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द लास्ट कोच: मुझमें रह गए हो तुम

वह जब भी ऐसी बात करती तो लगता कि वह नदी की तरह बहती हुई चली आ रही है। उसके आवेग को रोक पाना नामुमकिन है। कितने बरस गुजर गए। उसकी पलकों पर नीली रात ठहरी है, अनंत जश्न मनाने के लिए। आंखों में आज भी वही समंदर है नीलाभ के लिए, जहां वो एक नौका लेकर उसके साथ चल पड़ती है। पूरी दुनिया को फतह करने। सच कहूं तो वह फतह कर चुकी है। वह एक लंबी उड़ान भर सकती है तो समुद्र में गोता भी लगा सकती है। आज सब कुछ है उसके पास। कोई नहीं है तो बस एक आत्मीय साथी। ...मगर साथी की जरूरत तो अपराजिता को भी है। बुरे वक्त में वही भावनात्मक संबल बनी रही। उसको छोड़ कर कहां जाएगा नीलाभ? क्या उसे सचमुच छोड़ पाएगा। पढ़िए द लास्ट कोच शृंखला में लेखक पत्रकार संजय स्वतंत्र की नई कहानी।

Illustration, The Last Coach Series, jansatta last coachप्रतीकात्मक तस्वीर। (Illustration: Subrata Dhar)

उसने मासूमियत के साथ एक दिन कहा था, ये आपका प्रेम ही है जो मुझे बड़ा बना देता है। वरना मुझे आता ही क्या है? दुनिया की आम लड़कियों की तरह हूं। मगर आप मानते कहां हैं। हमेशा सिर पर चढ़ा कर रखते हैं। इतना चढ़ाया कि देखिए कितनी दूर चली आई। जो मुस्कान आपने मुझ पर बिखेरी थी। अब वही मरीजों पर लुटा रही हूं। मेरी मुस्कुराहट को आप कविताओं में कैसे उतार लेते हैं? मैं उन कविताओं में हूं भी और नहीं भी। ये कैसा प्रेम है नीलाभ। जिसमें आपकी मुझसे कोई कामना नहीं। कोई अपेक्षा नहीं। उसने उलाहना दिया।

फिर उसने कहा, आपका ये निष्काम प्रेम मेरे लिए जोत है। यह जलती रहती है सपने में भी, यथार्थ में भी। चंदन की खुशबू सी महकती रहती है और मैं पानी-पानी हो जाती हूं। जिस तरह पतझड़ वसंत के आने के इंतजार में प्रेम करता है और मृत्य मोक्ष की प्रतीक्षा में या देह आत्मा से करती है वैसे ही आपका प्रेम जैसे सदियों से ठहर गया है मुझमें। कोई नहीं हूं आपकी। फिर भी क्या हूं, ये आप जानते होंगे। मेरी आत्मा आपसे लिपटी रहती है। सोचती हूं किसी दिन तो टूट कर मुझे गले लगाएंगे। और मैं समेट लूंगी हमेशा के लिए। तृप्त कर लूंगी अधरों को। ले जाऊंगी आप को खुद आप से दूर। अनामिका आस्ट्रेलिया से फोन कर रही थी। ख्वाबों में डूबी वो सचमुच ख्वाबों में ही रहती है। …कैसी बहकी-बहकी बातें कर रही हो आज। नीलाभ ने उसे कहा था।

… मैं इतनी दूर चली आई फिर भी कुछ भी तो नहीं बदला। वो सूरज जो ढल कर आप से विदा लेता है न, वह आस्ट्रेलिया में अपनी रश्मियां बिखेरता हुआ मेरे कमरे की खिड़की से झांकने लगता है। मैं नींद में होती हूं और ऐसा लगता है कि आप मुझे निहार रहे हैं। मुझे मालूम है कि वहां रात हो रही है। चांद भी वही है, जिसे आप देख रहे होंगे अभी और फिर जब हमारे आसमान पर आकर टंक जाता है तो उसे देख कर मैं आपको याद कर लेती हूं। वही दूधिया सा चांद जिसे देख कर अपनी पढ़ाई करते करते रूमानी हो जाती थी। वो सड़क जहां आप करते थे मेरा इंतजार, वो सीधे मेरी आंखों तक चली आती है। और मैं चल देती हूं आपसे मिलने। उस रेस्तरां की रसोई में बनता होगा मेरी पसंद का डिनर। वो सूनी टेबल आपकी कविताओं के बिना अधूरी होगी। वो कुर्सी मुझे याद करती होगी, जिस पर मैं बैठती थी। वो बनारसी पान की दुकान पर आपका ठिठक जाना। और ये कहना कि तुम्हारी सूनी होंठों पर लाली क्यों नहीं। चलो खाते हैं पान।

