकार बनी, पर हमने सरकार बनाई। जम्मू-कश्मीर जैसे मुसलिम बहुल राज्य में हम सत्ता में भागीदारी कर रहे हैं। हिमाचल में हमने प्रचंड बहुमत हासिल किया है। उत्तर प्रदेश में अप्रत्याशित जीत हासिल हुई है। असम में तीन चौथाई बहुमत है। इस तरह के नतीजे जनता का सर्टिफिकेट ही है- मोदीजी के नेतृत्व के प्रति उनका रुझान ही है।

मुकेश भारद्वाज : दिल्ली में सीलिंग एक बड़ी समस्या है। लोग कह रहे हैं कि इसके लिए केंद्र और एमसीडी जिम्मेदार हैं। तो, पार्टी ऐसा कोई कदम क्यों नहीं उठाती, जिससे इस समस्या से पार पाया जा सके?
’धारणा ऐसी बना दी गई है कि केंद्र सरकार इसके लिए जिम्मेदार है। आम आदमी पार्टी के विधायक भी तख्ती लिए आ गए- भाजपा आई सीलिंग लाई! जबकि सब जानते हैं कि सीलिंग सुप्रीम कोर्ट की निगरानी समिति की देखरेख में हो रही है। उसमें केंद्र सरकार की कोई भूमिका नहीं है, एमसीडी की कोई भूमिका नहीं है। जहां तक दिल्ली सरकार की बात है, उसने तीन सौ एक सड़कों को अधिकृत करने के प्रस्ताव पर अमल नहीं किया। इसलिए वहां पर सीलिंग हो रही है। चूंकि आदेश के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी एमसीडी की है, इसलिए उसे वहां खड़ा होना पड़ता है। इसलिए दिखते वही लोग हैं। और, चूंकि केजरीवाल साहब को झूठ बोलने की आदत है, वे बार-बार कह रहे हैं कि इसमें केंद्र सरकार का हाथ है। जबकि हकीकत यह है कि इसमें केंद्र सरकार का कोई हाथ नहीं है।

मनोज मिश्र : मगर सीलिंग का समाधान क्या है?
’समय के मुताबिक उस कानून में परिवर्तन की आवश्यकता है। हर समय डंडा चले और लोग भागें, बेवजह अफरातफरी का माहौल बने, इससे समाधान नहीं निकलने वाला। आज मुझे लगता है कि शांति से इस विषय में विचार हो और इसके समाधान का कोई व्यावहारिक रास्ता निकाला जाए। 2002 में समिति बनी थी, उसे आज की स्थितियों को ध्यान में रखते हुए बदलाव का कदम उठाना चाहिए।

निर्भय कुमार पांडेय : दिल्ली में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर कोई व्यावहारिक कदम क्यों नहीं उठाया जा पाता?
’अभी पुलिस ने एक अच्छा काम यह किया है कि उन्हें आत्मसुरक्षा के लिए प्रशिक्षित करना शुरू किया है। इस दिशा में अगर कोई एनजीओ आगे आता है तो पुलिस उसे सारी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराती है। कॉलेजों में एनएसएस, एनसीसी आदि के माध्यम से प्रशिक्षण दिला रही है। पुलिस सतर्क हुई है। उसे सख्त हिदायत है कि एक भी आदमी की शिकायत वापस नहीं होनी चाहिए। दिल्ली सरकार को सीसीटीवी कैमरे लगाने थे, उसे ऐसी पुख्ता निगरानी के इंतजाम करने चाहिए।

पारुल शर्मा : संसद और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने का प्रस्ताव कहां तक विवेकपूर्ण है?
’पहले दोनों चुनाव साथ ही होते थे। मगर अब वैसा न होने से हालत यह हो गई है कि हम जैसे कार्यकर्ताओं को हर समय चुनावों में ही भागदौड़ करती रहनी पड़ती है। चुनाव की प्रक्रिया साल भर चलती रहती है। इसके अलावा सरकारों पर भी दबाव होता है। सरकार को कोई विकास करना है, कोई नीति बनानी है, तो वह भी वह ठीक से नहीं कर पाती। संयोग से भाजपा की अगुआई वाली सरकार इसका अपवाद है।

