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बारादरीः स्वास्थ्य क्षेत्र में क्रांति लाएगी आयुष्मान भारत योजना

केंद्रीय स्वास्थ्य राज्यमंत्री अश्विनी चौबे का कहना है कि पिछले चार सालों में स्वास्थ्य सेवाएं निरंतर आगे बढ़ी हैं। केंद्र सरकार की स्वास्थ्य नीति में गरीब, अमीर सब पर समान रूप से ध्यान दिया गया है। सभी सुखी और निरोग हों, इसी नीति के तहत आयुष्मान भारत एक अहम कदम है, जिसमें गरीब से गरीब आदमी को चिकित्सा सुविधाएं मिल सकेंगी। उन्होंने स्वास्थ्य सेवा में बुनियादी ढांचा, जेनेरिक दवाओं से लेकर निजी अस्पतालों के महंगे इलाज जैसे मुद्दों पर बातचीत की। इस कार्यक्रम का संचालन किया कार्यकारी संपादक मुकेश भारद्वाज ने।

मैं नहीं कहता कि जो आयुष्मान भारत हम शुरू करने जा रहे हैं, उसमें शत-प्रतिशत सफल हो ही जाएंगे। अभी तो हम सीखने की प्रक्रिया में हैं, विद्यार्थी हैं।

दीपक रस्तोगी : सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं के मामले में लोगों की शिकायतें बनी हुई हैं। आप ऐसा क्या करने जा रहे हैं, जिससे चिकित्सा सुविधाएं हर आदमी तक पहुंचें?

अश्विनी चौबे : मेरा इस क्षेत्र में जो भी व्यक्तिगत अनुभव है, उसके माध्यम से एक छोटी-सी जिम्मेदारी लेकर उसका निर्वहन कर रहा हूं। स्वास्थ्य नीति को ध्यान में रख कर हम आगे बढ़ रहे हैं। हमारी कोशिश है कि लोगों में विश्वास बढ़े, उन्हें लगे कि हम कुछ कर रहे हैं। जो चिकित्सा हम लोगों को उपलब्ध करा रहे हैं, वे लोगों को विश्वसनीय लगें। प्रिवेंटिव, प्रोग्रेसिव, प्रोमोटिव हेल्थ केयर हमारी स्वास्थ्य नीति का मूल उद्देश्य है। उसी को ध्यान में रख कर चल रहे हैं। हमारी स्वास्थ्य नीति में गरीब, अमीर सब पर समान रूप से ध्यान दिया गया है। पिछले चार सालों में स्वास्थ्य सेवाएं निरंतर आगे बढ़ी हैं। प्रधानमंत्री जी खुद स्वास्थ्य और शिक्षा को लेकर काफी संजीदा हैं, इसलिए उनका मार्गदर्शन लगातार मिलता रहता है। उसी नीति के तहत सर्वे भवंतु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया। सभी सुखी और निरोग हों, हमारी स्वास्थ्य नीति इसी परिकल्पना पर आधारित है और आयुष्मान भारत उसी नीति का एक महत्त्वपूर्ण कदम है, जिसमें गरीब से गरीब आदमी को चिकित्सा सुविधाएं मिल सकेंगी।

अनिल बंसल : आयुष्मान भारत में निजी अस्पताल आपकी दरों से सहमत नहीं हैं, फिर इसे कैसे सफल बनाएंगे?

