‘एक कचौड़ी दो समोसा, इन मर्दों का क्या भरोसा।’ ‘मेरे सिर में दर्द है, जिसका कारण मर्द है।’ दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्राओं के प्रदर्शन से निकले ये नारे पितृसत्ता को इतनी बड़ी चुनौती दे चुके हैं कि हंगामा मच चुका है।

पिछले दिनों जेन-जी के प्रदर्शन के दौरान निकले नारों ने प्रदर्शन की तस्वीर ही बदल दी थी। उस समय नारों की भाषा पर भी तीखे सवाल उठे थे। इस बार दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्राओं ने उस सवाल को और तीखा कर दिया है।

इन नारों की नीयत पर सवाल उठाते हुए पूछा जा रहा है कि सभी पुरुषों को क्यों लपेटा जा रहा है? साधारण शब्दों वाले इन नारों को समाज तोड़ने वाला बताया जा रहा है।

कचौड़ी-समोसे के नारों में छिपी पीड़ा

जेन-जी के प्रदर्शन में कुछ नारों में गालियां थीं, जिस पर आपत्ति उठी थी। लेकिन दिल्ली और देश के अन्य जगहों पर सामूहिक बलात्कार और स्त्री-उत्पीड़न की घटनाओं के बाद दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्राओं ने जिस तरह साधारण शब्दों को नारा बनाया, वही उन्हें असाधारण कर गया।

यहां पर ध्यान देने की बात यह है कि कचौड़ी-समोसे और जीरे-अजवाइन वाले नारे देश के प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थाओं की छात्राओं ने दिए हैं। इन्हें शब्दों की ताकत की पूरी समझ है।

शिक्षा हमारी समझ को विस्तार देती है। ‘अकादेमी’ में आपको भाषा का खास प्रशिक्षण मिलता है, इसलिए अकादमिक भाषा को जनसंघर्ष के अनुरूप नहीं माना जाता है। जब कोई संघर्ष सामूहिकता का होगा तो वहां आपको भाषा भी वैसी ही लानी होगी जो सबके जीवन से जुड़ी हो।

समोसा, कचौड़ी और अजवाइन आम लड़कियों के जीवन का हिस्सा है। लेकिन जब इन लड़कियों के लिए सड़क पर निकलना, स्कूल-कालेज जाना जैसी सामान्य क्रियाएं भी जोखिम भरी हो जाएं तो फिर अपनी पीड़ा कैसे बताएं?

क्या ऐसी पीड़ा देनेवाले का खास नाम है? क्या पीड़ा देनेवाले की खास निशानी है? ये दिल्ली से लेकर बिहार के जमुई तक हैं यानी एक व्यवस्था का रूप ले चुके हैं। इसलिए आज स्त्री-उत्पीड़न भी व्यवस्थागत समस्या हो चुकी है।

मार्गदर्शन: नैतिक पहरेदारी और रीलतंत्र के बीच फंसे अधिकार | संविधान बनाम समाज

न तो सरकार में कोई घोषित पितृसत्ता मंत्रालय है और न ही उसका कोई अ, ब या ज्ञ नाम का मंत्री जिससे इस्तीफा मांगा जाए। इसलिए लड़कियों ने इस व्यवस्था से इस्तीफा मांगते हुए कहा, ‘एक जीरा, दो अजवाइन/मर्द जात दो रिजाइन’।

अपराधी कौन, व्यवस्था कौन?

स्त्री उत्पीड़न का कोई एक रूप नहीं है। घर में कम पोषित खाना मिलने से लेकर सड़क पर छेड़खानी और बसों में सामूहिक बलात्कार तक। क्या यहां अपराधियों की शिनाख्त इतनी आसान है?

खीरा चोर से हीरा चोर की कहावत तो सभी मानते हैं। फिर यह क्यों नहीं मानते कि सड़क पर निकलीं लड़कियों पर अश्लील टिप्पणी करनेवालों का संबंध सामूहिक बलात्कार के अपराधियों से जुड़ता है।

जब सत्ता के प्रतिनिधि ही नैतिक पहरेदारी को जायज ठहराने लग जाएं तो किस एक व्यक्ति का नाम लेकर नारेबाजी की जाए? किस एक व्यक्ति के नाम समन भेजा जाए। फिर क्यों न पितृसत्ता का इस्तीफा मांगा जाए?