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द लास्ट कोच: प्रेम का देवता

हमारे समाज में किसी विवाहित स्त्री या पुरुष का दूसरा संबंध ही अनौतिक है। लेकिन अब एक उम्र पार कर लेने के बाद भारतीय स्त्री और पुरुष भी अपनी खुशियां तलाशने लगे हैं। यह क्या है? वे किसे और क्यों खोज रहे हैं। क्या वे अपने प्रेम के अधूरेपन को पूरा कर लेना चाहते हैं। या किसी और साथी में खुद का अस्तित्व तलाश रहे हैं? क्या यह खुद के अधूरेपन को पूरा करने की कोशिश है? यह रूहानी प्रेम है या कुछ और? रूहानी और जिस्मानी प्रेम में उलझी एक कहानी को द लास्ट कोच शृंखला में प्रस्तुत कर रहे हैं संजय स्वतंत्र।

Author Published on: October 30, 2019 4:04 PM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

किसी भी स्त्री-पुरुष के बीच एक खास लगाव क्या सचमुच प्रेम है होता है या महज दैहिक आकर्षण? या फिर किसी एक के पास सुंदरता, पद-प्रतिष्ठा या बेशुमार दौलत होने भर से प्यार हो जाता है। पश्चिम में स्त्री-पुरुष अपनी भावनाओं के प्रति उद्दात हैं। वे अपने प्यार को बार-बार प्रदर्शित करने का ढोंग नहीं करते। सार्वजनिक स्थल पर उनकी गलबहियां या चुुंबन उसी तरह है, जैसे हम लोग किसी से मिलते समय हाथ मिलाते हैं। वे हर उस पल को जी लेना चाहते हैं। जबकि अपने यहां ऐसा नहीं है। भारतीय युगल नौतिकता के बोझ से दबे दिखते हैं। संकोच और शर्म से भी गड़े हुए।

हमारे समाज में किसी विवाहित स्त्री या पुरुष का दूसरा संबंध ही अनौतिक है। लेकिन अब एक उम्र पार कर लेने के बाद भारतीय स्त्री और पुरुष भी अपनी खुशी तलाशने लगे हैं। यह क्या है? वे किसे और क्यों खोज रहे हैं। क्या वे अपने किसी अधूरे प्रेम को पूरा कर लेना चाहते हैं। या किसी और साथी में खुद का अस्तित्व तलाश रहे हैं? यह रूहानी प्रेम है या कुछ और?

……. तो सुनेत्रा कभी लौट कर नहीं आई नीलाभ के जीवन में। यह भी सच है कि वह तलाक भी नहीं देना चाहती थी और उसके साथ रहना भी नहीं चाहती थी। मां-बाबू जी के समझाने के बाद भी वह नहीं मानी। उसने मुंबई को अपना ठिकाना बना कर मॉडलिंग को अपना करिअर चुन लिया था। अब लौटने का सवाल नहीं था। नीलाभ के किसी कॉल का उसने कभी जवाब नहीं दिया। आखिरकार वह अकेला रह गया। वह रोज रात दफ्तर से लौटता तो सन्नाटा उसे लीलने लगता। सुनेत्रा का वो आखिरी खत याद आता जिसमें क्या कुछ नहीं लिखा था। उसने उसके पुरुषत्व तक को ललकार दिया था-

नीलाभ,
……तुम जानते हो। हम दोनों एक दूसरे से खुश नहीं हैं। मेरा लक्ष्य खुद के लिए जीना है। तुम तो दूसरों के लिए जीते हो। मैं चाहती हूं कि तुम अपनी दुनिया में खुश रहो और मुझे अपनी दुनिया में खुश रहने दो।
सुनो, आज एक सच बता रही हूं तुमसे। मैं एक दिन भी सच्चा प्रेम नहीं कर सकी। इसकी वजह तुम नहीं हो। इसे दिल पर मत लेना। बस देह ही जुड़े, मन कभी नहीं। तुम में वो आग भी नहीं। तुम समझ रहे हो न, मैं क्या कह रही हूं। खैर… मैं गिल्लू को समझा गई हूं। वह तुम्हारा खयाल रखेगा। वैसे तुम इंसान बहुत अच्छे हो। इसलिए थोड़ी चिंता है तुम्हारी। दुख है कि अब हम पति-पत्नी नहीं रहेंगे।
मैं तुम्हारी थी ही नहीं। इसलिए नहीं लिखूंगी- तुम्हारी।
बस सुनेत्रा…एक दोस्त

