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पंख खोने की सनक

समाज में आधुनिकता आ गई। लोगों की आत्म-चेतना जाग गई। पर आधुनिक और आत्म-सजग हुए लोगों पर परंपरा-ध्वंस की ऐसी धुन सवार हुई कि उन्हें अपना सब कुछ (भाषा, संस्कृति, साहित्य, परंपरा, चिंतन-पद्धति) निरर्थक और पिछड़ा लगने लगा। आधुनिक होने के मुगालते में उनका रिश्ता सबसे पहले अपनी परंपरा से कटा, फिर संस्कृति और फिर भाषा से।

Author July 2, 2018 2:01 AM
अपनी ज्ञान-परंपरा और बौद्धिकता के लिए दुनिया भर में भारत की ख्याति प्राचीन काल से रही है। आततायियों के बेशुमार हमले झेल कर भी इस देश ने अपनी सांस्कृतिक मौलिकता अक्षत रखी, तो इसका श्रेय यहां की भव्य विरासत को जाता है।

देवशंकर नवीन

अपनी ज्ञान-परंपरा और बौद्धिकता के लिए दुनिया भर में भारत की ख्याति प्राचीन काल से रही है। आततायियों के बेशुमार हमले झेल कर भी इस देश ने अपनी सांस्कृतिक मौलिकता अक्षत रखी, तो इसका श्रेय यहां की भव्य विरासत को जाता है। अपनी शासन-व्यवस्था, राजनीतिक विवेक और बौद्धिक क्षमता को सुसंगत बनाने के लिए कई राजाओं ने भारत के बौद्धिक धरोहरों का उपयोग किया है। पर, यह सब भारत के आधुनिक होने से पहले की बात है। अब हमारा देश आधुनिक हो गया है। विभिन्न ग्रहों की पूजा करने वाले लोग चंद्रमा पर जाकर सैर कर आए। तकनीकी सुविधाओं के दोहन में निपुण हो गए। साक्षरता बढ़ गई, ज्ञान का महत्त्व घट भी गया तो कोई बात नहीं! लोगों का जीवन आधुनिक तो हुआ! टीवी विज्ञापनों के सहारे दिनचर्या की वस्तुएं खरीदी जाने लगीं। अत्याधुनिक फोन ने हर किसी को अत्याधुनिक बना दिया।… पर इतनी दिशाओं से आधुनिक हो गए भारत में नागरिक मनोदशा देख कर मुक्तिबोध की कहानी ‘पक्षी और दीमक’ की बरबश याद आती है।

इस कहानी के अंतिम अंश में कथानायक ने नायिका को एक कहानी सुनाई- एक पक्षी अपने पिता और मित्र के साथ ऊंचे आसमान में तेज-तेज उड़ रहा था। उसने जमीन पर चलते एक गाड़ीवान को चिल्लाते सुना- ‘दो दीमकें लो, एक पंख दो!’ नौजवान पक्षी को दीमकों का शौक चर्राया। वह नीचे उतरा, अपनी चोंच से एक पंख खींच कर गाड़ीवान को दिया और बड़े स्वाद से मुंह में दीमकें दबा कर फुर्र हो गया। इसके बाद वह हर रोज गाड़ीवान को एक पंख देकर दो दीमकें खरीदने लगा। पिता ने समझाया कि दीमक हमारा स्वाभाविक आहार नहीं है, पंख की कीमत पर तो हरगिज नहीं। पर नौजवान पक्षी पर दीमकों का शौक सवार था। वह किसी समझदार की बात क्यों सुने!

उसे तो अपनी समझ और निर्णय पर घनघोर आस्था थी! लिहाजा, उसके पंख खर्च होते गए। ऊंचा उड़ने का उसका संतुलन बिगड़ता गया। पर दीमक खाने का शौक कम न हुआ। जब उड़ना उसके लिए संभव नहीं रहा, तो उसने सोचा कि आसमान में उड़ना ही फिजूल है। इधर वह गाड़ीवान भी गायब रहने लगा। उड़ान में अक्षम होकर पक्षी जमीन पर आ गया। यहां उसने ढेर सारे दीमक देखे। चुन-चुन कर उसने दीमकों का ढेर कर लिया। फिर अचानक उसे वह गाड़ीवान दिखा। प्रसन्न होकर पक्षी ने उससे कहा- देखो, मैंने ढेरों दीमक जमा कर लिए हैं। तुम ये ले लो और मेरे पंख वापस कर दो। गाड़ीवान ठठा कर हंसा और कहा- बेवकूफ, मैं पंख के बदले दीमक देता हूं, दीमक के बदले पंख नहीं! गाड़ीवान चला गया। पक्षी छटपटाता रहा। फिर एक काली बिल्ली आई और उसे दबोच कर चली गई। पक्षी का खून जमीन पर लकीर बनाता गया।…

अत्याधुनिक हो गए आज के भारतीय नागरिक बहुत हद तक उस पक्षी की तरह ही उत्साही, जिद्दी और अपने सुदक्ष निर्णय-क्षमता पर डटे हैं। ऊंची उड़ान भरने की अथाह शक्ति रखने वाले भारतीय नागरिक के पंख कुछ उस पक्षी की तरह ही खर्च होते दिख रहे हैं। वे अपनी बुद्धि पर गौरवान्वित क्षणिक और छुद्र लिप्साओं की पूर्ति हेतु अपने पंख उखाड़-उखाड़ कर गाड़ीवान को दिए जा रहे हैं। कुछेक लोग उस पक्षी के पिता की भूमिका में अवश्य हैं; पर उन्हें सुनने को कोई तैयार नहीं है। मुक्तिबोध के कथा-नायक ने नायिका को यह कथा सुना कर प्रण किया कि मैं उस पक्षी की मौत नहीं मरूंगा। मैं अभी उबर सकता हूं। रोग अभी असाध्य नहीं हुआ है। बड़ी आपदाओं से बचने के लिए उसे ठाठ-बाट की लिप्सा त्यागना उचित लगा था।

