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बारादरी: कश्मीर में बन सकती है सकारात्मक तस्वीर

उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में 18 नवंबर, 1950 को आरिफमोहम्मद खान का जन्म हुआ। बीए ऑनर्स अलीगढ़ मुसलिम विश्वविद्यालय से और कानून की पढ़ाई लखनऊ विश्वविद्यालय से की। अलीगढ़ विश्वविद्यालय में छात्र संघ से भी जुड़े रहे। चार बार सांसद रह चुके और ऊर्जा, कृषि और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय जैसे अहम मंत्रालयों का प्रभार संभाल चुके हैं। तीन तलाक के मुद्दे पर धन्यवाद भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लोकसभा में इनका नाम लिए बिना मुसलमानों के गटर में पड़े रहने का उद्धरण देने के बाद, अपने पहले के भाषण और शाहबानो मामले में राजीव गांधी सरकार के विरोध में इस्तीफा देने के अपने रुख को लेकर चर्चा में हैं। इन दिनों इनका बहुचर्चित बयान है, ‘छियासी में जो मुद्दे बने उसने देश को सैंतालीस में पहुंचा दिया’।

Author August 11, 2019 3:04 AM
आरिफ मोहम्मद खान

आरिफ मोहम्मद खान का कहना है कि कश्मीर के मसले पर सरकार की नीयत साफ है। उन्होंने कहा कि इस फैसले को लेकर सरकार की साख दांव पर है, इसलिए वे उम्मीद करते हैं कि छह महीने में वहां सकारात्मक चीजें दिखने लगेंगी। उन्होंने कहा कि दूसरी पारी में मोदी सरकार के पास सुरक्षा बोध है, इसलिए पूरी उम्मीद है कि राजनीतिक समस्याओं से पार पाने के बाद इस सरकार का सारा ध्यान अब अर्थव्यवस्था पर होना चाहिए। बातचीत कार्यक्रम का संचालन किया कार्यकारी संपादक मुकेश भारद्वाज ने।

मुकेश भारद्वाज : केंद्र सरकार ने जो ताजा फैसला लिया, उसमें क्या आप कश्मीर को बदलता हुआ देख रहे हैं?
आरिफ मोहम्मद खान : बहुत तेजी से बदलेगा कश्मीर। कश्मीर भारत के ज्ञान का केंद्र रहा है। वहां के लोगों में जो मेहमाननवाजी है, वह दुनिया में कहीं नहीं मिलेगी। इसके इतिहास में जाएं तो महाराजा रणजीत सिंह से कश्मीर को महाराजा गुलाब सिंह ने खरीदा था। तिरासी लाख रुपए में उसका बैनामा हुआ था। उसमें कश्मीर की जमीन, पेड़, कश्मीर के जानवर और कश्मीर के इंसान सब शामिल थे। इस तरह से तकनीकी और कानूनी रूप से हर कश्मीर एक तरह से दास था। बेगारी को वैध बना दिया गया था। अगर तीन भाई हैं, तो दो भाइयों को महाराजा की बेगारी करनी पड़ती थी। जब इंसान को इन हालात में जीना पड़ता है, तो उसका क्षरण हो जाता है। मुझे इसमें भी कोई शुबहा नहीं है कि जो लोग बाहर से आए हिंदुस्तान पर राज करने, वे बाद में हिंदुस्तानी बन गए। पर वे मूलत: आक्रांता ही थे। जिन लोगों को उनके शासन में गुजारा करना पड़ा, उन्होंने अपने जीने के लिए ऐसी संस्थाएं बनार्इं, जिनके जरिए वे अपनी मूल परंपराओं को सुरक्षित रख सकें।

मनोज मिश्र : केंद्र शासित प्रदेश बनाने के पीछे क्या मकसद है?
’केंद्र शासित बनाने के पीछे तो मकसद बिल्कुल साफ है। विधानसभा का चुनाव जल्दी कराना चाहते हैं और कानून-व्यवस्था अपने पास रखना चाहते हैं। अगर राज्य रहेगा तो कानून-व्यवस्था केंद्र नहीं रख सकता। फिर आपको राष्ट्रपति शासन लगाना पड़ेगा। सरकार वहां चुनाव कराना चाहती है। सरकार की नीयत बिल्कुल साफ है। कानून-व्यवस्था वे तब तक अपने पास रखना चाहते हैं, जब तक कि आतंकवाद की समस्या खत्म नहीं हो जाती।