सुनेत्रा की लिखी ये पंक्तियां रोज चुभतीं नीलाभ को। लगता कि उसके जिस्म को गरम चिमटे से उसने दाग दिया है। वह उसकी जिंदगी का मजाक बना कर चली गई है। क्या रिश्ते में आत्मीयता कोई मायने रखती। क्या घुमा-फिरा कर स्त्री और पुरुष का संबंध केवल देह पर ही टिका है? बतौर चैनल हेड काम करते हुए नीलाभ नेकामकाज के दौरान लड़कियों से प्रोफेशनल रिश्ता ही रखा। यह अपराजिता ही थी जो करीब आ गई, पता ही नहीं चला। मगर यह रिश्ता भी लोगों को खटकने लगा था।

……. हमारे समाज में एक स्त्री पुरुष कभी दोस्त नहीं हो सकते। क्योंकि इस दोस्ती के कुछ और ही मायने लगाए जाने लगते हैं। खासतौर से एक अविवाहित युवती और एक विवाहित पुरुष तो बिल्कुल भी मित्र नहीं हो सकते। या फिर दोनों विवाहित क्यों न हों। उनके बीच प्रेम का तो सवाल ही नहीं उठता।

मगर अपराजिता ने कब परवाह की? लांछनों की परवाह किए बिना उसने नीलाभ का साथ नहीं छोड़ा। वह अकसर कहती कि प्रेम और दोस्ताने में फर्क है। मगर किसी अच्छे इंसान से प्रेम हो जाए तो इसमें क्या हर्ज? चाहे उम्र का फासला हो या जाति का। या फिर विवाहित ही क्यों न हो। हां, मैं तुम से प्रेम करती हूं। मेरी रूह से प्रेम करो। मगर मेरी देह से भी प्रेम करो। यह सुन कर नीलाभ एक पल लिए सकपका जाता। उसे याद आती सुनेत्रा की वह बात, ‘तुम में वो आग नहीं। तुम समझ रहे हो न, मैं क्या कह रही हूं …….।’ नीलाभ को शून्य में निहारते देख अपराजिता झककझोर कर कहती, डफर….. क्या सोचने लगे तुम? उस मरे हुए रिश्ते से बाहर क्यों नहीं निकलते? कुएं का मेढक कब तक बने रहोगे। उसका इशारा सुनेत्रा की ओर था।

उस शाम अपराजिता दोपहर के बुलेटिन के बाद सिविल लाइंस अपने घर चली गई थी। घर क्या एकदम हॉस्टल जैसा ही था। वह रात भर दीवारों से बातें करती। नीलाभ का जी करता कि वह मशाल बन कर दीवारों पर टंग जाए और उसके मन के अंधियारे को दूर कर दे। मगर इस फ्लैट में पुरुष मित्रों के आने-जाने पर पाबंदी के कारण उसने कभी नहीं बुलाया। उसके अगल-बगल की लड़कियां अपने पुरुष मित्रों के साथ शाम को या रात में निकल जातीं, तो अपराजिता सारी रात करवटें बदलते हुए गुजार देती। नीलाभ ने उसे भावनात्मक संबल ही दिया। उसकी देह की भाषा कभी नहीं पढ़ी उसने। यों भी संबंद विच्छेद के सदमे से गुजर रहे पुरुष की देह मिट्टी हो जाती है। और स्त्री की देह? उस पर तो पुरुषों की लार टपकाती नजरें किसी से छिपी हैं क्या?

