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वीरेंद्र यादव के सभी पोस्ट

साहित्य और आंदोलनधर्मिता – बैठे ठाले का शगल

मौजूदा दौर में हिंदी साहित्य की मुख्यधारा में आंदोलनों की अनुपस्थिति का एक बड़ा कारण हिंदी समाज की जड़ों से इसका उस तरह जुड़ाव...

मौजूदा दौर में लेखक संगठन

स्वीकार करना होगा कि राजनीतिक दलों की वोट बैंक की राजनीति की बाध्यता के चलते अपनी प्राथमिकताएं और व्यूहरचना होती है।

चर्चा: युवा पठनीयता के इलाके

आज अगर हिंदी का गंभीर साहित्य कुछ हजार पाठक-लेखकों तक सिमट कर रह गया है।

मनुसंहिता नहीं मार्क्सवादी सौंदर्यशास्त्र

प्रेमचंद ने बिना मार्क्सवाद का नाम लिए कहा था- ‘हमारी कसौटी पर वही साहित्य खरा उतरेगा, जिसमें उच्च चिंतन हो, स्वाधीनता का भाव हो,...

अवसरः जहां से रोशनी की लकीर निकलती है

‘गोदान’ के प्रकाशन के अस्सीवें वर्ष में प्रेमचंद के इस उपन्यास का पुनर्पाठ भारतीय समाज की उन मूलभूत सच्चाइयों से रूबरू होना है, जिसे...

साहित्य : आलोचना नहीं, प्रशस्तिवाचन

सच है कि आलोचकों से लेखकों की नींद हराम होने की हिंदी साहित्य में लंबी परंपरा रही है।