मृणाल वल्लरी : अभी करणी सेना के आगे तमाम सरकारें जिस तरह झुकी नजर आर्इं, उसे क्या आप वोट बैंक की राजनीति नहीं कहेंगे?
’जनतंत्र में सभी को अपनी बात कहने का मौलिक अधिकार है। पर अपनी बात कहने का ऐसा तरीका नहीं होना चाहिए, जिससे कानून-व्यवस्था बिगड़े। इसलिए अगर किसी सरकार ने अशांति रोकने के लिए एहतियाती कदम उठाए, तो मेरे खयाल से वह उनका राजनीतिक विवेक था। कानून-व्यवस्था ठीक रखते हुए प्रदेश चलाना उनका काम है।

अरविंद शेष : हर जगह उन्माद का सहारा क्यों लिया जा रहा है? कासगंज के संदर्भ में इस पर क्या कहेंगे?
’कासगंज जैसी घटना का समर्थन कोई नहीं कर सकता। मगर पिछले चार सालों को देखिए, ऐसी घटना कहीं और हुई नहीं है। प्रधानमंत्री ने सख्त लहजे में कहा है कि ऐसी घटनाओं के मामले में झुकना नहीं है। तुष्टीकरण नहीं करना है किसी का, सबको न्याय दिलाना है।

राजेंद्र राजन : अभी तक स्वामीनाथन समिति की सिफारिशें लागू क्यों नहीं हो पार्इं?
’हमारी सरकार आने के बाद महंगाई कम हुई है, विदेशी निवेश बढ़ा है, अर्थव्यवस्था मजबूत हुई है, विदेशों में देश की साख बढ़ी है, इन सबके साथ-साथ कृषि क्षेत्र पर ध्यान दिया गया है। आज सोलह हजार गांवों तक बिजली पहुंचा दी गई है। दो हजार और गांव इस साल में पूरे हो जाएंगे। जब तक ऐसी बुनियादी सुविधाएं गांवों में नहीं देंगे, तब तक सुधार नहीं होगा। वैसे ही किसानी के बारे में मिट्टी की जांच जैसी योजनाएं नए सिरे से इस सरकार ने लागू की हैं। उसके लिए अलग से बजट का प्रावधान है। किसानों को कृषि विकास केंद्र से जोड़ा जा रहा है। पर हम इतने भर से संतुष्ट नहीं हैं। बाकी क्षेत्रों की तुलना में कृषि क्षेत्र में विकास नहीं हुआ है। उसमें काम करने की जरूरत है, पर सत्तर साल की बीमारी एक दिन में ठीक नहीं होगी।

मनोज मिश्र : दिल्ली नगर निगम का चुनाव तो आपने जीत लिया, पर विधानसभा के मामले में कैसे कमजोर साबित हुए?
श्याम जाजू : दिल्ली में भारतीय जनता पार्टी की जड़ें बहुत पुरानी हैं। देश में जब हम कहीं नहीं थे, तब भी दिल्ली में थे। गढ़ माना जाता है दिल्ली को भाजपा का। एमसीडी लगातार कई बार से हमारे पास रहा है। सातों सांसद हमारे हैं। छोटे-मोटे सब चुनाव हम जीते हैं। विधानसभा में इस बार का चुनाव अपवाद था। नहीं तो तीस के नीचे हम कभी आए नहीं। तो, एक बराबरी का स्थान रहा है। किन्हीं वजहों से पंद्रह सालों से कांग्रेस को बहुमत मिलता रहा है। और, इस बार आम आदमी पार्टी को। पर अगला चुनाव हम निश्चित रूप से जीतेंगे। दरअसल, जिस उम्मीद से लोगों ने आम आदमी पार्टी को जिताया था, वह पूरी नहीं हो पाई। आज लोग बहुत हताश, निराश हैं।

अनिल बंसल : बीस विधायकों के अयोग्य करार दिए जाने के बाद आम आदमी पार्टी में काफी टूट-फूट की संभावना बताई जा रही है। क्या आप इसका फायदा उठाएंगे?
’हमें ऐसा करने की जरूरत नहीं है। नहीं तो, यह स्थिति पहले भी आई थी। आम आदमी पार्टी की जिस तरह की आंतरिक कार्यशैली है, इससे उनके लोग खुश नहीं हैं। वे मौके की तलाश में थे। उनमें से कुछ लोगों ने बीच में हमसे संपर्क भी किया था, पर उस पर हमने भरोसा नहीं किया। वैसा करना ठीक नहीं समझा। इसलिए अब लोगों को भी यह यकीन हो गया है कि जिन उम्मीदों के साथ उन्हें सत्ता दी थी, उस पर ये खरे नहीं उतर पाए। उनके चौदह और लोगों पर मुकदमे हैं। उन पर भी जल्दी फैसला आने वाला है।

