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हार की जिम्मेदारी सामूहिक होती है

हरियाणा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अशोक तंवर का कहना है कि कांग्रेस को अपनी एक सौ चौंतीस साल की विरासत के साथ अपने संघर्ष को बचाना है। इस बार लोकसभा चुनाव में हरियाणा में कांग्रेस एक भी सीट नहीं जीत पाई। इसे लेकर प्रदेश कांग्रेस में हाहाकार है। हार का ठीकरा तंवर के सिर फोड़ते हुए उनसे इस्तीफे तक की मांग की गई, पर उन्होंने कहा कि बेशक मुझे गोली मार दो, पर मैं इस्तीफा नहीं दूंगा। इन तमाम मुद्दों को लेकर हुई बातचीत में उन्होंने कहा कि यह हमारे लिए एक सबक भी है और चुनौती भी कि हम अपनी कमियों को स्वीकार करें और भाजपा से मुठभेड़ के लिए तैयार हो जाएं। उन्होंने कहा कि कांग्रेस मेहनत करेगी और उठ खड़ी होगी। बातचीत कार्यक्रम का संचालन किया कार्यकारी संपादक मुकेश भारद्वाज ने।

Author Published on: June 9, 2019 2:45 AM
बारादरी की बैठक में अशोक तंवर। सभी फोटो : आरुष चोपड़ा

अजय पांडेय : आज हरियाणा में सीधी लड़Þाई भाजपा और कांग्रेस के बीच है, बाकी दल किनारे हो चुके हैं। इसके बावजूद कांग्रेस चुनाव में कैसे पिछड़ गई?

अशोक तंवर : यह बात बिल्कुल ठीक है कि सीधी लड़ाई है। पहले हरियाणा की राजनीति चंद घरानों के बीच घूमती थी, पर पिछले कुछ वर्षों में उसमें एक बड़ा बदलाव आया है। हालांकि जबसे हरियाणा बना है, तबसे इनेलोद बी टीम की तरह ही काम करती रही है। कभी भाजपा की बी टीम, कभी किसी और की। पिछले चुनाव में लोकसभा की दो सीटें मिली थीं, उन्नीस सीटें विधानसभा में मिलीं और उन्हें विपक्ष की भूमिका मिली। मगर वे विपक्ष की भूमिका नहीं निभा पाए और फिर धीरे-धीरे जिस तरह से परिवार में कलह हुई उसका नतीजा यह हुआ कि वह पार्टी टूटी। जहां तक वोट प्रतिशत की बात है, तो उनको बहुत कम वोट प्रतिशत मिला है। वह वोट भाजपा को मिला। हालांकि हमारा वोट प्रतिशत बढ़ा है। पूरे हरियाणा में हमें छह प्रतिशत वोट मिले। मगर सच्चाई यह है कि हम हारे हैं। उसके बावजूद लोग कहते हैं कि वे मुद्दे अलग थे। वोट लोगों ने मोदी जी के नाम पर दिए। लोग कहते हैं कि पहले सांसद प्रधानमंत्री को चुनते थे, इस बार प्रधानमंत्री के चेहरे पर लोगों ने सांसदों को चुना। यह उनकी रणनीति थी, जो कामयाब हुई। मगर मुझे पूरा यकीन है कि हरियाणा में अभी से उनका विरोध शुरू हो गया है और आने वाले समय में कांग्रेस को हर वर्ग का सहयोग और समर्थन मिलने वाला है। और इस लोकसभा चुनाव में जो वोट भाजपा की तरफ गया है, चाहे वह इनेलोद का हो, जेजेपी का हो या दूसरी पार्टियों का, उसे कांग्रेस अपने पक्ष में लाने में कामयाब होगी।