उधर, पोर्न फिल्मों ने अपराजिता में गहरा अवसाद भर दिया था। वह देर रात तक फैटेंसी में जीती, मगर इससे और भी खालीपन भर जाता उसमें। जब वह सुबह उठती तो शुचिता के नए प्रतिमान गढ़ती। वह अपने छोटे से मंदिर में दीप जला कर एक तस्वीर जरूर भेजती और कहती- आरती लीजिए। यह रोज का नियम था। गुलाबी साड़ी में लिपटी अपराजिता के ललाट पर चंदन का तिलक देख कर नीलाभ का मन पावनता से भर उठता। अपराजिता की छवि साफ-सुथरी रहे, इसके लिए वह हमेशा प्रयास करता। उसने एक दिन कहा भी कि मैं जितना तुम्हें फ्लर्ट करती हूं, दूसरा कोई होता तो पता नहीं नहीं क्या कर डालता। इसीलिए मेरे मन में तुम्हारे लिए असीम प्रेम के साथ बहुत सम्मान भी है। और मैं तुम पर अपना सर्वस्व न्योछावर कर देना चाहती हूं। तुम जैसे भी अच्छे हो, बहुत अच्छे हो। मगर थोड़े बुद्धू हो।

……..वह उमस भरी शाम थी। काले बादलों ने आसमान पर घेरा डाल दिया था। देखते ही देखते तेज बौछार शुरू हो गई। दफ्तर से नीलाभ ने मैसेज किया, तुम्हारी तरफ भी बारिश शुरू हो गई क्या। उधर से अपराजिता का जवाब आया, हां मैंने खिड़कियां खोल दी हैं। ठंडी हवाएं आ रही हैं। …… काश मैं आ जाता अभी तुम्हारे पास, नीलाभ ने लिखा। ……सचमुच कितना अच्छा होता। तुम्हारे लिए गरमा-गरम खाना बनाती। डिनर के बाद तुम्हारी गोद में सिर रख कर चांद को देखती, अपरा ने लिखा। और मैं तुम्हारी पलकों को चूम लेता, नीलाभ ने जवाब दिया। इस पर दूसरी ओर से आया मैसेज चमका- नहीं पहले ललाट को चूमते फिर मेरी नाभि तक……। नीलाभ ने जवाब लिखा- नहीं यह कुछ ज्यादा हो गया। बस पलकों तक। इस पर अपरा का जवाब आया-ऐसा क्यों शोना? मैं तुम्हारे भीतर के पुरुष को जगा रही हूं और तुम हो कि अब तक नौतिकता में बंधे हो। बंद कमरे में हम क्या कर रहे, किसी को इससे क्या लेना? यह हमारी निजता है। कुछ तो समझो डफर…….।

देह के प्रति तुम्हारी इतनी आसक्ति क्यों रहती है अपराजिता? यह भाव अक्सर नीलाभ के मन में उठता। उसे पहले भी समझाया था। मगर वह मानने को तैयार नहीं थी। ……रहने दो तुम। और सुनो जरा सेहत पर ध्यान दो। सुनेत्रा चली गई तो क्या, मैं हूं न तुम्हारे हर सुख-दुख को बांटने वाली। यह कहते हुए अपराजिता उसके कंधे पर झूल जाती। सचमुच बहुत मुश्किल था उसको समझना। जब तक प्रेम देह के इर्द-गिर्द रहता है, वह वासना के रूप में अभिव्यक्त होता है। मगर अपरा के लिए नीलाभ के मन में आत्मीयता है। यह लगाव देह से परे है। दिल में एक लौ जलती रहती है, जहां वह देवी की मूरत नजर आती है। मगर अपराजिता के मन में कुछ और ही चलता है। वह नीलाभ की धमनियों में उफनती नदी की तरह बह जाना चाहती है।

