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कांग्रेस की जमीन आज भी, जिंदा करने की जरूरत

कांग्रेस नेता तारिक अनवर का दावा है कि इस बार के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस का प्रदर्शन अच्छा रहेगा। उन्होंने कहा कि पिछली बार भाजपा को इकतीस फीसद वोट मिले थे। अगर बाकी के उनहत्तर फीसद को एकजुट करने में विपक्ष और कांग्रेस पार्टी संजीदगी दिखाएगी, तो उसका फायदा इस चुनाव में मिलेगा और एक मिलीजुली सरकार बनने की संभावना है। बातचीत कार्यक्रम का संचालन किया कार्यकारी संपादक मुकेश भारद्वाज ने।

बारादरी की बैठक में तारिक अनवर सभी फोटो : आरुष चोपड़ा

मनोज मिश्र : आधा से अधिक चुनाव बीत चुका है। कांग्रेस के बारे में आपका क्या आकलन है?

तारिक अनवर : हम लोगों के पास जो रिपोर्ट आ रही है, हो सकता है उनमें कुछ बातें सही न हों, पर अभी तक का आकलन यही है कि कांग्रेस और पूरे विपक्ष का प्रदर्शन इस बार बेहतर होगा। बहुत जगहों पर गठबंधन की शक्ल बनी है। पिछले चुनाव में जो कमी थी, वह इस चुनाव में ठीक हुई है, हालांकि उसे और मजबूत किया जा सकता था, पर वह नहीं हो पाया। इसका जो भी कारण रहा हो, पर हम मान कर चल रहे हैं कि इस बार भाजपा को नुकसान होगा। पिछली बार इकतीस फीसद वोट उसे मिला था। उनहत्तर फीसद वोट नहीं मिला, फिर भी उनको पूर्ण बहुमत मिला। अगर इस उनहत्तर फीसद को एकजुट करने में विपक्ष और कांग्रेस पार्टी संजीदगी दिखाएगी, तो उसका फायदा इस चुनाव में हमें मिलना चाहिए। एक मिलीजुली सरकार बनने की संभावना है।

दीपक रस्तोगी : उत्तर प्रदेश में कांग्रेस अपना आधार तलाशने निकली है। पर अभी तक के अनुभवों से यही पता चलता है कि जहां भी तीसरी शक्ति पैदा हुई है, वहां कांग्रेस की जगह छिन गई है। अभी आप लोगों ने उसे हासिल करने की क्या रणनीति बनाई है?
’मैं इस बात को स्वीकार करता हूं कि अभी उसे हासिल करना मुश्किल है। यह सही है कि पहले जो कांग्रेस का वोट बैंक हुआ करता था, वह काफी हद तक क्षेत्रीय पार्टियों के पास चला गया है। उसकी वापसी में थोड़ा वक्त लगेगा। पर यह भी सही है कि जिस तरह राहुल गांधी जी ने अभियान छेड़ा है, उसका इस चुनाव में असर दिखेगा। शायद उतना तो नहीं, पर इसका आने वाले दिनों में काफी असर पड़ेगा। देखिए, कांग्रेस के सामने ऐसा दौर कई बार आया है। 1967 में एक ऐसा दौर था, जब कोई भी कांग्रेस का नाम नहीं लेना चाहता था। फिर 1977 में ऐसा दौर आया। लोग सोच भी नहीं सकते थे कि देश का प्रधानमंत्री भी चुनाव हार सकता है। पर इंदिरा जी चुनाव हार गई थीं। फिर 1989 भी हमने देखा। इस तरह हर दस साल बाद कांग्रेस को ऐसा समय देखना पड़ा है। पर फिर वह उठी है। इसलिए हम लोग मान कर चल रहे हैं कि कांग्रेस की जो जमीन है, वह अपनी जगह पर आज भी है। उसे एक प्रकार से जीवित करने की जरूरत है। मेरा मानना है कि आज देश में जिस तरह के हालात हैं, उसमें कांग्रेस ही एकमात्र विकल्प है, जो लोगों को फिर से जोड़ सकती है।