पंकज रोहिला : तीन महीने का समय बहुत कम है। ऐसे में कांग्रेस की क्या रणनीति होगी कि वह हरियाणा में जनाधार अपने पक्ष में कर ले?
’तीन महीने तो बहुत ज्यादा समय है। जब नतीजे आ रहे थे तभी तीन-चार दिन पहले लोगों ने कहना शुरू कर दिया था कि लोकसभा का मामला अलग था और विधानसभा का मामला अलग है। अभी कर्मचारियों के आंदोलन शुरू हो गए हैं। कई जिलों में किसान धरने पर बैठे हैं। वे अपनी फसल के मूल्य को लेकर भी बैठे हैं, कहीं भूमि अधिग्रहण को लेकर भी बैठे हैं। जो कीमत यूपीए सरकार ने तय की थी, वह उन्हें नहीं मिल रही। तो, कई मुद्दे हैं। युवाओं की बेरोजगारी का मामला है। तो, धीरे-धीरे जब चीजें खुलेंगी, तो मैं समझता हूं कि परिस्थिति बदलेगी। पहले भी अनेक उदाहरण रहे हैं कि लोकसभा और विधानसभा के नतीजे भिन्न रहे हैं। जहां दोनों के चुनाव साथ होते हैं, वहां भी नतीजे भिन्न आए हैं। यहां तो तीन-चार महीने का समय है। तो, मैं समझता हूं कि कांग्रेस के भीतर जो हमारी कमियां हैं, उन्हें भी हम दूर करें और लोगों के बीच एकजुट होकर मजबूती से जाएं, तो निश्चित रूप से परिणाम बहुत आश्चर्यजनक होंगे। हरियाणा में चमत्कार होगा।

मृणाल वल्लरी : भाजपा का काम बूथ के स्तर पर दिखा, बहुत सूक्ष्म स्तर पर उसने प्रबंधन किया। इसके बरक्स कांग्रेस में जमीनी पकड़ नहीं दिखी। अब कांग्रेस की सूक्ष्म स्तर पर क्या रणनीति होगी?
’हम सूक्ष्म स्तर पर काम कर रहे हैं। हमारे जो साथी चुनाव लड़ रहे थे और जो हमारे साथी कार्यकर्ता हैं, उन्होंने भी बूथ स्तर पर काफी मेहनत की। ऐसा नहीं कि भाजपा का बूथ बहुत मजबूत था। कई जगहों पर उनके बूथ एजंट भी नहीं थे। हां, यह जरूर है कि भाजपा को सरकारी मशीनरी का बहुत अच्छी तरह दुरुपयोग करने आता है। अंतिम समय तक, मतदान के दिन तक, लोगों के खाते में सरकारी योजनाओं के पैसे गए। हमारे यहां एक जिले के अंदर साढ़े तीन सौ करोड़ रुपए बांटने का काम किया। इसी तरह सरपंचों को प्रलोभन देने का काम किया। कांग्रेस न तो इस तरीके से कभी करती है और न कभी किया कि सरकारी तंत्र का उपयोग इस पैमाने पर करे। तो, यह हमारे लिए एक सबक भी है और चुनौती भी है कि हम अपनी कमियों को स्वीकार करें और भाजपा से मुठभेड़ के लिए तैयार करें।

दीपक रस्तोगी : कांग्रेस ने अनुभवी नेताओं के साथ युवा नेताओं का तालमेल बिठाने की रणनीति बनाई थी। लोकसभा चुनाव में वह तालमेल कैसे गड़बड़ हुआ कि दोनों के बीच मतभेद उभरने शुरू हो गए?
’मैं समझता हूं कि कांग्रेस के शीर्ष से लेकर बूथ स्तर तक के नेताओं को सबसे पहले अपना अहं त्यागना पड़ेगा। कांग्रेस सबसे पुरानी पार्टी है। तो कई बार हम अपने पद और कद को लेकर अहं पाल लेते हैं, जबकि आज कद और पद की लड़ाई नहीं, देश, प्रदेश और कांग्रेस को बचाने की लड़ाई है। किसान, मजदूर, छोटे व्यापारी, बेरोजगार नौजवान, माताएं-बहनें, जो हमारी तरफ देखते हैं कि कांग्रेस पार्टी हमें बचा सकती है, हमारी मदद कर सकती है, उनके बारे में हमें सोचना चाहिए। इसलिए हमने कहा कि अगले चार महीने कांग्रेस को बचाने की हमारी लड़ाई होगी।

