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बारादरी: विधाएं भाषा की नहीं, साहित्य की होती हैं

साहित्य, समाज और सत्ता के त्रिकोण में एक अहम भूमिका होती है अकादमियों की। देश की आजादी के बाद सत्ता के केंद्र ने साहित्य व कला के विभिन्न पक्षों की जरूरतों को समझते हुए जिन अकादमियों की स्थापना की, उनमें से साहित्य अकादेमी प्रमुख है। एक देश, भाषा अनेक का नारा देने वाली साहित्य अकादेमी के उपाध्यक्ष माधव कौशिक का मानना है कि यह संस्था लेखकों की, लेखकों के लिए और लेखकों के द्वारा है। लेखक, समाज और राजनीति के रिश्तों पर माधव कौशिक के साथ लंबी बातचीत का संचालन किया कार्यकारी संपादक मुकेश भारद्वाज ने।

देश की आजादी के बाद सत्ता के केंद्र ने साहित्य व कला के विभिन्न पक्षों की जरूरतों को समझते हुए जिन अकादमियों की स्थापना की, उनमें से साहित्य अकादेमी प्रमुख है।

आर्येंद्र उपाध्याय : साहित्य अकादेमी बहुत बड़ी संस्था है। क्या आप इसके कामकाज से संतुष्ट हैं या आपको लगता है कि उसके काम को और ज्यादा लोगों तक ले जाने की जरूरत है?माधव कौशिक : सही बात तो यह है कि यह देश की अकेली ऐसी संस्था है जो पूरी तरह स्वायत्त है। लोकतंत्र में जिस तरह कहते हैं कि यह जनता का, जनता के लिए, जनता के द्वारा है, उसी तरह यह संस्था लेखकों की, लेखकों के लिए और लेखकों के द्वारा है। हालांकि सरकार इसे अनुदान देती है, लेकिन इसके किसी आयोजन में राजनेता या अधिकारी नहीं आते हैं। लेखक ही इसका संचालन करते हैं। नेहरू जी ने इसकी परिकल्पना की थी। पहले अध्यक्ष वही थे, शुरुआती दस-बारह सालों तक। वे कहते थे कि मैं जब साहित्य अकादेमी के परिसर में होता हूं तो भूल जाता हूं कि मैं प्रधानमंत्री हूं… मेरी यह गुजारिश है कि आप भी यहां भूल जाएं कि मैं प्रधानमंत्री हूं। वे दो-तीन घंटे तक बैठते थे। उनके बाद जाकिर हुसैन रहे, फिर सर्वपल्ली राधाकृष्णन, मौलाना अबुल कलाम आजाद आदि। उस समय जो राजनेता थे, वे लेखक भी थे। आज जैसा हाल नहीं था। आज के नेता पढ़ते-लिखते नहीं है या साहित्य से उसका वास्ता नहीं है। लेकिन नेहरू जी जैसे राजनेता को हम स्टेट्समैन कह सकते हैं। उनकी परिकल्पना थी कि एक ऐसी संस्था हो जो चिंतन और सृजन के स्तर पर काम करे, ताकि देश की बौद्धिक प्रखरता सामने आए। साहित्य अकादेमी में एक और कमाल की बात है। हमने चौबीस भाषाएं साथ में रखी हुई हैं। इन भाषाओं के साहित्य का संरक्षण और उनका प्रकाशन भी हो रहा है।

मनोज मिश्र : रचना, पुरस्कार और इसकी गरिमा के आलोक में आप साहित्य अकादेमी की गंभीरता को कैसे देखते हैं?
’साहित्य अकादेमी के पुरस्कार की राशि एक लाख रुपए है, लेकिन उसकी गरिमा लाखों इनामों से बड़ी है। राज्यों में तो ग्यारह लाख रुपए तक के इनाम हैं, लेकिन लेखकों की नजर में साहित्य अकादेमी पुरस्कार की गरिमा ज्यादा बड़ी है। अकादेमी ने बीते छियासठ वर्षों के दौरान वाकई इतना काम किया है, जिसकी परिकल्पना इसके निर्माताओं ने की थी। आज देखिए कि सुदूर स्तर तक जो छोटी-छोटी भाषाएं हैं, जैसे संथाली, बोडो आदि। इन भाषाओं में किताबों का प्रकाशन मुश्किल काम है। लेकिन यह काम साहित्य अकादेमी करती है। तो इन छियासठ वर्षों के दौरान अकादेमी ने हाशिए की भाषाओं की लिपि और साहित्य का संरक्षण व सृजन भी किया और देश में एक ऐसा माहौल बनाया कि अब बाकी राज्यों में भी अकादेमी है। एक और बात, देश में भाषायी दुर्भावना बहुत सालों तक फैली रही। मुझे अठावन वोट मिले अठासी में से। हिंदी से महज आठ वोट मिले। इससे साबित होता है कि अब कोई भाषायी विभाजन नहीं है। सारी भाषाएं बराबर हैं। हम अंग्रेजी को भी विदेशी भाषा नहीं मानते। यहां तक आने में साहित्य अकादेमी की बड़ी भूमिका है।