अजय पांडेय : क्या आपको लगता है कि अरविंद केजरीवाल के सामने मनोज तिवारी एक बेहतर चेहरा साबित होंगे?
’आज केजरीवाल का वह चेहरा नहीं बचा है, जो चार साल पहले था। अभी सूरत में जीएसटी को लेकर उनकी इतनी बड़ी सभा हुई, पर आम आदमी पार्टी को वहां एक सौ इकहत्तर वोट मिले। ये देश में जहां जाएंगे, उन्हें सुनने के लिए भीड़ तो इकट्ठा हो जाएगी, पर वोट नहीं मिलेगा। जहां तक भाजपा की बात है, उसके सांगठनिक अगुआ स्वाभाविक रूप से मनोज तिवारी हैं। उनके नेतृत्व में ही हमने एमसीडी का चुनाव जीता है। पर आगे क्या होगा, कहना ठीक नहीं। जरूरी नहीं कि पार्टी नेता पहले घोषित ही करे। हर राज्य के हिसाब से पार्टी की रणनीति तय होती है।

अनिल बंसल : यानी अभी तय नहीं है कि मनोज तिवारी ही चेहरा होंगे?
’पार्टी आखिरी समय में इसका फैसला करती है। कोई भी पार्टी इतना पहले से अपना चेहरा घोषित नहीं करती।

मुकेश भारद्वाज : आपने कहा कि दिल्ली में आम आदमी पार्टी के असंतुष्टों को लेकर सरकार नहीं बनाना चाहते। मगर बाकी कई राज्यों में ऐसा करने से आपको कोई गुरेज क्यों नहीं रहा?
’दूसरी पार्टियों से टूट कर आए लोगों को जगह देना बुरी बात नहीं है। आखिर ऐसे लोगों को कोई न कोई विकल्प तो चाहिए होता है। यहां भाजपा छोड़ कर उनके सामने दूसरा कोई विकल्प था नहीं। दिल्ली में जो हुआ, उसमें हमने आग में घी डाल कर भड़काना उचित नहीं समझा। हमने सोचा कि लोगों को इस बात का अहसास होने दो, उचित समय पर लोगों के सामने भी आ जाएगा और हमारा परफार्मेंस भी दिखेगा।

मृणाल वल्लरी : पर उत्तराखंड में तो आधी से ज्यादा सरकार आपने कांग्रेस के लोगों को लेकर बनाई है?
’वहां कांग्रेस से टूट कर लोग आ गए, तो उन्हें लेने में क्या हर्ज था। वे सभी सम्मानित लोग हैं। भाजपा लोकतांत्रिक पार्टी है, कोई परिवार की पार्टी तो है नहीं। वे सभी चुनाव से पहले आए थे, चुनाव के बाद थोड़े आए! तो, आने वाले सभी लोगों को अपने साथ लेकर उन्हें लोकतांत्रिक ढंग से अपनी पार्टी के मुताबिक ढालना कोई बुरी बात नहीं है। यह तो हर पार्टी करती है। जहां भी लोगों को अपनी पार्टी छोड़ कर दूसरी पार्टी में जाना होगा, लोग उसी पार्टी में जाना चाहेंगे, जिसका भविष्य बेहतर होगा।

पारुल शर्मा : अभी शरद यादव ने फिर से विपक्षी दलों को एकजुट करने और फिर से महागठबंधन बनाने की पहल की है। 2019 में इसका क्या असर पड़ेगा?
’कहीं का पत्थर कहीं का रोड़ा, भानुमती ने कुनबा जोड़ा! यह देश कभी पसंद नहीं करता। खाली नकारात्मकता के चलते लोग इकट्ठा हो जाएं, जिनमें नेतृत्व की कोई क्षमता नहीं है, कार्यपद्धति समान नहीं है, केवल भाजपा की राह में रोड़ा अटकाने के लिए कोई गठबंधन बन भी जाए, तो उसका कोई भविष्य नहीं है। नकारात्मकता पर लोग कभी भरोसा नहीं करते। मुझे नहीं लगता कि गठबंधन ज्यादा टिकेगा, ज्यादा चलेगा।