रविवार की सुबह उसका मैसेज आया- सुनो, आज भी न्यूजरूम में बैठना जरूरी है क्या। कुछ काम अपने जूनियर पर छोड़ दो। दोपहर में सिविल लाइंस चले आओ। मेरी सहेली विदेश चली गई है। वह अपने कमरे की चाबी दे गई है। आज हम वहीं मिलते हैं। वहीं उसके किचन में खाना बनाउंगी। यहां वाइन और बीयर भी छोड़ गई है कमीनी। आज पीने का मन हो रहा है। ढेर सारी बातें करेंगे। और सुनो, कार लेकर मत आना। मेट्रो से सीधे चले आना। यहां पार्किंग का स्पेस कम है। ……… मैसेज पढ़ कर लगा कि आज अपरा जी भर के बातें करने के मूड में है। काफी दिनों से साथ बैठी नहीं है। फिर वह अपने फ्लैट पर बुला भी नहीं पाती। इसलिए आज उसकी शिकायतें सुनने का अच्छा दिन है। मगर अकेला पाकर वह बहक न जाए, संभालना होगा उसे। ये आदत उसकी बुरी आदत है।

नीलाभ अपराजिता से उपहार में कभी मिले ब्लैक शर्ट पहन कर तैयार हुआ। ड्राइफ्रूट्स और चाय लेने के बाद वह मेट्रो स्टेशन निकल पड़ा है। दोपहर के दो बज चुके हैं। मेट्रो स्टेशन के पास आॅटो से उतरने पर उसने अपराजिता के लिए कुछ अंगूर और स्ट्रॉबेरी खरीद लिए। ……..वह प्लेटफार्म नंबर एक पर टहलते हुए आखिरी छोर पर चला गया है। हुडा सिटी सेंटर की मेट्रो आने की उद्घोषणा हो रही है। सामने लास्ट कोच के दरवाजे खुल गए हैं। कोने की सीट पर बैठते हुए उसने आंखें बंद कर ली हैं।

वह सोच रहा है…. वह एक ऐसे रिश्ते को लेकर चल रहा है, जिसे अभी कोई नाम नहीं दे सकता। और इस तरह के दोस्ताना संबंधों को भारतीय समाज कभी कबूल नहीं कर पाता। तरह-तरह के लांछन लगाए जाते हैं। पुरुष तो समाज की इस संकीर्णता को झेल लेता है। मगर स्त्रियों के लिए कोई भी लांछन किसी अग्नि परीक्षा से कम नहीं। जिसमें तप कर उसे साबित करना पड़ता है कि वह चरित्रवान है। मगर अपराजिता ने कब परवाह की। इस रिश्ते के लिए उसे चरित्रहीन कहलाने से भी गुरेज नहीं। किसी ने कुछ कहा नहीं कि सामने वाले को वहीं धर कर चार बात सुना देती है।

अगला स्टेशन विश्वविद्यालय है। दरवाजे बांयीं ओर खुलेंगे। दरवाजे खुलते ही लड़के-लड़कियों का समूह सवार हो गया है। उनके बीच सहज मित्रता देखते बनती है। लड़कियों में कितनी शोखी और कितना चुलबुलापन है। वे अपने मित्रों के साथ कितनी उन्मुक्त हैं। कोई संकोच नहीं। जब चाहे गले लग जाती हैं। जब चाहे चूम लेती हैं। आज से 20-30 बरस पहले ऐसा कोई सोच भी नहीं सकता था।

मेट्रो चल पड़ी है। नीलाभ भी मन की यात्रा पर चल पड़ा है। कोच के दरवाजे पर खड़े एक युगल पर निगाह ठहर गई है। टी शर्ट और स्कर्ट में एक लड़की अपने दोस्त के कंधे पर सिर टिकाए बात कर रही है। बातों-बातों में उसने अपने दोस्त को चूम लिया है। मगर यह सब देखना उसे अब नहीं चौंकाता। आज के युवाओं में जिस्मानी प्यार कुछ ज्यादा ही है। अपराजिता खुद इस मामले में पीछे नहीं। एक बार उसने कनाट प्लेस में घूमते हुए सार्वजनिक रूप से उसके होंठों को चूम लिया था। तब उसकी इस हरकत पर कितना डांटा था उसे। उसकी मासूम सा जवाब था- यार तलब लगी थी।