मृणाल वल्लरी : उत्तर भारत या हिंदी क्षेत्र में भी भाषा को लेकर संकीर्णता दिखती है। हम चाहते हैं कि दक्षिण भारतीय लोग हिंदी बोलें, लेकिन हम कभी तमिल नहीं सीखते। इस पर आपकी क्या राय हैं?
’ये मानसिकता से जुड़ी बात है। ये जो रोजगार है, वह भाषा में बड़ी भूमिका निभाता है। कुछ समय पहले मैंने एक फिल्म देखी थी- ‘सेतु’। उसमें दक्षिण भारतीय लोगों के इंटरव्यू हैं। उसमें एक बुजुर्ग कहता है कि देखो क्या जमाना आ गया है। मैंने हिंदी प्रचारिणी सभा से मुफ्त में हिंदी सीखी थी। अब मैं पोते को दाखिला दिला के आया हूं। वहां एक लाख रुपए लिए हैं हिंदी सिखाने वाले ने। अब बच्चे को बड़ा होकर आइएएस बनना है, उत्तर भारत में नौकरी करनी है। मैं बच्चे को हिंदी नहीं सिखाऊंगा तो मुश्किल होगी। दरअसल, उत्तर भारत का आदमी तमिल इसलिए नहीं सीख रहा क्योंकि उसे पता है कि रोजगार के लिए उसे दक्षिण की ओर नहीं जाना है। वह एक राज्य तक सीमित है। तमिल भाषी को पता है कि पूरे देश में काम करना है तो हिंदी सीखनी पड़ेगी। यह व्यावहारिक विचार है। भारत सरकार के त्रिभाषा फॉर्मूले के तहत एक सामान्य व्यक्ति को अपनी मातृभाषा, क्षेत्रीय भाषा और राष्ट्रीय भाषा सीखनी चाहिए। उत्तर भारत में क्षेत्रीय और राष्ट्रीय भाषा आमतौर पर एक ही है, लेकिन दक्षिण के लोग अपनी तमिल-तेलुगु भाषा भी जानते हैं। छठी जमात में उन्हें हिंदी पढ़नी पड़ती है और अंग्रेजी तो पढ़नी ही है। जहां तक साहित्य अकादेमी का सवाल है, उसने चौबीस भाषाओं के बीच अनुवाद की शृंखला शुरू की, यह सबसे बड़ा काम है। हर भाषा की पुरस्कृत पुस्तक का हम सभी भाषा में अनुवाद कराते हैं। इस्मत चुगताई का जिस दिन निधन हुआ, उस दिन साहित्य अकादेमी की ओर से उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए पत्र तैयार करते समय जब मैंने उनके लिए उर्दू साहित्यकार लिखवाया, तो एक सहयोगी ने कहा कि मैंने उनका सारा लिखा हिंदी में पढ़ा है और वे तो हिंदी की थीं। मुझे बड़ी खुशी हुई कि हमने भाषा के विभाजन को खत्म किया है।

