आज बहुत दिनों के सूखे के बाद सावन की बूंदों की झड़ी लगी तो मन बेचैन हुआ। साठ साल की उम्र पार करने के बाद आज साथ बैठने के लिए किसे कहूं? छत्तीस साल के सफर की साथी वसुधा कितनी बदल गई है। बदले रिश्ते की कहानी बूंदों को ही सुना दूं। हमने अपनी-अपनी व्यस्तता ढूंढ़ कर दूरियों के बहाने बना लिए हैं। अलग करवट सोते हैं। उम्र तो सब पर असर लेकर आती है। ऐसा क्या हुआ कि हमारे बीच मीठी बातें खो गईं? बतकहियां और गलबहियां ही तो पति-पत्नी के बीच मधुरता का आधार होती हैं। प्रेम और अनुराग की दिशाएं खो गई हैं। मन वह तड़प महसूस नहीं करता, जिसकी हमें तलाश रहती थी। अपने जीने की राह जो उसने बनाई है, क्या वह जरूरी थी? अब मेरा कुछ भी कहना-सुनना व्यर्थ है। मैं उसे राह बदलने के लिए भी नहीं कहूंगा।
क्या ये राहें उसे संन्यास की तरफ मोड़ रही हैं? मगर स्वामित्व का भाव उसमें अभी भी बना हुआ है! मेरे सहज प्रेम की बातें भी उसे असहज कर देती हैं। नजरिया ही हमारी सोच बनाता है। उसे व्यवहार में ढालने में समय लगता है। वैचारिक असमानता के बावजूद हममें कुछ समानता भी है। हम उन्हीं बातों को सामने रखकर क्यों नहीं चल पाते? उसे मुझसे शिकायत ही रहने लगी है। हमारा संबंध अपनी आदतों और स्वतंत्रता के साथ सहमति और समझ का भी है। इसी से दोनों का मन और मान जुड़ा है।
मेरे सामने आज भी वह बात दीवार-सी खड़ी हो जाती है, जो उसने मेरे भावों को देखकर कही थी— ‘विनय, आज के बाद हमारे बीच पहले जैसे दैहिक संबंध नहीं रहेंगे। मैंने आजन्म ब्रह्मचर्य का पालन करने का निश्चय किया है। इससे मानसिक सुख-संतोष मिलेगा।’ मैंने करवट बदलकर कहा, ‘कल से क्यों? अभी से क्यों नहीं? निश्चय ही निर्णय होते हैं, पर ऐसे निर्णय आपसी सहमति से लिए जाते हैं।’
उस दिन के बाद से मैं उसकी तरफ करवट लेना भूल गया। उसका निर्णय ही दीवार बना रहा। मेरे प्रतिवाद पर उसका कहना था— ‘मैंने सिर्फ संयम की राह चुनी है, संन्यास की राह नहीं। संन्यास तो बहुत दूर की यात्रा है। उधर जाने का मेरा इरादा नहीं है। मैंने घर-परिवार तो नहीं छोड़ा है। एक अवस्था के बाद मन की जरूरतें तन से बड़ी हो जाती हैं। लोग जरा-सी बात पर घर छोड़ देते हैं—कभी औरत की बेवफाई के नाम पर, कभी संबंधों की निस्सारता के नाम पर। फिर पलटकर पत्नी और बच्चों की तरफ भी नहीं देखते। उनके संन्यास की राह तो महानता लिए होती है। पर स्त्री तो घर में भी स्वतंत्र नहीं है। बाहर भी कौन उसे इच्छित जीवन जीने देता है?’
