बजरंग बिहारी तिवारी

बजरंग बिहारी तिवारी के सभी पोस्ट 9 Articles

विमर्श- विक्षोभ और रचनाशीलता

पूंजीवादी युग के साहित्यकार तगड़े तंत्र की जकड़बंदी में विक्षुब्ध। परिवर्तनेच्छा, क्रोध और अवशता की त्रयी क्षोभ का निर्माण करती है। इस त्रयी को...

साहित्य और राजसत्ता

भारतीय मानस धर्मप्राण है, इसलिए भारतीय साहित्य अपने स्वभाव में अध्यात्मवादी, रहस्यवादी है; यह धारणा औपनिवेशिक दौर में बनी।

वास्तवबोध की अभिव्यक्ति

सामाजिक उथल-पुथल ही साहित्यिक आंदोलनों के मूल में होती है। जब भी कोई नया आंदोलन उभरता है, अभिव्यक्ति के स्थापित रूपों में उल्लेखनीय तब्दीलियां...

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प्रतिबद्धता और रचनात्मकता

प्रगतिवाद के दौर में प्रतिबद्ध लेखन की चर्चा शुरू हुई। बदलाव की तीव्र कामना को प्रतिबद्धता का हेतु माना गया। यह धारणा भी बनी...

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दलित चिंतन : अंधेरे से फूटती रोशनी

1997 में गुजराती दलित साहित्य अकादमी की स्थापना हुई। अकादमी की प्रतिबद्धता, अथक और अटूट प्रयासों ने गुजराती दलित साहित्य को जिस ऊंचाई पर...

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दलित विमर्श : स्त्रीवाद की संश्लिष्ट वैचारिकी

दलित साहित्य की पहचान उसकी कथ्य केंद्रीयता है। यहां अंतर्वस्तु ही मुख्य है, शिल्प नहीं। समस्त जोर इस पर रहता है कि क्या कहना...

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दलित विमर्शः फुले-आंबेडकर की विरासत

वर्चस्ववादियों ने फुले-आंबेडकर के बारे में यथासंभव दुष्प्रचार किया। तरह-तरह की अफवाहें फैलाई गर्इं। पूर्वग्रहों का निर्माण किया गया। उन्हें जाति-विशेष का नायक साबित...

विमर्शः ओड़िया दलित साहित्य का दायरा

ओड़िया का दलित साहित्य, भारतीय दलित साहित्य आंदोलन का उल्लेखनीय पक्ष है। हिंदी क्षेत्र में अभी उसकी ठीक से चर्चा नहीं हुई है। बंगाल...

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दलित संवादः दलित चेतना की बंगीय भूमि

बांग्ला दलित साहित्य में इतिहास मुखर नहीं है। ऐसा लग सकता है कि बांग्ला दलित रचनाकार इतिहास के प्रति बेपरवाह रह कर लिखते हैं।...