ढोलक की थाप, आम की मिठास भरी खुशबू और रंगीन झालरों से सजा आंगन आने वाली खुशियों का संदेश दे रहा था। कहीं हल्दी पीसी जा रही थी, कहीं रसोई से पकवानों की महक आ रही थी और कहीं बच्चों की हंसी पूरे घर में गूंज रही थी। सविता मुख्य द्वार पर तोरण ठीक कर रही थी कि तभी एक गाड़ी आकर रुकी। जेठ-जेठानी और उनके बच्चे उतरे तो सविता मुस्कराते हुए उनके पैरों पर झुक गई। भैया ने आशीर्वाद देते हुए कहा, ‘अरे, सविता की मुस्कान देखो, कहीं नजर न लग जाए!’ सब हंस पड़े।

सविता और शिवानी एक ही दिन इस घर में ब्याहकर आई थीं। बड़ा भाई मंगेश और शिवानी कालेज के साथी थे। दोनों ने अपने समान विचारों के कारण जीवन भर एक-दूसरे के साथ चलने का निर्णय लिया था। छोटे भाई दिनेश की शादी सविता से हुई थी। सविता गांव की शांत और व्यावहारिक लड़की थी। घर की जिम्मेदारियां उसने सहजता से संभाल ली थीं। शिवानी का व्यक्तित्व अलग रंगों से भरा था।

वह बुरी नहीं थी, बस तेज रफ्तार वाली जीवनशैली के कारण दृष्टि कुछ बदल गई थी। कभी-कभी उसके आधुनिक तंज सविता को चुभ जाते, पर सविता उन्हें मन में जगह नहीं देती। फिर भी दोनों एक-दूसरे की खूबियों को मन ही मन स्वीकार करती थीं। शिवानी को आश्चर्य होता कि सविता साधारण सी चीजों में भी संतुष्ट कैसे रह लेती है। वहीं सविता को शिवानी की आत्मनिर्भरता और आत्मविश्वास अच्छा लगता था। फर्क बस इतना था कि शिवानी जहां आगे बढ़ने को जीवन का अर्थ मानती थी, वहीं सविता रिश्तों को साथ लेकर चलने में अपनी खुशी खोजती थी।

मंगेश-शिवानी अपनी ऊंची महत्त्वाकांक्षाओं को साकार करने के लिए विदेश चले गए। वहां की खुली सोच और स्वतंत्रता में पले-बढ़े। सुविधाओं की वहां कोई कमी नहीं थी, पर जैसे-जैसे बच्चे बड़े हुए और मंगेश की व्यस्तता बढ़ती गई, शिवानी के भीतर एक अजीब-सा खालीपन उतरने लगा।
त्योहार मनाने का तरीका बस यहां इतना ही था कि कई भारतीय परिवार एकत्रित होकर, ठीक वैसे ही भोजन कर लेते जैसे विदेशों में अक्सर त्योहारों पर किया जाता है।

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सोशल मीडिया पर भारत में चल रही पूजा या उत्सव में होने वाली रौनक, हंसी-खुशी का वातावरण देखकर उसका मन उदास हो जाता था। पाश्चात्य संस्कृति में रहते हुए मंगेश भी बहुत बदल गया था।

एक बार पूजा की तैयारी के बीच शिवानी ने अपनी विदेशी जीवनशैली से तुलना करते हुए मुस्कुराकर कहा, ‘सविता, इन सब रस्मों में इतना समय क्यों खराब करती हो? आजकल सब कुछ साधारण रखते हैं।’ सविता सहज स्वर में बोली थी, ‘समय तो लगता है, शिवानी, लेकिन यही समय बच्चों को भी तो बताता है कि वे कहां से आए हैं। हम जो कुछ अपने बड़ों से सीखकर लाए हैं, उसका थोड़ा-सा हिस्सा आगे दे दें, तो परंपरा अपने आप चलती रहती है।

बच्चों को जो सिखाया जाता है, वही वे आगे लेकर जाते हैं।’ शिवानी मुस्कुरा दी। उस रात उसे अपने बच्चों का बचपन याद आया। पढ़ाई, प्रतियोगिताओं, करियर और आगे बढ़ने की दौड़ में उसने हमेशा उन्हें आत्मनिर्भर बनना और अपने निर्णय स्वयं लेना सिखाया था। क्या उसने कभी उन्हें ठहरकर पीछे मुड़कर देखना भी सिखाया था? इस प्रश्न का उत्तर वह स्वयं भी नहीं जानती थी।

