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बारादरी: बारिश में कमी नहीं, बरसने का अंदाज बदला

ल-जंगल-जमीन से सीधे जुड़े जीविकोपार्जन में लगे ग्रामीण समुदाय के लिए मौसम की जानकारी देने में विभाग सफल हो रहा है। देश में बारिश की दर कम नहीं हुई है हां, उसके पैटर्न में बदलाव हुआ है।

Author July 7, 2019 3:03 AM
मौसम विभाग के महानिदेशक डॉक्टर केजे रमेश

मौसम विभाग के महानिदेशक डॉक्टर केजे रमेश का कहना है कि मौसमी पूर्वानुमानों को जारी करने के लिए विभाग के पास मुकम्मल ढांचा और व्यवस्था है। खासकर जल-जंगल-जमीन से सीधे जुड़े जीविकोपार्जन में लगे ग्रामीण समुदाय के लिए मौसम की जानकारी देने में विभाग सफल हो रहा है। उन्होंने कहा कि देश में बारिश की दर कम नहीं हुई है हां, उसके पैटर्न में बदलाव हुआ है। उन्होंने कहा कि पहले जैसी बारिश अब ज्यादा नहीं दिखेगी, लेकिन बारिश ठीक-ठाक होगी। बातचीत कार्यक्रम का संचालन किया कार्यकारी संपादक मुकेश भारद्वाज ने।

केजे रमेश
केजे रमेश का जन्म 26 जुलाई 1959 को हुआ। रमेश पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के तहत आने वाले भारतीय मौसम विभाग के महानिदेशक हैं। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान से मानसून गतिकी (मानसून डाइनेमिक्स) में पीएचडी की। मूलत: वैज्ञानिक रमेश इसी महीने सेवानिवृत्त होने वाले हैं। मंत्रालय में रहते हुए वे 2007 से लगातार भारत सरकार के प्रतिनिधि के तौर पर अंतरराष्ट्रीय मंचों व राष्ट्रीय संस्थाओं के जरिए आपदा नियंत्रण व वातावरणीय विज्ञान के क्षेत्र में योगदान करते रहे। योजना आयोग के आपदा प्रबंधन कार्यदल क ा हिस्सा रहे। संयुक्त राष्ट्र की जलवायु परिवर्तन संबंधी समिति में भारतीय प्रतिनिधि के तौर पर शामिल रहे। भारतीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के कोर कमेटी का हिस्सा रहे। इनकी अगुआई में मौसम संबंधी सटीक आकलन की दिशा में कई सफल परियोजनाएं खड़ी हुर्इं।

मनोज मिश्र : मौसम का पूर्वानुमान अब सटीक पता चलने लगा है। अगर साल भर का पूर्वानुमान जारी हो जाए तो किसानों और अन्य मामलों में यह काफी हद तक सहायक हो सकता है। इसके लिए मौसम विभाग क्या कर रहा है।
केजे रमेश : मौसम का साल भर पहले पूर्वानुमान मुमकिन नहीं है। अगर आप 15 दिन का पूर्वानुमान चाहेंगे तो मिल जाएगा। इसके बाद या तो कुछ हद तक आकलन ऊपर रहेगा या फिर नीचे रहेगा। माहवार और मौसमवार आकलन संभव नहीं है। 15 दिन के ऊपर आकलन करना पूरी दुनिया में संभव नहीं है।