मृणाल वल्लरी : धारा तीन सौ सत्तर खत्म होने के बाद आप कश्मीर की कैसी तस्वीर देख रहे हैं?
’केंद्र कुछ कह ले, चाहे मैं कुछ कह लूं, लोगों के मन में शक बना रहेगा। कश्मीरियों के दिमाग में शक बने रहेंगे। मगर मुझे लगता है कि सरकार की साख दांव पर है। अगले छह महीने में जमीनी स्तर पर सकारात्मक चीजें दिखानी पड़ेंगी। जैसे खुशहाल अर्थव्यवस्था। कुछ होता हुआ दिखना चाहिए। यह मत भूलिए कि यह वही लड़का है, जो दो सौ रुपए लेकर पत्थर फेंकने के लिए आता है, अगले दिन जब बीएसएफ की भर्ती होती है, तो वही लड़का वहां जाकर भर्ती के लिए खड़ा होता है। अगले दिन वह कहीं ठेला लगाता है। बहुत बेरोजगारी है कश्मीर में। पूरे देश की औसत आय ग्यारह हजार रुपए है, मगर कश्मीर की औसत छह हजार छह सौ रुपए है सालाना। कश्मीरी की सबसे बड़ी शिकायत और जायज शिकायत है कि बाकी हिंदुस्तान में लोग अपने प्रतिनिधि चुनते हैं, मगर कश्मीर में कुछ नेता प्रतिनिधि चुनते हैं। पुलिस वाले खड़े होकर वोट डाल देते हैं। मैंने खुद ऐसा होते देखा है। तो, मैंने लोगों से पूछा कि यह बताओ ईमानदारी से कि इसकी बुनियाद कहां पड़ी? शेख साहब बहुत लोकप्रिय नेता थे। वे जिसे कहते थे, लोग उसे जिता देते थे। मगर उनमें इतना अहंकार था कि वे बर्दाश्त नहीं कर सकते थे कि उनके उम्मीदवार के खिलाफ कोई पर्चा दाखिल कर दे। पहले चुनाव में उनहत्तर प्रत्याशी बगैर चुनाव के जीत कर आए थे वहां। सबके पर्चे खारिज करा दिए थे उन्होंने। मगर जिस प्रत्याशी का पर्चा खारिज हुआ वह चुनाव आयोग को शिकायत नहीं कर सकता था, क्योंकि धारा तीन सौ सत्तर की वजह से निर्वाचन आयोग को वहां सुनवाई का अधिकार ही नहीं था। इसी तरह वहां जो पैसा भेजा जा रहा है, वह जा कहां रहा है, कोई पूछ ही नहीं सकता, क्योंकि तीन सौ सत्तर की वजह से सीएजी का अधिकार क्षेत्र ही नहीं है वह। अब यह सब सोचने की बात है कि कहीं भी कोई भी प्रावधान स्थायी होंगे, तो वे एक विशेषाधिकार प्राप्त तबके को जन्म देंगे। और जब विशेषाधिकार प्राप्त तबका आएगा, तो वह एक बड़े समुदाय को दबा कर रखेगा। बराबरी होगी, तो सामान्य जन को ताकत मिलेगी।