मैं नहीं कहता कि जो आयुष्मान भारत हम शुरू करने जा रहे हैं, उसमें शत-प्रतिशत सफल हो ही जाएंगे। अभी तो हम सीखने की प्रक्रिया में हैं, विद्यार्थी हैं। हमारा विभाग, प्रधानमंत्री कार्यालय और नीति आयोग मिलकर निरंतर जो काम कर रहे हैं, उसमें बहुत कुछ हासिल हुआ है। जहां तक मेरी जानकारी है, इसमें कई बड़े-बड़े अस्पताल सहभागिता के लिए आगे आए हैं। हमारे पास विदेशों से कई लोग आए और कहा कि हम भी इसमें सहयोग करना चाहते हैं। उनतीस राज्यों के साथ हमने समझौता किया है। उन्होंने इसे माना है। हम उस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। मुझे लगता है कि पचास करोड़ आबादी को इस योजना का लाभ मिलने जा रहा है। कुछ राज्यों को छोड़ दें, तो बहुत से राज्यों में गांव-गांव में स्वास्थ्य उपकेंद्र नहीं बन पाए हैं। इसलिए पहली बार हमने सोचा कि इलनेस सेंटर को वेलनेस सेंटर में कैसे बदला जाए। इस तरह हमने डेढ़ लाख स्वास्थ्य उपकेंद्रों को आयुष्मान भारत योजना से जोड़ने की रूपरेखा तैयार की है। फिर पांच लाख रुपए की स्वास्थ्य बीमा योजना कोई छोटी बात नहीं है। इसके लिए बड़ी संख्या में निजी अस्पताल तैयार हो गए हैं। और भी अस्पतालों का पंजीकरण हो रहा है। सब लोग धीरे-धीरे समझ गए हैं। समाज के लिए केवल सरकार थोड़े ही करेगी, उन्हें भी तो कुछ जिम्मेदारी निभानी पड़ेगी! यह आग्रह करने पर बहुत सारे अस्पतालों ने अपने शुल्क कम कर दिए हैं। इस तरह काम आगे बढ़ रहा है।

दीपक रस्तोगी : इस योजना के तहत सरकारी अस्पतालों के मूलभूत ढांचे को ठीक करने की बात क्यों नहीं सोची गई?

एक ओर तो हम निजी अस्पतालों को इस योजना से जोड़ रहे हैं, दूसरी ओर गांवों के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और स्वास्थ्य उपकेंद्रों को बेहतर बनाने की कोशिश कर रहे हैं। हमने 2022 का लक्ष्य रखा है कि हर स्वास्थ्य केंद्र पूरी तरह सुसज्जित हो जाए। उसके पास अपना भवन हो, डॉक्टर हों, स्वास्थ्य उपकेंद्रों में बारह प्रकार की चिकित्सीय सुविधाएं देने जा रहे हैं, जिसमें तमाम तरह के गैर-संचारी रोगों के निदान की व्यवस्था होगी। इसमें वृद्ध लोगों के स्वास्थ की भी चिंता की जा रही है। बारह प्रकार की चिकित्सीय सुविधा में इसे भी जोड़ा गया है। गांव का कोई आदमी बीमार हो जाता है, तो उसे जिला अस्पताल या बड़े शहर के किसी अस्पताल में जाना पड़ता है। ऐसे में अगर हम उपकेंद्रों को सुसज्जित कर देंगे, तो लोगों को दूर नहीं जाना पड़ेगा। इसके अलावा हम वहां लोगों को टेली हेल्थ सुविधा भी उपलब्ध कराएंगे, जिसमें उपकेंद्रों के डॉक्टर या चिकित्सा सहायक बड़े अस्पतालों के विशेषज्ञ डॉक्टरों से सलाह करके चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराएंगे।

मनोज मिश्र : इन दिनों बिहार के गावों से लोगों का सबसे ज्यादा पलायन शिक्षा और स्वास्थ्य की वजह से हो रहा है। यह कम क्यों नहीं हो पा रहा?

