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बारादरी: आम लोगों तक पहुंच बनाई एनबीटी ने

एनबीटी के अध्यक्ष बल्देव भाई शर्मा ने कहा कि उनके कार्यकाल की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि लोगों की जुबान पर राष्ट्रीय पुस्तक न्यास का नाम चढ़ा। पहले आम लोग इस नाम को ही नहीं जानते थे। उन्होंने दावा किया कि पिछले दो-तीन सालों में न्यास सही मायनों में आम लोगों के लिए हुआ है। देश के किसी भी कोने के, किसी भी भाषा और वर्ग के लेखक तक यह भरोसा पहुंचा है कि उनकी किताबें राष्ट्रीय पुस्तक न्यास से आ सकती हैं। पहले न्यास अभिजात्य वर्ग के बुद्धिजीवियों तक सीमित था, अब यह हर लिखने वाले और पढ़ने वाले का है। दिल्ली के प्रगति मैदान में विश्व पुस्तक मेला शुरू होने से पहले इसकी आयोजक संस्था के अध्यक्ष के साथ बातचीत कार्यक्रम का संचालन किया कार्यकारी संपादक मुकेश भारद्वाज ने।

Author December 30, 2018 4:07 AM
बारादरी की बैठक में बल्देव भाई शर्मा। (सभी फोटो: आरुष चोपड़ा)

मुकेश भारद्वाज : पांच जनवरी से शुरू होने वाले विश्व पुस्तक मेले में क्या खास लेकर आ रहे हैं आप?

बल्देव भाई शर्मा : विश्व पुस्तक मेले में इस बार हमलोगों ने जो थीम रखी है वह दिव्यांगजनों की पठन आवश्यकताएं हैं ताकि सामान्य लोगों में शारीरिक-मानसिक चुनौतियां झेल रहे लोगों के प्रति सम्मान और अपनत्व का भाव जगे और वे समझ सकें कि ये सामान्य लोगों की तरह नहीं बल्कि उनसे ज्यादा प्रतिभाशाली होते हैं। बिना दया और सहानुभूति दिखाए हम उनके जीवन में कैसे सहभागी बन सकें, इस पर फोकस करने की दृष्टि से यह कोशिश की गई है। मेले में थीम आधारित जो परिसर बनेगा वहां दिव्यांगों से संबंधित करीब 500 किताबें उनकी कठिनाइयां व उनकी प्रतिभाओं की पुस्तकें और गुजराती, उड़िया, मलयालम व अन्य भाषा में पुस्तकें रहेंगी। हमारी यूनेस्को से बात हुई है। रोजाना 2 से 4 बजे के बीच यूनेस्को के सहयोग से दिव्यांगजनों पर आधारित फिल्म दिखाई जाएगी। माइक्रोसॉफ्ट के साथ आइटी के हिसाब से उपकरणों की प्रदर्शनी लगाएंगे, जिनकी सहायता से वे अपने जीवन को और आगे ले जा सकेंगे। अलग-अलग क्षेत्र में जैसे खेल, संगीत, अध्यापन के क्षेत्र के दिव्यांगों को बुला रहे हैं इनकी सूची बन रही है। इसके अलावा लोगों की बातचीत, पाठकों की बातचीत के साथ नौ दिन तक सेमिनार और संगोष्ठियां चलेंगी ताकि लोगों की सहभागिता बढेÞ और इस मुद्दे पर वे और अधिक संवेदनशीलता के साथ अपनी भू्मिका तय करें। आइटीपीओ के सीएमडी से मुलाकात कर दिव्यांगजनों की जरूरतों के हिसाब से सुविधाओं का इंतजाम किया गया है। जन जागरूकता की दृष्टि से यह थीम हमने रखी है। बाकी पुस्तकों की दृष्टि से यह एक महाकुंभ है। पिछले तीन-चार साल में इसका स्वरूप बढ़ा है। पिछले साल भी यहां 12 लाख से ज्यादा लोग आए थे। दो दर्जन से ज्यादा भाषाओं की पुस्तकें रहती हैं। आइटीपीओ में काम चलने की वजह से इस बार कम जगह मिली है लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा। करीब 700 प्रकाशक जुड़े हैं, 900 से ज्यादा स्टॉल और दो दर्जन से ज्यादा देशों की सहभागिता रहेगी। शारजाह इस बार विशिष्ट अतिथि देश है। मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर 5 जनवरी को इसका उद्घाटन करेंगे। शारजाह के हेड हेल हाइनेस अल फातमी इसमें मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद रहेंगे।