पंकज रोहिला : भाजपा गठबंधन किन मामलों में आपसे कमजोर लग रहा है?
’लोगों की भावनाओं को उभारना बहुत असान होता है, खासकर धार्मिक भावनाओं को। भाजपा के पास धार्मिक भावनाओं को उभारने के अलावा कोई दूसरा तरीका नहीं है। वे शुरू करते हैं विकास से, राष्ट्रवाद से पर अंत में वहीं चले जाते हैं, जो उनकी बुनियाद है, एक तरह से उनकी विचारधारा है। वे इस बात को मान कर चल रहे हैं कि जब तक हम समाज को बांटेंगे नहीं, तब तक कामयाब नहीं हो सकते। और वे उस काम में लगे हुए हैं। इसमें उन्हें कामयाबी भी मिली। हर चुनाव के मौके पर वे राम मंदिर की बात करते हैं। मैं समझता हूं कि राजनीतिक दलों का काम देश के सामने बुनियादी समस्याओं को दूर करने की दिशा में बढ़ने का होना चाहिए, न कि मंदिर, मस्जिद और गुरद्वारा बनाने का। यह काम तो हमारे धार्मिक गुरुओं, संतों का है। मगर भाजपा हर चुनाव में इस मुद्दे को उठाती है, ताकि वह लोगों की भावनाओं से खेल सके। मगर वे हम पर आरोप लगाते हैं कि हम अल्पसंख्यक की राजनीति करते हैं। एक बात समझने की है कि अल्पसंख्यक की राजनीति करके किसी को फायदा कैसे होगा, उसे तो नुकसान होगा। फायदा तो उसे होगा, जो बहुसंख्यक को अपने साथ लेकर चल रहा है। इस तरह वोट बैंक की राजनीति तो वे कर रहे हैं। इस तरह की बातें करके वे लोगों को गुमराह करने में किसी हद तक कामयाब भी हो जाते रहे हैं। पर इस बार उन्हें जो पांच साल काम करने का मौका मिला, उसमें लोगों के सामने उनका चेहरा भी आ गया। लोग अब समझ रहे हैं कि भाजपा के पास देश को देने के लिए कोई ठोस कार्यक्रम नहीं है।

आर्येंद्र उपाध्याय : कांग्रेस विपक्ष के एक मजबूत विकल्प के रूप में क्यों नहीं उभर पाई?
’कांग्रेस ने कभी खुल कर जाति की राजनीति नहीं की, कभी सोशल इंजीनीयरिंग नहीं कर पाई। इस तरह क्षेत्रीय पार्टियां इस मामले में कामयाब हुर्इं। हर राजनीतिक दल किसी न किसी जाति पर निर्भर है या किसी न किसी जाति का प्रतिनिधित्व कर रहा है। कांग्रेस के साथ ऐसा नहीं है। कांग्रेस का मानना है कि हम सबका प्रतिनिधित्व करते हैं। सबको लेकर चलेंगे। क्षेत्रीय दलों ने कांग्रेस की इस कमजोरी का फायदा उठाया। मगर हमारा मानना है कि यह राष्ट्र के हित में कतई नहीं है। हमारा कर्तव्य है कि समाज के तमाम वर्गों को हम जोड़ें और सबको हिस्सेदारी मिले। प्रधानमंत्री सबका साथ सबका विकास का नारा देते हैं, पर जमीनी हकीकत इसके उलट है। समाज के एक समूह को आज अहसास दिलाने की कोशिश हो रही है कि वह समाज की मुख्यधारा में नहीं है। यह बहुत खतरनाक बात है कि समाज के एक तबके को देश की राजनीति से अलग कर दें, उसकी हिस्सेदारी खत्म कर दें।

सूर्यनाथ सिंह : इस बार का चुनाव दो चेहरों को सामने रख कर लड़ा जा रहा है। प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी के सामने राहुल गांधी के चेहरे को कितना मजबूत मानते हैं?
’यह सवाल 2004 में भी उठा था। तब अटल बिहारी वाजपेयी का चेहरा किसी से भी कहीं बड़ा था। लोग वाजपेयी जी का सम्मान करते थे। उनका व्यक्तित्व मोदी जी की तुलना में कहीं बहुत ऊंचा था। तब कांग्रेस के पास कोई बड़ा विकल्प नहीं था, पर देश ने विकल्प बनाया। यहां तो विकल्प है। राहुल गांधी ने अध्यक्ष बनने के बाद यह साबित किया कि उनके अंदर नेतृत्व देने की क्षमता है। तीन राज्यों में जहां भाजपा की सशक्त पकड़ थी, वहां वे अपनी पार्टी को वापस ले आए। मैं इस बात को पूरी तरह नकारता हूं कि राहुल गांधी के व्यक्तित्व में किसी तरह की कोई कमी है।

अजय पांडेय : प्रियंका गांधी के वाराणसी से चुनाव लड़ने की बात थी। मगर ऐसा क्या हुआ कि अंतिम क्षणों में उन्हें वहां से चुनाव नहीं लड़ाया गया?
’राहुल जी ने कभी यह नहीं कहा था कि प्रियंका जी चुनाव लड़ेंगी। उन्होंने कहा था कि यह अभी तय नहीं है। प्रियंका जी ने जरूर कहा था कि अगर कांग्रेस पार्टी चाहेगी, कांग्रेस अध्यक्ष चाहेंगे, तो मैं चुनाव जरूर लडूंगी। प्रधानमंत्री के खिलाफ चुनाव लड़ने का फैसला करने से पहले काफी तैयारी करनी पड़ती है। इसलिए मेरा मानना है कि वाराणसी से उन्हें चुनाव न लड़ाने का फैसला सही है। प्रियंका जी को वहां उतारना उचित नहीं था। हां, यह जरूर है कि अगर वे चुनाव लड़तींं तो वहां ते नतीजे चौंकाने वाले भी हो सकते थे।