अजय पांडेय: साहित्य अकादेमी के पुरस्कारों को लेकर अक्सर कहा जाता है कि पुस्तकों का चयन कायदे से लेखकों द्वारा होना चाहिए। लेकिन आमतौर पर आइएएस अधिकारियों का उसमें हस्तक्षेप होता है।
’हमारे यहां किसी आइएएस की कोई भूमिका नहीं होती। वे हमारे यहां आते हैं तो किसी को पता भी नहीं चलता। पुस्तकों की चयन प्रक्रिया बड़ी जटिल है और व्यापक भी है। दस साल पहले विवाद पैदा हुआ होगा, लेकिन हाल के वर्षों में कोई विवाद नहीं हुआ। साहित्य की एक सृजन प्रक्रिया है। उसमें कई कालखंड आते हैं। अगर हमें चार साल के दौरान की किताब लेनी है और संयोग से इस बीच कोई अच्छी किताब नहीं रची गई। कई बार पांच सालों में पच्चीस अच्छी किताबें आ गर्इं। उनमें से हमें चयन करना है। तो कई बार सूखा पड़ जाता है, कई बार अतिवृष्टि हो जाती है। मैं सबसे पहला आदमी था, जिसने यह प्रस्ताव रखा था कि युवाओं को पुरस्कार दिया जाए। उम्र तय करना मुश्किल था, लेकिन आखिर वह शुरू हो गया। हमने बाल साहित्य का पुरस्कार भी रखा। दरअसल, पिछले पांच-सात सालों में यह अनुभव किया गया कि यह बहुत बड़ा देश है। इसके मुताबिक इसका विस्तार करना होगा। पिछले दिनों साहित्य अकादेमी का एक समारोह हुआ। उसमें मैंने देखा कि एक चौबीस साल का युवा भी बैठा हुआ है और हमारे हिंदी के एक अठासी साल के वरिष्ठ भी बैठे हैं। संथाली या बोडो को बहुत कम लोग जानते हैं, लेकिन अब वहां के किसी चौबीस साल के लड़के का नंबर पुरस्कारों के लिए आ सकता है। हिंदी में हमारे यहां जब नंबर आता है, तो कई बार लेखक अपने जीवन के अंतिम चरण में होता है। यह भाषा बड़ी है और इसमें बहुत ज्यादा सृजक हैं। इसलिए ऐसा होता है।

अरविंद शेष : महिला शोषण से जुड़े मुद्दे पर महिलाएं लिखती हैं तो उसे ‘आइडेंटिटी पॉलिटिक्स’ के रूप में पेश कर दिया जाता है। आप इस पर क्या कहेंगे?
’समाज की तरह साहित्य में भी संकीर्णता देखने को मिलती है। अच्छी बात यह है कि साहित्य में चालाकियां या नारेबाजी ज्यादा देर तक नहीं चलती हैं। साहित्य आज भी गंभीरता की मांग करता है, वह आपको सोचने पर मजबूर करता है। मेरे पिता कहते थे कि जो नारेबाजी वाला साहित्य है, उसकी उम्र उतनी ही होगी, जितनी देर तक मजमा रहेगा। इस तरह के साहित्य को हम गंभीर साहित्य सृजन की श्रेणी में नहीं रख सकते। साहित्य अकादेमी के लिए रचना का महत्त्व है, वह कहीं भी हो। महिलाओं के बारे में सबसे बढ़िया लिखने वाले पुरुष रहे हैं, जैसे प्रेमचंद। दलित समाज को जागृत करने में जितना बड़ा योगदान प्रेमचंद का है, उससे ज्यादा किसका होगा। साहित्यकार लिखते हुए न जाति देखता है, न जेंडर। जब वह कलम उठाता है, तो वह विशुद्ध साहित्यकार होता है। मेरा मानना है कि स्वतंत्र लेखक ही समाज को स्वतंत्र कर सकता है।

