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बारादरी: पत्रकारिता ही नहीं, पूरी दुनिया बदल रही है

वरिष्ठ पत्रकार शीतला सिंह का कहना है कि आज पत्रकारिता राजनीति से बहुत आगे की चीज है। इसका मूल्यांकन करने के लिए इसके विभिन्न आयामों का मूल्यांकन करना होगा। राजनीति, समाज, धर्म और संस्कृति में चल रही मुठभेड़ों का असर भी पत्रकारिता पर पड़ रहा है। पत्रकारिता के प्रभाव का आकलन देश और काल से आगे यानी भविष्य को ध्यान में रखकर करना होगा। उन्होंने बारादरी की बैठक में पत्रकारिता में सहकारिता आंदोलन से लेकर वेब पत्रकारिता तक के मुद्दों पर बातचीत की। कार्यक्रम का संचालन किया कार्यकारी संपादक मुकेश भारद्वाज ने।

बारादरी की बैठक में शीतला सिंह (सभी फोटो: आरुष चोपड़ा)

मनोज मिश्र : इतने सालों में पत्रकारिता में जो बदलाव आपने देखे, उनके बारे में क्या कहना चाहेंगे?
शीतला सिंह : बदलाव को आप केवल पत्रकारिता में क्यों देखते हैं! देश में, राजनीति में, हमारे जीवन में सबमें निरंतर बदलाव हो रहा है। इसका एक रूप पत्रकारिता में भी दिखाई देता है। आज हम एक देश से दूसरे देश में जाते हैं तो एक अखबार नहीं ले जा सकते। उसे यह कहकर रखवा लिया जाता है कि इसकी छूट नहीं है। पर आज यह भी है कि वैश्वीकरण के सिद्धांत के तहत हम चल रहे हैं। उसमें सारे प्रतिबंध समाप्त होते जा रहे हैं। यह इसलिए है कि वैश्वीकरण का सिद्धांत सिर्फ इस बात पर काम करता है कि पूरी दुनिया में पूंजी के प्रवाह पर कोई रोक न हो। पर सवाल यह भी है कि क्या पंूजी हमारे गुणों और मूल्यों का सृजन कर सकती है?

मृणाल वल्लरी : एक तरफ पूंजी का प्रवाह बढ़ रहा है, पर मानवीय अधिकार, लोगों की आजादी, आवाजाही सिकुड़ रही है। कहीं रोहिंग्या का मामला है, तो अमेरिका में प्रवासियों को रोकने के लिए दीवार खड़ी की जा रही है। इसे कैसे देखते हैं?
’पूंजी के प्रभावों को किसी देश या काल से मत जोड़िए। इसे वैश्विक परिप्रेक्ष्य में ही देखना पड़ेगा। देखना पड़ेगा कि इसका प्रभाव दुनिया में कैसे पड़ रहा है। जैसे कुछ ऐसी व्यवस्थाएं, सरकारें और राज्य थे, जो इसके विपरीत सोचने वाले थे और एक-दूसरे को समाप्त करने और अपनी व्यवस्था लागू करने के लिए व्याकुल थे। जब रूस का विघटन हुआ तो उसका असर दिखने लगा, लेकिन चीन उसका समर्थक क्यों हो गया है! ऐसा इसलिए हो गया है कि हम वैश्विक पूंजी में शामिल होकर ही किसी को पछाड़ सकते हैं और जब अमेरिका की चिंता दिखती है और उसकी चिंता में उसका यह पक्ष दिखता है, तो लगता है कि प्रभाव का आकलन देश और काल से आगे यानी भविष्य को ध्यान में रखकर करना होगा।

अजय पांडेय : वैश्वीकरण को लेकर कहा गया था कि यह पूरी दुनिया में समानता लाएगा। क्या आपको लगता है कि यह किसी हद तक संभव है?
’सवाल यह है कि क्या हम उपभोक्ता वस्तुओं तक ही अपने को सीमित रखें या सारी चीजों को उसमें शामिल करके देखें, जो हमारे जीवन को आगे बढ़ाती हैं। जो हमें आगे ले जाती हैं, मूल्यों का सृजन करती हैं। क्या सिर्फ उपभोक्ता वस्तुओं को ध्यान में रखकर इसकी सफलता या विफलता का मूल्यांकन किया जाए?

