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कविताएं: लाश, एक दीप जला जाओ और आंखों की दीवार

सांत्वना श्रीकांत की तीन लघु कविताएं।

प्रतीकात्मक फोटो (फोटो सोर्स: जनसत्ता)

सांत्वना श्रीकांत

1. लाश

वहां कोई मर गया है,
धू-धू कर उसे अब
जला दिया जाएगा,
आंसुओं से नहला कर
उसका अंतिम संस्कार
कर दिया जाएगा।
वैसे भी पैदा होते ही
चल पड़ता है सिलसिला
मनुष्य के लाश बनने का।
कभी मां बिछड़ती है
को कभी बाप
कर जाता है अनाथ।
कभी प्रेमी,
तो कभी प्रेमिका,
सब चले जाते हैं
एक के बाद एक।
अंतत:
अंतिम बार लाश बनने के
इंतजार में मनुष्य
लाश बन कर ही जीता है,
यही नियति है उसकी।

2. एक दीप जला जाओ

मैं तरलवत
तुम्हारे गले से उतर कर
हृदय में आ जाऊंगी,
फैल जाऊंगी धमनियों में
ताकि तुम
मेरी शून्यता को
स्वीकार कर पाओ,
उसमें भर जाओ नेह।
अंधकार से भरे रास्ते से
गुजर कर तुम
उस काली कोठरी में
पहचान जाओ मुझे,
मेरे अकेलेपन की देहरी पर
एक दीप जला जाओ।

3. आंखों की दीवार

मेरे कानों और गर्दन के बीच
ठीक-मेरे चेहरे की
दायीं ओर खाली
कैनवास पर जो आकृतियां
उकेरी थीं तुमने
अपने होंठों से,
देखो उसमें
रंग चढ़ गया है
बेफिक्री का।
उसकी भंगिमाएं
बदल जाती हैं हर वक्त।
कल शाम की ही बात है
वो लड़की जिसे
छोड़ आए थे तुम वहां,
कह रही थी-
रहने दूं उसे मैं
बिल्कुल उसी जगह
जहां तुमने-
हम दोनों की आंखों को
दीवार बना कर,
माथे की छत डाल,
अपने होंठों से
सीढ़ियां बनाई थीं
मेरे होठों तक पहुंचने की।

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