मुकेश भारद्वाज : साहित्य बहुत महान चीज है। लिखा हुआ शब्द वह कर सकता है, जो कहा हुआ नहीं कर सकता। लेकिन फिर साहित्यकारों के बीच इतनी जबर्दस्त खेमेबंदी क्यों है? आपने जिस विधा (गजल) में लिखना शुरू किया, मुख्यधारा की कविता उसे मान्यता नहीं देती। ऐसा क्यों है? साहित्यकार का दृष्टिकोण इतना संकीर्ण क्यों है? जब वह समाज को आईना दिखा सकता है तो खुद अपने सामने शीशा रखने में उसे क्या दिक्कत है?
’अंतर्विरोधों से हर साहित्यकार जूझ रहा है। अंतर्विरोध आदमी को आगे बढ़ाता है। हिंदी समाज बहुत देर तक कुछ चीजों पर गौर नहीं कर सका। आपने गजल की बात कही। कॉलेज के दिनों में शुरू में मैं जब लिखता था, तब केवल ‘सारिका’ पत्रिका में गजल छपती थी। हम इंतजार करते थे। बड़े-बड़े सेमिनारों में लेखकों ने कहा कि गजल उर्दू से आई है और यह हिंदी समाज में खप नहीं सकती। बाद में मैंने विनम्रता से लोगों से बात की। कहा कि गजल उर्दू से आई है, जो हमारी अपनी भाषा है। लेकिन इस तरह देखें तो उपन्यास भी हिंदी का नहीं है। लघुकथा यूरोप से आई है। निबंध भी हमारी विधा नहीं है। अब पांच दशक के बाद साहित्यिक समाज को यह समझ में आया कि विधाएं भाषा की नहीं होतीं, साहित्य की होती हैं। हाइकू जापानी की नहीं, हमारी भी है। अखबारों में रिपोर्ताज छपते हैं। रिपोर्टिंग यूरोप से आई है। तो आज हालत यह है कि गजल एक प्रमुख विधा है। चौबीस भाषाओं में गजलें लिखी जा रही हैं। हम विचार की बड़ी प्रक्रिया वाली कविता को कोट नहीं करते। आज भी मीर और गालिब को ही कोट करते हैं। दरअसल, कविता अपनी ऊंचाई में मुहावरों में तब्दील हो जाती है। जो नहीं होतीं, वे कालजयी नहीं होतीं। विधाओं के मामले में दायरा टूट रहा है।

पारुल शर्मा: साहित्य अकादेमी अपने यहां प्रकाशित साहित्य को तो इलेक्ट्रॉनिक स्वरूप में ला रही है, लेकिन बाकी इस माध्यम में जो साहित्य आ रहे हैं और लोग इंटरनेट के अलग-अलग मंचों पर लिख रहे हैं, उसे साहित्य अकादेमी कितनी मान्यता देगी?
’अभी ये चीजें शुरुआती चरण में हैं। बहुत सारी चीजें लिखी जा रही हैं। अभी उनकी शक्ल निखर कर नहीं आई है। तो अभी उसकी शिनाख्त कर पाना और उसे मान्यता दे पाना सबके लिए कठिन है। अभी ये चीजें परिपक्वता की ओर बढ़ रही हैं। दूसरी बात है कि करोड़ों की संख्या में लोग लिख रहे हैं। कुछ समय बाद जब इसमें ठहराव आएगा, तब अच्छी चीजें सामने आएंगी। लेकिन ई-पब्लिकेशन का दायरा बढ़ा है। अब किताबें ज्यादा पढ़ी जा रही हैं। नई पीढ़ी के लेखक हमसे ज्यादा सूचनाओं और संवेदनाओं से लैस है।

सुशील राघव: कुछ मीडिया घराने बेस्टसेलर किताबों की
सूची जारी करते हैं। आप उसे कैसे देखते हैं?
’दो चीजें हैं- बिकाऊ और टिकाऊ। सिर्फ टिकाऊ बचेगा, इसमें कोई दो राय नहीं है। मेरे पिता स्कूल शिक्षक थे। एक बार चंडीगढ़ आए। मैंने उन्हें एक सेमिनार में चलने को कहा। बाद में उन्होंने कहा कि सेमिनार में कई लेखक कह रहे थे कि कुछ कालजयी नहीं रचा जा रहा है, पर किसी ने कालजयी साहित्य का लक्षण नहीं बताया। उन्होंने कहा कि मैं मानता हूं कि लेखक की मौत के साथ अगर उसकी किताबें मर गर्इं तो उसका लेखन कुछ नहीं है। लेकिन लेखक के मौत के दिन अगर उसकी किताबें जीवित हो गर्इं, तो वह कालजयी है। फिर भी बेस्टसेलर की सूचियां जारी होने ने पुस्तकों से विमुखता को तोड़ने में थोड़ी भूमिका निभाई है।