यह वास्तविकता है कि बिहार में उद्योग-धंधे नहीं हैं। वहां खेती आधारित जीवन ज्यादा है। इसलिए रोजगार के लिए लोग वहां से दूसरी जगहों पर जाते हैं। अच्छे रोजगार के लिए किसी को कहीं और जाना पड़े, तो यह अच्छी बात है। बहुत से लोगों ने परिश्रम करके बाहर अपने को बनाया भी है। पर चिकित्सा के लिए बाहर जाना पड़े, तो निस्संदेह चिंता की बात है। पर 2017 में जबसे स्वास्थ्य नीति बनी है, शिशु और मातृ मृत्यु दर में कमी आई है। झारखंड जैसे राज्य में भी स्वास्थ्य के स्तर में सुधार आया है। हमारा बल इस बात पर है कि जच्चा और बच्चा दोनों को कैसे स्वस्थ रखें। उसके लिए नीचे से लेकर ऊपर तक की इकाई को बेहतर बनाने का प्रयास हुआ है। इसका असर व्यापक हुआ है। इंद्रधनुष योजना से साढ़े तीन करोड़ बच्चों का टीकाकरण हुआ। करीब नब्बे लाख गर्भवती महिलाओं को स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराई गर्इं। पचास लाख से ज्यादा गर्भवती महिलाओं को छह हजार रुपए सालाना दिए गए। हमारा मानना है कि अगर हमने मातृ और शिशु मृत्यु दर पर काबू पा लिया, तो स्वास्थ्य का सूचकांक बेहतर होता जाएगा। इस तरह हम तेजी से टिकाऊ विकास की तरफ बढ़ रहे हैं।

मुकेश भारद्वाज : काफी समय से निजी अस्पतालों को भी नियंत्रित करने की जरूरत महसूस की जा रही है। क्या केंद्र सरकार ने इस बारे में सोचा है कि निजी अस्पतालों के मनमाने ढंग से शुल्क वसूली पर लगाम लगाई जानी चाहिए?

यह बात मेरे दिमाग में शुरू से रही है। सांसद के तौर पर यह बात मैंने दो बार संसद में भी उठाई। तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री से भी इस संबंध में बात की थी। आज उस दिशा में मैं खुद एक कदम आगे बढ़ा रहा हूं। यह ठीक है कि निजी अस्पतालों पर सरकारी नियंत्रण नहीं है, पर जहां-जहां से अनावश्यक फीस लेने के मामले हमारे सामने आए, हमने उसमें हस्तक्षेप किया। आए दिन ऐसी शिकायतें आती रहती हैं। जो व्यक्ति अपनी जमीन-जायदाद बेच कर इलाज के लिए आ रहा है, आप उसका शोषण करें, यह हम कदापि सहन नहीं कर सकते। इसलिए हमने इसे नियंत्रित करने के लिए एक तंत्र बनाने का सोचा है।

अनिल बंसल : सरकारी स्तर पर घोषणाएं होती हैं, पर हकीकत यह है कि व्यवहार के स्तर पर वह नहीं उतर पा रहा। जैसे जेनेरिक दवाओं का मामला है, कोई डॉक्टर लिखता ही नहीं।

आपकी बात सही है कि डॉक्टर जेनेरिक दवा लिखे, चाहे वह निजी अस्पताल हो या सरकारी। लोगों को दवाएं सस्ती मिलें, हम भी चाहते हैं। इसलिए गांव के स्तर पर डॉक्टर जो दवाएं लिखते हैं, उन पर निगरानी रखी जा रही है। अब डॉक्टर भी कहने लगे हैं कि हमें जेनेरिक दवाएं चाहिए। सरकार की तरफ से एक हजार चौवन दवाओं का मूल्य नियंत्रित किया गया है और उसमें दस हजार करोड़ रुपए की बचत हुई है। प्रधानमंत्री जनऔषधि योजना के तहत हमने सरकारी से लेकर निजी अस्पतालों तक में तीन हजार दो सौ सोलह दुकानें नियंत्रित की हैं, जिनमें दवाएं साठ प्रतिशत कम में मिलती हैं। इसी तरह सौ से ज्यादा हमारी अमृत फार्मेसी काम कर रही हैं। इस योजना के तहत हृदय रोग या घुटना प्रत्यारोपण आदि से संबंधित उपकरण साठ से नब्बे फीसद तक कम कीमत में मिलते हैं। दवाओं का मूल्य नियंत्रण करने से दवाओं की कीमतें तीस से चालीस प्रतिशत कम हो गर्इं। अगर देशभर में जेनेरिक दवाएं चलेंगी, तो यह सबसे बड़ी उपलब्धि होगी। हमारी योजना है कि 2022 तक दस हजार दुकानें खोल दें। इसके अलावा कोशिश है कि डॉक्टर जेनेरिक दवाएं लिखें भी।

आर्येंद्र उपाध्याय : निजी अस्पतालों की बिलिंग पर नियंत्रण रखने में आपको कहां बाधा आ रही है?

