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दिनेश कुमार के सभी पोस्ट

जीवन-दृष्टि ही विचार-दृष्टि है

रचना में विचारक साहित्यकार और रचनाकार साहित्यकार के बीच जो द्वंद्व दिखाई देता है वह वास्तव में विचारधारा बनाम विचार-दृष्टि का ही द्वंद्व होता...

चर्चाः मकसद से भटकती गोष्ठियां

सेमिनारों की अराजक स्थिति का सबसे बुरा प्रभाव सामान्य श्रोताओं पर पड़ा है। श्रोताओं की स्वत: स्फूर्त भागीदारी अब धीरे-धीरे समाप्त हो रही है।...

बोले बहुत, पर कहा क्या!

पर्याप्त विषय-वस्तु के बिना कहानी का लंबा होना कहानीकार की आत्ममुग्धता का परिचायक है। कहानीकार जो कुछ भी जानता है उसे वह कहानी में...

जड़ों से कटने का नतीजा

इधर हिंदी में जो नए लेखक आ रहे हैं, वे बहुत पढ़े-लिखे हैं और ज्ञान के दूसरे अनुशासनों से संबद्ध हैं। वे ज्ञानी तो...

सूचना के संजाल में छीजती संवेदना

समाज में साहित्य के लिए जगह लगातार कम होती जा रही है। प्राय: ऐसा प्रतीत होता है कि समाज को साहित्य की कोई जरूरत...

कला और साहित्य: आंदोलन विहीन समय में

साहित्य के इतिहास में यह शायद पहली बार है कि इतनी अधिक संख्या में रचनाकार एक साथ सक्रिय हैं और उन्हें किसी एक व्यापक...

साहित्य- साहित्य पर बाजार का साया

साहित्य का राज-सत्ता से रिश्ता चाहे जैसा रहा हो, पर इसमें कोई दो राय नहीं कि बाजार के साथ उसका रिश्ता सदा विरोध का...

पश्चिम की तरफ देखने की प्रवृत्ति

राजनीतिक गुलामी से तो हम सत्तर साल पहले मुक्त हो गए, पर सांस्कृतिक गुलामी की निरंतरता बनी हुई है।

कथा के बिना कहानी

वह लंबी इसलिए हो रही है कि कहानीकार ने जो कुछ भी देखा-सुना या जाना होता है उसे कहानी में प्रस्तुत कर देता है।...

जवाबदेही से जुदा

छोटे-बड़े शहरों से निकलने वाली इन पत्रिकाओं में विज्ञापन प्राय: नहीं होते। घर फूंक तमाशा देखने की तरह इन पत्रिकाओं के संपादक एक जुनून...

विचारहीनता के दौर में

साहित्यकार की प्रतिबद्धता किसी भी तरह की सामाजिक या राजनीतिक सत्ता के प्रति न होकर आम जन के प्रति होनी चाहिए। तभी वह...

बीच बाजार में लेखक

हिन्दी साहित्य और हिंदी समाज के बीच का रिश्ता लगातार कमजोर पड़ता जा रहा है। हाल के वर्षों में इन दोनों के बीच अलगाव...

आत्मप्रचार का मुलम्मा

अधिकतर नए रचनाकारों ने अपनी रचना पर भरोसा करने की जगह विज्ञापन के उन सारे औजारों का उपयोग करना शुरू कर दिया, जो उन्हें...

विमर्श: पाठक से दूर होती कविता

हिंदी की विभिन्न साहित्यिक विधाओं में कविता आज सर्वाधिक संकट के दौर में है।

साहित्य की संकीर्णता

हिंदी में प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना के साथ ही साहित्य का राजनीति और समाज से रिश्ता एक नए दौर में प्रवेश करता है।...

पुस्तकायन: यादों की पगडंडियां पकड़े

हिंदी में जिस एक साहित्यकार को सबसे अधिक हमले झेलने पड़े, वे अज्ञेय थे।

रचनाकार के दोहरे मापदंड

आधुनिक लोकतांत्रिक राज्य और उसकी संस्थाओं से साहित्यकारों का क्या संबंध होना चाहिए, इस पर लंबे समय से बहस होती रही है।

साहित्यः कथा- रस के बिना कथा

नए यथार्थ के अनुरूप कहानी के स्वरूप में परिवर्तन स्वाभाविक है। हर दौर में कहानी के स्वरूप में कुछ न कुछ परिवर्तन जरूर हुआ...