पंकज रोहिला : निजी कंपनी की ओर से जो मौसम का पूर्वानुमान आता है वह काफी उन्नत माना जाता है। क्या आपके विभाग में व्यवस्था में बदलाव की जरूरत है?
’वो हमसे बेहतर कैसे हैं? यह विज्ञान आधारित सेवा है। विज्ञान के लिए आपके पास शोध और बुनियादी ढांचा होना चाहिए। हमारे पास 6 हजार लोग काम करते हैं। दो अनुसंधान केंद्र हैं, लगभग 600 वैज्ञानिक काम करते हैं तब जाकर यह सुधार दिख रहा है। लेकिन निजी एजंसी के पास न तो वैज्ञानिक हैं और न ही कोई व्यवस्था है तो कहां से पूर्वानुमान दे रहे हैं। ये निजी कंपनियां सार्वजनिक रूप से जारी सूचनाओं को ही जारी करती हैं। हमारा सारा पूर्वानुमान उपलब्ध है, आस्ट्रेलिया का सारा डाटा उपलब्ध है। इसी सार्वजनिक डाटा को लेकर वे लोग अपने ग्राफिक और वीडियो बनाकर पेश करते हैं। वे किसी ढांचागत व्यवस्था की तरह काम नहीं करते हैं। निजी कंपनी अपने ग्राफिक प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को देती है। निजी कंपनी कहीं भी सरकारी सेवा के आसपास नहीं है। वे लोग फरवरी में मानसून की जानकारी देते हैं और हम अप्रैल में। वे कहते हैं ‘अल नीनो’ आ रहा है। लेकिन आज तक ‘अल नीनो’ नहीं आया। तो वो कैसे सही हो गया? हम अप्रैल में क्यों दे रहे हैं क्योंकि मार्च तक की स्थिति का आकलन जरूरी है। तभी जून में सही आकलन आएगा।

अजय पांडेय : मानसून के बारे में कई बातें हम सुनते हैं। जानना चाहते हैं कि इसका समय कैसे तय होता है और उसकी देरी की वजह क्या है।
’मानसून दक्षिण क्षेत्र से ईस्ट ऑफ मेडगास्कर से हाई प्रेशर जोन बनता है। वहां से आउटफ्लो इक्वेस्टर पास करके भारत की तरफ बढ़ता है। अप्रैल के अंत में मेडगास्कर से इक्वेस्टर की तरफ बढ़ता है। इसकी एक शाखा अरब सागर की ओर केन्या की तरफ आती है और दूसरी बंगाल की खाड़ी की तरफ आती है। बंगाल की खाड़ी वाला सबसे पहले अंडमान निकोबार में मई की 17-18 तारीख को आता है। फिर श्रीलंका में आता है तब अरब सागर वाला मानसून मिलकर केरल में आता है। बंगाल की खाड़ी का मानसून अंडमान निकोबार से श्रीलंका और केरल पहुंचने तक अरब सागर का मानसून भी केरल आ जाता है। वहां हवा में नमी का ठंडापन अनुभव होगा। वहां कोई पूर्वानुमान देने की जरूरत नहीं होती है, वह अहसास ही बताता है कि मानसून आ गया है। मानसून इस बार भी 18 मई तक अंडमान तक आ गया था इसके बाद धीमा हो गया।

दीपक रस्तोगी : पानी का प्रबंधन कैसे करें कि भूजल को दुरस्त किया जा सके। क्या इस तरह की परियोजना पर आपका विभाग या मंत्रालय काम कर रहा है।
’हमारा विभाग पूर्वानुमान तक ही सीमित है। लेकिन 1901 से अभी तक का आंकड़ा हमने देशों की बारिश और तापमान के पैरामीटर पर बनाया है। इसमें .25 डिग्री मतलब 35 से 40 किलोमीटर की रेंज में गुणवत्ता की जांच की गई है। इन आंकड़ों से पानी के स्रोत पर शोध कर सकते हैं। 50 के दशक में कितनी बारिश हुई, 2010 में कितनी बारिश आई, कैसे कम हुई और बढ़ी ये सब अध्ययन करने के लिए हम डाटा पर काम कर रहे हैं। हमने केंद्रीय जल आयोग के साथ मिलकर पानी की उपलब्धता पर शोध किया है कि क्या सच में पानी कम हो गया है। हर शहर में पानी की क्या स्थिति है इस शोध से पता चलता है। हमने देखा कि देश में पानी में 8 फीसद की बढ़ोतरी हुई है। कुछ नदियों में घटा है कुछ में बढ़ा है। समग्रता में पानी की कमी नहीं है बल्कि ज्यादा है। अच्छा होगा कि लोग पानी के प्रबंधन पर ध्यान दें। यह हमारा पहला अध्ययन था जो पूरा हो गया है।