……..बीप की आवाज ने नीलाभ का ध्यान खींच लिया है। यह अपराजिता का संदेश है। सिविल लाइंस वाले फ्लैट का पता दिया है उसने। लिखा है- मैं सोसायटी के गेट के बाहर ही मिलूंगी। उसने जवाब दिया-ओके। बस पहुंच रहा हूं। पांच मिनट में। अपरा ने स्माइली भेज कर खुशी का इजहार किया है। ….. यह आत्मीय लगाव, यह प्लेटोनिक लव क्या है? क्या इसमें भी स्त्री या पुरुष का कोई स्वार्थ छिपा रहता है। पुरुष तो खास तौर से अंत में उसके जिस्म तक पहुंचना चाहता है, इसमें वह कभी-कभी रूहानी प्रेम की आड़ ले लेता है। उसका आखिरी पड़ाव वहीं है। मगर मेरे मन में ऐसा कुछ नहीं। ये अपराजिता ही है जो देह की जरूरतों की उसे याद दिलाती रहती है। सुनेत्रा जो आघात दे गई है, उसके बाद तो मुझे यह सब भी नहीं सोचना चाहिए। कल को अपराजिता भी यही कह दे कि तुम में वो आग नहीं, तो फिर क्या करूंगा। क्या मैं अपने भीतर का हौसला खो चुका हूं? या पुरुषत्व मर गया है मेरा। क्या मुझे इस रिश्ते में और आगे बढ़ना चाहिए। ……. नीलाभ ने मन में सोचा।

इस बीच दो स्टेशन निकल चुके हैं। उद्घोषणा हो रही है-अगला स्टेशन सिविल लाइंस है। दरवाजे बांयीं ओर खुलेंगे। नीलाभ सीट से उठ गया है। स्टेशन से बाहर निकल कर कुछ कदम चलने के बाद अपराजिता सड़क के किनारे मिल गई है। उसने लपक कर नीलाभ को अपनी ओर खींच लिया है। दूसरे हाथ में अपनी पसंद के फल देख कर उसने हंसते हुए कहा, मेरे लिए अंगूर खट्टे नहीं है। ओह, मेरे लिए स्ट्रॉबेरी। आज उसकी आंखों में शरारत है। उसने नीलाभ के कंधे पर अपना बोझ डालते हुए कहा, आज मैं तुम्हें सराबोर करने वाली हूं। परम आनंद के शिखर पर चलोगे मेरे साथ। …… क्या मतलब? हमेशा बहकी-बहकी बातें करती रहती हो तुम, नीलाभ ने टोका। अपराजिता ने उसके पीठ पर मुक्का मारते हुए कहा, तुम कभी नहीं समझोगे डफर। अब चलो भी। ……..चलते-चलते सामने उसकी सहेली का फ्लैट आ गया था।

दरवाजे खुलते ही मोगरे की खूशबू बदन से लिपट गई है। वही खुशबू जो अपराजिता को बेहद पसंद है। नीलाभ उसमें खो गया। ओह! कितनी मोहक सुगंध है। अपराजिता ने कहा, ‘बैठो मैं नहा कर आती हूं।’ फिर वह नीलाभ के बालों को सहलाते हुए वॉशरूम चली गई है। वहां से उसके गुनगुनाने की आवाज आ रही है-

मुझे चांद पर ले चलो
तारे दिखा दो मुझे
शमां सी जल रही हूं मैं
आ के बुझा दो मुझे….
ना तू शरीफों सा है
ना मैं शरीफों सी हूं
तेरे मेरे दरमियां
हैं फासले बोलो क्यों
मुझे चांद पर ले चलो….

वह देर तक नहाती रही। वॉशरूम से निकलती भाप से लग रहा था कि वह खुद में पिघल रही है। कुछ देर बाद झटके से दरवाजा खुला और गुलाबी टॉवेल में लिपटी अपराजिता ने अपने गीले रेशमी बाल उसके चेहरे पर बिखेर दिए। पानी की बूंदें मोतियों की तरह टपकने लगी हैं … टप-टप-टप…..। एक पल के लिए लगा कि पर्वत पर काली घटाएं लहराते हुए उतर आई हों। नीलाभ के भीतर का समंदर उफान से भर उठा है। क्या आज वह इसके आवेग में बह जाएगा।