…डॉ अनामिका यादों में खो गई थी। लम्हा ठहर गया था। …नीलाभ ने सोने के लिए बिस्तर जमाते हुए पूछा, वहां सुबह हो गई? उसने कहा- हां …और आप यादों में चले आए। यूं ही रोज चले आते हैं आप। यहीं आ जाइए न। आपको बांहों में भर लेना चाहती हूं। वह फिर बहकने लगी थी।

वह जब भी ऐसी बात करती तो लगता कि वह नदी की तरह बहती हुई चली आ रही है। उसके आवेग को रोक पाना नामुमकिन है। कितने बरस गुजर गए। उसकी पलकों पर नीली रात ठहरी है, अनंत जश्न मनाने के लिए। आंखों में आज भी वही समंदर है नीलाभ के लिए, जहां वो एक नौका लेकर उसके साथ चल पड़ती है। पूरी दुनिया को फतह करने। सच कहूं तो वह फतह कर चुकी है। वह एक लंबी उड़ान भर सकती है तो समुद्र में गोता भी लगा सकती है। आज सब कुछ है उसके पास। बेशुमार दौलत और बेशुमार शोहरत। एक दिन में सौ मरीज और दो सौ वेटिंग में। सब कुछ तो है। अस्पताल, समंदर किनारे घर। एस्टेट मैनेजर और कई नौकर चाकर। महंगी से महंगी गाड़ियां। और कई देशों में लाखों डॉलर में निवेश। क्या नहीं है उसके पास। कोई नहीं है तो बस एक आत्मीय साथी। …मगर साथी की जरूरत तो अपराजिता को भी है। बुरे वक्त में वही भावनात्मक संबल बनी रही। उसको छोड़ कर कहां जाएगा नीलाभ? क्या उसे सचमुच छोड़ पाएगा।

नीलाभ ने कई बार अनामिका से कहा था, हम एक दूसरे के जीवनसाथी नहीं हैं, मगर आजीवन साथी तो हैं न। इस पर उसने उलाहना देते हुए कहा, आप मुझे शब्दों में मत उलझाइए। चुपचाप चले आइए हमेशा के लिए। मुझे आपकी बातें समझ नहीं आती। आप लेखक लोग सब को भरमा देते हैं। आप मन के डॉक्टर हैं तो मैं दिल की डॉक्टर हूं। खूब समझती हूं आपका लारालप्पा।

सचमुच प्यार की कोई सीमा नहीं होती। वह उम्र, जाति या दूरियां नहीं देखती। न उसने कभी जाति पूछी और कभी उम्र। नीलाभ ने पिछले साल ही मजाक मजाक में कहा था, देखो न अनामिका, काम के दबाव में बाल सफेद होने लगे हैं। तो उसने हंसते हुए कहा था कि बाल तो आमीर खान के भी सफेद हो रहे हैं। ये धूप में नहीं अनुभव से पके हैं। दो चार बाल सफेद हो गए तो क्या हुआ। दिल में उमंग रखिए। … तब भी उसने उम्र नहीं पूछी। वह बढ़ती उम्र के मायने जानती है। उसने काया और माया से ऊपर उठ कर भावों के शिखर पर अपने प्रथम पुरुष के रूप में नीलाभ को ही पाया।