मुकेश भारद्वाज : कांग्रेस के लिए यह मंथन का दौर है। मगर हरियाणा में एक-दूसरे पर आरोप लगाए जा रहे हैं। इस अंदरूनी झगड़े ने आप लोगों की हार में कितनी भूमिका निभाई है?
’हार-जीत तो सामूहिक होती है। न तो कोई एक व्यक्ति जिता सकता है और न हरा सकता है। इसमें बहुत से बाहरी कारण होते हैं, जो आपके हाथ में नहीं होते। इस चुनाव में ऐसी कई बाहरी शक्तियां थीं, जिन्होंने प्रतिकूल प्रभाव डाला। जो हमारे हाथ में है, उसका हम अपने तरीके से सही इस्तेमाल करें। आरोप-प्रत्यारोप से काम नहीं चलेगा। हमें देखना है कि कैसे हम एक-दूसरे का पूरक बन कर काम करें। हम अलग-अलग जगहों से चुनाव लड़े इसलिए हम जो एक-दूसरे का सहयोग कर सकते थे वह नहीं कर पाए, शायद यह भी एक कारण रहा। जबकि भाजपा के सारे नेता एक-दूसरे की मदद कर पाए। तो अब हमें लोकसभा चुनाव में जो कमियां रहीं उनका विश्लेषण करते हुए उन्हें दूर करने का प्रयास करना चाहिए। अब तो जो धुंधलका था, वह भी काफी हद तक छंट गया है। अंदरूनी कारणों की जांच हमें करनी पड़ेगी।

अजय पांडेय : राहुल गांधी ने लोकसभा चुनाव में हार की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए पद छोड़ने की घोषणा कर दी थी। अब क्या लगता है कि वे विधानसभा चुनावों में सभी को एकजुट कर पाने में सक्षम होंगे?
’पूरे देश से आवाज उठ रही है कि राहुल जी ही एकमात्र विकल्प हैं। वही कांग्रेस को आगे लेकर जा सकते हैं। यह तो सबको पता है कि पिछले पांच साल तक किसी ने सड़कों पर उतर कर किसी ने मजबूती से आवाज उठाई तो वे राहुल गांधी हैं। आज निश्चित रूप से परिणाम हमारे लिए निराशाजनक रहे हैं, पर आज भी प्रेरक शक्ति हमारे लिए वही हैं। उनके नेतृत्व में संगठन आज भी सुरक्षित है, ऐसा हम मानते हैं। उनकी सादगी, समर्पण, संघर्ष और उनकी समझ, सारी चीजों को आज देख रहे हैं। मुझे पूरा यकीन है कि एक समय आएगा कि जब देश यह कहेगा कि हमने 2014 में उनको क्यों नहीं चुना। 2019 में क्यों नहीं चुना और जब चुना तब देश काफी पीछे चला गया था। उन्होंने जिम्मेदारी ली, यह उनका बड़प्पन है। मगर जिम्मेदार वे अकेले नहीं हैं, जिम्मेदार हम जैसे सभी लोग हैं, जिनके ऊपर जिम्मेदारी थी। इसलिए हमें सामूहिक जिम्मेदारी लेनी चाहिए।

सूर्यनाथ सिंह : कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं पर आरोप है कि वे जमीनी स्तर पर संजीदगी से नहीं उतरते, जिसके चलते नीचे के कार्यकर्ताओं पर बुरा असर पड़ता है। जबकि भाजपा ने बहुत आक्रामक तरीके से प्रचार अभियान चलाया। इस तरह उसे कहां तक टक्कर दे पाएंगे?
’देश में सब जगह कांग्रेस का मत प्रतिशत बढ़ा है। हां, कमियां अभी हैं और उन्हीं कमियों को चिह्नित करके हमें बारीकी से काम करना पड़ेगा। अब वह समय गया, जब कांग्रेस का एकछत्र राज्य हुआ करता था और हम काम करें, न करें वोट हमें मिलता था। अब हमें अपने को नए ढांचे में ढालना पड़ेगा। संगठन की अलग-अलग स्तर पर ओवरहालिंग करनी पड़ेगी।