सूर्यनाथ सिंह : भाजपा की चुनावी जीत को किस तरह से देखते हैं।
’आज देश में भाजपा के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं दिख रहा। मोदी जी के प्रधानमंत्री बनने के बाद जिन-जिन राज्यों में चुनाव हुए हैं, पंजाब, बिहार और दिल्ली को छोड़ कर सब जगह भाजपा की सरकारें बनी हैं। महाराष्ट्र में हमने कभी सोचा भी नहीं था कि वहां अकेले चुनाव जीत पाएंगे, पर शिवसेना से गठबंधन तोड़ने के बावजूद नंबर एक पर आए। पंजाब में भी चार से चालीस तक पहुंचे। झारखंड में आज तक पूरे बहुमत से सत्ता किसी की नहीं आई, किसी न किसी से गठबंधन करके ही वहां सरकार बनी, पर हमने सरकार बनाई। जम्मू-कश्मीर जैसे मुसलिम बहुल राज्य में हम सत्ता में भागीदारी कर रहे हैं। हिमाचल में हमने प्रचंड बहुमत हासिल किया है। उत्तर प्रदेश में अप्रत्याशित जीत हासिल हुई है। असम में तीन चौथाई बहुमत है। इस तरह के नतीजे जनता का सर्टिफिकेट ही है- मोदीजी के नेतृत्व के प्रति उनका रुझान ही है।

मुकेश भारद्वाज : दिल्ली में सीलिंग एक बड़ी समस्या है। लोग कह रहे हैं कि इसके लिए केंद्र और एमसीडी जिम्मेदार हैं। तो, पार्टी ऐसा कोई कदम क्यों नहीं उठाती, जिससे इस समस्या से पार पाया जा सके?
’धारणा ऐसी बना दी गई है कि केंद्र सरकार इसके लिए जिम्मेदार है। आम आदमी पार्टी के विधायक भी तख्ती लिए आ गए- भाजपा आई सीलिंग लाई! जबकि सब जानते हैं कि सीलिंग सुप्रीम कोर्ट की निगरानी समिति की देखरेख में हो रही है। उसमें केंद्र सरकार की कोई भूमिका नहीं है, एमसीडी की कोई भूमिका नहीं है। जहां तक दिल्ली सरकार की बात है, उसने तीन सौ एक सड़कों को अधिकृत करने के प्रस्ताव पर अमल नहीं किया। इसलिए वहां पर सीलिंग हो रही है। चूंकि आदेश के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी एमसीडी की है, इसलिए उसे वहां खड़ा होना पड़ता है। इसलिए दिखते वही लोग हैं। और, चूंकि केजरीवाल साहब को झूठ बोलने की आदत है, वे बार-बार कह रहे हैं कि इसमें केंद्र सरकार का हाथ है। जबकि हकीकत यह है कि इसमें केंद्र सरकार का कोई हाथ नहीं है।

मनोज मिश्र : मगर सीलिंग का समाधान क्या है?
’समय के मुताबिक उस कानून में परिवर्तन की आवश्यकता है। हर समय डंडा चले और लोग भागें, बेवजह अफरातफरी का माहौल बने, इससे समाधान नहीं निकलने वाला। आज मुझे लगता है कि शांति से इस विषय में विचार हो और इसके समाधान का कोई व्यावहारिक रास्ता निकाला जाए। 2002 में समिति बनी थी, उसे आज की स्थितियों को ध्यान में रखते हुए बदलाव का कदम उठाना चाहिए।

निर्भय कुमार पांडेय : दिल्ली में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर कोई व्यावहारिक कदम क्यों नहीं उठाया जा पाता?
’अभी पुलिस ने एक अच्छा काम यह किया है कि उन्हें आत्मसुरक्षा के लिए प्रशिक्षित करना शुरू किया है। इस दिशा में अगर कोई एनजीओ आगे आता है तो पुलिस उसे सारी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराती है। कॉलेजों में एनएसएस, एनसीसी आदि के माध्यम से प्रशिक्षण दिला रही है। पुलिस सतर्क हुई है। उसे सख्त हिदायत है कि एक भी आदमी की शिकायत वापस नहीं होनी चाहिए। दिल्ली सरकार को सीसीटीवी कैमरे लगाने थे, उसे ऐसी पुख्ता निगरानी के इंतजाम करने चाहिए।

