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सांसत और विरासत के बीच निराला

मौजूदा दौर को जिन हर्र्फोंं, तर्कों और हवालों में हम सबसे ज्यादा महसूस कर सकते हैं, वे हैं- आंदोलन की दरकार और संवेदना के लोकतंत्र की हिफाजत।

Author Updated: February 17, 2021 2:47 AM
Niralaनिराला की चर्चा करते हुए कबीर का संदर्भ आलोचकों के बीच भी बार-बार उभरता रहा है।

दिलचस्प है कि इन दोनों ही मोर्चों पर अभिव्यक्ति की तेज से तेज तकनीक से लेकर प्रखर से प्रखर लेखक-वक्ता तक हमारा उतना साथ कोई नहीं देता, जितना हिंदी का वह महाप्राण देता है, जो दशकों पहले इस दुनिया से विदा हो चुका है। छंद और हर तरह के प्रतिबंध से ऊपर इंसानी संवेदना के अक्षर हिमायत में सालों से खड़े इस महान साहित्यकार की दुनिया की यात्रा मृणाल वल्लरी और प्रेम प्रकाश के साथ।

कागज पीले पड़ जाते हैं, वक्त के पत्ते भी देखते-देखते झर जाते हैं, पर इन सबके बीच एक अक्षर दुनिया आगे बढ़ती रहती है। निराला के साहित्य ने इस दुनिया को जिस तरह समृद्ध किया है, वह आज हिंदी अभिव्यक्ति के छोटे-बड़े मिस्त्रियों के लिए थाती भी है और चुनौती भी। निराला की लिखावट को प्रासंगिक करार देने के लिए देशकाल की सूई को न तो उलटा घुमाने की जरूरत है और न ही तारीख के पुराने पन्ने पलटने की। हिंदी का यह महाकवि हमारा साथ मौजूदा हालात के बीच उतरकर देता है।

आज हम अपने देश और परिवेश को ध्वनियों और शब्दों में महसूस करें तो पहला शब्द सुनाई देगा- आंदोलन। इसके बाद का शब्द होगा- संवेदना। आंदोलन और संवेदना एक ही सीध के शब्द और भाव हैं, इसे निराला ने तब सिद्ध कर दिखाया था जब स्थूल के खिलाफ सूक्ष्म के विरोध के लिए औजार जुटाने से ज्यादा जरूरी था उस शास्त्र का पालन, जो असुंदर समय में भी काव्य को सुंदर होने की कसौटी गढ़ता है। इस पाबंदी को निराला से पहले कबीर तोड़ चुके थे। यही कारण है कि निराला की चर्चा करते हुए कबीर का संदर्भ आलोचकों के बीच भी बार-बार उभरता रहा है।

दलित चेतना, स्त्री विमर्श, प्रयोग और जोखिम के लिए तत्पर साहित्य, हम जिस भी रास्ते से बढ़ें निराला हमारे हमराही हैं। निराला के इस विस्तार के बीच अपने समकाल के लिए कुछ सूत्र तलाशने की कोशिश करें तो हिंदी का यह महाप्राण हमें सबसे पहले सौंदर्य का अक्षर स्पर्श करने का रचनात्मक सलीका सिखाता है।

विकास और वर्तमान के बीच जिस तरह आंदोलन की नई जमीन पक रही है, वह युवाओं और महिलाओं से लेकर ग्रामीण और शहरी समाज को एक नई मानव श्रृंखला रचने के लिए प्रेरित कर रहा है। ऐसे में अभिव्यक्ति के उन दकियानूस घरानों के आगे एक बड़ी चुनौती है कि जो शब्द और संवेदना के इकहरेपन से अपनी सुविधाजनक स्थिति को दोहराने-तिहराने में लगे हैं।

संवेदना और स्त्री

सरकार के बनाए एक कानून के खिलाफ महिलाएं जब बड़े सवालों के साथ सड़क पर अडिग इरादे के साथ मोर्चे पर बैठती हैं तो हिंदी का एक लेखक बेशर्मी से सवाल करता है कि ये औरतें खाली क्यों बैठी हैं, कुछ स्वेटर-मोजे क्यों नहीं बुनतीं हैं। इसी तरह हाल में उत्पीड़न के एक मामले में न्याय के मंदिर का घंटा यह कहते हुए बज उठा कि कपड़े के ऊपर से महिला का जबरन स्पर्श इतना मर्यादित है कि उसे बलात्कार या उसकी कोशिश के तौर पर देखना सही नहीं है।

दिलचस्प है कि निराला ने आने वाले समय की जटिलता और विरोधाभास को बहुत पहले पहचान लिया था। एक दलित स्त्री से शुरू होकर अपनी जवान बेटी तक के बारे में लिखते हुए वे स्त्री और संवेदना का एक ऐसा विधान रच गए, जिसके केंद्र में सबसे पहले मनुष्य है, उसकी मनुष्यता है।

‘शैतानी सभ्यता’

जो लोग इस बात में दिलचस्पी लेते हैं कि अक्खर निराला जब महात्मा गांधी से मिले तो उनके हिंदी मन का तेज प्रबल था कि वे बापू से तकरीबन भिड़ने की शैली में बात कह रहे थे। वैसे गांधी की समझ ही किसी साहित्यकार के मूल्यांकन का एकल आधार बने यह जरूरी नहीं। पर यह देखना तो जरूरी है ही कि मनुष्य और सभ्यता के सवाल पर दोनों कितनी दूर या पास खरे थे।

