ताज़ा खबर
 

बारादरी: सिनेमा ने सिर्फ शहरों का बखान किया

फिल्म अभिनेता, प्रोड्यूसर, संस्कृतिकर्मी व भाजपा नेता राजा बुंदेला का मानना है कि भारतीय मुख्यधारा के सिनेमा ने सिर्फ शहरों का महिमामंडन किया है। गांवों व शहरों के सिनेमा और सिनेमाकर्मियों को जोड़ने के लिए वे फिल्म महोत्सवों का सहारा ले रहे हैं। शहर के बुद्धिजीवी और गांव का यथार्थ एक मंच पर खड़े होंगे तो दोनों जिंदा रहेंगे। उनका कहना है कि नेटफ्लिक्स बाजारू बुखार है जो यथार्थ से टकराकर बहुत जल्दी उतर जाएगा। बजरिए सिनेमा समाज और राजनीति में बदलाव पर हुई इस बातचीत का संचालन किया कार्यकारी संपादक मुकेश भारद्वाज ने।

Author December 16, 2018 3:43 AM
फिल्म अभिनेता, प्रोड्यूसर, संस्कृतिकर्मी व भाजपा नेता राजा बुंदेला।

मुकेश भारद्वाज : आप हर साल फिल्म समारोह आयोजित करते हैं। उसके पीछे मकसद क्या रहता है?
राजा बुंदेला : दरअसल हुआ क्या है कि जाने-अनजाने हमने शहरों को महिमामंडित कर दिया है। शहरों में ही मल्टीप्लेक्स आ गए, स्मार्ट सिटी बना रहे हैं। हम उस गांव-देहात को भूल गए। इसलिए मैं गांव-देहात की बात कर रहा हूं। मैंने अठारह-बीस साल बुंदेलखंड के लिए काम किया है। मैंने सिनेमा को बुंदेलखंड में स्थापित करने का प्रयास किया क्योंकि मुझे लगा कि लोगों को मानसिक रूप से बाध्य किया जा रहा है कि अपनी जगह को छोड़ें। जब आप सब कुछ एक शहर में मुहैया करा देंगे, तो आदमी फिर वहीं जाएगा। तो, बुंदेलखंड के सड़सठ फीसद पलायन ने मुझे डराया। जिनके पास कोई रोजगार नहीं है, उनका तो रोजगार की तलाश में पलायन ठीक है, पर जो युवा वहां रह कर काम कर सकते हैं, वे भी अब शहर की तरफ भाग रहे हैं। ऐसे में मेरे पास जो था, वह सिनेमा और थिएटर था। तो मैंने सोचा कि कोई ऐसा पर्यटन स्थल ढूंढ़ें, जिसे सिनेमा के साथ जोड़कर एक ऐसा उपक्रम करें, जिससे लोग जुड़ें। तो, हमने खजुराहो को चुना। वहां पहले साल तीन दिन का सिनेमा महोत्सव रखा। वहां कोई थिएटर नहीं है। इसलिए हमने फाइव स्टार होटल के हॉल में कार्यक्रम किया था। पर गरीब आदमी उसके अंदर नहीं घुसा। फिर हमने अगले साल टपरा टॉकीज बनाया। वह काफी लोकप्रिय हुआ। दूसरे साल हमने इसे पांच दिन का किया। अब इसे सात दिन का रखा है। इस बार हमने तीन अलग-अलग ग्रामीण इलाकों में तीन टपरा टॉकीज बनाए हैं। इस तरह हमने इस महोत्सव को विकेंद्रीकृत कर दिया। पहले सिर्फ खजुराहो तक सीमित हुआ करता था, अब हमने इसे अलग-अलग इलाकों में फैला दिया है। इन सात दिनों में दस थिएटरों में रोज तीन-तीन शो चलाएंगे। इसके पीछे मेरा मकसद था कि मैं सिनेमा को वापस ला रहा हूं। उसमें हम उस युवा की फिल्म भी चला रहे हैं, जो अपने मोबाइल पर बनाता है या किसी और माध्यम से बनाता है। इस तरह पूरे बुंदेलखंड के लोग वे फिल्में देखते हैं, चाहे वे तीन मिनट की हों, दस मिनट की हों। मकसद हमारा सिर्फ यह था कि सिनेमा के जरिए हम वहां लोगों को रोजगार उपलब्ध कराएं। पिछले साल हमने किसानों को केंद्र में रखकर पूरा महोत्सव चलाया। उनसे जुड़ी फिल्में चलार्इं। कोशिश यही है कि हम हर पहलू को छू लें। सिनेमा के माध्यम से लोगों में जागरूकता ला सकें।

