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बारादरीः मैं लिखती आंखिन की देखी

हिंदी को हर वक्त क्षेत्रीय भाषाओं की जरूरत पड़ती है। हिंदी समृद्ध होती है क्षेत्रीय भाषाओं से। हालांकि बड़े दुख की बात है कि क्षेत्रीय भाषाएं खत्म हो रही हैं और जब क्षेत्रीय भाषाएं नहीं होंगी, तो हिंदी जहां है, वहीं रुक जाएगी। आगे इसमें कोई बढ़ोतरी नहीं होगी। इसलिए जो अलग-अलग जबानें हैं, उनका हिंदी में इस्तेमाल होना चाहिए।

पद्मा सचदेव

डोगरी भाषा की पहली आधुनिक कवयित्री पद्मा सचदेव का जन्म 17 अप्रैल 1940 को जम्मू के पुरमंडल में हुआ। आकाशवाणी में समाचार वाचिका के रूप में काम किया। डोगरी लोकगीतों से प्रभावित होकर काव्य संग्रह ‘मेरी कविता मेरे गीत’ लिखा, जिसे साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिला। अपने जीवनसाथी सरदार सुरिंदर सिंह को अपने रचनात्मक जीवन का सबसे मजबूत स्तंभ मानती हैं। इनके कविता संग्रहों पर जम्मू कश्मीर की कला संस्कृति और भाषा अकादमी ने उन्हें ‘रोब ऑफ ऑनर’ से सम्मानित किया। डोगरी कविता और कहानी को आधुनिकता की छुअन के साथ एक स्त्री का संघर्ष भी दिया, जो अपना भोगा हुआ लिख रही थी। संघर्ष और संवेदनशीलता का मेल इनके लिखे को एक अलग खांचे में रखता है जिसे किसी खास वाद या विचारधारा से नहीं जोड़ा जा सकता। कविता संग्रहों में इनके मेरी कविता मेरे गीत, तवी ते झन्हां, न्हैरियां गलियां, पोटा पोटा निंबल उत्तर बैहनी, तैंघियां, रत्तियां उल्लेखनीय हैं। गोदभरी और बुहुरा इनके बहुप्रशंसित कहानी संग्रह हैं। उपन्यासों में अब न बनेगी देहरी, नौशीन, भटको नहीं धनंजय, इनबिन, जम्मू जो कभी शहर था अलग पहचान रखते हैं। मैं कहती हूं आंखिन देखी इनका यात्रा वृत्तांत है। इनकी आत्मकथा बूंद बावड़ी को सरस्वती सम्मान से नवाजा गया।

मृणाल वल्लरी : आपने डोगरी और हिंदी दोनों भाषाओं में लिखा है और विभिन्न विधाओं में लिखा है। अपनी एक अलग पहचान बनाई। पहचान के इस सुख को किस तरह अनुभव करती हैं?

पद्मा सचदेव : सबसे पहली बात तो यह कि जो मैंने महसूस किया है, वही मैंने लिखा है। जो मैंने बहुत करीब से जाना है, वही मैंने लिखा है। मैंने हवा में से कोई चरित्र कभी नहीं निकाला है। जब छोटी थी तब सिर्फ कविता लिखती थी। तब डोगरी में ही लिखती थी। सब जगह छपती थी। फिर जब धर्मयुग में छपी- 1970-71 में- तो हिंदी की तरफ रुझान हुआ। लोग अक्सर पूछते हैं कि आपने डोगरी और हिंदी दोनों को कैसे साधा। तो, मैं कहती हूं कि हमारे बुजुर्गों ने समझाया कि डोगरी अगर हमारी मां है, तो हिंदी दादी है। इसलिए मां से प्यार करते हैं, तो दादी से भी करते हैं। जब मैं कॉलेज में थी, तभी दिनकर जी से मिलना हुआ और मैंने उन्हें अपनी एक कविता का हिंदी अनुवाद सुनाया था। वे बहुत प्रभावित हुए। फिर मैंने कहा कि जब भी मेरी किताब छपेगी, उसकी भूमिका आप ही को लिखनी पड़ेगी। इस तरह मेरी पहली किताब की भूमिका दिनकर जी ने लिखी थी। उसमें उन्होंने लिख दिया था कि पद्मा की कविताएं पढ़ कर ऐसा लगता है कि मुझे अपनी कलम फेंक देनी चाहिए। वह भूमिका पढ़ कर हिंदी जगत में हल्ला मच गया।

मुकेश भारद्वाज : हिंदी में लिखने का खयाल आपको कब आया?