मुकेश भारद्वाज : राहुल गांधी ने कुछ नेताओं का नाम लेकर कहा कि वे पुत्रमोह में पड़े रहे। क्या आपको लगता है कि आपके नेता परिवार को ऊपर रख रहे हैं, इसलिए पार्टी को नुकसान हो रहा है?
’मैं समझता हूं कि कई ऐसे चुनाव क्षेत्र हैं, जहां एक ही परिवार के लोगों को लंबे समय से मौका मिलता रहा है। आजादी के बाद से अब तक उन पर एक ही घराने का वर्चस्व है। तो कहीं न कहीं हमें सोचना पड़ेगा कि चुनाव क्षेत्रों में रोटेशन प्रणाली लागू की जाए। नए लोगों को मौका दिया जाए। हरियाणा चुनाव में हम यह प्रयोग करेंगे। हमें पुत्रमोह और बार-बार हारने वालों पर दांव लगाने के चक्र से बाहर निकलना होगा।

आर्येंद्र उपाध्याय : इस चुनाव में ईवीएम पर भी सवाल उठाए गए हैं। आप इसे किस तरह देखते हैं?
’ईवीएम पर बहुत पहले से शंकाएं जाहिर की जा रही हैं। बहुत से लोग कहते रहे हैं कि वर्तमान सत्ता पक्ष ईवीएम में गड़बड़ी करता रहा है। फिर जिन देशों ने ईवीएम ईजाद किया, उन्होंने जब उसका इस्तेमाल बंद कर दिया, तो हमें क्यों उससे चिपके रहना चाहिए। इन्हीं बातों को लेकर सारे विपक्षी दल बार-बार निर्वाचन आयोग में गए, सर्वोच्च न्यायालय में गए। कहीं-कहीं कुछ गड़बड़ हो सकती है, जैसे किसी बूथ पर हमें तीन-चार सौ वोटों से जीतना चाहिए था, वहां हम तीन-चार सौ वोटों से हार गए। तो, जहां इतनी नजदकी लड़ाई है, वहां तो गड़बड़ी की बात समझी जा सकती है, पर जहां हजारों वोट का अंतर है, उसे हम प्रमाणित नहीं कर सकते। इसलिए हम यह नहीं कह सकते कि पूरे देश के स्तर पर वे मशीनों को बदल देते हैं। पर कहीं न कहीं कुछ तो गड़बड़ है। इन शंकाओं को दूर करना निर्वाचन आयोग की जिम्मेदारी है और यह लोकतंत्र के हित में भी है।

मृणाल वल्लरी : आज का समय छवि की राजनीति का है। इस बार दो चेहरों को सामने रख कर चुनाव लड़े गए, उसमें राहुल गांधी को लोगों ने खारिज कर दिया। अगले चुनाव में आप किस तरह से इस छवि को तोड़ेंगे?
’दरअसल, राहुल जी की एक छवि बना दी गई है। जो उनकी असली कार्यशैली है, जिस तरीके से वे सोचते हैं, जिस तरह वे देश को सशक्त करना चाहते हैं, उन सबके बारे में लोगों को बताना पड़ेगा। कहीं न कहीं कांग्रेस से इस मामले में चूक हुई है। जब वह छवि बदलेगी, तो लोग निश्चित रूप से कांग्रेस के साथ खड़े होंगे। उसकी शुरुआत हम हरियाणा चुनाव से करने जा रहे हैं।

अजय पांडेय : कहा जाता है कि हरियाणा की राजनीति जाट और गैर-जाट में बंट गई है। इस विभाजन को आप कैसे दूर करेंगे?
’कांग्रेस ने कभी धर्म और जाति के नाम पर लोगों को बांटने का काम नहीं किया। यह भाजपा करती रही है। मैं सभी हरियाणा वासियों से अनुरोध करूंगा कि हमें इस लड़ाई को इन सब चीजों से ऊपर उठ कर देखना चाहिए।

