मेरा दिल मां का है…मैं ऐसे दृश्य नहीं देख सकती…। फेसबुक पर एक मशहूर शख्सियत इस टिप्पणी के साथ एक वीडियो साझा करती हैं। वीडियो वीभत्स है। एक युवक अपनी रिश्तेदार भाभी से शादी का प्रस्ताव रखता है। भाभी एक बच्चे की मां है और वह इस रिश्ते को ठुकरा देती है। युवक उसके छोटे बच्चे को चाकलेट देने के बहाने ले जाता है और पटक-पटक कर मार देता है। बच्चे की हत्या का यह वीभत्स दृश्य कैमरे में कैद होता है।
कुछ ही देर में इंटरनेट पर यह वीडियो वारयल हो जाता है। ज्यादातर लोग यही कह कर वीडियो साझा कर रहे थे कि यह दृश्य देखा नहीं जा रहा है। लेकिन इसे साझा सब कर रहे थे। हिंसक अपराध के ऐसे दृश्यों को बारंबार दिखाया जाना यही साबित करता है कि हम ऐसे हिंसक दृश्यों को लेकर अति सहिष्णु हो चुके हैं।
जब अपनी करुणा दिखाने के लिए आप दूसरे के कष्ट का सहारा लेते हैं, तो इसका तात्पर्य है, आपकी करुणा भी भौतिकवादी हो चुकी है। आप ऐसे वीडियो को इसलिए साझा कर रहे हैं क्योंकि इससे आपकी दृश्यता बढ़ रही है। लेकिन हमें इस बात का अंदाजा नहीं होता है कि ऐसा करके हम इस तरह की हिंसा का महिमामंडन कर रहे हैं।
एक परिवार का साहस, जिसने व्यवस्था को जवाब देने पर मजबूर किया | मार्गदर्शन
विद्वान अल्बर्ट बंदुरा का कहना है कि लोग अपने अनुभवों और अवलोकन से अपने व्यवहार और सोच को भी बदल लेते हैं। हिंसा के दृश्य लगातार देखने से लोगों के व्यवहार और भावनात्मक प्रतिक्रियाएं प्रभावित हो सकती हैं। जब लोग बार-बार हिंसक दृश्य देखते हैं तो उनकी भावनात्मक प्रतिक्रिया कम होने लगती है। जो हिंसक दृश्य किसी व्यक्ति के मन में पहले भय या दुख उत्पन्न करते थे, वे सामान्य लगने लगते हैं। इसके अलावा जो लोग पहले से किसी हिंसक हादसे से गुजरे होते हैं, उनके लिए ऐसे वीडियो दुबारा मानसिक आघात का कारण बन सकते हैं।
सबसे अहम बिंदु यह है कि हत्या या अन्य अपराध के वीडियो वायरल हो जाने से पीड़ित और उसके परिवार की गरिमा का हनन होता है। कोई भी यह नहीं चाहता है कि इंटरनेट पर उसके अजीज की स्मृति हिंसक और क्रूर दृश्यों के रूप में हो। कहते हैं कि हर दुख की एक मियाद होती है। जब लोग दुख से उबरने की कोशिश करते हैं तो सार्वजनिक मंच पर बार-बार उनका दुख याद दिलाने की कोशिश की जाती है।
कोई समाज किस प्रवृत्ति का है, इसकी पहचान के लिए महात्मा गांधी का कहना था कि सबसे वंचित समुदाय की तरफ देखो। किसी समाज की प्रवृत्ति इस बात से तय होती है कि वहां वंचित समुदायों की स्थिति कैसी है? वहां पीड़ितों की गरिमा और सम्मान के साथ कैसा व्यवहार किया जाता है? इसलिए जरूरी है कि हम पीड़ित के साथ समानुभूति रखें।
सूचना देना महत्त्वपूर्ण काम है। हिंसा की सूचना देने के लिए हिंसा के दृश्यों का प्रयोग करना समाज के लिए नुकसानदायक होता है। हमें अपनी करुणा को क्रूरता के दृश्यों का मोहताज नहीं बनाना चाहिए।
