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अरिमर्दन कुमार त्रिपाठी के सभी पोस्ट

प्रसंगवश: अफवाह का तंत्र

सोशल मीडिया पर उपस्थित लोग न तो संपूर्ण समाज हैं और न ही इनकी प्राथमिकताएं संपूर्ण समाज का प्रतिनिधित्व करती हैं, लेकिन सार्वजनिक उपस्थिति...

शिक्षा: गति और गतिरोध

आवश्यकता निजी विद्यालयों पर सख्ती के साथ सार्वजनिक विद्यालयों को आधुनिक संदर्भों में मूल्यपरक शिक्षा देने लायक बनाने की है, जहां सरकारी खानापूर्ति से...

दुनिया मेरे आगेः नाम में छवियां

पहली नजर में किसी व्यक्ति, स्थान या वस्तु के नामकरण की प्रक्रिया सहज दिखती है और वास्तव में इसे सरल होना भी चाहिए।

रोजी के संघर्ष में भाषा का सवाल

भाषा का न तो मानव-सभ्यता से परे कोई अस्तित्व है और न भाषा के बिना जीवन की पूर्णता की कामना की जा सकती है।...

तकनीकी हिंसा का दायरा

कितना विस्मयकारी है कि प्रकृति की व्यवस्था को चुनौती देते हुए विशुद्ध मशीनी पात्र आज हमारे समाज का नागरिक है।

डिजिटल मीडिया का सच

भारतीय लोकतंत्र की व्यापक परिधि में आज भी वह परिपक्वता नहीं है, जो किसी स्वस्थ समाज और लोक कल्याणकारी राज्य के लिए आवश्यक है।...

व्याकरण की सामयिकता

हिंदी अपने मूल में लोकतांत्रिक भाषा है और स्थानीयता ही इसकी वास्तविक पूंजी रही है।

‘संचार’ कॉलम में अरिमर्दन कुमार त्रिपाठी का लेख : संवाद में संकुचन

नील थाम्पसन ने कहा था कि ‘भाषा महज शब्दों का प्रयोग नहीं होती, बल्कि यह उस जटिल सरणि को संबोधित करती है, जो संपर्क...

भाषा : भारतीय राष्ट्रवाद और भाषाएं

असल में किसी भाषाभाषी में जब उच्चता का बोध आ जाता है, तो वह दूसरी भाषा नहीं सीखना चाहता।

सोशल नेटवर्क और सरोकार का मुखौटा

इंटरनेट एक माध्यम मात्र है। इस पर उपलब्ध कोई ऐप या वेबसाइट समाज के भूख, रोग और अशिक्षा को दूर नहीं कर सकता है।...