मृणाल वल्लरी : यह तो 2014 के परिणाम के बाद तय था कि 2019 में चुनाव होंगे। फिर प्रियंका गांधी को अंत में लाने और तैयारी होने की बात क्यों? पिछली बार अरविंद केजरीवाल नरेंद्र मोदी के खिलाफ चुनाव लड़े थे। इस बार कोई भी उनके खिलाफ मजबूत उम्मीदवार नहीं है। क्या यह विपक्ष का भाजपा के सामने समर्पण नहीं है?
’यहां फिर मैं 1977 का उदाहरण देना चाहूंगा। इंदिरा जी के खिलाफ जब राजनारायण जी चुनाव लड़े थे, तब भी लोगों ने यही कहा था कि भाई, इंदिरा जी के सामने राजनारायण की क्या हैसियत है? पर उनको लोगों ने जिता दिया। तो, हमारे देश की जनता में राजनीतिक सूझ-बूझ की कमी नहीं है। वह बहुत सोच-समझ कर फैसला करती है और सही समय पर करती है।

मुकेश भारद्वाज : 1977 से अब तक बहुत कुछ बदल चुका है। प्रधानमंत्री के खिलाफ पहले से खड़े निर्दलीय उम्मीदवार तेज बहादुर को समर्थन देना और कोई मजबूत प्रत्याशी न उतार पाना क्या विपक्ष की हताशा जाहिर नहीं करता है?
’यह सही बात है कि वहां विपक्ष को इस बात पर गंभीरता से विचार करना चाहिए था। इसमें कमी रही है। अगर हम कोई मजबूत प्रत्याशी उतारते, तो उसका असर होता। मैं इस बात से सहमत हूं कि प्रधानमंत्री के खिलाफ चुनाव लड़ने के लिए एक रणनीति बननी चाहिए थी। सभी विपक्षियों को उस पर एकजुट होना चाहिए था और एक साझा प्रत्याशी उतारना चाहिए था।

मनोज मिश्र : बिहार में गठबंधन को लेकर सवाल उठ रहे हैं कि वहां कांग्रेस को कम तवज्जो मिली।
’कांग्रेस एक राष्ट्रीय पार्टी है। वहां हमें अपेक्षा अधिक की थी। पिछली बार बारह जगह से वह लड़ी थी और एक सीट पर एनसीपी से मैं लड़ा था। एक तरह से तेरह सीट पर हमें जगह मिली थी। मगर इस बार राजद का तर्क था कि नए लोगों को जोड़ना चाहते हैं। गठबंधन को और विस्तृत करना चाहते हैं। इसलिए वे पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी को ले आए, मुकेश साहनी को ले आए, उपेंद्र कुशवाहा को ले आए, माले को ले आए। तो, उन सभी को जगह देनी थी, इसलिए हमें अपनी जगह छोड़नी थी। राजद खुद भी पिछली बार सत्ताईस-अट्ठाईस सीट पर चुनाव लड़ा था, इस बार घट कर उन्नीस पर आ गया। इसी तरह हमें भी अपनी सीटें छोड़नी पड़ीं।

पंकज रोहिला : दिल्ली में आम आदमी पार्टी के साथ आपका गठबंधन क्यों नहीं हो पाया?
’दिल्ली में हम गठबंधन चाहते थे, पर वे केवल दिल्ली में गठबंधन के लिए तैयार नहीं थे। वे पंजाब में भी गठबंधन चाहते थे, हरियाणा में भी चाहते थे, गोवा में भी एक सीट चाहते थे। कांग्रेस के सामने यह दिक्कत थी कि राज्यों के हमारे नेता इसे स्वीकार करने को तैयार नहीं थे।

दीपक रस्तोगी : इस चुनाव में निर्वाचन आयोग के ऐप पर दूसरे-तीसरे चरण के मतदान से संबंधित आंकड़े अभी बदलते हुए आ रहे हैं। क्या इससे संदेह गहरा नहीं होता? और इस पर विपक्ष सक्रिय क्यों नहीं दिख रहा?
’निर्वाचन आयोग ने इस चुनाव में जो भी फैसले किए हैं, वे पारदर्शी नहीं हैं। उनमें विरोधाभास है। आयोग की भूमिका विधानसभा चुनावों में भी संदिग्ध रही है। जहां तक हमारी बात है, हम उसकी आलोचना कर ही रहे हैं।

