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कविताएं: दुख को मुखाग्नि, तुम सुनिश्चित हो और मैं स्वर हूं…

डॉ. सांत्वना श्रीकांत की तीन लघु कविताएं

Author June 30, 2019 11:48 PM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

सांत्वना श्रीकांत

दुख को मुखाग्नि

दुख बहुत रोता है आजकल
तड़पता है/ सिसकता है,
इस कंधे से उस कंधे चढ़ता
मुखाग्नि देना चाहता है
स्वयं को
फफकता हुआ दुख।
चिढ़ता है मुस्कुराने से
सीने से लग कर अब
खत्म हो जाना चाहता है
बिलखता हुआ दुख।

तुम सुनिश्चित हो

मैंने अभावों को प्रेम किया
आकाश को निहारा,
धरती पर पांव पटके
क्षितिज का चुंबन
महसूस किया,
फिर सोचा-
अनंत ही सीमा है।
जैसे खामोश जंगल में
अनंत शोर है,
वृहद समंदर में
अनंत लहरें हैं
ठीक वैसे ही-
मेरी जीवन की
अनंत अनिश्चितताओं में
तुम सुनिश्चित हो….
और शाश्वत ही रहोगे।

मैं स्वर हूं…

मैं शंखनाद से
निकली गूंज हूं,
रहूंगी देर तक कानों में।
तुम्हारे शब्दों का स्वर हूं,
अर्थ बन कर रहूंगी
ब्रह्मांड में सदा।
प्रस्फुटित होती हुई
चिनगारी हूं मैं,
जलूंगी देर तक।
दमन के खिलाफ
चीत्कार हूं
चुभूंगी देर तक।

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