’तब तक मैं सिर्फ डोगरी में लिखती थी। जम्मू में थी तो जब बूढ़ी दादियां वगैरह आती थीं तो उनकी चिट्ठियां वगैरह जरूर हिंदी में लिख दिया करती थी। पर जब दिनकरजी ने मेरी किताब की भूमिका लिख दी और मुझे साहित्य अकादमी पुरस्कार मिल गया उसके बाद हम मुंबई चले गए थे। उस समय धर्मवीर भारती से मुलाकात हुई। हालांकि वे धर्मयुग में मुझे पहले छाप चुके थे। उन दिनों जम्मू में डोगरी को लेकर पहली कान्फ्रेंस होनी थी। तब मैंने भारती जी से कहा कि अगर आप उसके बारे में छापेंगे, तो मैं किसी से कहूंगी कि वह कुछ लिख कर आपको भेज दे। फिर मैंने उन्हें मुतास्सिर करने के लिए डोगरी के बारे में बताया। फिर उन्होंने कहा कि आप क्यों नहीं लिखतीं। मैंने कहा कि मैं गद्य नहीं लिखती। फिर उन्होंने कहा कि जो आपने कहा, वही लिख दीजिए। तो मैंने घर आकर फटाफट वह सब लिख दिया। इस तरह मेरा हिंदी में गद्द लिखना शुरू हुआ।

पारुल शर्मा : आपने कविताएं डोगरी में लिखीं और गद्य हिंदी में, ऐसा क्यों?

’तब डोगरी में कोई ऐसी लड़की नहीं थी। मैं अकेली थी। आज भी जो लिखती हैं, वे मेरा ही मुंह देखती हैं। हालांकि उनमें से कई बहुत अच्छा लिखती हैं और मैं उन्हें प्रोत्साहित करती हूं। हमारे एक बुजुर्ग साहित्यकार थे- दीनूभाई पंत- उन्होंने कहा था कि हिंदी हमारी दादी है और डोगरी हमारी मां। मां का अपना स्थान है और दादी का अपना स्थान है। भारती जी के कहने पर मैंने हिंदी में लिखना शुरू किया और आज स्थिति यह है कि डोगरी में मेरी दस-बारह किताबें हैं और हिंदी में बहुत ज्यादा हैं।

अजय पांडेय : आज कश्मीर में अस्थिरता है। क्या आपको कोई ऐसा रास्ता नजर आता है जिसके जरिए फिर से वहां अमन कायम किया जा सके?

’जब मैं श्रीनगर में थी, तो वहां एक शहर है अनंतनाग, जिसे वहां के लोग इस्लामाबाद कहा करते थे। चूंकि मैं कश्मीरी जानती थी, तो उन लोगों की सारी बातें समझ आती थीं कि वे लोग क्या कह रहे हैं। उस वक्त एक आदमी अस्पताल में आया करता था, बहुत दबंग था, वह बहुत ऐसी बातें किया करता था। तो, उस समय से मैंने कश्मीर में आतंकवाद को बनते देखा है। उस वक्त बहुत से लोग पाकिस्तान की खबरें सुना करते थे, जो कि नहीं सुननी चाहिए थीं। तो, आतंकवाद उस एक जगह से बनना शुरू हुआ था। मुझे हैरानी होती थी कि इस्लामाबाद तो पाकिस्तान में है, ये लोग इस शहर को क्यों कह रहे हैं! माफ कीजिएगा, हिंदुस्तान का इंटेलिजेंशिया है कश्मीरी पंडित, पर वह डरपोक बहुत है।

सूर्यनाथ सिंह : एक ही राज्य के दो हिस्से हैं- जम्मू और कश्मीर, पर दोनों में अलगाव बहुत है। ऐसा क्यों?