आर्येंद्र उपाध्याय : आप सहकारिता पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं। क्या वजह है कि अखबारों के मामले में सहकारिता आंदोलन विफल हुआ?
’पत्रकारिता के क्षेत्र में विभिन्न प्रकार के प्रयोग होते रहे हैं, हो रहे हैं। एक प्रयोग हमने भी किया था। पर उसे मैं अपना नहीं मानता हूं। पहले प्रेस आयोग ने एक तत्त्व पर खासतौर से विचार किया था कि इस पत्रकारिता को क्या कहा जाए। तो, तीन दिन के विचार-विमर्श के बाद उसने इसे परिभाषित किया था और जो उसकी सिफारिशों में भी समाहित है कि अखबार एक सार्वजनिक उपयोग की समाचार सेवा है। तो इस सार्वजनिक उपयोग की सेवा पर खतरा कहां से है, सरकार की तरफ से या उसके बाहर से? उसमें कहा गया कि सरकार तो बहुत समर्थ है, उसके पास बहुत सारे अधिकार और संसाधन भी हैं, पर इससे भी बड़ा खतरा निजी पूंजी से है। तब हमने सोचा था कि वर्कर और पत्रकारों को मिलकर यह प्रयोग करना चाहिए। लेकिन प्रेस आयोग ने यह चिंता भी जाहिर की थी कि क्या साधनहीनता के चलते पत्रकारिता अपने मकसद में कामयाब हो पाएगी? दूसरे प्रेस आयोग में मुझे ऐसे प्रयोगों पर सुझाव देने का दायित्व सौंपा गया था। तब देश भर में सैंतालीस ऐसे प्रयोग हुए थे। पर यह इकसठवां वर्ष है, जब शायद दो-चार ही बचे होंगे। क्योंकि प्रतिस्पर्धा में अपने अस्तित्व को बचाए रखने की स्थितियां ही नहीं रहती हैं।

दीपक रस्तोगी : अयोध्या मामले पर आपकी एक किताब आई है। आपने अयोध्या आंदोलन को बहुत करीब से देखा है। आपके अनुसार इसका निपटारा कैसे होगा?
’सन 1987 में हमने प्रयास किया था कि अगर इस मामले को सीमित कर दिया जाए, तो फैजाबाद-अयोध्या के लोग मंदिर भी बना देंगे और यह विवाद भी समाप्त हो जाएगा, इस पर राजनीतिक प्रभाव भी समाप्त हो जाएगा। तब बाबरी एक्शन कमेटी के सैयद शहाबुद्दीन ने कहा कि हम इस मसले पर मिलना चाहते हैं। मैं वहां गया। तब शहाबुद्दीन ने कहा कि जितना जल्दी हो सके, मंदिर बनवा दीजिए। उनकी बात सुनकर मैं हैरान हुआ। मैंने पूछा कि आपकी सोच में इस बदलाव का कारण क्या है। तो शहाबुद्दीन ने कहा कि दरअसल, यह आंदोलन हम अल्पसंख्यकों को देश की मुख्यधारा से अलग करने के लिए है। अगर हम देश की मुख्यधारा से अलग हो गए तो इसका लाभ किसको मिलेगा? उसे मिलेगा, जो सत्ता में होगा। तब मैंने कहा कि मगर आपके शाही इमाम तो ऐसा नहीं चाहते! तब शहाबुद्दीन ने अपने आदमी से कहकर उन्हें फोन मिलवाया। मैंने शाही इमाम से कहा कि हम अमुक-अमुक लोग यहां बैठे हैं और चाहते हैं कि मंदिर बन जाए, आपकी क्या राय है? तो उन्होंने कहा कि बन जाए तो अच्छी बात है। झगड़े से छुट्टी मिल जाएगी। तय हुआ कि सभी पक्षों के लोगों को शामिल करके एक ट्रस्ट बना दिया जाए। मगर फिर अड़चनें आती गईं और मंदिर बनाने का मुद्दा लटका रह गया।

सूर्यनाथ सिंह : तो क्या मंदिर बनने की स्थिति फिलहाल नहीं बन रही?
’मंदिर अभी बनेगा कैसे। आज से सौ साल पहले लाहौर में सिखों ने एक मस्जिद को गिराकर उस पर गुरुद्वारा बना दिया। बाद में पाकिस्तान बना और लाहौर उसके हिस्से में आ गया। उस गुरुद्वारे को हटाने का मामला हाई कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट, प्रीवी काउंसिल तक गया, मगर उस गुरुद्वारे को हटाकर पाकिस्तान आज तक मस्जिद नहीं बनवा पाया है। अयोध्या मामले में दो फैसलों का हवाला देना चाहता हूं। एक एसआर बोम्मई बनाम भारत गणराज्य, जिसके संविधान पीठ में नौ लोग थे और दूसरा जस्टिस वेंकटचलैया का पीठ जिसमें पांच लोग थे। इन पीठों के फैसले से अलग कोई फैसला कैसे दे सकता है! फिर न्याय पाने के अधिकार से किसी को कैसे वंचित किया जा सकता है। और जो फैसले इन दोनों पीठों ने दिए वे एक तरह से दिशानिर्देश हैं, उनके बारे में विचार करना पड़ेगा। लाहौर का उदाहरण मैंने इसीलिए दिया था कि दोनों देशों में जाब्ता दीवानी और जाब्जा फौजदारी संबंधी कानून एक-से हैं, अंग्रेजों के बनाए हुए। राइट आॅफ एडवर्स पजेशन में एक नियम है कि अगर किसी चीज पर किसी का बारह साल तक लगातार कब्जा रहता है, तो उससे वह चीज छीनी नहीं जा सकती। पर यह भी कहा जाता है कि यह नियम सामान्य जमीन पर तो लागू होता है, पर सरकारी जमीन पर लागू नहीं होता। इस तरह कई पेच अब भी बने हुए हैं, जिनका निपटारा हुए बिना मंदिर का निर्माण संभव नहीं है।