मृणाल वल्लरी : हर कोई कह रहा कि पानी बचाओ, लेकिन आम आदमी की समझ से परे है कि वह अपने स्तर पर क्या करे, उसके पास इसके लिए प्रशिक्षण और संसाधन नहीं है। गरीब तबके के लोग मौसम की मार से मर ही रहे थे अब अमीर अपनी एसयूवी में डूब कर मर रहे हैं। शहरी नियोजन की इस विफलता को कैसे देखते हैं।
’पहले शहर में तालाब और कुआं होता था जिससे बारिश का पानी वहां जाता था, लेकिन शहरों में अब सब बंद हो चुका है, यह पानी कहां जाएगा। सड़क पर ही रहेगा न। ड्रेनेज बनाए गए हैं लेकिन यह उतने कारगर नहीं हैं। खुले क्षेत्रों में पार्क में पहले पानी रिसता था लेकिन अब सीमेंटेड हो गया है। इसलिए ऐसे हालात बन रहे हैं। दूसरी समस्या इससे अलग है कि सीवेज में सिल्ट जमा हो रहा है। अगर सौ फीसद सील्ट साफ नहीं हुआ तो कोई फायदा नहीं है। जिम्मेदार विभाग कहता है कि 60 फीसद और 90 फीसद साफ करने से बारिश के लिए तैयार हैं। लेकिन अगर एक फीसद भी सिल्ट बची होगी तो पानी का निकास नहीं हो पाएगा, इसलिए शुरू ही न करें अगर न कर पा रहे हों 100 फीसद तो। जो पानी आ रहा है उसे भी संरक्षित करने की जरूरत है। लक्ष्यद्वीप में हर घर में लोग 1000 से 2000 लीटर की टंकी लगाकर पानी की बचत करते हैं। जहां पानी नहीं है वहां पानी के लिए लोग प्रयास कर रहे हैं। उसे समझना चाहिए।

मुकेश भारद्वाज : ग्रामीण क्षेत्र और जल-जंगल-जमीन से सीधे जुड़े जीविकोपार्जन की प्र्रक्रिया में जुटे लोगों के लिए मौसम के सटीक पूर्वानुमान की ज्यादा जरूरत है। इस क्षेत्र में विभाग की क्या प्रगति है?
मंगलवार और शुक्रवार को हर जिले में मुख्य चार फसल के लिए मौसम पर आधारित सलाह देते हैं। मौसम की सूचना हम देते हैं जिसे कृषि से जुड़ी संस्थाएं अपने तरीके से जारी करती हैं। इसके लिए 130 यूनिट स्थापित की गई है। इसके लिए हर तरह का खर्च किया गया है। प्रयोगशाला और तकनीक में कमी नहीं है। यह सेवा जिला स्तर पर चल रही है। यहां हमारा फोकस रहता है कि बारिश शुरू होने के बाद 17 मिलीमीटर की बारिश जहां होनी है वहां खुद किसान समझ जाता है कि बारिश कब आएगी। 17 मिलीमीटर बारिश हर जगह एक साथ नहीं आती है तो वहां के लिए कैलेंडर बनाया जाता है। दाल और दलहन की फसलें जहां उगाई जाती हैं वहां कैलेंडर आधारित प्रक्रिया चल रही है। दो से तीन साल में यह सेवा हर जिले में और उसके बाद ब्लॉक स्तर पर शुरू की जाएगी। इसके लिए हमारे पास पर्याप्त बजट है।