पारुल शर्मा: साहित्य समारोहों का जो दौर चला है, उसके बारे में आपका क्या खयाल है। आप इसे कितना जरूरी समझते हैं?
’जयपुर से शुरू होकर साहित्य समारोह अब देश के बड़े हिस्से में और हर भाषा में होने लगे हैं। अगर उसके बाजार को एक तरफ रखें तो इन समारोहों ने जो बड़ा काम किया है वह लेखक को सेलेब्रिटी बना देना है। दो तरीके का लेखन होता है- एक टिकाऊ और एक बिकाऊ। साहित्य समारोहों में आमतौर पर बिकाऊ नजर आते हैं, लेकिन उसके केंद्र में भी पुस्तक है। इस तरह पुस्तक लोगों के बीच गई है। लेखक का सम्मान बढ़ा है। अब साहित्य समारोहों में काफी भीड़ होती है। स्कूलों में भी ये होने लगे हैं और लोग लेखकों को बुलाने लगे हैं। एक ऐसा वक्त भी गुजरा है, जब किताबें उपलब्ध नहीं थीं। जब कंप्यूटरीकरण हुआ था, तो सबसे ज्यादा दुखी लेखक ही हुए थे कि शब्द पर संकट है, लेकिन हमें ऐसा कहीं नजर नहीं आया। आज कंप्यूटर पर सैकड़ों वेबसाइटों पर पूरा का पूरा साहित्य मिलेगा। अब इसके माध्यम से किताबें बिक रही हैं। पुस्तकों की उपलब्धता आज आपके घर में है।

मृणाल वल्लरी : भारत में हम जहां कालजयी और टिकाऊ की बात करते हैं। बड़े कवि केदारनाथ सिंह का निधन होता है। कोई और देश होता तो शायद राष्ट्रीय शोक होता। लेकिन हम हिंदी में लिखने-पढ़ने वालों को छोड़ कर इसकी जरूरत किसी को महसूस नहीं हुई। इस सच के सामने हम विरोधाभासों को कैसे देखेंगे?
’आपके सवाल में दो चीजें हैं- साहित्य और सत्ता का अंतर्संबंध। साहित्य का संबंध सत्ता से ठीक नहीं रहा है, न रह सकता है। साहित्यकार को अपेक्षा भी नहीं करनी चाहिए। जो साहित्यकार होगा, वह सोच कर आएगा कि हमें आम लोगों की बात करनी है। जो आम आदमी का साहित्यकार होगा, वह कभी सत्ता-प्रतिष्ठान से नहीं जुड़ सकता। केदारनाथ सिंह जिस दिन गए, उस दिन किसी भी अच्छे साहित्यकार के घर में खाना जरूर बना होगा, लेकिन उनकी कविताएं रात भर गूंजती रही होंगी। वे सारी भाषाओं के साहित्यकार थे। उनकी किताबें सभी भाषाओं में छपी थीं। यों साहित्य की अपनी भी एक सत्ता है, जो काफी मजबूत है। आपको मीरा, तुलसी, कबीर याद है, लेकिन उनके जमाने के शासक याद नहीं होंगे। जब सत्ता के संबंध मधुर हो जाते हैं तो मुझे लगता है कि साहित्य का क्षरण हो जाता है।

माधव कौशिक
हरियाणा के भिवानी में जन्मे माधव कौशिक कविता, गीत, गजल, कहानी, आलोचना व बाल साहित्य से लेकर अनुवाद तक की विधाओं में मजबूत दखल रखते हैं, इसलिए विधाओं को भाषा नहीं, साहित्य का मामला मानते हैं। ‘आईनों के शहर में’, ‘किरण सुबह की’, ‘सपने खुली निगाहों के’, ‘हाथ सलामत रहने दो’, ‘आसमान सपनों का’, ‘नई सदी का सन्नाटा’, ‘सूरज के उगने तक’, ‘अंगारों पर नंगे पांव’, ‘खूबसूरत है आज भी दुनिया’, ‘सारे सपने बागी हैं’ जैसे इनके गजल संग्रह इन्हें गजल की नई धारा के कद्दावर शायरों में शुमार करते हैं। वे कहते हैं कि मैं साहित्य में इश्तिहारबाजी में यकीन नहीं रखता और घर पर बैठ कर पढ़ना-लिखना पसंद करता हूं। कौशिक चंडीगढ़ साहित्य अकादमी के अध्यक्ष और साहित्य अकादेमी के उपाध्यक्ष हैं।

प्रस्तुति : अरविंद शेष / मृणाल वल्लरी

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