मृणाल वल्लरी : सभी पक्षों में नेताओं की गलतबयानी को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। उनमें से कुछ मामलों में नेताओं को माफी तक मांगनी पड़ी। इसे आप कैसे देखते हैं?
’राहुल जी ने तो स्वीकार कर लिया कि हमसे गलती हुई। उन्होंने माफी मांग ली। ऐसा हो जाता है। कभी-कभी उत्साह में आदमी कुछ बोल जाता है। उस पर बाद में माफी मांग ली, तो मेरा खयाल है, उसे नजरअंदाज कर दिया जाना चाहिए।

मनोज मिश्र : आपने जिस मुद्दे पर कांग्रेस छोड़ी, वह मुद्दा ही समाप्त हो गया। आप फिर कांग्रेस में आ गए। आप एनसीपी के लोगों से अपील क्यों नहीं करते कि वे भी कांग्रेस में आ जाएं?
’बिल्कुल सही बात है। जब हम लोगों ने पार्टी छोड़ने का फैसला किया था, तब सोनिया जी का मुद्दा था। मगर छह महीने बाद जब चुनाव हुआ तो एक तरह से लोगों ने हमारी पार्टी को नकार दिया। उसी समय लगा था कि हमें स्वीकार कर लेना चाहिए कि जनादेश सोनिया जी के साथ था। मगर तब भी हम लोग पार्टी चलाते रहे। फिर दस साल तक यूपीए की सरकार में भी शामिल रहे। राहुल जी ने अध्यक्ष बनने के बाद कहा कि वापस आइए। पर पवार साहब ने कहा कि हम अपने लोगों, मतलब महाराष्ट्र के लोगों से इस बारे में बात करेंगे। तकनीकी रूप से हम भले राष्ट्रीय पार्टी हैं, पर हकीकत यही है कि हम महाराष्ट्र से बाहर निकल नहीं पाए। पवार साहब ने कांग्रेस में मिलने के विचार को गंभीरता से नहीं लिया। मैं वापस कांग्रेस में आ गया। मैं समझता हूं कि आज देश को कांग्रेस की जरूरत है और कांग्रेस के लोगों को वापस आ जाना चाहिए।

आर्येंद्र उपाध्याय : भाजपा और कांग्रेस दोनों ने गठबंधन किया है, पर कांग्रेस ने जहां भी गठबंधन करने की कोशिश की वहां की पार्टियां उसके साथ जूनियर पार्टी की तरह व्यवहार करती नजर आर्इं। यह क्या कांग्रेस का नुकसान नहीं है?
’भाजपा सत्ता में है, इसलिए उसे उसका लाभ मिल रहा है। कांग्रेस अभी विपक्ष में है, इसलिए उसका भी असर है। मगर मुझे लगता है कि आने वाले समय में बदलाव नजर आएगा। कहीं-कहीं वस्तुस्थिति ऐसी थी कि हमें समझौता करना पड़ा। पर यह केवल कांग्रेस के साथ नहीं है। भाजपा के साथ भी है। जैसे बिहार को ले लीजिए, वहां सत्रह-सत्रह सीटें बांटी हैं। उनके इक्कीस सांसद जीते थे और पिछली बार वे बत्तीस सीट पर लड़े थे। नीतीश कुमार के महज दो सांसद चुनाव जीते थे।

तारिक अनवर
तारिक अनवर का जन्म 16 जनवरी, 1951 को पटना में हुआ। बहुत कम उम्र में ही इन्हें अपने राजनीतिक रुझान की समझ हो गई थी, तो फिर इसी राह पर आगे बढ़े। समावेशी विचार और तर्कसंगत भाषा के लिए जाने जाते हैं। 1976 से 1981 तक बिहार प्रदेश युवा कांग्रेस (आइ) के अध्यक्ष और 1982 से 1985 तक भारतीय युवा कांग्रेस के राष्टÑीय अध्यक्ष भी थे। कांग्रेस मुख्यालय में अच्छी पैठ होने के बावजूद 1999 में सोनिया गांधी के विदेशी मूल के मुद्दे पर राष्टÑवादी कांग्रेस पार्टी में चले गए। बिहार से लोकसभा सीट पर कई बार विजेता रहे हैं। राकांपा के टिकट पर महाराष्टÑ से 2004 में राज्यसभा के सदस्य बने। यह राज्यसभा में उनका दूसरा कार्यकाल था। वर्तमान में वे कटिहार लोकसभा सीट से सांसद हैं। अनवर का कहना है कि कांग्रेस ही एक ऐसी पार्टी है, जो पूरे देश को एक साथ लेकर चल सकती है।

 

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