मैंने कहा था— ‘मुझे यह निर्णय मेरी मनोवृत्ति को बांधना लगता है। मेरा सौंदर्यबोध और प्रेम से भरा दिल नहीं देखा? मैं कहीं बाहर नहीं, अपने ही मन में भटका। बाजार से गुजरा था, पर खरीदार नहीं था। मैंने स्त्री को वस्तु की तरह नहीं, व्यक्ति की तरह देखा। उसके सम्मान और स्वतंत्रता को महत्व दिया है। उसकी जरूरतों और इच्छाओं को मानवीय आधार पर समझा है। उसे कभी संवेदना से दूर नहीं रखा।’
कभी-कभी अंतरंग क्षणों में उसकी अलिप्तता भी महसूस की है। यह निर्णय उसी का विस्तार लगता है। उसका उत्तर मिला— ‘मेरे पास रहकर भी तुम कहीं और रहते थे। मैं तुम्हारी कामना-पूर्ति का जरिया बन गई थी। पर तुम्हारी इच्छा देखकर चुप रही।’
मैंने एक बार कहा था— ‘वसुधा, हम सहज उपलब्ध छोटे-छोटे सुखों के साथ जीने वाले इंसान हैं। यही सुख हमारी कामनाओं का प्रतिरूप होते हैं। उम्र के ढलान पर इस निर्णय का औचित्य मेरी समझ में नहीं आता।’
याद आता है, जब वह इस घर में दुलहन बनकर आई थी। अपनी खोई नजरों से शृंगार-टेबल के शीशे में देर तक खुद को निहारा करती थी। मैंने पूछा था— ‘वह खुद को अपनी नजरों से देखती है या आईने की नजर से?’
उसने कहा— ‘मैं खुद को चाहत भरी नजरों से देखना चाहती हूं। कोई देखने वाला तो दिखाई दे!’ मैंने कहा— ‘किस चाहने वाले की नजरों से खुद को देखना चाहती हो? हम भी चाहने वालों में हैं।’ वह चुप रही।
हम सहज स्वाभाविक रूप में क्यों नहीं रह पा रहे हैं? मैं उसे दोष नहीं दे रहा। लोग दूसरों को आसानी से दोषी बना देते हैं। उन दिनों की यादों की तरफ मुड़ना चाहता हूं। पहली बार जब मैंने एक दुबली-सी लड़की को देखा था, वह कविता की तरह छंदबद्ध थी—जिसे गुनगुनाने को जी चाहे, जिसका हाथ अपने हाथों में लेने को जी चाहे।
उसके भीतर मेरी रसिक प्रवृत्ति को लेकर संशय आज भी है। उसने चुप्पी तोड़ी— ‘मेरा मन संन्यास लिया-सा है या वनवास दिया-सा। मैं घर-गृहस्थी के प्रति समर्पित हूं। तुम्हारी फितरत मेरे कहने से बदलने वाली नहीं है।’
उसने कह दिया, मैंने सुन लिया। मैंने चाहा कि इस अवरोध को कहानी के शब्दों में बांध दूं, पर कहानी एकपक्षीय लगने लगी। उसका पक्ष पूरा नहीं आ पाया। फिर सोचा— ‘वो अफसाना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन, उसे एक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा।’
मैं भी इस अफसाने को वहीं छोड़ रहा हूं, जहां कोई शिकवा-शिकायत न हो। कहानी एक नजरिया है, सच्चाई नहीं। उसके कथित संन्यास की राहें मन के विन्यास की राहें बनतीं तो अच्छा था।
बहुत दिनों के सूखे के बाद बूंदों की झड़ी लगी है। किससे कहूं कि साथ बैठकर बारिश की बूंदों का शीशे पर गिरना देखें? कितना शोर हमने भीतर भर लिया है। किसी बहाने से भी साथ नहीं बैठे। उन बीते दिनों की यादें उतारकर देखें जिन्हें भूल गए हैं। बस साथ बैठे रहें—न मैं कुछ कहूं, न वह।
उम्र से ज्यादा हमारी सोच हमें बूढ़ा बनाती है। जहां अपनापन हो, वही हमारी दुनिया है। पति-पत्नी का संबंध हर निष्कर्ष से परे होता है। दो कहानियों का अंजाम एक जैसा नहीं होता। चलें उस पथ पर, जहां हंसी-खुशी के फूल हों, प्रेम का विस्तृत आकाश हो।
कोई और सारांश नहीं—एक ऐसा एकांश जिसमें शिकायत न हो। इस भीगे मौसम में चाय पीते हैं। मुद्दत से साथ बैठे नहीं। चलो गुनगुनाएं—
“नीले गगन के तले, अपना भी प्यार पले…”