सूर्यनाथ सिंह : अपने इस मकसद में कितना कामयाब हुए हैं।
’इसका काफी असर हुआ है। इसका अंदाजा इस तरह से लगा सकते हैं कि बुंदेलखंड में कई फिल्मों की शूटिंग हो रही है। सुई-धागा व स्त्री जैसी कई फिल्में हाल में आई हैं, जिनकी शूटिंग बुंदेलखंड में हुई है। हमने वहां पर सरकार को मजबूर कर दिया है कि सिंगल विंडो क्लियरेंस होनी चाहिए। वहां हम एक वर्कशॉपनुमा करते हैं, जिसमें हम काम करनेवाले तैयार कर देते हैं, आपको मुंबई से लाने की जरूरत ही नहीं है। पहला महोत्सव किया था, तब करीब तीन हजार लोग आए थे, पर पिछले साल बीस हजार लोग आए। शाम को सांस्कृतिक आयोजन होते हैं, जिसमें स्थानीय लोगों को मंच देते हैं। फिर मुंबई से कुछ लोगों को मनोरंजन के लिए बुलाते हैं। पिछले साल शेखर कपूर आए थे। हम ऐसी स्थानीय प्रतिभाओं को सम्मानित करते हैं, जिन्होंने अलग-अलग क्षेत्रों में अपना बहुमूल्य योगदान दिया होता है।

दीपक रस्तोगी : आज जब फिल्मों की कमाई में चार-पांच सौ करोड़ की होड़ है, आप जिस तरह का प्रयोग कर रहे हैं, वह कितना टिकाऊ है?
’अगर हम ठान लें, तो कोई भी प्रयोग विफल नहीं होता। इसी तरह का एक प्रयोग पिछले साल मई की भीषण गरमी में हमने ओरछा में किया था। इसमें सरकार हमारी मदद करती है, स्थानीय लोग मदद करते हैं, हमारे दोस्त मदद करते हैं, इस तरह यह प्रयास लगातार सफल हो रहा है। मुंबई से रमेश सिप्पी आए, शेखर कपूर आए। इन लोगों से स्थानीय लोगों को मिलने का कहां मौका मिलता! कहने का मतलब कि जब तक आप लोगों को जोड़कर आगे नहीं बढ़ेंगे, तब तक आप अपने मकसद में कामयाब नहीं हो पाएंगे। फिल्म फेस्टिवल रखकर फिल्मों पर चर्चा होती रहनी चाहिए। बुद्धिजीवी आपके साथ रहेगा, तो आप और जिंदा रहेंगे।

अजय पांडेय : क्या आपको लगता है कि इस प्रयोग से शहर के वर्चस्व को चुनौती दी जा सकती है?
’नहीं, हमारा मकसद किसी को चुनौती देना नहीं है। हमारा मकसद उनको जगाना भर है। यह जगाने का काम हम सिनेमा के माध्यम से कर रहे हैं। हमारी कोशिश होती है कि वह हर विधा वहां उपस्थित हो, जो उन्हें छू सके। इसलिए हम उसमें सिर्फ सिनेमा ही नहीं, बल्कि नाटक, कवि सम्मेलन, मुशायरा, साहित्यकारों से बातचीत व किसान नेताओं से बातचीत आदि रखते हैं। हमारा मकसद है कि वे अपने आप को पहचानें। किसानों को जगाने के लिए हम कार्यक्रम और चर्चाएं आयोजित करते हैं।