कोई बाधा नहीं आ रही। देखिएगा, आयुष्मान भारत योजना एक क्रांति लाएगी। देखिए कि निजी अस्पताल इस योजना से जुड़े। कई लोग प्राइवेट पब्लिक पार्टनरशिप के तहत जुड़ने को तैयार हैं। कई लोगों ने जिलों में जमीन खोजना शुरू कर दिया है कि यह योजना शुरू होगी, तो वहां अस्पताल बनाना पड़ेगा। जिन राज्यों के साथ हमारे समझौते हुए हैं, उनसे हमने कहा है कि आप अपने यहां निजी अस्पतालों को नियंत्रित करने की दिशा में सोचें। अभी सारे राज्यों के स्वास्थ्य मंत्रियों की बैठक में हमने कहा कि हमने जो नियम-कायदे बनाएं हैं, उनका पालन कराएं। मुझे लगता है कि इस दिशा में कारगर कदम बढ़ाया गया है।

मृणाल वल्लरी : व्यवहार के स्तर पर हम देखते हैं, तो जन औषधि केंद्र ढूंढ़े नहीं मिलते, वहां दवाएं भी नहीं मिलतीं?

नहीं, इस मामले में दुष्प्रचार ज्यादा हुआ है। दिल्ली तो छोड़ दीजिए, सुदूर गांवों में भी दवाएं उपलब्ध कराई गई हैं। कुछ समय के लिए कुछ दवाओं की अनुपलब्धता जरूर हुई थी, पर उसे ठीक कर लिया गया है। दवाओं की कमी के पीछे कुछ माफिया का हाथ था। इसलिए सरकार ने उसे तुरंत ठीक कर लिया। देश भर में बत्तीस सौ से ज्यादा केंद्र चल रहे हैं, और ठीक से चल रहे हैं। दस हजार से ज्यादा दुकानें जो हम खोलना चाहते हैं, वह योजना भी सफल होगी।

सूर्यनाथ सिंह : राज्य सरकारों का अपेक्षित सहयोग न मिल पाने के कारण केंद्र की लगभग सभी योजनाएं लक्ष्य तक नहीं पहुंच पातीं, भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाती हैं। इस पर निगरानी रखने की क्या व्यवस्था की है आपकी सरकार ने?

आयुष्मान भारत में हमने निगरानी की व्यवस्था की है। राज्यों के स्तर पर भी निगरानी की व्यवस्था की गई है। इसके लिए एक केंद्रीय एजंसी बनाई गई है। उस एजंसी की मदद से दोषी पाए जाने वालों को दंडित करने की व्यवस्था भी है। भ्रष्टाचार को पूरी तरह समाप्त किया जा सके, इसके लिए राज्य सरकारों को लगातार सतर्क करने का प्रयास किया जा रहा है।

अनिल बंसल : आम चुनाव नजदीक हैं। आपको क्या लगता है कि बिहार में आपके घटक दल साथ बने रहेंगे?

अभी तक तो ठीक है। किसी का किसी से व्यक्तिगत दुराव भले हो, पर पार्टी के स्तर पर अभी तक तालमेल बिल्कुल ठीक है। हालांकि राजनीति में कोई अंतिम लकीर नहीं होती, पर अभी तक हमारे जो घटक दल हैं, वे संगठित हैं और रहेंगे। इसके अलावा दूसरे लोग भी जुड़ेंगे, पूरे देश के स्तर पर जुड़ेंगे। बिहार में चालीस सीटें हैं और उनका बंटवारा स्वाभाविक ढंग से होगा।

मुकेश भारद्वाज : महागठबंधन से कितना खतरा महसूस करते हैं?