उसने गोद में बैठी अपरा के होठों पर अंगुली रखते हुए कहा, न…..न….। क्या इसीलिए बुलाया था तुमने? …… और क्या, अब रुको मत। सारी दीवारों को गिरा दो नीलाभ, जिनसे आज तक बात तो करती रही मगर इसने कभी मुझे जवाब नहीं दिया। आज उन सभी बंधनों को तोड़ दो, जिसे तुम नैतिकता कहते हो। जो मेरी ओर बढ़ते तुम्हारे कदमों को हमेशा रोक लेती हैं, यह कहते हुए उसने अपने गुलमोहर से दहकते अधर नीलाभ गर्दन पर रख दिए हैं। नीलाभ का बदन तपने लगा है।

अपराजिता ने केतकी के फूल जैसी अपनी सुवासित और चिकनी बांहों में उसे बांध लिया है। नारी देह से लिपटे बदन से नीलाभ का दिल उबर भी न पाया था कि उसके स्वर कानों में पिघलने लगे-मेरे अधूरेपन को पूरा कर दो नीलाभ। और तुम भी अधूरे क्यों रहो। इसमें कुछ भी तो गलत नहीं। तुम्हारे भीतर जो आग सोई हैं न, उसे जगाओ। मैं उसमें पिघल कर तुम्हारी धमनियों तक बहना चाहती हूं। यह जिस्म की नहीं, जिंदगी की तलब है नीलाभ। मैं एक कंपलिट वूमन का सुख चाहती हूं। क्यों न हम आज अपनी अधूरी चाहतों में एक नया रंग भर लें। ……. यह कहते हुए उसकी जीभ नीलाभ की जीभ के साथ अठखेलियां करने लगी। एक लंबे स्मूच से दोनों की सांसें ठहर गई हैं।

……. तभी अपराजिता ने उसे बिस्तर पर धक्का देते हुए कहा, रुको। मैं वाइन लेकर आती हूं। मगर नीलाभ ने उसे रोका, नहीं ये गलत होगा। अब इससे आगे कुछ नहीं। यू आर अनटच्ड वूमन। इसके बाद जो भी होगा, उससे सारी मर्यादा टूट जाएगी। फिर कोई शर्म-संकोच बाकी नहीं रहेगा। मैं आत्मग्लानि से मर जाऊंगा। अपरा ने उसके होठों पर अंगुली रखते हुए कहा, मरे तुम्हारे दुश्मन। तुम कुछ मत सोचो। मेरे लिए प्रेम बहुत बड़ी चीज है। और तुम मेरे लिए महत्त्वपूर्ण हो। तुमने सही कहा, मैं एक अटच्ड वूमन हूं, मगर चरित्रहीन नहीं। मुझे आज तक किसी ने नहीं छुआ और न मैंने किसी को छूने दिया। यह मेरे जीवन का चुंबन भी पहला ही था जो मैंने तुम्हें दिया है। यह तुम्हारे प्रति मेरा प्रेम है। और प्रेम जाति, उम्र और गरीब-अमीर कुछ नहीं देखता। अगर मैं देह का भी रिश्ता तुमसे बनाती हूं तो यह अनैतिक नहीं है। मैं कोई प्रोस्टीट्यूट नहीं हूं, जो इसके बदले में कुछ मांगूगी तुम से। बस प्रेम की भीख मांग रही हूं। इसलिए जो हो रहा है, उसे आज हो जाने दो।

