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संजय स्वतंत्र के सभी पोस्ट

द लास्ट कोच: चाहे रहो दूर, चाहे रहो पास…

अपराजिता जैसी ज्यादा उम्र की युवतियां शादी न कर के भी कितनी खुश हैं। वे अपने जीवन के फैसले खुद करती हैं। बूढ़े हो...

द लास्ट कोच-66: मुझे आसमान में उड़ने दो

यह महिला सशक्तीकरण का दौर है। शारीरिक संरचना और बल में वह पुरुषों से बेशक कमतर हो, लेकिन मानसिक धरातल पर कहीं अधिक सक्षम...

द लास्ट कोच: यहीं कहीं है खुशियों की चाबी

खुशी की तलाश में हम सभी भटकते हैं। फिर भी कितना इतराते हैं। झूठ ही सही, मगर जब लोग पूछते हैं-आप कैसे हैं, तो...

द लास्ट कोच: तुझको चलना होगा

स्त्री नदी की तरह होती है। वह चलती है तो कई जिंदगियां चलती हैं। वह हंसती हैं तो फूल झरते हैं। उसकी मुस्कान से...

चेहरे और भी हैं…

बाल श्रम ने एक नया रूप ले लिया है। सड़कों पर बच्चे भीख मांग रहे हैं। कभी पेन बेचते हैं तो कभी करतब दिखाते...

द लास्ट कोच: तमाचा

मैं इस वक्त लास्ट कोच में सफर कर रहा हूं। यह कहानी है मेरी मित्र डॉ. उज्ज्वला की सहेली सुनंदा की, जो इस समय...

द लास्‍ट कोच: अति सुधो सनेह को मारग है

मैं प्लेटफार्म नंबर तीन के अंतिम छोर पर पहुंच गया हूं। यहां एक युगल ने बरबस ध्यान खींच लिया है। वे इस तरह सट...

ये दोनों प्रेम के पुजारी हैं, कोई बताएगा इन्हें

उस दिन ठिठुरती दोपहर थी। बादलों में लुकाछिपी करता सूरज अपनी रश्मियों से प्रेम की कोपलें सहला रहा था। रेस्तरां में कॉफी पीते हुए...

कविता: मैं पिता हो जाना चाहता हूं

पढ़ें संजय स्वतंत्र की कविता "मैं पिता हो जाना चाहता हूं"

कविता: तुम्हारी हथेलियों में सुगंध

पढ़ें संजय स्वतंत्र की कविता तुम्हारी हथेलियों में सुगंध

कविताः लव का लैम्पपोस्ट

संजय स्वतंत्र की कविता

कविताः उठो, कि सुबह हो गई है

संजय स्वतंत्र की कविता

कविताः तपती दुपहरी में गुलमोहर तुम

संजय स्वतंत्र की कविता