कमल कुमार

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11 Articles

दुनिया मेरे आगे: खुदकुशी की कड़ियां

हमारे यहां संयुक्त परिवार थे। एक-दूसरे से गुंथे-उलझे घर के सदस्य! सुख-दुख में एक साथ! गमी-कमी में एक साथ! सुख-सुविधाओं के अभाव में भी...

दुनिया मेरे आगे: हंसी की हिलोर

हंसी में हम अपने भीतर के उल्लास को व्यक्त करते हैं। यह इसका सकारात्मक पक्ष है। कई बार आज के इस विषाक्त समय में...

दुनिया मेरे आगे: वापसी का दुख

सन 1960 के आसपास गावों से शहरों की ओर विस्थापन शुरू हो गया था। उनके पीछे कारण किसानों की कृषि में बढ़ती कठिनाइयां रही।...

दुनिया मेरे आगे: संवादहीनता का सन्नाटा

संवाद के अभाव में परिवारों में अवसाद का अंधेरा भर रहा है। जरूरी है कि जैसे भी हो, आपसी संवाद बना रहे। बुजुर्गों और...

दुनिया मेरे आगे: इंसानियत के हक में

संत के रूप में प्रचारित बाबाओं के आश्रम हैं। आम जन भटक कर शांति की तलाश में इन आश्रमों में आ जाता है।

आधी दुनिया: दो पाटन के बीच

बच्चों की देखभाल ठीक से नहीं हो पा रही थी। अधिकतर लड़कियों के साथ यही हो रहा है। शादी के समय ग्यारह प्रतिशत लड़कियां...

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अच्छी मां

इन दिनों बहुत-सी कविताएं ‘मां’ पर पढ़ने को मिलीं। इनमें से अधिकतर कविताएं पुरुषों की थीं। सभी में मां का अपनी-अपनी तरह से निरूपण...

कहानी: शुरुआत

मैंने बेटी का दाखिला इग्नू में करवा दिया है। मैं उसकी मदद करूंगी। उसके बच्चों को देखना पड़ा तो देखूंगी। कोर्स के बाद अगर...

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दुनिया मेरे आगे: विकृतियों के ठिकाने

लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आजादी का हवाला देकर कुछ ऐसी बातों को भी न्यायसंगत ठहराया जा रहा है जो तार्किक दृष्टि से नहीं, संवेदना...

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दुनिया मेरे आगे: खुशहाली की खोज

भारतीय स्त्री की अवधारणा में सिर्फ ‘बेचारी’ और ‘विचारहीन’ नारी का महिमामंडन किया गया, जो सिर्फ अनुगमन और अनुसरण करे। वह कभी प्रश्न न...

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दुनिया मेरे आगेः ढलती शाम में

तीन पीढ़ियों में सौहार्द और समरसता वाले परिवार हमारी सुदृढ़ सामाजिक ईकाई की पहचान रहे हैं। लेकिन इस ढांचे में बिखराव ने शायद भावनाओं...

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