इस कहानी के पीछे मुक्तिबोध की मंशा निश्चय ही स्वातंत्र्योत्तर भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था और नागरिक-निरपेक्षता देख कर बनी होगी। आज का जनजीवन कहीं उससे कठितर समय भोग रहा है।…शायद इसलिए, कि उन्हें ठाठ-बाट सम्मोहित करता है। उन्हें बताया जा रहा है कि यह जीवन ऐशो-आराम के लिए मिला है। ऐसे नागरिकों के उपदेशक उनके समक्ष कर्तव्य और नैतिकता का उल्लेख नहीं करते। वे अपनी ही संदिग्ध नैतिकता से परिचित नहीं हैं; उन्हें भली-भांति मालूम नहीं है कि वे जो कर रहे हैं, उसका उद्देश्य क्या है, उनकी हरकत कितनी मानवीय और सार्थक है!

वे आमजन को निरंतर आश्वस्त किए जा रहे हैं कि ‘गाड़ीवान’ ही इस समाज के त्राता हैं, उपकारी हैं। उन्हें सुविधा मुहैया करा रहे हैं। भोली भारतीय जनता यह बात बड़ी आसानी से मान भी लेती है। चेतना के ऊर्वर क्षेत्र से जनसामान्य को दूर रखने का शासकीय धंधा सदैव संचालित रहा है; अब भी है। जनसामान्य की पीड़ाओं को अपने पक्ष में भुना लेने का उनका कौशल विलक्षण है। प्राचीन काल में जब लोग आधुनिक वैज्ञानिक आविष्कारों से प्राप्त सुविधाओं से संपन्न नहीं हुए थे, तब सामाजिक-विधान का संचालन धर्म, संस्कृति, और मर्यादा (नैतिकता) के सूत्रों से हो रहा था। लंबे समय तक चली किसी व्यवस्था के सोच-विचार में विसंगति आ जाना सहज प्रक्रिया है।

इसलिए समय के बहाव के जिस मोड़ पर सामाजिक-व्यवस्था के संचालकों की मर्यादा कलुषित हुई; धर्म और संस्कृति का विरूपित उपयोग हुआ, और होता रहा। पर, देश आधुनिक हुआ; विज्ञान के प्रादुर्भाव से समाज की सोच बदली। देवत्व से मुक्त होकर समाज मनुष्यत्व की ओर बढ़ा। अनुपस्थित ‘परलोक’ की जगह उपस्थित ‘लोक’ का महत्त्व बढ़ा। समाज में आधुनिकता आ गई। लोगों की आत्म-चेतना जाग गई। पर आधुनिक और आत्म-सजग हुए लोगों पर परंपरा-ध्वंस की ऐसी धुन सवार हुई कि उन्हें अपना सब कुछ (भाषा, संस्कृति, साहित्य, परंपरा, चिंतन-पद्धति) निरर्थक और पिछड़ा लगने लगा। आधुनिक होने के मुगालते में उनका रिश्ता सबसे पहले अपनी परंपरा से कटा, फिर संस्कृति और फिर भाषा से। इनसे कटते हुए उन्हें बोध ही नहीं हुआ कि वे अपनी मूल से कट रहे हैं।

छिन्न-मूल नागरिकों की जगह अंतत: किसी की झोली में होती है। झोली में आ गई जनता की आंखों पर उनके स्वामी का चश्मा होता है; उसकी चिंतन-प्रणाली पर स्वामी का पहरा होता है। वह वैसा कुछ भी नहीं देखता-सोचता, जो उसके स्वामी के हितसाधन के विपरीत हो। धार्मिक/ सांप्रदायिक उन्माद; प्रतिपक्षियों पर अभद्र लांछन; लुभावने आश्वासन आदि से उन्हें बताया गया कि वे स्वामी के कहे अनुसार आचरण करें, बाकी सब कुछ अन्न-पानी-पवन के अपने देवताओं पर छोड़ दें, वे अपनी सुरक्षा के लिए मुतमइन रहें। वे मुक्तिबोध के उस पक्षी की तरह हैं, जिन्हें गाड़ीवान की घोषणा हितकर लगती है, अपने पिता की बात पाखंड। गाड़ीवान के प्रति सम्मोहन के मारे उन्हें अपने उखड़ते पंख का दर्द भी महसूस नहीं होता।
समाज में आधुनिकता आ गई। लोगों की आत्म-चेतना जाग गई। पर आधुनिक और आत्म-सजग हुए लोगों पर परंपरा-ध्वंस की ऐसी धुन सवार हुई कि उन्हें अपना सब कुछ (भाषा, संस्कृति, साहित्य, परंपरा, चिंतन-पद्धति) निरर्थक और पिछड़ा लगने लगा। आधुनिक होने के मुगालते में उनका रिश्ता सबसे पहले अपनी परंपरा से कटा, फिर संस्कृति और फिर भाषा से।

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