अनामिका ने पूछा, सोने जा रहे हैं आप? नीलाभ ने कहा, हां, पर नींद कहां आती है मुझे। कुछ लिखूंगा। फिर सोऊंगा। अच्छा तो आप लिखिए तब तक मैं स्वीमिंग पूल में नहा कर आती हूं …। यह कह कर उसने अपने सभी कपड़े उतार दिए और लगातार योग से स्लिम हो गई देह को पल भर के लिए उसने निहारा और पानी में छलांग लगा दी। शीतल जल में डूब कर उसमे नीलाभ को अपनी आंखों में भर लिया। नीला आसमान उसकी हसरतों पर मुस्कुरा उठा है।

… उधर नीलाभ लिखता रहा। तभी कुछ देर बाद मोबाइल की घंटी बज उठी, उधर से अनामिका की चहकती हुई आवाज गूंज उठी, सो तो नहीं गए थे? नीलाभ ने जवाब दिया, नहीं तो। तुम्हारे लिए कविता लिख रहा हूं। उसने कहा-वॉव। यू आर ग्रेट। यू आर सो नाइस। ईश्वर का शुक्रिया उसने आप सा दोस्त मुझे दिया। दिस वर्ल्ड नीड मोर नीलाभ लाइक यू। हर स्त्री को नीलाभ आपके जैसाा दोस्त चाहिए। अपनी प्रशंसा सुन कर नीलाभ पुलकित हो उठा। उसने कहा- आई मिस यू सो सो मच। यू आर सुपर्ब। आई लब यू सो मच।

अनामिका देर तक बातें करती रही और बीच-बीच में अपने सर्जरी क्लिीनिक के स्टाफ को निर्देश देती रही। आज वह कोई जटिल आपरेशन करने जा रही है। उसने कहा, जब टफ सर्जरी के बाद थक जाती हूं तो म्यूजिक सुनती हूं और आपको याद करती हूं लेखक महोदय। आप मेरी सुनेंगे नहीं। इसलिए कोरोना पेंडेमिक खत्म होने के बाद मैं अपनी जन्मभूूमि भाारत आऊंगी। और मां की यादों को हमेशा के लिए संजोए रखने के लिए दिल्ली और पंजाब में एक-एक चेरिटेबल हॉस्पीटल खोलूंगी जहां गरीब महिलाओं और उनके बच्चों का इलाज हो सके। इसके लिए मैं सिक्स मिलियन यूएस डॉलर इनवेस्ट करने जा रही हूं। अब तो आप खुश? आप कहते थे न कि मुझ पर पैसे खर्च मत करो। इसे लोक कल्याण में लगाओ तो वही करूंगी। ….यह सुन कर अनामिका के लिए मन में प्यार उमड़ने के साथ आंखें नम हो उठीं है। … मैं जानती हूं कि आप इस वक्त क्या सोच रहे होंगे। आपने हमारे इस रिश्ते को सार्थक बना दिया है। और इसकी प्रेरणा आप हैं। वैसे मैंने आपके लिए भी बहुत कुछ सोचा है। मगर इसके लिए मुझे कुछ नहीं तो गले जरूर लगाएंगे।

… नीलाभ के सब्र का बांध टूट गया- हां अनामिका जरूर। तुम तो सदा मेरे हृदय में हो। तुम्हारी गरिमामय उपस्थिति हमेशा मेरे आसपास रहती है। मैं तो हमेशा तुम्हारे पास हूं। तुम जल्दी से आ जाओ। …आ रही हूं बाबा, जल्दी ही आ रही हूं। अब आप सोइए। बहुत रात हो गई होगी वहां। मेरे ख्याल से चार बज रहे हैं इंडिया में। मैं क्लिनिक निकल रही हूं। कुछ देर बाद बजे पहला आपरेशन करना है मुझे। उसके बाद एक और सर्जरी करूंगी। आप आराम कीजिए। विल कॉल यू अगेन। बाय।