पंकज रोहिला : कश्मीर को लेकर इस वक्त जो प्रावधान हैं, वे आपकी नजर में कितने खरे उतरते हैं?
’मैं यह देखता हूं कि 1953 में शेख अब्दुल्ला साहब लोकतांत्रिक ढंग से चुने गए मुख्यमंत्री थे। पंडित जवाहरलाल नेहरू के दोस्त थे। विधानसभा में अविश्वास प्रस्ताव नहीं लाया गया था। मुख्यमंत्री को गिरफ्तार करके जेल में डाला गया। इससे अच्छा मौका क्या हो सकता था विपक्ष के लिए? मगर कोई नहीं बोला, क्योंकि लोकतंत्र भी तो तभी चलेगा न, जब देश होगा! चार दिन से शेख साहब की बैठकें रोज अमेरिकी राजदूत के साथ हो रही थीं। इसी तरह इंदिरा जी के समय में 370 को लगभग नब्बे फीसद कमजोर कर दिया गया, मगर कोई नहीं बोला। इसलिए नहीं बोला कि यह एक अस्थायी प्रावधान है, इसे एक साथ हटाइए या फिर आहिस्ता-आहिस्ता हटाइए। राज्यों का एकीकरण तो देश में होना ही है न! सिक्किम का मामला हुआ, और भी मामले हुए, किसी ने कुछ नहीं बोला। मैं तो हैरत में हूं कि आज मुख्य विपक्षी पार्टी जिस तरह से व्यवहार कर रही है, कि पार्टी में ही विरोध खड़ा हो गया! इसलिए कि उन्हें अंदाजा ही नहीं है कि कुछ चीजें ऐसी होती हैं, जिनके विरोध की जरूरत नहीं होती। हर चीज कानून-कायदे के मुताबिक होनी चाहिए। मुझे लगता है कि अगले छह महीने में अर्थव्यवस्था के स्तर पर कुछ होता हुआ नजर आए, तो कश्मीर में बदलाव नजर आने लगेगा। हमारे लिए 370 सिर्फ विविधता दर्शाने वाली चीज हो सकती थी। मगर उसका लगातार इस्तेमाल किया गया, अलगाववाद पैदा करने के लिए। फिर ऐसे प्रावधान को क्यों रहने दिया जाना चाहिए था! कोई भी जिम्मेदार सरकार इसे नहीं रहने देगी।

दीपक रस्तोगी : कश्मीर मामले में अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप की कितनी गुंजाइश है?
’अब हम उसे हरगिज स्वीकार नहीं कर सकते। जब हमने तिरानबे हजार फौजियों को छोड़ा तब हमने कागज पर लिखवा लिया था कि अब जितने भी हमारे-आपके मसले हैं, वे अंतरराष्ट्रीय नहीं हैं। अब वे द्विपक्षीय हैं। उनके प्रधानमंत्री ने उस पर दस्तखत किए थे। यह तो कतई हो नहीं सकता कि जिस दिन आपको तिरानबे हजार कैदी छुड़वाने हैं, उस दिन आप इसे द्विपक्षीय मान लीजिए और जिस दिन आप उस स्थिति से बाहर निकल जाइए, उस दिन उसे अंतरराष्ट्रीय करार दे दीजिए। यह कैसे हो सकता है?

सूर्यनाथ सिंह : धारा तीन सौ सत्तर हटने के बाद सरकार के सामने क्या चुनौतियां हैं? वहां से उजड़ कर भागे लोगों की जमीन-जायदाद वापस दिलाने में कितनी मुश्किलें आएंगी?
’मुझे लगता है कि हम लोगों को कई गलतफहमियां हैं। कश्मीरी पंडितों की जमीन-जायदाद पर किसी ने कब्जा नहीं किया है। वे भागे हैं जरूर। वह माहौल ऐसा बना कि वे भागे। मगर उनके घरों में आज भी ताले लगे हैं। उनके घरों में कोई घुसा नहीं। तो, मुझे नहीं लगता कि यह कोई समस्या होगी कि कश्मीरी पंडित दुबारा वहां पहुंच जाएं। उनको तो पहुंचना ही है। कश्मीरी खुद भी यही चाहता है। कश्मीर में पर्यटन की अपार संभावनाएं हैं। कश्मीरी भी उसका विकास चाहता है। मैं तो कहता हूं कि फिलहाल बाकी चीजों को भूल जाइए, सिर्फ पर्यटन में वहां निवेश कराइए। इतना रोजगार पैदा होगा वहां छह महीने के अंदर कि आप दंग रह जाएंगे।