यह महागठबंधन नहीं, मैं कहता हूं महाठगबंधन है। ये लोग सदा से भ्रामक प्रचार करते आए हैं, वही कर रहे हैं। इनमें हर कोई प्रधानमंत्री बनने का सपना देख रहा है। और मुझे लगता है कि यही सपना उन्हें एक नहीं रहने देगा। यह गठबंधन चारों खाने चित होगा।

मृणाल वल्लरी : पिछले कुछ दिनों से राहुल गांधी जिस तरह आपकी नीतियों को लेकर हमलावर हुए हैं, उसे आप किस तरह देखते हैं?

राजनीति में विरोध होना चाहिए। मगर झूठी बातें नहीं बोलनी चाहिए। मर्यादा में रहना चाहिए। राहुल जी जिस तरह संसद और संसद के बाहर रफाल की चर्चा कर रहे हैं और जिस प्रकार की झूठी बातें कह रहे हैं, अनर्गल बयानबाजी कर रहे हैं, जिसका कोई सिर-पैर नहीं है, उसे सिद्ध करके दिखा दें। अगर वे सही हैं, तो अदालत में जाएं और खुद को सही साबित करके दिखा दें। वे जिस वंश परंपरा से आते हैं, वह इसी तरह की बातें करता आया है। मैं तो कहता हूं कि अगर सचमुच में कांग्रेसमुक्त भारत बनेगा, तो इससे बड़ा गुणवान, इससे बड़ा चरित्रवान अध्यक्ष शायद कांग्रेस को नहीं मिलेगा, जो देश को कांग्रेसमुक्त बना कर छोड़ेगा। चाहे वे मानसरोवर जाएं, चाहे जहां जाएं, उससे उन्हें कोई लाभ नहीं मिलने वाला।

सूर्यनाथ सिंह : आरक्षण के विवाद का आने वाले चुनाव पर कोई असर पड़ेगा?

मुझे लगता है कि यह विवाद कुछ लोग जान-बूझकर खड़ा कर रहे हैं। इसमें विपक्ष के लोग हवा देने का काम कर रहे हैं। यह देश के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है। आने वाले दिनों में आप देखेंगे कि चाहे वह सवर्ण हो, पिछड़ा हो, दलित हो या किसी भी समुदाय का हो, सबका रुझान नरेंद्र भाई मोदी की तरफ है।

अरविंद शेष : यूपीए सरकार के समय में जब डीजल-पेट्रोल की कीमतें बढ़ीं, तब भाजपा का तर्क अलग था, अब अलग है, ऐसा क्यों?

लोग यह देखते हैं कि पहले चार कुएं थे, अब सौ हो गए। वे यह नहीं देखते कि अर्थव्यवस्था कैसे चल रही है। हमारा मतदाता गांव का है और वह यह देखता है कि पहले खेत को पानी नहीं मिलता था, अब मिलने लगा है। तो वह इस आधार पर हमें वोट देगा। और जहां तक अर्थव्यवस्था की बात है, हमने जीडीपी दर को बढ़ाया है। नोटबंदी की वजह से जरूर शुरू में थोड़ी असुविधा हुई, पर अब उसका सकारात्मक असर दिखाई देने लगा है। जहां तक पेट्रोल-डीजल की बात है, उसे भी नियंत्रित करने का प्रयास कर रहे हैं। महंगाई हम किसी भी रूप में बढ़ने नहीं देंगे, यह हमारी सरकार की स्पष्ट राय है।

अश्विनी चौबे – केंद्रीय स्वास्थ्य राज्यमंत्री अश्विनी चौबे का जन्म 2 जनवरी 1953 को बिहार के भागलपुर जिले में हुआ। पटना विश्वविद्यालय से स्नातक करने के दौरान ही अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के छात्र नेता के तौर पर अपनी खास पहचान बनाई। उस समय सरकारी दमन के कारण इनके स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ा। बिहार के बक्सर से भाजपा के सांसद हैं। कांग्रेस और उसके नेताओं पर कड़े शब्दों में हल्ला बोलने के कारण मीडिया की सुर्खियों में बने रहते हैं।

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