शादी में सविता और दिनेश एक-दूसरे का साथ देते हुए हर काम में जुटे थे। उनके बेटे ने स्वयं एक इंजीनियर लड़की चुनी थी। हल्दी की रस्म में सविता का उत्साह चरम पर था। सभी एक-दूसरे को हंसते-हंसते हल्दी लगा रहे थे। तभी किसी ने चुटकी ली, ‘अरे, सविता! थोड़ी हल्दी शिवानी के बेटे को भी लगा दो, जल्दी शादी हो जाएगी!’ सविता बच्चों के स्वभाव से परिचित थी, इसलिए वह बात को नजरअंदाज कर आगे बढ़ने लगी।

तभी शिवानी ने मुस्कुराकर थाली से हल्दी उठाई और बेटे की नाक पर हल्का-सा टीका लगा दिया। बेटा थोड़ा पीछे हट गया, ‘माम, प्लीज, ज्यादा मत लगाना। मुझे स्किन एलर्जी हो जाती है और कपड़ों पर भी दाग लग जाएगा।’ उसके स्वर में आग्रह था। वह थोड़ा असहज हो गया और हल्के से मुस्कुराकर अपने दोस्तों के पास चला गया। शिवानी उसे जाते हुए देखती रही। सविता के बेटे से उम्र में बड़ा होने पर भी विवाह के संस्कार और उसके भावनात्मक अर्थों से वह उतना जुड़ नहीं पाया था। उसके लिए विवाह शायद जीवनभर के रिश्ते से अधिक दो व्यक्तियों के बीच एक समझौते जैसा था।

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उसे अनायास ही सविता का जीवन याद आ गया। गांव में रहते हुए, सीमित सुविधाओं और अधिक पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच भी सविता ने अपने बच्चों को ऐसे संस्कार दिए थे कि वे आधुनिक जीवन के साथ-साथ रिश्तों की गरिमा और परिवार की अहमियत भी समझते थे। वहीं वह विदेश में सुविधासंपन्न और अपेक्षाकृत स्वतंत्र जीवन जीते हुए भी अपने बच्चों को उन संस्कारों और अपनी जड़ों से उतना जोड़ नहीं पाई थी।

शायद खुशियां केवल सुविधाओं और स्वतंत्रता से नहीं, बल्कि अपनेपन, रिश्तों और संस्कारों से भी समृद्ध होती हैं। उसे लगा कि सविता के बेटे की शादी में केवल रस्में नहीं निभाई जा रही थीं। हर रस्म के साथ परिवार के लोग जुड़ रहे थे, बड़ों का आशीर्वाद था और छोटे-बड़े मिलकर जिम्मेदारियां संभाल रहे थे। शायद विवाह का यही भाव नई पीढ़ी तक पहुंचना भी जरूरी था।

थोड़ी देर बाद सविता का बेटा अपने दोस्तों से अलग होकर दादी के पास बैठ गया। ‘दादी, दवा समय पर ली थी न?’ बूढ़ी आंखों में चमक आ गई। शिवानी ने वह दृश्य चुपचाप देखा। उसे लगा कि यही छोटी-छोटी बातें घर को घर बनाती हैं। थोड़ी देर बाद सविता का बेटा थाली उठाकर बुजुर्गों को जलपान बांट रहा था।

दूर से किसी ने कहा, ‘देखो सविता का लड़का कितना सलीकेदार है! अपनी पत्नी को बहुत खुश रखेगा।’ शिवानी ने सिर झुका लिया। यह ईर्ष्या नहीं थी। यह स्वीकारोक्ति थी। अगली सुबह उसकी नींद ढोलक की हल्की थाप से खुली। शादी वाले घर में सुबह-सुबह मंगल गीत गाए जाते हैं। वह उठी, स्नान आदि से निवृत्त हुई और तैयार होकर बाहर आई। आंगन में पूजा की तैयारियां चल रही थीं। सविता फूलों और पूजा की सामग्री को सहेज रही थी।

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शिवानी ने बिना किसी के कहे उसके पास जाकर हाथ बंटाना शुरू कर दिया। उसने फूल धोए, दीपक सजाए और पूजा की थाली को व्यवस्थित करने लगी। किसी ने हंसकर कहा, ‘अरे, आज तो शिवानी भी देसी हो गई!’

शिवानी ने सविता से कहा, ‘शायद तुम्हारा जीवन को देखने का नजरिया बिल्कुल सही है। इंसान जहां भी जाए, उसे अपनी भाषा, रिश्तों की गर्माहट और अपनी संस्कृति के कुछ रंग अपने साथ जरूर ले जाने चाहिए। आगे बढ़ना जरूरी है, लेकिन अपनी जड़ों से जुड़े रहना भी उतना ही जरूरी है।’
शायद यही था, खुशियों का असली मोल।