……तुम्हारी भावनाएं समझ रहा हूं अपराजिता, मगर ये सब अभी, नीलाभ ने कहा तो अपराजिता ने टोका, अभी नहीं तो कब। ये सब तो अचानक ही होता है। कल फिर कहां आता है। इस पल को जी लो डफर। हमेशा बुद्धू ही रहोगे क्या। अपराजिता ने उसकी एक नहीं सुनी……… दोनों में देर तक एक दूसरे के तर्कों को काटते रहे। वाइन का दौर चलता रहा। हर छोटे पैग के बाद नीलाभ रोकता तो अपरा यही कहती, बस थोड़ी सी ही तो पी है। थोड़ी और हो जाए। ……. देर तक चले दौर के बाद अपराजिता निढाल हो गई है। उसके गोरे बदन से लिपटा गुलाबी टॉवेल खुल गया है। नीलाभ का संयम नहीं टूटा है। उसने तुरंत पास ही तह लगा कर रखी चादर अपराजिता ओढ़ा दी है। वह उसके बालों को सहला रहा है। अपराजिता नशे में बड़बड़ा रही है, ……. नीलाभ मुझे छोड़ कर मत जाओ। मुझे छोड़ कर मत जाओ। वह देखते ही देखते वह गहरी नींद में चली गई है। जी में आया कि उसकी गुलाबी पलकों को चूम लूं। …… मगर नहीं। कहीं मैं न बहक जाऊं? यह खयाल आते ही नीलाभ वहीं बगल में सोफे पर पसर गया। नशे की खुमारी उसे भी आगोश में ले रही है।

…… अपराजिता की कोमल हथेलियों के स्पर्श से उसकी नींद खुली है। वह उसके बालों को सहला रही है। नीलाभ की अंगुलियों में अपनी अंगुलियां फंसा कर उसने हक के साथ कहा है ……उठो नीलाभ। कब तक सोते रहोगे? देखो सुबह हो गई। मैं मार्निंग वॉक भी कर आई। तुम कल सो क्यों गए। मैं तुम्हारे इतने करीब थी। तुम मेरी देह को छू सकते थे। मेरी सांसों को महसूस कर सकते थे। फिर भी तुमने खुद को कैसे संभाला? नीलाभ ने अपरजिता केललाट को चूम कर कहा, ऐसे। ……क्योंकि मैं तुमसे प्रेम करता हूं। तुम्हारी देह से नहीं। इस पर अपरा ने नीलाभ की नाक से अपनी नाक रगड़ते हुए कहा…… तुम सचमुच सबसे अलग हो। एकदम अलग। मैं तो निहाल हो गई तुम्हें पाकर। नीलाभ की आंखों में वह अपना अक्स देख कर एक पल के लिए शरमा गई।

अपराजिता भावुक हो चली है। वह नीलाभ के सीने में दुबक गई है। उसे याद आया कि कल की रात के लिए उसने कितना इंतजार किया। क्या-क्या नहीं जतन किए। सहेली से फ्लैट की चाबी ली। केमिस्ट के पास गई। एक बार के लिए तो संकोच से ही गड़ गई थी, फिर भी हौसला कर के मांग ही लिया। दुकानदार मुंह ताकता रह गया था। उल्लू कहीं का। मानो लड़के ही ये सब खरीद सकते हैं, लड़कियां नहीं। मगर……. ये महाराज तो ठहरे संन्यासी। उसने बिस्तर से नीचे गिरे ‘आई पिल्स’ के पैकेट और वियाग्रा की गोलियों को चुपके से छिपाते हुए नीलाभ को चूम लिया- हां मेरे प्रेम के देवता। तुम सचमुच देवऋषि हो। तुम्हें डिगाना बहुत मुश्किल है। पर तुम मुझसे बच कर कहां जाओगे डफर……।

मुस्कुराते हुए अपराजिता किचन में नाश्ता बनाने चली गई है। नीलाभ सोच रहा है ……. मृगतृष्णा की रेत पर भटकती इस लड़की को समंदर किनारे ले जाऊंगा एक दिन। वहीं मैं अपनी देह उतार कर उसकी रूह में गुम जाऊंगा हमेशा के लिए। उधर, दूसरे कमरे में रेडियो पर बज रहे गीत के साथ अपराजिता गुनगुना रही है-
ऐ दिल-ए-नादान….
आरजू क्या है, जुस्तजू क्या है,
हम भटकते हैं, क्यों भटकते हैं
दश्त-ओ-सहरा में…
ऐसा लगता है मौज प्यासी है
अपने दरिया में।
कैसी उलझन है
क्यों ये उलझन है
एक साया सा रू-ब-रू क्या है……
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