प्रतिभा शुक्ल : क्या मौसम विभाग कृषि विभाग के साथ मिलकर कोई काम कर रहा है जिसमें किसानों को बता सकें कि पानी की कमी वाले इलाकों में कैसी खेती हो?
’इसके लिए कृषि जागरूकता शिविर में बताया जाता है। जो बासमती पहाड़ों पर उगाई जाती थी अब हरियाणा और पंजाब में उगा रहे हैं। इसका फायदा है कि 20 से 22 दिन में फसल आ रही है और गरमी भी झेलती है और पानी भी कम लेती है। यह बदलाव का अच्छा उदाहरण है। लेकिन भूजल से गन्ना उगाने के लिए किसानों को मना करना होगा जैसा कि महाराष्ट्र और तेलांगाना में होता है। इसी तरह बीटी और एचटी कॉटन के लिए मना करने के बावजूद किसान नहीं मान रहे हैं। उर्वरकों की मात्रा भी किसान मनमाने तरीके से इस्तेमाल करते हैं। इस पर जागरूकता के लिए किसान संगठनों को भी सहयोग करना पड़ेगा।

मनोज मिश्र : सुनामी या भूकम्प की सबसे सटीक जानकारी कब तक मिलनी शुरू हो जाएगी ।
’इसकी सटीक जानकारी नहीं मिल सकती। भूकम्प के लिए अभी विज्ञान ने प्रगति नहीं की है। समुद्र क्षेत्र में अगर भूकम्प आ गया तो उसे पांच मिनट के अंदर हम पहचान लेंगे, अगर उसने सुनामी पैदा किया तो उसकी सूचना भी दो से तीन मिनट में आ जाएगी। तब अगर अंडमान और नार्थ इंडोनेशिया में सुनामी हुई तो हमारे तट तक आने में दो से ढाई घंटे की यात्रा उसे करनी पड़ेगी। यह समय पूर्वी तटों के लिए दिया जाता है। अगर अंडमान में हमारे इंदिरा प्वाइंट और नार्थ इंडोेनेशिया जिसे बंडा आचे बोलते हैं में सुनामी जैसा भूकम्प आ गया तो 10 मिनट में हमारे सायरन बजते हैं। भूकम्प का पूर्वानुमान तो नहीं है, लेकिन भूकम्प से उत्पन्न सुनामी लहरों का पूर्वानुमान है।

प्रतिभा शुक्ल : मौसम लगातार तेजी से बदल रहा है। इसकी क्या वजह है?
’ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन का असर है। यह भारत ही नहीं बल्कि पूरे विश्व की स्थिति है। पिछले दिनों यूरोप और पेरिस में भी 45 से अधिक तापमान गया, जो कभी नहीं देखा गया।

आर्येंद्र उपाध्याय : केदारनाथ के बाद यह सवाल उठा कि हम पहले सूचना नहीं दे पाए और हमारी निगरानी व्यवस्था काम नहीं कर पाई। क्या हमारे पास इतने अच्छे उपकरण नहीं हैं?
’पूर्वानुमान क्षमता में आज के समय में कोई अंतर नहीं रह गया है। चाहे मॉडलिंग या मैकेनिज्म किसी भी स्तर पर बात करें यह सुधार हुआ है। उत्तराखंड में हमने केवल अत्यधिक बारिश की संभावना जाहिर की थी जो कई अलग-अलग हिस्सों में होनी थी। उत्तराखंड में केदारनाथ के पीछे एक झील है जो पूरी तरह जमी हुई थी। जब भारी बारिश हुई तो झील के ऊपर जमी बर्फ पिघलने लगी। जब ज्यादा पानी हुआ तो आसपास के पत्थर नीचे आ गए। इस मामले में भू-विज्ञान और जल-विज्ञान से संबंधित मामले जिम्मेदार थे। इस तरह के मामलों के लिए और काम करने की जरूरत है। बारिश तक का पूर्वानुमान सही हुआ है। लेकिन स्थानीय स्तर के हालात के लिए हमें सबके साथ मिलकर काम करना होगा।