मनोज मिश्र : शाहबानो से लेकर तीन तलाक तक का सफर पूरा हो चुका है। अब क्या लगता है कि समान नागरिक संहिता का रास्ता आसान हो गया है?
’समान नागरिक संहिता को नीति निर्देशक सिद्धांतों में रखा गया है। अनुच्छेद 44 में। भारत में कभी भी विविधता ने परेशान नहीं किया। हमने हमेशा विविधता का जश्न मनाया है। भारत की परंपराएं, उसकी सनातनता के चलते विविधता भारत को मजबूत करने का स्रोत है। इसलिए भी हमने महसूस किया कि समान नागरिक संहिता होनी चाहिए। साथ ही यह भी महसूस किया कि एक जमाने से इसे धार्मिक आस्थाओं से जोड़ा गया है। लिहाजा, एक भ्रांति दूर करने की जरूरत है। बहुत सारे लोगों के दिमाग में एक भ्रम है। जब हिंदू कोड बिल बनाया गया, तब भी उसका विरोध हुआ कि इससे धार्मिक आस्था को चोट पहुंचेगी। नागरिक संहिता हमारी जरूरत है। जनतंत्र में, सेक्युलर राजनीति में एक बुनियादी सिद्धांत है, आप कोई भी कानून बनाइए, उसमें ऐसा कोई भी काम करने को न कहा जाए, जिसे करने से मेरी आस्था मना करती हो। और ऐसा कोई काम करने से मुझे रोका नहीं जाना चाहिए, जिसे करना मेरे ऊपर जरूरी किया गया हो। समान नागरिक संहिता इस बात से तो मुझे नहीं रोक सकता कि मुझे अपनी पत्नी को मेहर देनी है, क्योंकि वह मुझ पर जरूरी किया गया है।

मृणाल वल्लरी : धर्म के अलावा एक बड़ी ताकत बाजार है। आज मुसलिम समाज में जो मध्यवर्ग बन रहा है, उस पर बाजार का बहुत असर पड़ा है। इसे आप कैसे देखते हैं?
’बहुत सकारात्मक ढंग से देखता हूं। बाजार ने निश्चित रूप से इसमें भूमिका निभाई है। एक समय था, जब हमारे परिवारों की बच्चियां दस-बारह साल की उम्र के बाद घरों से नहीं निकल सकती थीं। घरों पर पढ़ाई होती थी, लड़कियों की। तब स्कूल भी नहीं होते थे गांवों में। मगर आज जब अपने गांव को देखता हूं, तो तबीयत खुश हो जाती है। जब मैं सड़क पर खड़ा हो जाता हूं तो देखता हूं कि पचास से ज्यादा लड़कियां पंद्रह, सोलह, सत्रह साल उम्र की, साइकिल चला कर छह किलोमीटर दूर कॉलेज जा रही होती हैं। यह मामूली बदलाव नहीं है। तो, मैं सबसे कहता हूं कि यह जो बदलाव आया है, यही मुझे सबसे ज्यादा आशावादी बनाता है। यह बदलाव कैसे आया है, इस पर दो राय हो सकती है, क्योंकि मौलवी तो अब भी मुखालफत कर रहा है, खासकर लड़कियों की शिक्षा पर। लेकिन अब कोई उनकी बात नहीं सुन रहा है। तो इन लड़कियों पर मुल्ला का असर नहीं पड़ेगा। मुल्ला जो ऐसे लोगों पर अपनी बात को धर्म बना कर थोप रहा है और उनके पास यह जांचने का कोई तरीका नहीं है कि वह जो कह रहा है वह वास्तव में धर्म है या नहीं, उससे भी ये लड़कियां बची रहेंगी। फिर जब ये लड़कियां मां बनेंगी, तब इनके बच्चों पर बहुत सकारात्मक असर पड़ेगा।

