कोई मानुस जंगल में पड़े वनमानुस की तरह के बच्चे को आधुनिक आदम बना दे तो? विजयदान देथा के ‘उलझन’ की बंजारन ऐसा ही करती है। विजयदान देथा जिन्हें लोग प्यार से बिज्जी कहते हैं, ऐसे साहित्यकार हुए जो लोक-संस्कृति को किसी इतिहासकार की तरह देख रहे थे।

देथा का जन्म एक सितंबर 1926 को राजस्थान के जोधपुर के पास बोरुदा गांव में हुआ था। उन्होंने लोक की स्मृतियों का वर्तमान के साथ जीवंत रिश्ता बनाने का मार्ग चुना। राजस्थान के लोक के बीच में से सदियों की स्मृतियां, सत्ता के किस्से, जाति की दीवारें और सारी वर्जनाओं को लांघ जाने की इंसानी बेचैनी को खोज निकाला।

पुरानी गठरी सी, जंग खाई संदूकची जैसी इन कहानियों को समकालीन चेतना की प्रयोगशाला से निकाल कर साहित्य प्रेमियों को चमत्कृत कर दिया। वे लोक की मिट्टी में आधुनिक मनुष्य की तलाश कर रहे थे।

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स्मृतियों में भुलाए गए लोगों को ऐसे खड़ा कर देते थे कि वह कोई ऐसा भुतहा किरदार दिखता, जिसका कोई काम बचा रह गया हो, जिसे पूरा करने के लिए उसे आना पड़ा। चौदह खंडों में उनकी ‘बातां री फुलवाड़ी’ शृंखला छपी। बिज्जी का संसार राजस्थान के भूगोल को पार कर जाता है।

उनकी कहानी ‘दुविधा’ में बंदिशों से जकड़े प्रेम, पितृसत्ता से जकड़ी स्त्री, सामंती व्यवस्था से लाचार गरीब की दुविधाएं एक साथ कठपुतली की तरह नृत्य करती हैं। वर्तमान से बात करने और भविष्य की राह समझने के लिए देथा भूत को खड़ा कर देते हैं।

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देथा की खासियत है कि वे लोक को रुमानियत में नहीं ले जाते हैं। लोक-जीवन के अंतर्विरोधों की पहचान कर साहित्यक सुर-लय-ताल से वह एक आधुनिक संगीत रचते हैं। उनकी रचनाओं की विद्रोहिणी स्त्रियां चकित करती हैं। इन स्त्रियों के लिए प्रेम व्यवस्था के विरुद्ध खड़े होने की ताकत लाता है। दस नवंबर 2013 को उनका निधन हो गया।