’इस अलगाव की सबसे पहली वजह तो वहां के राजा हैं। हालांकि महाराजा हरि सिंह को लोग बहुत प्यार करते थे। महाराजा प्रताप सिंह और कर्ण सिंह जी को भी बहुत प्यार करते थे। लेकिन इन लोगों ने जुल्म भी बहुत किए हैं। कश्मीरी पंडितों ने भी बहुत जुल्म किए हैं। इसका एक किस्सा है, एक मुसलमान कश्मीरी पंडित के पास चिट्ठी पढ़वाने लाया। वह उर्दू में लिखी थी। उसने आधी चिट्ठी तो पढ़ कर सुना दी और कहा कि आधी कल पढ़ कर सुनाऊंगा। अगले दिन पढ़ कर सुनाया तो उसमें लिखा था कि तुम्हारी मां मरने वाली है, वह तुम्हारी सूरत देखना चाहती है, फौरन आ जाओ। यानी वह एक दिन पहले वह चिट्ठी अगर पढ़ देता तो वह अपनी मां से मिलने चला जाता। इस तरह के जुल्म किए हैं।

राजेंद्र राजन : अभी कठुआ में जो हुआ, उस पर आप क्या कहना चाहेंगी?

’बहुत दुख की बात है। शर्म की बात है। इस तरह का कोई कांड पहले हमारे यहां नहीं हुआ। डूब मरने की बात है- डोगरों के लिए भी और कश्मीरियों के लिए भी।

दीपक रस्तोगी : आज बहुत सारी क्षेत्रीय भाषाओं से दूरी बनाने का प्रयास हो रहा है। यह कहां तक उचित है?

’मेरा मानना है कि हिंदी को हर वक्त क्षेत्रीय भाषाओं की जरूरत पड़ती है। हिंदी समृद्ध होती है क्षेत्रीय भाषाओं से। हालांकि बड़े दुख की बात है कि क्षेत्रीय भाषाएं खत्म हो रही हैं और जब क्षेत्रीय भाषाएं नहीं होंगी, तो हिंदी जहां है, वहीं रुक जाएगी। आगे इसमें कोई बढ़ोतरी नहीं होगी। इसलिए जो अलग-अलग जबानें हैं, उनका हिंदी में इस्तेमाल होना चाहिए। कहने का मतलब यह कि हम कभी अपनी क्षेत्रीय भाषा से अलग नहीं हो पाते। हिंदी को समृद्ध करने के लिए दूसरी भाषाओं की जरूरत है।

मृणाल वल्लरी : आज की कविता को आप किस रूप में देखती हैं?

’किसी का शेर है- कविता तब आती है जब-कभी टूट जाते हैं मेरे किनारे मुझमें/ डूब जाता है कभी मुझमें समंदर मेरा। तो, जो लोग कविता लिखते हैं, वे लोग मुझे पसंद नहीं हैं। क्योंकि कविता आती है, लिखी नहीं जाती। जैसे एक छोटा बच्चा किसी का आंचल पकड़े पीछे-पीछे घूमता रहता है, वैसे ही जब तक कविता लिख न लो, वह घूमती ही रहती है। तो, जो मॉडर्न लोग लिख रहे हैं, खासकर मुक्त छंद की कविता लिख रहे हैं, उनकी संख्या बहुत हो गई है। इस तरह की कविता बातचीत की तरह है। वह भी बहुत घटिया स्तर की बातचीत। हालांकि ऐसा नहीं कि इसमें अच्छी कविता नहीं लिखी जा रही, पर बहुत कम लिखी जा रही है।

राजेंद्र राजन : आपने कविता, कहानी, उपन्यास, आत्मकथा आदि विधाओं में लिखा है। सबसे अधिक संतोष आपको किस विधा में मिलता है?

’मुझे कविता में ज्यादा संतोष मिलता है।

पारुल शर्मा : आज स्त्री विमर्श के नाम पर जो कुछ लिखा जा रहा है, उसे आप किस तरह देखती हैं?

’मैं उसको देखती ही नहीं। उस लेखन से कोई फर्क पड़ने वाला नहीं है। अगर आज पांच प्रतिशत औरतें बात कर सकती हैं या बीस प्रतिशत औरतें आज खुद कमा सकती हैं, तो बाकी की कितनी औरतें हैं, जिनके साथ क्या-क्या होता है, क्या उनके बारे में आप जानती हैं? मैं जानती हूं।

अजय पांडेय : आपने कहा कि कविता लिखी नहीं जाती, आती है। इस रचना प्रक्रिया को जरा समझाएं।