मुकेश भारद्वाज : इतने लंबे समय के अनुभव में क्या आपको लगता है कि पत्रकारिता पर दबाव होते हैं?
’वर्तमान समय में जिस तरह पूंजी का प्रभाव बढ़ा है, पत्रकारिता भी उससे मुक्त नहीं है। हिंदुस्तान में ऐसे चालीस-पचास लोग हैं, जिनका नाम आप बड़े आदर और श्रद्धा से लेते हैं, पर समग्र रूप में देखा जाए, तभी इसके बारे में ठीक-ठीक कुछ कहा जा सकता है। अभी तक इसका कोई परीक्षण नहीं हुआ है, जिसके आधार पर मैं कह सकूं कि वास्तविकता क्या है। मेरी कोई बात सिर्फ मेरी राय मानी जाएगी, उसे समग्र मूल्यांकन नहीं कहा जा सकता। हां, सरकार के पास असीमित अधिकार हैं और उन्हें सीमित नहीं किया जा सकता। इसलिए जिन लोगों का राज्य की कानून-व्यवस्था पर अधिकार है, वे इसे किस तरह प्रभावित करते हैं, सोचने की बात है।

अजय पांडेय : बाजार के चलते अब तक दो विश्वयुद्ध हो चुके हैं। अब जब पूंजी का वर्चस्व बढ़ रहा है, तो क्या आपको लगता है कि दुनिया फिर उस तरफ बढ़ेगी?
’विश्वनाथ प्रताप सिंह ने इस सवाल पर एक बार कहा था कि पूंजी ही नहीं, इसमें तीसरे पक्ष को भी रख लीजिए। श्रम का भी वैश्वीकरण हो जाएगा। तो, उसका क्या प्रभाव होगा और पूंजी वालों का क्या होगा, यह भी सोच लीजिएगा।
अरविंद शेष : पूंजी और धर्म का जैसा दखल राजनीति में बढ़ा है, उससे आने वाले दस सालों में कैसी पीढ़ी बनती देख रहे हैं?
’इसमें यह भी देखना है कि हमारा जीवन कैसा होगा। अब तो इस प्रभाव में परिवार और विवाह नाम की संस्थाएं ही ध्वस्त होने को हैं। विभिन्न धर्मों में विवाह से मुक्ति के लिए संघर्ष चल रहा है। इस तरह यह बदलाव तो चलता रहेगा, हमें यह सोचने की जरूरत है कि जीवन को सुंदर कैसे बनाए रखें।

मृणाल वल्लरी : कम लागत की पत्रकारिता में वेब पत्रकारिता को देखा जा रहा है, पर इसमें फर्जी समाचारों जैसे खतरे हैं और जमीनी रिपोर्टिंग भी नहीं हो रही है। तो रिपोर्टिंग को कैसे बचाएं?
’देखिए, अब पत्रकारिता सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं रह गई है। इसके विभिन्न आयाम हैं और उन आयामों को लेकर भिन्न-भिन्न प्रयोग हो रहे हैं। उन सबको समग्र रूप में शामिल करके ही देखना चाहिए

शीतला सिंह
भारत सुरक्षा कानून के तहत चीन पर लिखे अपने संपादकीय के कारण जेल में बंद हुए ‘जनमोर्चा’ के पहले संपादक महात्मा हरगोविंद की जेल से लिखी पर्ची ने शीतला सिंह को इस ऐतिहासिक अखबार का संपादक बनाया। शीतला सिंह और सहकारिता से निकलने वाले अखबार ‘जनमोर्चा’ को एक-दूसरे का पर्याय माना जाता है। 6 अगस्त, 1932 को फैजाबाद के खड़भड़िया गांव में जमींदार परिवार में जन्मे शीतला सिंह ने शिक्षा की कोई औपचारिक डिग्री तो नहीं ली, लेकिन उनका गहन अध्ययन उनके लेखन और उनकी बातों में दिख जाता है। 1963 में कम्युनिस्ट पार्टी के विभाजन के बाद वे पार्टी से अलग हो गए। उनका मानना है कि अखबार किसी पार्टी का सदस्य होकर नहीं निकाला जा सकता। अयोध्या में बाबरी मस्जिद विध्वंस की निष्पक्ष रिपोर्टिंग के लिए जाने जाते हैं। इस मसले को हल कराने की कोशिशों में इनकी भी भूमिका है। हाल ही में इनकी किताब ‘अयोध्या : रामजन्मभूमि-बाबरी-मस्जिद का सच’ प्रकाशित हुई है। सरोकार की पत्रकारिता में योगदान के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने इन्हें यश भारती पुरस्कार से नवाजा है।

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