मृणाल वल्लरी : आज नेटप्लिक्स जैसे सिनेमा के नए माध्यम आ रहे हैं। इन माध्यमों का चुनाव मुख्य रूप से यौनिकता, गाली-गलौज आदि वाली फिल्में होती हैं। इसे आप किस तरह से देखते हैं?
’एक बात तो यह कि आज का युवा इस कदर गुमराह हो चुका है कि वह एक तरह से नो मैन्स लैंड में चला जा रहा है। ऐसे में न तो वह अपनी जमीन का रहता है और न जिस दूसरी जगह जाता है वहां का। और जो हमें नहीं मिल रहा है, उसका फायदा पश्चिम उठा रहा है। हम सेक्स को एक वर्जित चीज बनाकर चल रहे हैं, जबकि पश्चिमी देशों में लोग पच्चीस साल में सेक्स से ऊपर उठकर अपने काम में लग जाते हैं। यहां मरते दम तक आदमी के दिमाग में वह बना रहता है। इसलिए कि हम अपने समाज को ठीक से जगा नहीं पाए। इसलिए हम सबका फर्ज बनता है कि गलत चीजों का विरोध करें। विरोध नहीं करते, इसीलिए चीजें गलत तरीके से हमारे बीच आती हैं और युवा गुमराह होते हैं। नेटफ्लिक्स वही कर रहा है, जो हमारे यहां एकता कपूर करती हैं। नेटफ्लिक्स पर तो कोई सेंसर है ही नहीं। सच्चाई यह भी है कि यौनिकता और गाली-गलौज वाली फिल्मों से लोगों का दिल बहुत जल्दी भर जाता है। इसलिए जिस दिन लोग ऊबेंगे, उस दिन हमें उन्हें सही रास्ते पर लाना है।

मुकेश भारद्वाज : मगर बहुत सारे धारावाहिक ऐसे भी बनाए और दिखाए जा रहे हैं, जिनकी कहानियां हमारे आसपास घटित हो रही कहानियों पर आधारित हैं। अब धारावाहिक और फिल्मों का मकसद पैसा कमाना है, इसे आप कैसे तोड़ेंगे?
’सिनेमा को आए सौ साल हो गए, पर टेलीविजन अभी बहुत अपरिपक्व अवस्था में है। इसे जितना परिपक्व होना चाहिए था, उतना हो नहीं पाया। जो लोग सी श्रेणी की फिल्मों में विफल हुए वे टेलीविजन में आ गए और लिखना शुरू कर दिया। पर अब वह छनना शुरू हो गया है, क्योंकि अब दर्शक भी परिपक्व होने लगे हैं। पर हम एक पूरी की पूरी पीढ़ी का काफी नुकसान कर गए।

सूर्यनाथ सिंह : हिंदी में बच्चों के लिए फिल्में और धारावाहिक क्यों नहीं बन पाते? इस मामले में विदेशी सामग्री पर निर्भर रहना पड़ता है।
’दरअसल, अब हमारे बच्चे वैसे रहे नहीं कि बाल फिल्में देखें। यह बड़ी वजह है। पहले बच्चे दादा-दादी से कहानियां सुनकर संस्कार पाते थे, पर आज के बच्चे दिनभर गूगल पर लगे रहते हैं। उन्हें अगर वे कहानियां परोसेंगे, तो वे कहां पसंद करेंगे। टीवी पर बच्चों के लिए कोई तय समय नहीं है।
पंकज रोहिला : आपने बुंदेलखंड में पानी की लड़ाई भी लड़ी, पर अपने लक्ष्य को हासिल नहीं कर पाए। इसके पीछे क्या अड़चन है?
’हमारी कोशिश तो है कि अपने मकसद में कामयाब हों। हमें दुख इस बात का है कि जिस बुंदेलखंड में सात नदियां हैं, वहां पानी नहीं है, सूखा है। हम चार जगह बिजली बनाते हैं और खुद अंधेरे में बैठे हैं। इसलिए कि जो बांटने वाले हैं, उन पर हमारा जोर नहीं है। जिस दिन यह भेदभाव मिटेगा, उस दिन हम अपने मकसद में कामयाब होंगे।

आर्येंद्र उपाध्याय : आपके मन में बुंदेलखंड मुक्ति मोर्चा बनाने का विचार क्यों आया?
’बुंदेलखंड मुक्ति मोर्चा के बाद हमने एक राजनीतिक पार्टी भी बनाई और उससे चुनाव भी लड़ा बयालीस सीटों पर। मगर हार गए। फिर मैं भाजपा में आ गया। इसलिए कि मैंने सोचा कि अगर आप कोई बड़ा परिवर्तन करना चाहते हैं, तो सत्ता के साथ रहकर ही कर सकते हैं। पर सत्ता हमारी मांगों पर कब विचार या अमल करेगी, पता नहीं। इसलिए मैं फिल्म फेस्टिवल के जरिए उन मुद्दों को जिंदा रखने का प्रयास करता रहता हूं। मैं हर मंच से बुंदेलखंड की बात करता रहता हूं।