पारुल शर्मा : संसद और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने का प्रस्ताव कहां तक विवेकपूर्ण है?
’पहले दोनों चुनाव साथ ही होते थे। मगर अब वैसा न होने से हालत यह हो गई है कि हम जैसे कार्यकर्ताओं को हर समय चुनावों में ही भागदौड़ करती रहनी पड़ती है। चुनाव की प्रक्रिया साल भर चलती रहती है। इसके अलावा सरकारों पर भी दबाव होता है। सरकार को कोई विकास करना है, कोई नीति बनानी है, तो वह भी वह ठीक से नहीं कर पाती। संयोग से भाजपा की अगुआई वाली सरकार इसका अपवाद है।

मृणाल वल्लरी : अभी करणी सेना के आगे तमाम सरकारें जिस तरह झुकी नजर आर्इं, उसे क्या आप वोट बैंक की राजनीति नहीं कहेंगे?
’जनतंत्र में सभी को अपनी बात कहने का मौलिक अधिकार है। पर अपनी बात कहने का ऐसा तरीका नहीं होना चाहिए, जिससे कानून-व्यवस्था बिगड़े। इसलिए अगर किसी सरकार ने अशांति रोकने के लिए एहतियाती कदम उठाए, तो मेरे खयाल से वह उनका राजनीतिक विवेक था। कानून-व्यवस्था ठीक रखते हुए प्रदेश चलाना उनका काम है।

अरविंद शेष : हर जगह उन्माद का सहारा क्यों लिया जा रहा है? कासगंज के संदर्भ में इस पर क्या कहेंगे?
’कासगंज जैसी घटना का समर्थन कोई नहीं कर सकता। मगर पिछले चार सालों को देखिए, ऐसी घटना कहीं और हुई नहीं है। प्रधानमंत्री ने सख्त लहजे में कहा है कि ऐसी घटनाओं के मामले में झुकना नहीं है। तुष्टीकरण नहीं करना है किसी का, सबको न्याय दिलाना है।

राजेंद्र राजन : अभी तक स्वामीनाथन समिति की सिफारिशें लागू क्यों नहीं हो पार्इं?
’हमारी सरकार आने के बाद महंगाई कम हुई है, विदेशी निवेश बढ़ा है, अर्थव्यवस्था मजबूत हुई है, विदेशों में देश की साख बढ़ी है, इन सबके साथ-साथ कृषि क्षेत्र पर ध्यान दिया गया है। आज सोलह हजार गांवों तक बिजली पहुंचा दी गई है। दो हजार और गांव इस साल में पूरे हो जाएंगे। जब तक ऐसी बुनियादी सुविधाएं गांवों में नहीं देंगे, तब तक सुधार नहीं होगा। वैसे ही किसानी के बारे में मिट्टी की जांच जैसी योजनाएं नए सिरे से इस सरकार ने लागू की हैं। उसके लिए अलग से बजट का प्रावधान है। किसानों को कृषि विकास केंद्र से जोड़ा जा रहा है। पर हम इतने भर से संतुष्ट नहीं हैं। बाकी क्षेत्रों की तुलना में कृषि क्षेत्र में विकास नहीं हुआ है। उसमें काम करने की जरूरत है, पर सत्तर साल की बीमारी एक दिन में ठीक नहीं होगी।

श्याम जाजू क्यों
लाभ के पद मामले में आम आदमी पार्टी के बीस विधायकों की हानि के बाद दिल्ली में चुनावों की बात शुरू हो गई है। सीलिंग के मुद्दे पर सत्ताधारी ‘आप’ के साथ विपक्षी कांग्रेस और भाजपा भी कठघरे में हैं। दिल्ली के निकाय संगठनों पर भाजपा का कब्जा है तो सीलिंग दस्ते के साथ उसी का नाम भी आता है और केंद्र सरकार पर भी सवाल उठते हैं। देश की राजधानी से जुड़े इन अहम मुद्दों पर बात करने के लिए भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष व पार्टी के दिल्ली प्रभारी श्याम जाजू से बेहतर चेहरा और कौन होता।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App