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कला संस्कृति: चरखे के सम्मान में नृत्य समारोह

इस प्रस्तुति की पराकाष्ठा बंकिमचंद्र की अमर रचना ‘वंदे मातरम’ पर आधारित थी। इसमें सभी नृत्य शैलियों की नृत्यांगनाओं ने एक साथ भारत माता की वंदना की। इस समारोह का आयोजन संस्कार भारती और गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति ने किया था।

Author October 12, 2018 3:29 AM
समारोह में शास्त्रीय नृत्य रचना ‘वंदे मातरम’ प्रस्तुत की गई। इसकी परिकल्पना भरतनाट्यम नृत्य गुरु सरोजा वैद्यनाथन ने की थी।

शशिप्रभा तिवारी 

राजघाट परिसर में तीन दिवसीय चरखा समारोह का आयोजन किया गया। समारोह के दौरान ध्रुपद गायक उस्ताद वसीफुद्दीन डागर और संतूर वादक पंडित भजन सोपोरी से संवाद प्रस्तुत किया गया। समारोह की तीसरी संध्या कला संस्कृति संगम थी। छह अक्तूबर को आयोजित सांस्कृतिक संध्या में दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं ने सामूहिक गीत पेश किया। उन्होंने राग बसंत और मल्हार में रचनाओं को गाया। इसके लिए, नाटिका ‘कल्कि अवतार’ और ‘लोकतंत्र या भीड़तंत्र’ पेश किया। इसके अलावा, शास्त्रीय नृत्य रचना ‘वंदे मातरम’ प्रस्तुत की गई। इसकी परिकल्पना भरतनाट्यम नृत्य गुरु सरोजा वैद्यनाथन ने की थी। इसमें अन्य शास्त्रीय नृत्य रचना में गुरु राजा व राधा रेड्डी, गुरु रंजना गौहर, गुरु जगदीशन, डॉक्टर भबानंद बरबायन, नृत्यांगना जयप्रभा मेनन और नृत्यांगना खुलना साहनी की शिष्याओं ने भागीदारी की।

गुरु सरोजा वैद्यनाथन ने अलग-अलग नृत्य शैलियों का संयोजन मोहक तरीके से किया। नृत्य रचना का आरंभ ओडिशी नृत्य से हुआ। इस अंश में ओडिशी नृत्य के तकनीकी पक्ष को उजागर किया गया। गुरु रंजना गौहर की शिष्याओं ने लयात्मक पाद, हस्त और अंगों की लयात्मक गतियां पेश कीं। उनका नृत्य ‘तारी झम-तारी झम’ के बोलों पर आधारित था। इसके बाद, सत्रीय नृत्य शैली में कृष्ण के रूप का वर्णन नृत्यांगनाओं ने पेष किया। रचना ‘धरनि धर धारण प्रिय परम’ के जरिए कृष्ण के रूप का विवेचन किया। वहीं, छंद ‘नृपांग उपांग भूपांग भूषणम’ में कालिया मर्दन प्रसंग का चित्रण मोहक अंदाज में किया। उनका आपसी समायोजन सुंदर था।

कुचिपुडी नृत्य शैली में गणपति स्तुति को राजा व राधा रेड्डी की शिष्य-शिष्याओं ने पेश किया। इस प्रस्तुति में ‘नमस्ते गणपतये त्वम केवलम सर्वम’ को नृत्य का आधार बनाया गया। कलाकारों ने ताल के विभिन्न आवर्तनों और लयों पर पूरी लयात्मकता से अंग और पाद संचालन पेश किया। उनके नृत्य में अच्छा तारतम्य दिखा। मणिपुरी नृत्य की कलाकारों ने बसंत रास पेश किया। यह तीन ताल में निबद्ध था। रचना ‘श्रीकृष्ण गोविंद राधा निकुंज’ में कृष्ण को तलाशती राधा व गोपियों के भावों का मनोरम वर्णन था। नृत्य के क्रम में होली पर्व में रंग व अबीर से खेलते नायक-नायिकाओं का चित्रण सौम्य था। वहीं कथकली के कलाकारों ने अपने सुंदर हस्तसंचालन, मुख चालम और पैर की गतियों से समां बांधा। मोहिनी अट्टम की नृत्यांगनाओं ने तकनीकी पक्ष को प्रस्तुत किया। आदि ताल में निबद्ध स्वरांजलि भरतनाट्यम की नृत्यांगनाओं ने पेश किया। इस अंश की परिकल्पना गुरु सरोजा वैद्यनाथन ने किया था।

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