मृणाल वल्लरी : क्या राजनीति बदलाव का रास्ता है?
’निश्चित रूप से। अगर आप राजनीति में हैं और सत्ता में हैं, तो आपके पास भरपूर साधन हैं। इसलिए एकदम से नहीं, पर धीमे-धीमे बदलाव कर सकते हैं। रही बात सिनेमा की, तो यह एक नौजवान की सोच का जरिया है। बहुत सारे लोग उससे प्रेरित होते हैं। इस तरह देखें तो ये दोनों ही बदलाव के माध्यम हैं।

सूर्यनाथ सिंह : बुंदेलखंड को अलग राज्य बनाने की मांग पुरानी है, पर अब तक इस मामले में कोई सार्थक पहल नहीं हो पाई। इसकी क्या वजह है?
’एक तो वहां उत्तराखंड और झारखंड जैसा कोई बड़ा आंदोलन खड़ा नहीं हो पाया और दूसरा कि इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी थी। राजनीतिक इच्छाशक्ति इसलिए नहीं दिखी क्योंकि जब एक दुकानदार की दुकान चल रही होती है, तो वह नहीं चाहता कि कोई दूसरा दुकानदार आकर उसके बगल में दुकान खोले। जब मैं आंदोलन कर रहा था, तब कोई भी बड़ा नेता नहीं आया। दूसरा, जहां तक आंदोलन की बात है, झारखंड, उत्तराखंड और तेलंगाना से बुंदेलखंड का आंदोलन बहुत भिन्न है। बुंदेलखंड में बड़ा आंदोलन इसलिए नहीं हो पाया क्योंकि वहां का आदमी पेट के अलावा कुछ और सोच ही नहीं पाता। वहां रोजी-रोटी की इतनी समस्या है कि अगर कोई काम न करे, तो उसे भोजन नहीं मिलेगा। इसलिए वह आंदोलन में नहीं जाता। उसे आंदोलन का महत्त्व नहीं पता।

अजय पांडेय : फिल्मों से जो लोग राजनीति में आए, उनमें से ज्यादातर का अनुभव कड़वा ही रहा है। आपका क्या अनुभव रहा है?
’वे लोग दरअसल, सुख-सुविधाओं के आदी हो गए हैं। राजनीति का रास्ता बहुत कंटीला है, वे उस पर चलने से बचते हैं। फिर दक्षिण और मुंबई के फिल्मी लोगों में अंतर है। राजनीति में आप कोई बचाव का रास्ता नहीं तलाश सकते। फिर इनमें से किसी की मानसिकता राजनीति की नहीं रही है। ये सब दिक्कतें उनके साथ रही हैं, इसलिए उनके अनुभव कड़वे रहे हैं।

सूर्यनाथ सिंह : क्या वजह है कि अब क्षेत्रीय भाषाओं
में फिल्में बननी लगभग बंद हो गई हैं। ’हम इसे जिंदा रखने का प्रयास कर रहे हैं। यह मृतप्राय था, पर हमारे प्रयास से बहुत से युवा अपनी क्षेत्रीय भाषा में फिल्में बना रहे हैं। इसका व्यवसाय इसलिए नहीं हो पाता, क्योंकि इसके लिए कोई पैसा नहीं देता। इसीलिए हम सिनेमा का विकेंद्रीकरण कर रहे हैं।

राजा बुंदेला
उत्तर प्रदेश में ललितपुर जिले के एक राजघराने में पैदा हुए राजा राजेश्वर प्रताप सिंह जुदेव आज राजा बुंदेला के नाम से लोकप्रिय हैं। फिल्मों से अपने करिअर की शुरुआत कर बुंदेलखंड को अलग राज्य बनाने की मांग के साथ राजनीति के मैदान में उतरे और बुंदेलखंड मुक्ति मोर्चा की स्थापना की। 2004 में कांग्रेस के टिकट पर झांसी सीट से चुनाव लड़ा लेकिन उसमें कामयाबी नहीं मिली। उसके बाद भाजपा के साथ जुड़े और अभी भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य भी हैं। राजनीति से मिली शक्ति का इस्तेमाल सिनेमा के मंच से शहर और गांव को जोड़ने के लिए कर रहे हैं। खजुराहो अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव के आयोजनों से यह संदेश दे सकने में कामयाब हुए हैं कि राजनीति बदलाव का रास्ता है और उसका जरिया सिनेमा भी हो सकता है।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

X