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कथक के केंद्र में युवा ऊर्जा

कथक नृत्य की शुरुआत कभी हंडिया गांव से हुई। लखनऊ, जयपुर, बनारस और रायपुर के राजदरबार और मंदिरों में यह नृत्य पोषित और पल्लवित हुआ।

गौरी दिवाकर

कथक नृत्य की शुरुआत कभी हंडिया गांव से हुई। लखनऊ, जयपुर, बनारस और रायपुर के राजदरबार और मंदिरों में यह नृत्य पोषित और पल्लवित हुआ। धीरे-धीरे कई पीढ़ियों से होते हुए यह नृत्य शैली पूरे देश में लोकप्रिय हुई। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली का कथक केंद्र ऐसी जगह है जहां पूरे देश से युवा इस नृत्य को सीखने आते हैं। इस केंद्र की ओर से त्रिवेणी सभागार में समारोह में गुरुओं के शिष्य-शिष्याओं ने नृत्य प्रस्तुत किया। समारोह में स्वरिना श्रीवास्तव, अनेस, आरती, अर्तुर प्रीजिबिल्स्की, प्रदीप कुमार ने नृत्य पेश किया। इस आयोजन की दूसरी शाम को अंतिम वर्ष की छात्रा रिदिमा ने नृत्य पेश किया। इसी शाम दामिनी बिष्ट, जूली, अनु, नीरज परिहार और अदिति रावत ने कथक नृत्य किया। समारोह की अंतिम संध्या में देवांगी और साधिका ने शिरकत की। इसके अलावा, कंचन, आइरीना, इप्सा और कोमल ने नृत्य किया।

पंडित राजेंद्र गंगानी की शिष्या कंचन नेगी ने राधा और कृष्ण के भावों को निरूपित किया। उन्होंने रचना ‘राधे रानी दे डारो न बंसी हमारी’ पर नायिका राधा व नायक कृष्ण के भावों को खूबसूरती से दर्शाया। आंखों और चेहरे के हाव-भाव में अच्छी सहजता दिखी। वह आत्मविश्वास से परिपूर्ण नजर आई। आइरीना बिरयुकोवा ने कथक नृत्य गुरु जयकिशन महाराज से सीखा है। उन्होंने शिव स्तुति से नृत्य शुरू किया।

इसके अगले अंश में तीन ताल में शुद्ध नृत्य पेश किया। इप्सा नरूला ने जयपुर घराने का नृत्य पेश किया। शिव स्तुति के बाद उन्होंने शुद्ध नृत्य किया। तीन ताल में निबद्ध शुद्ध नृत्य में उपज, थाट, तिहाइयों को नृत्य में पिरोया। एक रचना ‘तारि-किट-थुंग-थुंग-नग’ के बोल पर 21 चक्करों का अच्छा प्रयोग किया। एक और नृत्यांगना कोमल खुशवानी ने शिव स्तुति से शुरुआत की।

नृत्य में परंपरा की शुद्धता

नाट्य वृक्ष की ओर से हुए नृत्य समारोह में कथक नृत्यांगना गौरी दिवाकर, भरतनाट्यम नर्तक अनिरुद्ध नाइट, विलासिनी नाट्म की नृत्यांगना पूर्वा धनाश्री और मणिपुरी नृत्यांगना नंदिता देवी ने नृत्य पेश किया। गीता चंद्रन ने भरतनाट्यम और शशधर आचार्य ने छऊ की कुछ तकनीकों को कार्यशाला में सिखाया। भरतनाट्यम की पारंपरिक विशुद्ध नृत्य को नर्तक अनिरुद्ध नाइट ने पेश किया। उनके नृत्य में परंपरा की शुद्धता दिखी। उन्होंने अपनी दादी गुरु बाला सरस्वती जी की परंपरा का अनुसरण करते हुए, परंपरागत भरतनाट्यम का आरंभ अलरिपु से किया। यह राग खंडम और आदि ताल में निबद्ध था। समारोह की पहली शाम की दूसरी कलाकार गौरी दिवाकर थीं। कथक नृत्यांगना गौरी दिवाकर ने गणपति व शिव स्तुति शुरुआत की। ‘गणपति विघ्नहरण गजानन’ व ‘या दृशोसि तादृशो महेश्वरा’ पर आधारित पेशकश में गणपति परण, उपज, थाट प्रस्तुत किया। एक तिहाई में शिव के रूप के विवेचन के साथ अमृत मंथन प्रसंग को निरूपित किया। इस प्रस्तुति का संगीत शास्त्रीय गायिका अश्विनी भिंडे ने परिकल्पित किया है। मुग्धा नायिका के भावों को अगले अंश में प्रस्तुत किया। यह लाल बलबीर की रचना पर आधारित था। इसमें रचना ह्यजीअत मरत झुकिह्ण, ‘सुंदर सुजान एरी मिलन को’ और तराने को पिरोया गया था। रचना का छंदात्मक पढ़ंत गौरी ने नृत्य के साथ सुंदर अंदाज में किया। अगले अंश में गौरी दिवाकर ने अपनी नृत्य प्रस्तुति रेजोनेंस के अंश को पेश किया।

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