अरविंद शेष : ग्लोबल वार्मिंग को लेकर लगातार चिंता जताई जा रही है। बुलेट ट्रेन और तमाम अन्य परियोजनाओं में 54 हजार पेड़ों को काटने का काम किया जा रहा है। बाहर जलने की स्थिति है। विकास और पर्यावरण के संतुलन के बीच मौसम कैसा रहेगा।
’हर परियोजना में पर्यावरण की हानि के संबंध में एक समझौता होता है जिसमें संबंधित विभाग भाग लेते हैं। परियोजना से जुड़े लोगों को बताया जाता है कि इसकी वजह से कितना तापमान बढ़ेगा और कार्बन-डाई-आॅक्साइड गैस उत्सर्जित होगी। इसलिए वैकल्पिक जंगल बढ़ाने की सलाह दी जाती है। कटाई के अनुपात में पौधे लगाने के लिए समझौता किया जाता है। परियोजना के तैयार होने तक पौधे लगाने का लक्ष्य दिया जाता है।

गजेंद्र सिंह : कहा जा रहा है कि हर साल बारिश की दर घट रही है। मौसम विभाग का आंकड़ा क्या कहता है?
’देश के हिसाब से देखें तो बारिश घट नहीं रही है। अगर यह 10 फीसद कम ज्यादा होती है तो इसे ज्यादा असरकारक नहीं माना जाता है। कुछ क्षेत्रों में कम होगा और कुछ में ज्यादा होगा यह भी समझना है। केरल में एक जून से दिसंबर तक मानसून रहता है। वहां छह माह रहता है। राजस्थान में 15 जुलाई को पहुंचता है जो 45 दिन रहता है। कुछ जगह कम है कुछ जगह ज्यादा। हां जलवायु परिवर्तन की वजह से मध्य महाराष्ट्र, तेलंगाना और कर्नाटक में बारिश कम हुई है। यहां 400 मिलीमीटर के आसपास ही बारिश है जो इससे कम-ज्यादा होता है। उत्तर पूर्व में कुछ ज्यादा कमी देखने को मिली है। पिछले 30 साल में 15 फीसद से कम बारिश इस इलाके में हुई है।

गजेंद्र सिंह : डॉप्लर वेदर राडार (डीडब्लूआर) लगाने के बाद 450 किलोमीटर की रेंज में पूर्वानुमान में काफी सुधार हुआ है। क्या इससे अच्छी तकनीक का राडार लगाने की योजना है।
’राडार मॉनिटरिंग निगरानी का अच्छा उपकरण है। अभी 27 राडार पूरे देश में लगे हैं। तटीय क्षेत्र में इससे चौबीसों घंटे निगरानी रखना संभव हो जाता है। 27 से अधिक राडार लगाने के लिए काम चल रहा है। हमारे साथ भारतीय वायुसेना और नौसेना का मौसम विभाग भी है जो राडार लगा रहे हैं। मैदानी इलाका कवर हो जाएगा। हिमालय के लिए छोटे राडार लगाते हैं, वहां बड़ा नहीं लगा सकते। उत्तराखंड, हिमाचल और जम्मू-कश्मीर के लिए भी 10 राडार आर्डर हो चुके हैं। अमरनाथ यात्रा के लिए हम मोबाइल राडार ले जा रहे हैं। आने वाले दिनों में उत्तर पूर्व में भी छोटे राडार लगाएंगे।

सूर्यनाथ सिंह : पहले बारिश लगातार हफ्तों तक होती थी, उसके बाद समय आया कि दो से तीन दिन बारिश के बाद मौसम बदल जाता था। अस्सी के दशक में हमने जैसी बारिश देखी उसका पैटर्न बिलकुल बदल चुका है। इसकी क्या वजह है।
’जलवायु परिवर्तन बड़ा कारण है। कहीं बारिश ज्यादा है तो कहीं कम है। लेकिन राष्टÑीय स्तर पर देखें तो यह कम नहीं है। कोंकण और मुंबई में तिमाही से ज्यादा बारिश सिर्फ दो दिन में हो गई है। हो सकता है कि एक हफ्ते में पूरा कोटा हो जाए बारिश का। पहले जैसी बारिश अब ज्यादा नहीं दिखेगी, लेकिन बारिश ठीक-ठाक होगी।

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