सूर्यप्रकाश चतुर्वेदी

सूर्यप्रकाश चतुर्वेदी के सभी पोस्ट 17 Articles

दुनिया मेरे आगे: पैरोडी की कला

फिराक साहब की या बेगम अख्तर की नकल करके कक्षा में या महफिल में शराब और सिगरेट पीने मात्र से कोई फिराक या बेगम...

दुनिया मेरे आगे: औपचारिकता का यथार्थ

पिछली सदी के सत्तर के दशक की बात है। एक सख्त मिजाज प्राचार्य मातहतों को आसानी से आकस्मिक अवकाश नहीं देते थे। एक तेज...

अपना-अपना सत्य

चित्रकार और कवि ही नहीं, हम सभी मूल सत्य की छवि को ही अपने आसपास देखते हैं और इसे देखना हमारे दृष्टिकोण और नजरिए...

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बचपन और मासूमियत

ठीक ही कहा जाता है कि बच्चे मन के सच्चे होते हैं। मासूमियत, पवित्रता, सच्चाई और राग-द्वेष से परे साफ-सुथरा जीवन कहीं देखना हो...

बेरोजगारी का दंश

कितने ताज्जुब की बात है कि हमारे देश में बहुत से ऐसे लोग हैं जिनके पास स्थायी और हमेशा के लिए कोई काम ही...

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दुनिया मेरे आगे: दिखावे की जुबान

लोगों को तरह-तरह के शौक होते हैं। किसी तरह अंग्रेजी बोलना भी उनमें से एक है। कुछ लोग हैं जिन्हें अंग्रेजी का ज्ञान न...

दुनिया मेरे आगेः मशविरा उस्ताद

कुछ लोग हैं जो समझते हैं कि वे हर चीज के बारे में दूसरों से अधिक और बेहतर जानते हैं। ऐसे लोगों को क्या...

दुनिया मेरे आगेः अर्थ खोते शब्द

पिछले कुछ वर्षों में कुछ शब्दों ने अपना मूल अर्थ ही खो दिया है। सामाजिक सोच में आए बदलाव और चलन व व्यवहार में...

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दुनिया मेरे आगे: मनौती और मंशा

ऐसा माना जाता है कि कोई काम करने से पहले अगर मनौती मानी जाए तो सभी बाधाएं दूर हो जाती हैं। बहुत सारे लोग...

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दुनिया मेरे आगे – खुद की पहचान

हमारे लिए यही जरूरी है कि हम आत्मनिरीक्षण करें। खुद को पहचानें व अपनी क्षमता का सही उपयोग करें। जो मुमकिन है और किया...

दुनिया मेरे आगे- दूसरों की खातिर

हवा, पानी, खुशबू, रंग, सौंदर्य, फल, फूल ही नहीं, आग, रोशनी और संगीत- सभी औरों के लिए हैं।

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‘दुनिया मेरे आगे’ कॉलम में सूर्यप्रकाश चतुर्वेदी का लेख : रफ्तार का रोग

तेज रफ्तार से दौड़ रही जिंदगी में सभी तेजी से भागते नजर आते हैं। न किसी में सब्र है, न इंतजार करने की मानसिकता।...

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‘दुनिया मेरे आगे’ कॉलम में सूर्यप्रकाश चतुर्वेदी का लेख : चाहा क्या हुआ क्या

दुनिया में ऐसे लोग गिने-चुने ही हैं, जिनके सपने और हकीकत एक हों। आप असंख्य संपन्न, सुखी और भौतिक रूप से संतुष्ट लोगों पर...

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दुनिया मेरे आगेः भ्रम के विज्ञापन

क्या हम विज्ञापनों से जी रहे हैं? टीआरपी के हिसाब से चैनल अपने धारावाहिक और अन्य कार्यक्रमों के बारे में फैसला करते हैं। दर्शकों...

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दुनिया मेरे आगेः समीक्षा का पैमाना

समीक्षा का मतलब है मूल्यांकन। यानी किसी भी कृति या रचयिता का गुण-दोष के आधार पर उचित ईमानदार, संतुलित और सही आकलन। इसीलिए डॉ...

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आस्था का सागर

भारत एक धर्म प्रधान देश है। यहां आस्था प्रकट करने के अनगिनत अवसर आते हैं। खासकर दीपावली के बाद कथा, पुराण और भक्ति संध्या...

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बढ़ती उम्र का अहसास

बढ़ती उम्र का असर सभी पर होता है। फर्क इतना होता है कि किसी पर कम, किसी पर कुछ ज्यादा और किसी पर कुछ...

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