विराग दिल्ली के एक स्कूल में आठवीं कक्षा का छात्र था। उसके पापा इंजीनियर थे। उनका तबादला होते रहता था। इसलिए उन्होंने विराग को छात्रावास में रख दिया था। विराग के पापा पिछले एक साल से नरौरा में कार्यरत थे। वहां रहने के लिए उन्हें खासी बड़ी कोठी मिली हुई थी। पीछे बड़ा बगीचा था, जिसमें तरह-तरह के फूलों और सब्जियों के पौधे लगे हुए थे। थोड़ी दूरी पर जूनियर इंजीनियर का मकान था। उनका बेटा प्रफुल्ल भी विराग के साथ उसी छात्रावास में था। दोनों साथ ही दिल्ली आते-जाते थे। वहीं पर मास्टर शर्मा जी का मकान था। उनकी बेटी शिप्रा वहीं के स्कूल की सातवीं कक्षा की छात्रा थी। उसे पेंटिंग में काफी रुचि थी।

विराग की एक बहन थी मानसी, जो उससे छह वर्ष छोटी थी। अभी वहीं के स्कूल में पढ़ती थी। एक दिन मानसी खरगोश के पीछे दौड़ती-दौड़ती सड़क तक आ गई। सामने से आती कार पर उसने ध्यान नहीं दिया। वह सड़क पार करने के लिए जैसे ही बढ़ी, शिप्रा ने लपक कर उसे खींच लिया। एक दुर्घटना टल गई। शिप्रा स्वयं मानसी को उसकी कोठी तक छोड़ने गई। तभी मानसी की मम्मी से उसकी मुलाकात हुई।

मम्मी ने शिप्रा को अंदर बुलाकर बैठाया, वह शिप्रा की सूझबूझ से बहुत प्रभावित हुई। अगले दिन शिप्रा ने उन्हें अपनी बनाई हुई कई वस्तुएं दिखाई। मम्मी ने तारीफ कर शिप्रा को प्रोत्साहित किया। उस दिन से शिप्रा रोज ही मानसी के पास आने लगी। मानसी के पास कई अच्छे-अच्छे खिलौने थे। विराग और प्रफुल्ल से भी उसकी जान-पहचान हो गई। शिप्रा ने विराग को भी अपनी पेंटिंग दिखाई। विराग ने अनमने भाव से देखा, कुछ कहा नहीं। तभी कोई और बात चल निकली अत: शिप्रा ने इस बात का बुरा न माना।

दीपावली पर विराग घर आया, शिप्रा ने अपने हाथ से बनाकर शुभकामना कार्ड बना कर मानसी की मम्मी को दिया। कार्ड मम्मी और पापा दोनों को बहुत पसंद आया, लेकिन विराग को नहीं। उसे तो महंगे वाले कार्ड ही पसंद आते थे। वह बनाने वाले की मेहनत नहीं, वस्तु की कीमत देखता था।

छुट्टियों में विराग पुन: घर आया। सब दोस्तों से मिला। शिप्रा से भी मिला। जनवरी में विराग का जन्मदिन आने वाला था। तैयारियां होने लगी। जन्मदिन बड़ी धूमधाम से मनाया गया। बड़े-बड़े उपहार लेकर लोग आए। विराग के दोस्त अपनी गाड़ी से दिल्ली से आए थे। प्रफुल्ल और हेमंत ने भी अच्छे उपहार दिए। शिप्रा ने अपने हाथ से बनाए हुए कागज व कपड़े के रंग-बिरंगे फूलों का गुलदस्ता उपहार में दिया था। विराग की मम्मी के कहने पर शिप्रा ने डांस भी किया।

अगले दिन शाम को प्रफुल्ल विराग के पास आया और पूछा- ‘कहो दोस्त, उपहार कैसे लगे?’
‘सब उपहार अच्छे थे बस शिप्रा ने बेगार टाल दी।’
‘तुम ठीक कहते हो यार, वह हर किसी को तोहफे में अपने हाथ से बनी हुई चीज ही देती है, मेरे जन्मदिन पर भी उसने एक माडल बनाकर दिया था।’ प्रफुल्ल ने कहा।

‘वह अपनी कला सब पर लादती फिरती है। यह भी कोई बात है, हूं।’ कहते हुए विराग ने शिप्रा के दिए फूलों का गुच्छा उठाकर बरामदे में फेंक दिया, जो सामने से आ रही शिप्रा के पांवों पर गिरा। शिप्रा ठगी सी रह गई। उससे झुक कर फूलों को उठाया भी न गया, उसकी आंखों में आंसू आ गए।

बगीचे में खड़े पापा ने सब देख लिया था। वह लपक कर आए और कागज के फूलों का गुच्छा उठाते हुए बोले, ‘तुम गलत समझ रही हो शिप्रा। विराग प्रफुल्ल को यह दिखा रहा था कि किसी वस्तु को कितनी दूर फेंक सकता है। उसकी यह गलती है कि उसने फेंकने के लिए फूलों के इस गुच्छे को चुना। फिर भी देखो, एक फूल भी नहीं निकला। कागज और कपड़े से बने यह सुंदर फूल ताजा फूलों से अच्छे हैं। ये कभी मुरझाते नहीं, सदा तरोताजा रहते हैं, तुम बच्चों की तरह।’

कह कर उन्होंने फूलों का गुच्छा विराग को पकड़ा दिया। विराग ने चुपचाप उसे फूलदान में लगा दिया।
‘विराग, तुम्हें पता है, कला प्रतियोगिता में शिप्रा को प्रथम पुरस्कार मिला है। तुम्हारी मम्मी ने मुझे बताया था।’ पापा ने कहा।

‘अच्छा, बधाई हो शिप्रा तुमने बताया नहीं’, विराग ने जैसे-तैसे कहा।
‘अगर मैं बताती तो तुम विश्वास करते?’ शिप्रा ने कहा।
विराग से जवाब देते न बना। पापा ही बोले, ‘ये दोनों इधर-उधर की बातों में समय खराब करते रहते हैं। काम की बात इन्हें याद ही नहीं रहती। अब तुम सब लोग जाओ रसोई में। चंदू ने नाश्ता बना दिया होगा। मेज पर लगाओ, हम और तुम्हारी मम्मी अभी आते हैं।’

तीनों ने मिलकर नाश्ता मेज पर लगाया, मम्मी-पापा भी आ गए। सबने एक साथ नाश्ता किया। शिप्रा और प्रफुल्ल अपने-अपने घर चले गए। शाम को मम्मी-पापा बगीचे में बैठे थे। विराग भी वहीं था। मम्मी ने कहा, ‘विराग किसी के दिए उपहार की कीमत मत आंको। उपहार देने वाले की भावना देखो। आज अगर पापा बात न संभालते तो शिप्रा को कितना दुख होता।’ ‘सारी मम्मी।’ विराग ने अपनी गलती महसूस की। उस दिन के बाद से विराग ने किसी के उपहार का मजाक नहीं बनाया। उसने प्रफुल्ल को भी यही बात समझाई कि उपहार में देने वाले की मेहनत और भावना देखते हैं, कीमत नहीं।