रमेश दवे

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19 Articles

संवाद: परंपरा का अतिवाद

मनुष्य अपने स्वभाव की मनोभूमि पर परंपरा को अपनाता और त्यागता या उसमें समय और स्थिति के अनुसार परिवर्तन परिवर्द्धन करता रहा है। उसे...

शिक्षाः कमजोरी कहां

भारत में शिक्षा की दुर्दशा देख कर यह अवश्य लगता है कि अवतारी महापुरुषों और महान गं्रथों के देश की शिक्षा में कोई न...

शिक्षा नीति बनाम राजनीति

शिक्षा जिस दिन मुक्त विचारों का मानवीय संस्कार बनेगी उस दिन सरकार या राजनीति से नीति पैदा न होकर मनुष्यता की संस्कृति और संविधान...

चर्चा: स्त्री सशक्तिकरण की हकीकत, भारतीय स्त्री सशक्त या अशक्त

स्त्री सशक्तीकरण को लेकर लंबे समय से बहस चल रही है। इसके लिए अनेक अभियान, जन-जागरूकता कार्यक्रम भी चलाए गए। तमाम बहसों, गोष्ठियों में...

गांधी का नवाचार

अनुशासन को गांधी चरित्र निर्माण की पहली सीढ़ी मानते थे। चरित्रवान नागरिक स्वावलंबी और स्वाभिमानी होता है। देश में वे ऐसी चरित्रवान युवाशक्ति चाहते...

गिरती गुणवत्ता के पीछे

अरस्तू जैसे दार्शनिक ने सदियों पहले कह दिया था कि समृद्धि और संपन्नता के समय में शिक्षा अलंकार बन जाती है, जबकि विपरीत और...

प्रसंगवशः द्रोह या विद्रोह

अगर इतिहास के सत्य को बचाना है तो हमें युद्धों, व्यक्तियों, घटनाओं से हट कर संगीत, नृत्य, ललित कलाएं, साहित्य, संस्कृति और मनुष्यता का...

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प्रसंगवश: उपनिवेश-दर-उपनिवेश

शिक्षा हो या साहित्य, सभी क्षेत्रों में लोकतंत्र की उस संस्कृति का अभाव है, जो हमारे संवेदनतंत्र को जाति, धर्म, वर्ग और विचारधारा की...

बोलने की आजादी बनाम बड़बोलापन

भारतीय राजनीति में जातिगत संकीर्णता राष्ट्रीय एकता के मानस को खंडित करती है। इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता कि भारत जातियों...

प्रसंगवश- सूचना से सोचना बंद

सूचनाओं को ज्ञान बना कर बांटने वाले कहते हैं, सोचना बंद करो, सूचनाओं की सेल लगी है, सूचना खरीदो और शिक्षा की फैशन-परेड में...

शिक्षा का बाजारवाद

शिक्षा को जब हम अपने अतीत से जोड़ते हैं तो संस्कार की ध्वनि सुनाई देती है, लेकिन जब अपने वर्तमान समय से जोड़ते हैं...

समाज-अपशिक्षा से उपजा अपराध तंत्र

यूरोप में शिक्षा का औपचारिक तरीका चर्च में अपनाया गया। वहां बच्चों, किशोरों, युवाओं की धार्मिक शिक्षा-दीक्षा होने लगी।

रचनाकार का विपक्ष

साहित्यकार का विपक्ष क्या है? क्या सत्ता है? क्या कोई विचारधारा है? क्या कोई राजनीति है? क्या किसी भी प्रकार की निरंकुशता या तानाशाही...

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उच्च शिक्षण संस्थान और संगोष्ठियां : मकसद से भटका संवाद

सेमिनार से विचार की जो शृंखला बनती है, उसे गंभीरता से न लेने के कारण सेमिनार केवल ग्रांट लेने, नैक आदि से प्रमाणीकरण लेने...

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समाज : संदेह में जीता समय

आज कितनी अपराधग्रस्त होती जा रही है। अपराधी देह और निरपराध देह में बंट गया है समाज।

शिक्षाः शिक्षा के सत्तर साल

शिक्षा से वेदना तो पैदा हुई, संवेदना पैदा क्यों नहीं हुई? शिक्षा के प्रति सच्ची भावना और संभावना सत्ता से लेकर समाज तक क्यों...

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‘शिक्षा’ कॉलम में रमेश दवे का लेख : अवकाश, अध्यापक और अध्ययन

अवकाश का मतलब अपने काम से छुट्टी नहीं, बल्कि अवकाश में किसी नए काम की खोज करना है, जो अध्यापक को अधिक प्रभावशाली बना...

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भाषा संस्कृति : लोकतंत्र में भाषिक मर्यादा

एक सभ्य लोकतंत्र, राजनीति के पक्ष-प्रतिपक्ष, समर्थन-विरोध या प्रकृति-संस्कृति का ही लोकतंत्र नहीं होता। वह भाषा का लोकतंत्र भी होता है।

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