मनोज मिश्र : एनबीटी में अपनी भूमिका से आप कितने संतुष्ट हैं। आम आदमी तक किताबें पहुंचाने में सफलता मिली है क्या?
’संतोष की बात है तो मैं खुद को सफल कह सकता हूं। आज लोग इस संस्था को रार्ष्टÑीय पुस्तक न्यास के नाम से जानने लगे हैं, पहले लोग इस नाम से नहीं जानते थे। पहले राष्ट्रीय पुस्तक न्यास शब्द का प्रयोग ही नहीं होता था। पहले यह संभ्रांत बौद्धिक वर्ग तक सीमित केंद्र था। हमारा प्रयास ये रहा है कि हम इसको भारतीयजन के साथ जोड़ें। जैसे आज एक सामान्य लेखक को भी यह भरोसा रहता है कि मैं अगर एनबीटी में अपना प्रस्ताव लेकर जाऊंगा तो उसे देखा जाएगा। सामान्य इंसान भी अब एनबीटी में अपनी भूमिका महसूस करने लगा है। दूसरी चीज, हमने नए लेखकों को तैयार करने की दृष्टि से कुछ योजनाएं शुरू कीं और उसका परिणाम भी अच्छा आया। एक नवलेखन शुरू किया जिसमें 40 साल तक के युवा लेखकों को प्रोत्साहित किया। अगर युवा लेखक और नवाचार समाज में खड़े नहीं होंगे तो पुरानी पीढ़ी के लेखकों के भरोसे साहित्य और लेखन की परंपरा को आगे नहीं ले जाया जा सकता। 40 साल तक के लेखक, जिनकी कोई पुस्तक प्रकाशित नहीं हुई है उन्हें तवज्जो दी। पहले जब यह शुरू हुआ तो 16 पुस्तकें सात भाषाओं में प्रकाशित करवार्इं और विश्व पुस्तक मेले में ही उनका लोकार्पण कराया। यह योजना अच्छी चल रही है। राष्ट्रीय पुस्तक न्यास तो भारत सरकार का उपक्रम है और वह देश में रचना प्रक्रिया को लेखन की दृष्टि से आगे बढ़ाने, पुस्तक प्रोन्नयन को आगे बढ़ाने और पुस्तक पढ़ने की आदत को आगे बढ़ाने का काम बिना किसी लाभ-हानि के कर रहा है। यह जनोद्देश्य के लिए है ताकि ऐसी एक पीढ़ी तैयार हो जो देश में अलग-अलग विषयों पर लेखन कर सके। तो उस दृष्टि से एलीट क्लास से निकालकर सामान्यजन तक ले जाने का हमारा प्रयास रहा। नवलेखन में महिला-पुरुष दोनों शामिल हैं। लेकिन महिला सशक्तीकरण को देखते हुए महिला लेखन प्रोत्साहन योजना अलग से शुरू की, लेकिन वर्ग इसका भी यही रहा कि 40 साल तक की युवा लेखिकाओं की कोई पुस्तक प्रकाशित न हुई हो। इसका परिचय भी पुस्तक मेले में कराया जहां चार पुस्तकों का लोकार्पण किया। लोगों में संदेश गया कि एनबीटी सबकी किताबें छापता है। हम सबको अवसर देते हैं, लेकिन गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं करते।

मृणाल वल्लरी : क्षेत्रीय भाषाओं और बोलियों के लिए न्यास कितना मददगार रहा?
’अधिसूचित भाषाओं में काम खूब हुआ पर ये देश तो विविध बोलियों और भाषाओं का देश है, जिनको क्षेत्रीय भाषा कहते हैं। हालांकि मैं इस वर्गीकरण से सहमत नहीं हूं कि यह क्षेत्रीय भाषा है और यह राष्ट्रीय। सभी भाषाएं राष्ट्रीय हैं, कुछ क्षेत्रीय नहीं होता। ये तो औपनिवेशिक काल में भाषाई विवेक पैदा करने के लिए क्षेत्रीय भाषा का प्रयोग किया गया था। पिछले दो-तीन साल में मेरा प्रयास रहा कि हमारी जो आंचलिक भाषाएं हैं उनमें हम पुस्तक लेखन शुरू कराएं। बिहार में मगही, मैथिली और भोजपुरी में 15 पुस्तकों का प्रकाशन किया। उस समय बिहार के राज्यपाल से पुस्तकों का लोकार्पण पटना में कराया। वहां मैं खुद गया था और बिहार के 40 से 50 लेखकों को बैठाकर बातचीत की और उन्हें अनुवाद के लिए जुटाया। उसके बाद 15 पुस्तकों का तीनों भाषाओं में प्रकाशन कराया। यह काम आगे चल रहा है। बस्तर की हल्बी, गोंडी, भतरी जैसी आठ बोलियों में हमने 25 पुस्तकों का प्रकाशन किया है। पुस्तकों के माध्यम से हम न केवल भाषा को संरक्षण दे सके बल्कि उस क्षेत्र के लोगों में जागरूकता भी पैदा कर सके। त्रिपुरा जनजातीय क्षेत्र है, वहां के कुछ विद्वानों ने कहा कि हमारी भाषा खत्म हो रही है। वहां कार्यशाला की, विद्वानों को बुलाया, इलस्टेÑटर को बुलाया, अधिकारी, कला विभाग के लोग भी गए। तीन दिन की कार्यशाला की। वहां से पुस्तकें जल्द आएंगी। सिक्किम में नेपाली भाषा प्रमुख रूप में जानी जाती है, इसकी 12 पुस्तकों का प्रकाशन किया है। पुस्तक परिक्रमा की बसें हैं। कुछ बसें देशभर के दूर-दराज क्षेत्रों में जाती हैं ताकि लोगों का पुस्तकों के प्रति लगाव बढ़े। वहां हम अपने कार्यक्रम भी करते हैं।