’देखिए, यह सिर्फ कविता में नहीं होता, कहानी में भी होता है। जब कोई बड़ा विचार आपके पीछे पड़ जाता है, तो वह कहानी में उतरे बिना आपको नहीं छोड़ता। और जब वह बड़ा विचार कविता में नहीं आ पाता, तो वह कहानी में उतरता है। तो, बचपन में हम डोगरी गीत बहुत गाया करते थे। तब जब कोई विचार मेरे मन में आता था, कुछ भाव मेरे मन में आता था, तो उसे मैं उन गीतों में पिरो दिया करती थी।

मुकेश भारद्वाज : आपने बहुत सारे लोगों का साक्षात्कार लिया है। उनमें लता मंगेशकर के साथ आपका लंबे समय से बहुत करीबी रिश्ता रहा है। कहा जाता है कि लता जी के साथ कोई चार दिन तक लगातार नहीं रह सकता, तो आपने यह कैसे संभव किया?

’मैं उनको बड़ी दीदी कहती हूं, नाम नहीं लेती। जैसे अपने घरों में हम बुजुर्गों के नाम नहीं लेते, उसी तरह। हालांकि मुंबई में जहां हम रहते थे, दो-चार दुकानें छोड़ कर पास में ही दीदी का घर था, पर उनसे कभी मिलना नहीं हुआ। कल्याणजी भाई कहते थे कि इसके साथ तो कोई तीन दिन नहीं रह सकता। फिर जब एक बार मैं जम्मू गई, तो एक आदमी मिला। उसने पूछा कि मुंबई में कहां रहती हो? मैंने कहा पैडर रोड। तो उसने पूछा- बाल से मिली? मैं हैरान कि कौन बाल। उसने बताया कि वह मेरा गहरा दोस्त है। लता मंगेशकर का भाई। फिर उसने कहा कि मेरी एक गठरी उसे दे दोगी! तो, मैं वह गठरी ले आई। वह गठरी लेकर पहुंचाने गई, तब पहली बार दीदी से मिलना हुआ। उसके बाद तो मैंने उन्हें छोड़ा ही नहीं। सचिनदेव वर्मन कहा करते थे- पद्मा हमारी जिंदगी में लोता आ गया, समझो सब कुछ आ गया। मैंने दीदी की लगभग एक हजार रिकॉर्डिंग देखी है, पर ऐसा एक भी आदमी नहीं देखा, जिसके घर वे रिकॉर्डिंग से पहले गई हों, पर दादा के घर जाती थीं। बाद में उन्होंने मेरे लिए डोगरी के गीत भी किए। मैं उनके घर की सदस्य की तरह हो गई।

सूर्यनाथ सिंह : आपने इतने सारे लोगों को संगीत देते देखा है। आज के संगीत और पहले के संगीत में क्या अंतर पाती हैं?

’पहले संगीत होता था, अब नहीं होता। पहले जब कोई भी अच्छा गाना सुन कर निकलते थे, तो वह सारा दिन आपके भीतर बजता रहता था, अब वैसा नहीं होता। बहुत कम गाने ऐसे होते हैं।

पारुल शर्मा : क्षेत्रीय भाषाओं को बढ़ावा देने के लिए क्या किया जाना चाहिए?

’उन्हें बढ़ाने का एक ही उपाय है- उन्हें अपने रूप में बोला जाना चाहिए। वे अपने रूप में नहीं बोली जातीं।

अजय पांडेय : आपने आत्मकथा भी लिखी है। आत्मकथाओं में कितनी ईमानदारी होती है?

’मैंने तो अपनी आत्मकथा में कुछ भी झूठ नहीं लिखा। जो भोगा है, जो किया है, उसे लिखने-बताने में डरना क्या?

आर्येंद्र उपाध्याय : आत्मकथा लिखने का विचार कब आया आपके मन में?

’जब मेरे पास कविताओं और कहानियों का कोटा खत्म हो गया और मुझे लगा कि अपने बारे में बताना चाहिए। और उन लड़कियों को पता चलना चाहिए कि कैसे समाज से लड़ना है, तो मैंने अपने बारे में लिखा। मैं चाहती थी कि लड़कियों को पता चले कि कैसे समाज से लड़ना है, उसी समाज में मिट्टी भी हो जाना है, पर डटे रहना है।

सूर्यनाथ सिंह : युवा पीढ़ी की लेखिकाओं में आपको कितनी संभावना दिखाई देती है?

’उन्हें देख कर यह विश्वास बनता है कि साहित्य मरेगा नहीं। मैं डोगरी की बात करूं, तो वहां कई लड़कियां बहुत अच्छी कविताएं और कहानियां लिख रही हैं।