1857 में आजादी की पहली लड़ाई के बाद से देश में एक नई चेतना का उभार हो रहा था। सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर विभिन्न नेता और विद्वान देश को गुलामी से मुक्त कराने के लिए कई सवालों से टकरा रहे थे। ऐसे में एक विद्वान ने कहा -‘निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल’। संदेश स्पष्ट था कि जब तक अपनी भाषा का विकास नहीं होगा, तब तक किसी भी क्षेत्र में वास्तविक और स्थाई प्रगति संभव नहीं है।

देश की आजादी और विकास को उसकी भाषा और संस्कृति के विकास से जोड़ने वाले इस विद्वान का नाम था -भारतेन्दु हरिशचंद्र। महज 34 साल की छोटी सी आयु में देश के सांस्कृतिक विकास के लिए उनका काम इतना विशद था कि 1880 में काशी के विद्वानों ने उन्हें ‘भारतेन्दु’ (भारत का चंद्रमा) की उपाधि से विभूषित किया।

इसके अलावा हिंदी भाषा के लिए उनके महती योगदान के कारण आज उन्हें ‘आधुनिक हिंदी का उन्नायक’ कहा जाता है। उन्होंने खड़ी बोली को साहित्यिक भाषा के रूप में अपनाया बल्कि उसे गद्य की मानक भाषा के रुप में भी प्रतिष्ठित किया।

9 सितंबर 1850 को काशी में जन्में भारतेन्दु हरिश्चंद्र के पिता बाबू गोपाल चंद्र भी एक कवि थे और गिरधर दास के नाम से लिखते थे। भारतेन्दु भी बहुत कम उम्र में कविताएं लिखने लगे थे। वह शुरु में प्रचलन के अनुसार ही अवधी और ब्रज भाषा में कविताएं लिखते थे, लेकिन आगे चलकर उन्होंने खड़ी बोली को गद्य की मानक भाषा के रूप में स्थापित किया।

यह वहीं दौर है, जब खड़ी बोली को साहित्यिक रचनाओं के लिए उपयुक्त नहीं माना जाता था। लेकिन तब भारतेन्दु ने न सिर्फ खड़ी बोली में नाटक लिखे, बल्कि उनका मंचन भी किया। वह नाटकों को समाज-सुधार और राष्ट्रीय जागरण का सबसे शक्तिशाली माध्यम मानते थे। उन्होंने अपने नाटकों में औपनिवेशिक शोषण, प्रशासनिक भ्रष्टाचार और सामाजिक आडंबर पर तीखे प्रहार किए हैं।

भारतेंदु के प्रमुख नाटक

  • भारतेन्दु अपने नाटक ‘भारत दुर्दशा’ औपनिवेशिक शोषण का चित्रण करते हैं। इस नाटक में भारत के आर्थिक पतन और सामाजिक निष्क्रियता का अत्यंत मार्मिक और राजनीतिक चित्रण है। नाटक का प्रारंभ ही एक करुण आह्वान से होता है-

” आबहु सब मिलि रोबहु भारत भाई।
हाँ हा! भारतदुर्दशा न देखी जाई।।”

नाटक में भारतेन्दु ने ‘भारत’ को ही एक पात्र बना दिया है, जिसकी हालत दयनीय है और मूर्छित पड़ा है। यह तात्कालीन औपनिवेशिक शोषण का ही अप्रत्यक्ष चित्रण है। वह इस दुर्दशा का एक प्रमुख कारण अपने ही देशवासियों के आलस को बताते हैं, जिसे वह कुछ इस तरह से चुटिले अंदाज में लिखते हैं-

दुनिया में हाथ पैर हिलाना नहीं अच्छा।
मर जाना पै उठके कहीं जाना नहीं अच्छा॥

वह अपने नाटक ‘अंधेर नगरी’ में सत्ता के विवेकहीनता पर तीखा प्रहार करते हैं और मजाक उड़ाते हैं। नाटक में बार-बार आने वाला दोहा अंग्रेजी शासन पर तीखा तंज कसता रहता है-

“अंधेर नगरी चौपट राजा।
टके सेर भाजी टके सेर खाजा॥”

भारतेन्दु ने ‘सत्य हरिश्चंद्र’,’वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति’, ‘नीलदेवी’, ‘चंद्रावली’, ‘सती प्रताप’ जैसे अन्य प्रसिद्ध नाटक भी लिखे, जिनमें उन्होंने विभिन्न सामाजिक विसंगतियों को उठाया और समाज के सामने रखा।

भारतेन्दु ने नाटक लिखने के लिए जहाँ मुख्य रुप से खड़ी बोली का प्रयोग किया वहीं कविताएं लिखने के लिए ब्रज भाषा का प्रयोग किया। उन्होंने उर्दू में भी शेर लिखे और अंग्रेजी में भी कविताएं लिखीं। इस प्रकार भाषा के प्रति उनकी दृष्टि संकुचित नहीं थी।

भारतेन्दु के शेर

ये चार दिन के तमाशे हैं आह दुनिया के
रहा जहाँ में सिकंदर न और न जम बाक़ी

अभी तो आए हो जल्दी कहाँ है जाने की
उठो न पहलू से ठहरो ज़रा किधर को चले

प्रमुख काव्य रचनाएं

भारतेन्दु ने जितना गद्य रचा उससे कम पद्य भी नहीं रचा। उनकी प्रमुख रचनाएं हैं-प्रेम मालिका’, ‘प्रेम माधुरी’, ‘प्रेम तरंग’, ‘प्रेम प्रलाप’, ‘प्रेम फुलवारी’, ‘होली’, ‘मधुमुकुल’, ‘वर्षा विनोद’, ‘राग संग्रह’, ‘उत्तरार्द्ध भक्तमाल’।

इसके अलावा भारतेन्दु ने संस्कृत से ‘रत्नावली’, ‘मुद्राराक्षस’, ‘कर्पूरमंजरी’का अनुवाद किया। उन्होंने शेक्सपियर के नाटक’मर्चेंट ऑफ वेनिस’ का भी हिंदी में ‘दुर्लभ बंधु’ के नाम से अनुवाद किया था।

हिंदी पत्रकारिता में योगदान

भारतेन्दु ने ‘कविवचनसुधा’, ‘हरिश्चंद्र चंद्रिका’ और ‘बालबोधिनी’ जैसी पत्रिकाएं भी प्रकाशित कीं। एक तरफ जहाँ उन्होंने हरिश्चंद्र चंद्रिका में निबंध, यात्रा वृत्तांत, समीक्षा आदि के माध्यम से हिंदी गद्य को नया आकार दिया। वहीं बालबोधिनी और कविवचनसुधा के माध्यम से स्त्री-शिक्षा और महिला अधिकारों के प्रति लोगों जागरूक करने का प्रयास किया।

भारतेन्दु का योगदान इतना विशद है कि उन्हें केवल एक कवि या लेखक के रूप में नहीं, बल्कि आधुनिक हिंदी भाषा, साहित्य और भारतीय नवजागरण का एक महान निर्माता जाना जाता है।

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कानपुर के ‘प्रताप’ कार्यालय में उस दिन भी काम अपनी रफ्तार से चल रहा था। बाहर देश की राजनीति उथल-पुथल से भरी थी और भीतर अखबार के अगले अंक की तैयारियां। गणेशशंकर विद्यार्थी अपने काम में व्यस्त थे। तभी एक किशोर वहां पहुंचा। पूरी खबर के लिए यहाँ क्लिक करें।