दीपक रस्तोगी : डिजिटलीकरण से प्रकाशन पर क्या असर पड़ा है और एनबीटी इसे लेकर क्या कर रहा है।
’यह भ्रम है कि डिजिटलीकरण के कारण लिखी हुई किताबें कम पढ़ी जा रही हैं। मेरा अनुभव है कि अच्छी गुणवत्ता की सस्ती पुस्तकें प्रकाशित करिए, गांव-कस्बों तक में लोग पढ़ेंगे। उदाहरण के लिए ओड़ीशा जैसे क्षेत्र में भी लोगों ने 15 लाख से ज्यादा पुस्तकें खरीदीं। तकनीक बड़ी चीज है लेकिन भारतीय मानस में छपी हुई चीज के प्रति जो भरोसा है जो लगाव है और इसे स्पर्श करने में जो आनंद है वह कम नहीं हुआ है। हालांकि एनबीटी ने भी ऑनलाइन बिक्री और ई-बुक्स शुरू की हैं। लक्ष्य है कि सारे साहित्य को ई-प्रारूप में लाएं। आइआइटी खड़गपुर इस मामले में बढ़िया काम कर रहा है। उससे बातचीत चल रही है।

अजय पांडेय : क्षेत्रीय भाषाओं पर आप काम कर रहे हैं पर हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं में इसका विरोध है कि क्षेत्रीय भाषा बढ़ी तो हिंदी का नुकसान होगा। इस पर आप क्या सोचते हैं।
’भारत में आजादी के बाद भाषा को लेकर जो राजनीति शुरू हुई ये उसी का नतीजा है। भारत में भाषा को लेकर कभी विभेद और वैमनस्य नहीं रहा। क्योंकि भाषाई लोगों के साथ समाज के हर लोगों का संवाद होता रहता है। आजाद होने के बाद संस्कृत को राष्ट्रभाषा बनाने पर चर्चा हुई क्योंकि अधिकतर भाषाएं संस्कृत से ही मिली-जुली थीं। दक्षिण भारत की मलयाली भाषा के कुछ शब्द तो मैं ऐसे ही समझ रहा था, क्योंकि उनमें संस्कृत के शब्द थे। भाषा किसी की नहीं होती यह समाज की होती है। वैमनस्य राजनीति की वजह से है, जनमानस की इसमें कोई भूमिका नहीं है। मेरा मानना है कि भाषाई आधार पर राज्यों का गठन सबसे बड़ी गलती थी। अगर हम भाषा के नाम पर लड़ेंगे तो समाज कमजोर होगा।

मुकेश भारद्वाज : एनबीटी और केंद्रीय हिंदी निदेशालय या अन्य संस्थान कहने को स्वायत्त हैं। लेकिन इन पर सरकार के कहे अनुसार चलने का आरोप लगता है। लोग इनमें विश्वास नहीं जगा पाते। लोगों को न्यास की मील का पत्थर साबित हुर्इं पुस्तकों के नाम तक याद नहीं होते। इससे उबरने के लिए आपने क्या किया।
’जब मैं यहां आया तो पत्रकार मुझसे तमाम सवाल पूछते थे। राष्ट्रीय पुस्तक न्यास एक संस्थान है जो सरकार ने लोगों के ज्ञानवर्धन के लिए बनाया है। इसके उद्देश्यों में जो है मैं वो करूंगा। मैं आत्मसंतोष के साथ कह सकता हूं कि पिछले दिनों में यहां की रचनाधर्मिता को लेकर ऐसा कोई विवाद नहीं हुआ है कि व्यक्तियों का वर्गीकरण करके किताबों को छापा गया हो या न छापा गया हो। अभी विचारधारा के स्तर पर मेल न खाते हुए भी विषय और उसके महत्त्व को देखते हुए पुस्तक प्रकाशित की गई है।

