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कौशलेंद्र प्रपन्न के सभी पोस्ट

अतिथि शिक्षकों के कंधे पर शिक्षा

हर साल विभिन्न सरकारी और गैर सरकारी संस्थानों की रिपोर्टें हमें बताती हैं कि हमारे बच्चे अपनी आयु और स्तर के अनुसार विषयी ज्ञान...

दुनिया मेरे आगे: उद्देश्य की ताकत

हमारे जीवन की कथा यही है कि हम जाना कहीं और चाहते हैं, लेकिन रेलगाड़ी कोई दूसरी दिशा पकड़ लेती है। आमतौर पर हम...

समावेशी शिक्षा से बहिष्कृत बच्चे

यों कोई भी समाज पूरी तरह विसंगतियों से मुक्त नहीं होता, पर हमारे यहां कई विसंगतियां जागरूकता के अभाव और जड सोच-समझ की वजह...

दुनिया मेरे आगे: खाली मकान, सूनी आंखें

जिन जगहों पर बैठने के लिए आपस में लड़ाई होती थी, उन पर अब चूहों-बिल्लियों की धमा-चौकड़ी दिखेगी। कोई नहीं बैठता अब आपके बैठकखाने...

राजनीति: शिक्षा का लक्ष्य और हासिल

आजाद भारत में हमने ढेरों शैक्षिक समितियां बनार्इं, राष्ट्रीय नीतियां बनार्इं, राष्ट्रीय शैक्षिक आयोग की स्थापनाएं कीं। लेकिन जो नहीं कर पाए वह यह...

दुनिया मेरे आगेः कहने की कला

यहां जब हम कहानी की बात कर रहे हैं तो वह एक अकादमिक कथाकार और उपन्यासकार की कहानी से हट कर अन्य कहानियों की...

दुनिया मेरे आगे: घर में बाजार

हमें याद होगा कि कभी वक्त था जब शादी-ब्याह या फिर तीज-त्योहारों पर नए कपड़े दिलाए जाते थे। जिन्हें हम बहुत जतन से रखते,...

दुनिया मेरे आगे: डर के आगे

असफलता का डर, लोगों के हंसने का डर, दूसरों की नजरों में बेहतर साबित न हो पाना आदि ऐसे आम डर हैं जिनसे हम...

दुनिया मेरे आगे: समय पर संवाद

किसी सूचना की कितनी आवश्यकता है, कब जरूरत है, क्यों जरूरत है, इसे ध्यान में रखना जरूरी होता है। क्या वह सूचना किसी खास...

दुनिया मेरे आगेः जिम्मेदारी का पाठ

दिल्ली के तमाम व्यावसायिक माने जाने वाले इलाकों में चौराहों, दीवारों, खंभों आदि पर एक विज्ञापन चिपका मिलेगा- ‘सरकारी टीचर बनें।’ इन इलाकों में...

राजनीतिः क्यों बंद हो रहे सरकारी स्कूल

पिछले पांच सालों में डेढ़ लाख से ज्यादा सरकारी स्कूल बंद हो चुके हैं। तर्क दिया गया कि बच्चे कम हैं। उन बच्चों को...

दुनिया मेरे आगेः बीच बाजार में

वे कहते हैं कि मैं खूबसूरत हूं... वे कहते हैं कि आप जो जूता पहन रहे हैं, वह सांस नहीं लेता... वे कहते हैं...

दुनिया मेरे आगे- कुएं का दायरा

अध्यापकों का तर्क यह होता है कि हमें तो पढ़ने का वक्त ही नहीं मिलता, बच्चे पढ़ना नहीं चाहते, हमें गैर-शैक्षणिक कामों में...

राजनीतिः अवसाद की कड़ियां और शिक्षा

हमने अपनी निजता और संवेदनाओं को बाजार के हवाले कर दिया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने वर्ष 2017 को अवसाद व उदासी से निजात...

दुनिया मेरे आगे- भीड़ में सन्नाटा

जब दो या तीन दिन की छुट्टियां एक साथ आती हैं, तब हम बाहर भागने का प्रयास करते हैं।

शिक्षा: कहां गए पुस्तकालय

किसी भी समाज के बौद्धिक विकास में शैक्षिक संस्थानों और पुस्तकालयों के योगदान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। लेकिन अफसोसनाक बात यही है...

दुनिया मेरे आगेः सफर के अनुभव

यात्राएं हमेशा से हमें न केवल आकर्षित करती रही हैं, बल्कि जीवन के व्यापक दर्शन से भी रूबरू कराती हैं। यही कारण है कि...

दुनिया मेरे आगे: पूर्वग्रह के स्कूल

जातिसूचक गाली नत्थी करते हुए लगातार ऐसे बच्चों को शिक्षा की पगडंडी से खदेड़ा जाता रहा है।

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