आभासी रिश्तों के जोखिम
कई बार ऐसा लगता है कि यह दुनिया जैसे-जैसे प्रगति और विकास की सीढ़ी चढ़ती जा रही है, वैसे-वैसे मानव संवेदना, समझ और नैतिकता...
मृत संवेदनाओं के ढांचे
कई बार यथार्थ पर विश्वास नहीं करने का मन करता है। कई बार यथार्थ घटनाएं किसी काल्पनिक सिनेमा के दृश्य की तरह आंखों के...
दुनिया मेरे आगे: नन्ही मेरी बिटिया होगी
मुझे नहीं पता कि लोगों पर सामाजिक खबरों का क्या असर होता है और ऐसी खबरों से लोग समाज के दिशा-दशा का ज्ञान कर...
दुनिया मेरे आगे: भरोसे की रोशनी में
मौजूदा दौर में महामारी के संकट ने हमें जितनी आर्थिक चोट पहुंचाई है, उससे कई गुना ज्यादा हम मानसिक और भावनात्मक आघात झेल रहे...
दुनिया मेरे आगे: निर्भय भोर की तलाश
एक सच्चाई यह भी है कि आज भी पारिवारिक-सामाजिक भीरुता और कुंद सोच अधिकतर मामलों की शिकायत दर्ज नहीं होने देती। पूर्णबंदी के दौरान...
दुनिया मेरे आगे: पितृसत्ता की परतें
जब तक हम ऐसी सोच और मानसिकता नहीं बदलेंगे यह समाज भी नहीं बदलेगा। बलात्कारी का विवाह तक रचा दिया जाता है, जिसके साक्षी...
दुनिया मेरे आगे: परंपरा का बोझ
कई बार अकाल मौत की वजह से अपनों को खोने के दुख के साथ-साथ ऐसे मृत्यु-भोज का आयोजन आर्थिक दबाव के साथ भावनात्मक और...
दुनिया मेरे आगे: दमन का समाज
हीरो अपनी नायिका से प्रेम तो जता रहा है, लेकिन इस परोक्ष धमकी के साथ कि अगर उसने कभी किसी और से प्रेम...
दुनिया मेरे आगे: सम्मान का परदा
किन्हीं हालात में माता-पिता या परिवार को लगता है कि बच्चों का चुनाव गलत है तो खुल कर बात की जा सकती है।
दुनिया मेरे आगेः स्त्री की छवि
कुछ साल पहले मैं प्रबंधन की पढ़ाई कर रही थी। राजस्थान के एक छोटे-से गांव में बना वह संस्थान शहरी शोर-शराबे से कोसों दूर...
दुनिया मेरे आगेः जीवन की डोर
कुछ समय पहले एक दिन जब दफ्तर पहुंची, तब सब सामान्य ही लग रहा था। लेकिन तकरीबन ग्यारह बजे एक टीम में थोड़ी अफरा-तफरी...
परिसर का परिवेश
आखिर विश्वविद्यालय तक पहुंचने वाला हर छात्र मजबूत पृष्ठभूमि से ही हो, जरूरी नहीं है। कुछ ऐसे भी हो सकते हैं जो भयानक अभावों...


