अरविंद शेष : तीन तलाक के मामले में असराफ मुसलमानों के बाद पसमांदा मुसलमानों में भी सकारात्मक प्रतिक्रियाएं दिख रही हैं। इसे आप कैसे देखते हैं?
’बहुत सकारात्मक। 1986 में तो हाल यह था कि मैं जिन तीन सौ बाईस लोगों की बात कर रहा था, मेरे इस्तीफे के बाद उनमें से बहुत सारे लोग मेरे घर आते थे मिलने। मुझे समझाते थे कि मौलवी बड़े ताकतवर हैं, अब आगे कुछ मत कीजिए, वे आपको नुकसान पहुंचा सकते हैं। बात करते हुए डरते थे। मगर आज तो हालत यह है कि 2017 में जब सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया, तो बहुत पिछड़े इलाकों में भी लड़कों ने मुसलिम पर्सन लॉ बोर्ड के फरमान का विरोध शुरू कर दिया। उन्होंने उनके फरमान पर दस्तखत नहीं किया। उन्होंने कहा कि हम कुरान को मानते हैं, पर्सनल लॉ बोर्ड को नहीं। आज माहौल काफी बदल चुका है।

आर्येंद्र उपाध्याय : देश मंदी की चपेट में है। विमानन कंपनियों की हालत खराब है। इस पर आप क्या कहेंगे?
’नागरिक विमानन के मामले में मुझे लगता है कि जब भी प्रतिस्पर्द्धा होगी, तो बुरे प्रबंधन को खमियाजा तो भुगतना ही पड़ेगा। मगर उसी से कुछ अच्छा भी निकल कर आएगा। और जहां तक मंदी की बात है कि रोजगार नहीं पैदा हो रहा, उसमें मैं यही उम्मीद करता हूं कि अभी सरकार इस दिशा में काम करेगी। पिछले पांच साल इस सरकार के पास सुरक्षा का बोध नहीं था। अब है। मुझे ऐसा लगता है कि राजनीतिक समस्याओं से पार पाने के बाद इस सरकार का सारा ध्यान अब अर्थव्यवस्था पर होगा।

मनोज मिश्र : अलग-अलग दलों में रहने के बाद आपने सारे दलों को छोड़ दिया। अब निकट भविष्य में क्या योजना है?
’असल में, मैंने सबको नहीं छोड़ दिया। मेरा कार्यकाल बहुत छोटा था। मुझे लगता है कि जहां भी आधारभूत चीज से समझौता करना संभव नहीं है, मैं खुद को अलग कर लेता हूं। मैंने कभी किसी को बुरा नहीं कहा। खामोशी से खुद को अलग कर लेता था। मैंने बहुत पहले शुरू कर दिया था। जब मैं मंत्री बना तो मेरी उम्र पच्चीस साल चंद महीने थी। तो, मुझे भी हक हासिल है कि जिंदगी का आनंद लूं। कुछ लोग शुरू में करते हैं, मैं बाद में कर रहा हूं। बस इतना अंतर है।

दीपक रस्तोगी : क्या भीड़ हिंसा को लेकर कोई अलग से कानून बनाने की जरूरत है?
’पहला सवाल जो पूछना चाहिए वह यह पूछा जाना चाहिए कि जब भी कोई मासूम इंसान मारा जाता है, तो जो मौजूदा कानून हैं, उन्हें हमने लागू किया या नहीं किया? अगर हम मौजूदा कानून लागू नहीं कर रहे और नया कानून बना रहे हैं, तो वह भी नहीं लागू होगा। मैं खुद भी भुक्तभोगी हूं, इसलिए मैं भीड़ की हिंसा को कबूल नहीं कर सकता। मगर जब आप इस पर सांप्रदायिक रंग लगाएंगे, तो वह ठीक नहीं है। पचास के दशक में भी अनेक घटनाएं हुई थीं। आज के राजनेता सार्वजनिक रूप से उन लोगों के खिलाफ कुछ बोल तो देते हैं, पीड़ितों के साथ सहानुभूति तो जता देते हैं, पचास के दशक में तो यह भी नहीं था। हम हकीकत को नजरअंदाज नहीं कर सकते। विभाजन ने हमारी सोच को भी विभाजित कर दिया। अब कोशिश यही होनी चाहिए कि यह विभाजन कैसे जल्दी से जल्दी खत्म हो जाए।

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