दीपक रस्तोगी : आप भूपिंदर सिंह हुड्डा के लिए कुछ कहना चाहेंगे?
’मैं तो कांग्रेस के सभी नेताओं से कहना चाहूंगा कि वे अपने अहं को त्यागें और प्रदेश को बचाने का काम करें, पार्टी को बचाने का काम करें। अगर हम लोग मिल कर आज से मन बना लें कि कांग्रेस को लेकर आना है, तो मुझे नहीं लगता कि कोई ऐसी ताकत है, जो कांग्रेस को बहुमत लाने से रोक सके।

पंकज रोहिला : किसानों को लेकर आपके पास क्या योजनाएं हैं?
’योजना तो फिलहाल यही है कि किसानों के लिए जो वादे वर्तमान सरकार ने किए थे, वे पूरे नहीं हुए। फिर जब हम चार्जशीट दाखिल करेंगे, तो उसमें वे सारे मुद्दे डालेंगे, कि किसानों को लेकर केंद्र की सरकार ने क्या वादे किए, राज्य की सरकार ने क्या वादे किए। उन पर कितना काम हुआ, उसका फायदा किसान तक पहुंचा कि नहीं पहुंचा। इन्होंने ‘भावांतर’ की घोषणा तो कर दी, पर वास्तव में किसान को उसका लाभ नहीं मिला। ये सारी चीजें लेकर हम लोगों के पास जाएंगे।

आर्येंद्र उपाध्याय : हरियाणा के मौजूदा मुख्यमंत्री के कामकाज को आप दस में से कितने नंबर देंगे? आपको क्यों लगता है कि वे दुबारा सत्ता में नहीं आएंगे?
’मैं तो उनके कामकाज को ऋणात्मक अंक दूंगा। वे चार साल तो यही कहते रहे कि मेरे पास अनुभव नहीं है। जब जाट आरक्षण का आंदोलन हुआ, तो वे मुख्यमंत्री आवास में चद्दर डाल कर सो गए। पर मैं यह भी मानता हूं कि नगरपालिकाओं के जो चुनाव हुए वहां से कांग्रेस स्थिति को बदल सकती थी, पर हम नाकाम रहे। हमारी गलती थी कि हमारे लोग चुनाव निशान पर चुनाव नहीं लड़े। पर प्रदेश में जिस तरह से वहां की सरकार ने भ्रष्ट लोगों को संरक्षण दिया है उससे लोग उसके खिलाफ हो गए हैं। इसलिए वहां खट्टर सरकार का जाना तय है।

अशोक तंवर: डॉक्टर अशोक तंवर का जन्म 12 फरवरी, 1976 को दिल्ली में हुआ। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से एमए, एमफिल और पीएचडी की। जेएनयू में ही कांग्रेस की छात्र इकाई एनएसयूआइ से जुड़े और 2003 में छात्र संघ के अध्यक्ष बने। एनएसयूआइ में युवा नेता के तौर पर इनका कार्यकाल उल्लेखनीय रहा। छात्र संगठन को अनुशासित कर ज्यादा से ज्यादा छात्रों के बीच पहुंचाने का काम किया। 2009 में कांग्रेस ने जब इन्हें सिरसा से टिकट दिया, तो इनके पास चुनावी तैयारी के लिए एक महीने से भी कम वक्त था, लेकिन इन्होंने इनेलोद के प्रतिद्वंद्वी सीताराम को पैंतीस हजार से ज्यादा वोटों से हराया। ताजा लोकसभा चुनावों में हरियाणा में कांग्रेस की हार के बाद प्रदेश कांग्रेस प्रमुख के तौर पर सवालों के घेरे में हैं। हरियाणा आसन्न विधानसभा चुनाव भी इनके लिए बड़ी चुनौती है।

बारादरी की बैठक में अशोक तंवर। सभी फोटो : आरुष चोपड़ा

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