पीर का पर्वत होना वह असाधारण बिंब है जो दुष्यंत कुमार साहित्य के जरिए जनआंदोलनों के प्रतिरोध को दे गए। हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए/इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए..। यह गजल दुष्यंत कुमार के संग्रह ‘साये में धूप’ में प्रकाशित हुई थी। दुष्यंत कुमार इस कविता में बेचैनी, प्रतिरोध और बदलाव की पूरी यात्रा रचते हैं।

पीर को पर्वत की तरह दिखा कर हिमालय से गंगा निकलने का बिंब लाते हैं। यानी जितनी विशाल पीड़ा है उतना ही बड़ा परिवर्तन भी होना चाहिए। यहां पर गंगा शुद्धि, प्रवाह और परिवर्तन का रूपक बन जाती है। यानी वह ढांचागत बदलाव की मांग करती है।

रचना की सबसे बेचैन करने वाली पंक्ति है-‘हर लाश चलनी चाहिए।’ यहां पर दुष्यंत कुमार लाश के रूपक में ऐसे समाज को लाते हैं जो जिंदा होने के नाम पर सिर्फ सांस लेता है। वह सांस लेते हुए भी निष्क्रिय, जड़ और अपनी पीड़ा के प्रति असंवेदनशील हो गया है। इस एक गजल में समस्या के साथ समाधान भी है।

दुष्यंत कुमार कहते हैं कि सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं/सूरत भी बदलनी चाहिए…यह आग हम सब के भीतर होनी चाहिए। कुमार परिवर्तन को निजी कर्म मानने से इनकार करते हुए इसे सामूहिक प्रक्रिया के रूप में देखते हैं।

निराला की स्त्री: ‘वह’ से ‘मैं’ तक, पत्थर तोड़ती श्रमिक महिला का संघर्ष

आज महंगाई, बेरोजगारी, गैरबराबरी, किसानों, मजदूरों की समस्याओं के साथ मतदाताओं के अस्तित्व की समस्या भी पीर को पर्वत बना चुकी है। ऐसे में दुष्यंत कुमार आगाह करते हैं कि व्यवस्था चाहेगी कि जनता सिर्फ समस्या की दीवार देखे, समस्या की जड़ तक उसकी नजर नहीं जाए।

सबसे अहम यह है कि व्यवस्था के खिलाफ हंगामे के बाद क्या करेंगे? हम सचमुच बदलाव लाना चाहेंगे या सिर्फ बदलाव की आवाज सुन कर चुप हो जाएंगे? हंगामे के बाद यह भी जांच लें कि क्या वाकई सूरत बदली? प्रतिरोध की आग बचाए रखेंगे तभी समय के संकट का हल मिलेगा।