‘वर्जिन रिवर’ कस्बे में हंगामा बरपा है। डाक्टर मार्क की क्लीनिक के दरवाजे पर कोई नवजात बच्ची को छोड़ गया है। इस छोटे से कस्बे में सभी एक-दूसरे को जानते हैं, तो सबके लिए हैरत की बात थी कि अपनी बच्ची को कोई ऐसे कैसे छोड़ सकता है।
डाक्टर को लगता है कि यहां से कुछ दूर रहने वाले नशेड़ियों के समूह में से जो लड़की गर्भवती थी, यह बच्ची उसकी है। डाक्टर की सहयोगी मीलिंडा जो एक नर्स है, वह उस छोड़ी हुई अनाथ बच्ची के प्रति संवेदनशील हो उठती है। बच्ची बाहर का दूध नहीं पी रही है, जिस वजह से सभी चिंतित हैं।
जब सभी को लगता है कि बच्ची को किसी बाहरी ने यहां छोड़ा है, उसी वक्त नर्स मीलिंडा पता लगा लेती है कि बच्ची वर्जिन रिवर की ही वासी लिली की है, जिसे सभी जानते हैं। मीलिंडा इस बात की तह में जाती है कि आखिर एक मां अपनी नजवात को छोड़ कैसे सकती है। मिलिंडा डाक्टर व शहर के अन्य लोगों को समझाती है कि लिली प्रसव के बाद के अवसाद की समस्या यानी पोस्टपार्टम (postpartum) से जूझ रही है।
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डाक्टर सहित आम लोगों के लिए भी यह अबूझ पहेली थी कि क्या अवसाद ऐसी स्थिति में ला सकता है कि मां अपने बच्चे को ही त्याग दे। लिलि पहले ही चार बच्चों की मां थी। उसके बच्चे बड़े हो चुके थे, और अलग रह रहे थे। लिलि के पति की छह महीने पहले मौत हो गई थी।
पति की मौत, और इतनी बड़ी उम्र की गर्भावस्था ने लिलि को असहज कर दिया, और उसने अपनी अवस्था की बात किसी को नहीं बताई। बच्ची पैदा होने के बाद उसका अवसाद इतना बढ़ गया कि उसने फैसला किया कि बच्ची को किसी बेहतर जगह पर ही छोड़ देना उसके भविष्य के लिए सही होगा।
नेटफ्लिक्स की इस वेब सीरीज में एक ऐसा जरूरी मुद्दा उठाया गया है, जो वहां के अनुभवी डाक्टर के लिए भी नया है। यह सीरिज लेखिका राबिन कार के उपन्यासों की कड़ी ‘वर्जिन रिवर’ पर आधारित है। वेब सीरिज मूल उपन्यास से काफी अलग है। इसी के तहत ‘पोस्टपार्टम’ जैसा मुद्दा भी आया है।
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वर्जिन रिवर के सबसे योग्य और बुजुर्ग डाक्टर को भी ‘पोस्टपार्टम’ अवसाद की समस्या के बारे में नहीं पता और वे चाहते हैं कि युवा नर्स मिलिंडा, लिलि की इस मामले में मदद करे। कभी मिलिंडा ने भी प्रसव के समय अपना बच्चा खोया था और वह गहरे अवसाद में चली गई थी। मिलिंडा ने लिलि को एहसास कराया कि दवाओं से यह दिक्कत ठीक हो सकती है, और उसे अपना इलाज करवाना चाहिए।
पिछले दिनों हिंदी फिल्मों की एक मशहूर अभिनेत्री ने कहा कि जन्म के बाद सभी सिर्फ बच्चे का ही ध्यान रखते हैं। मां के बारे में किसी को चिंता नहीं होती, जो ‘पोस्टपार्टम’ अवसाद का प्रमुख कारण बनता है। इस संबंध में घर-घर बात होने के बावजूद अभी तक इसे नई मां के ‘नखरे’ के रूप में ही देखा जाता है। जरूरत इस बात की है कि इसे जच्चा-बच्चा की देखभाल का जरूरी अंग माना जाए और यह सिर्फ शहर के महंगे अस्पतालों की बात न हो।