मशीन और पूंजी की साझा ताकत से आगे बढ़ रही ‘शैतानी सभ्यता’ को कोसने वाले महात्मा से महाप्राण की वह आवाज कहां जुदा है, जिसमें वे उम्मीद के सत्याग्रह के साथ कह उठते हैं, ‘आज अमीरों की हवेली/ किसानों की होगी पाठशाला/ धोबी, पासी, चमार, तेली/ खोलेंगे अंधरे का ताला।’ निराला के इन शब्दों को चाहें तो आप मौजूदा किसान आंदोलन में विरोध की तख्ती के तौर पर देख सकते हैं और कह सकते हैं कि अभिव्यक्ति जड़ता का नहीं, बल्कि बदलाव के रौशन उम्मीद का नाम है।

महादेवी और महाप्राण

निराला के बारे में बात हो रही हो और जिक्र महादेवी वर्मा का न हो, यह संभव नहीं। कुछ लोगों ने भी कहा भी है कि हिंदी के इस विलक्षण कवि की नजदीकी और ईमानदार परख के लिए ऐनक के पीछे महादेवी जैसी आंखों के साथ उतरना जरूरी है। दूरदर्शन को दिए एक साक्षात्कार में महादेवी कहती हैं कि मशीनें तो इस बीच खूब आ गई हैं, उनका इस्तेमाल भी खूब हो रहा है पर सवाल है कि इस बीच इंसान कितना अच्छा बना है। महादेवी जब ये बात कह रही होती हैं तो उनके भाव के आगे-पीछे निराला हैं।

इंसान निजता से सार्वजनिकता और आत्मकेंद्रिता से सर्वव्यापकता की ओर किस कदर मुड़ता है, इसकी स्मृति साहित्य की अनमोल लिखावट का हिस्सा रही है। इसमें यह भी दर्ज है कि रक्षाबंधन के दिन निराला महादेवी वर्मा के घर पहुंचते थे और उनसे दो रुपए की मांग करते थे। महादेवी पूछती थीं कि क्या करेंगे दो रुपए का? निराला कहते थे कि एक रुपए तुम्हें दूंगा और एक रुपए रिक्शेवाले को। बात रुपए की मांग से शुरू होकर कब हृदय का गहना बन जाती था, यह इन दो साहित्यकारों के संबंध से समझा जा सकता है।

एक ऐसे दौर में जब पुरुष का महिला के प्रति असंवेदनशील होना ‘बोल्ड एंड क्रिएटिव कंटेंट’ करार दिया जा रहा है, यह कहना-समझना थोड़ा मुश्किल भी हो सकता है कि कोई पुरुष अपनी मुंहबोली बहन के पास सिर्फ ‘रक्षाबंधन’ के भाव के साथ नहीं आता है बल्कि उसका वैचारिक विकास उसे अतीत के बंधनों से मुक्त होकर संबंध और संवेदना का नया सहचर होने के लिए प्रेरित करता है। इस बात को आगे हम इस आलोचकीय छोर तक ले जा सकते हैं कि निराला स्त्री के सबलीकरण के साथ खुद को भी सबल महसूस करते हैं तभी तो राखी के नेग के लिए बहन की कलम की कमाई से नेग लेने का प्रेमल हठ भी कर उठते हैं।

कालजयी नैतिकता

बड़प्पन महादेवी का भी रहा, जो अपने भाई के मन को तो सबसे बेहतर पढ़ती ही है, ऐसे मन के औघड़पने के जोखिम को भी बखूबी समझती हैं। उसका यह भाई आखिरी वक्त में हर्निया की पीड़ा के बीच अस्पताल में इलाज कराने से इनकार करता है। महादेवी इसकी वजह बताती हैं कि निराला ने अस्पतालों के वे दृश्य देखे थे जिसमें गरीब आदमी या तो बाहर लंबी कतार में खड़ा होता है या अस्पताल तक पहुंच भी नहीं पाता जबकि अंदर डॉक्टर अपने आले से संपन्न लोगों की बीमारी समझ रहे होते हैं।

एक ऐसे समय में जब कोरोना की मार के बीच लाखों प्रवासी मजदूरों की शहरों से बेदखल होने की पदयात्रा करती मजबूरी हमने देखी है, निराला के मन और उनकी नैतिकता को हम नए सिरे से समझ सकते हैं। लेखन का कालजयी होना आचरण के पारदर्शी होने पर भी निर्भर है, यह बात आलोचकीय सूक्ति भर नहीं है। हमारे दौर में दिनोंदिन जिस तरह यह निर्भरता कमजोर पड़ती जा रही है, लेखन का वजन भी उसी अनुपात में हल्का पड़ता जा रहा है।

होगी जय, होगी जय

आज जब साहित्य की आलोचना का ‘सबाल्टर्न’ तकाजा नई-पुरानी कृतियों को देखने की नई दृष्टि लेकर आया है, निराला अपने जीवन और लेखन की साझी नैतिकता के साथ आधुनिक हिंदी साहित्य की सबसे ठोस जमीन पर कालजयी भाव से खड़े हैं। चतुरी चमार, बिल्लेसुर बकरिहा और कुल्ली भाट की दुनिया तक नए विमर्श के उत्तर आधुनिक उठान से बहुत पहले वे पहुंच चुके थे।

उनकी नजर उस दुविधा पर भी थी, जो सत्य के लिए निर्णायक संघर्ष से पहले मानवीय दुर्बलता के कारण स्वाभाविक तौर पर थोड़ा डोल जाता है। पर यह दोलन कोई स्फीति नहीं बल्कि बड़े संघर्ष के लिए बड़े प्रण और बड़े मन की निर्मिति की जरूरी प्रस्तावना है। ‘राम की शक्तिपूजा’ में कहे उनके शब्द सत्य के लिए संघर्ष के पक्ष में खड़े हर आदमी को हर दौर में होसले से भरेगा-
होगी जय, होगी जय, हे पुरुषोत्तम नवीन।

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