मृणाल वल्लरी : आपसे पुस्तक छपवाने और आपके पुस्तक छापने के अलग-अलग उद्देश्य होते हैं। उससे आप कैसे तारतम्य बनाते हैं।
’न्यास में अब इस प्रकार का कोई विभेद नहीं है कि इसकी पुस्तक छपेगी और उसकी नहीं छपेगी। दृष्टि जो कार्य के प्रति विकसित हुई है वह अच्छी बात है। विचारधारा अलग हो सकती है लेकिन सोच, विचार और लेखन एक सामाजिक दायित्व है। जब व्यक्ति के दायरे से बाहर निकलकर सोचते हैं तो आप सामाजिक दायित्व से बंध जाते हैं तो आपकी निजी बाध्यताएं कोई मायने नहीं रखती हैं। फिर आपकी प्राथमिकता होती है कि देश के दीर्घकालिक हित में ही सोचें और लिखें।
अजय पांडेय : बच्चों की पुस्तकों का कोना अब खाली है। न पुस्तकें हैं और न हम उपलब्ध करा पा रहे हैं।
’बच्चों के लिए हमारी अलग इकाई है। मेरा प्रयास रहा है कि बच्चों के लिए किताबें और खेल मनोरंजन को देखते हुए ही सब रचते हैं। अब बच्चों की दुनिया बदल गई है। मनोरंजन के साथ जीवन-दृष्टि का संदेश जाए। भारत के परमवीर चक्र विजेता की वीरगाथा विशेषांक की इलस्टेशन बुक जारी की है। कॉमिक्स हम प्रकाशित नहीं कर सकते हैं। उसमें चित्र ज्यादा लेखन कम है। क्योंकि चित्र प्रेरणा ज्यादा देते हैं, इसलिए यह खूब बिक रही है। यह कई भाषाओं में प्रकाशित हो रही है। हमने पहली बार संस्कृत की किताब प्रकाशित की है।
अरविंद शेष : वैज्ञानिक दृष्टिकोण के विकास के प्रसार में एनबीटी की क्या भूमिका है।
’विज्ञान पर कई किताबें प्रकाशित हुई हैं। तथ्यों और प्रमाणिकता के साथ हमने फिजिक्स एंड एनशिएंट इंडिया पुस्तक प्रकाशित की है। पर्यावरण भी चिंता का विषय है और इस पर भी हमने कई किताबें छापी हैं। मेरा मन है कि राष्ट्रीय विज्ञान पुस्तक मेला लगाऊं। यह पाइपलाइन में है। विज्ञान को आज हौव्वा बना दिया गया है जबकि यह हमारे दैनिक जीवन का हिस्सा है। विज्ञान को आज अंग्रेजी वालों के लिए बनाकर रख दिया गया है जबकि यह जीवन पद्धति का हिस्सा है।
आर्येंद्र उपाध्याय : ऑनलाइन और ई-बुक आने के बाद निजी प्रकाशक क्यों रोना रोते हैं कि घाटे में हैं। आखिर इसका क्या कारण हैं।
’यह तो निजी प्रकाशक ही जानें, लेकिन व्यापार का एक सिद्धांत है कि हमेशा खुद को घाटे में दिखाते रहो। मैं इस पर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहूंगा।

बल्देव भाई शर्मा
उत्तर प्रदेश के मथुरा में पटलौनी गांव में छह अक्तूबर 1955 को जन्मे बल्देव भाई शर्मा पिछले 35 सालों से पत्रकारिता जगत में सक्रिय रहे। मौजूदा समय में राष्ट्रीय पुस्तक न्यास (एनबीटी) में अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाल रहे बल्देव भाई के देश के लगभग सभी प्रमुख समाचार पत्र-पत्रिकाओं में ज्वलंत राष्ट्रीय व सामाजिक मुद्दों पर पांच सौ से ज्यादा विचारपरक आलेख प्रकाशित हो चुके हैं। कई अखबारों में काम करने के बाद 2008 से 2013 तक ‘पाञ्चजन्य’ के संपादक रहे। इनके द्वारा रचित ‘मेरे समय का भारत’, ‘आध्यात्मिक चेतना’ और ‘सुगंधित जीवन’ पुस्तकें भारतीय-जीवन दृष्टि को नया आयाम देती हैं। अनेक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों व प्रमुख शैक्षिक संस्थाओं में शिक्षा, संस्कृति और राष्ट्रीयता पर व्याख्यान देने के साथ पत्रकारिता के विद्यार्थियों का मार्गदर्शन भी कर रहे हैं।

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