… सुबह मोबाइल की घंटी से नीलाभ की नींद खुल गई। फोन उठाते ही दूसरी तरफ से अपराजिता बोली, कितनी देर से फोन कर रही हूं। कितना सोते हैं आप? उठिए साढ़े दस बज रहे हैं। यह सुनते ही नीलाभ हड़बड़ा कर उठा और पूछा, क्या हुआ सब ठीक? अरे क्या सब ठीक? रिजल्ट आ गया यूपीएससी का। उसने कहा। तो? नीलाभ ने कहा। तो क्या? सलेक्ट हो गई सिविल सेवा के लिए। आपकी सारी दुआएं मुझे लग गई। सौवीं रैंक आई है। डीएम बनना मेरा पक्का। अब लबासना (लाल बहादुर शास्त्री प्रशासनिक अकादमी, मसूरी) छोड़ने आपको चलना है। चलेंगे न? अपराजिता ने पूछा। हां, क्यों नहीं चलूंगा। मैंने पहले ही वादा किया था तुमसे, नीलाभ ने उसे बधाई देते हुए कहा। अच्छा अब जाइए आफिस के लिए तैयार होइए। मैं यूपीएससी से लेटर आते ही दून शताब्दी का टिकट कटाती हूं।

… ब्रश करते हुए नीलाभ सोचने लगा, एक तरफ अनामिका भारत आ रही है मानवता की सेवा के लिए तो दूसरी तरफ अपरााजिता अगले साल डीएम बनने जा रही है। जिलाधिकारी बनना कितनी बड़ी बात है। इन दोनों ने मुकाम हासिल कर लिया। दोनों शिखर पर। दोनों ही मनुष्यता और स्त्रियों की बेहतरी के लिए काम करेंगी। कितनी महिलाएं इस दुनिया में हैं जो इस बारे में सोचती हैं। जरूरत है कि पढ़ी लिखी लड़कियों को देश के लिए कुछ करने का हौसला दिया जाए। क्योंकि वे ही इस दुनिया को सुरक्षित रख सकती हैं। इस वक्त युवा कवयित्री डॉ. सांत्वना की लिखी पंक्तियां याद आ रही हैं-
जब-/ अनाथ बच्चों का पिता बनना चाहो / और विधवा मांओं का/ बांट सको दर्द / हारी हुई स्त्रियों का हाथ थाम/ दे पाओ उन्हें दिलासा/ शिखर पर पहुंचने की/ उनकी विराट आकांक्षाओं को/ दे पाओ आकार/ तब तुम-/ उनके नवांकुर सपनों को/ बना देना इंद्रधनुष…।

… साब जी चाय। गिल्लू टेबल पर ग्रीन टी रख गया है। उसने टीवी चैनल आॅन कर दिया है। खबरें आ रही हैं। कोरोना नियंत्रण में आ रहा है। स्कूल कालेज फिलहाल नहीं खुलेंगे। जब तक कि सरकार को तसल्ली न हो जाए। अलबत्ता सरकार मेट्रो शुरू कर सकती है। यह सुनते ही नीलाभ की आंखें चमक उठी हैं। उसे अपना लास्ट कोच याद आ रहा है। वो कोने वाली सीट की भी कितनी यादें हैं जहां से उसने दिल्ली की दुनिया देखी। ड्राइवर गोपाल को वापस दफ्तर भेजने के बाद उस सीट पर कितनी बार यात्रा की है। … तभी मोबाइल की घंटी बज उठी है। फोन उठाते ही उधर से अनामिका का स्वर कानों में घुल गया- एक सर्जरी पूरी हो गई नीलाभ। अब दूसरा आपरेशन करने जा रही हूं। सुनिए रात में कितनी अच्छी कविता लिखी है आपने। अभी पढ़ी एफबी पर। क्या क्या लिख देते हैं आप। आपके मन की पोटली में जाने क्या क्या है और मेरे पास दवाइयां हैं। इंजेक्शन है। और सर्जरी के लिए स्केलपल है। ओह, कितना सुंदर लिखते हैं आप। ओ माइ गॉड। वह देर रात लिखी नीलाभ की कविता पढ़ रही है-

सूख गया है अब
ांसुओं का समंदर
नहीं दिखाई देता
हंसों का वह जोड़ा
जो पानी पर फिसलते हुए
लिखता था प्रेम।
लड़की ने वहीं किनारे
बांध ली है अपनी नाव
जिस पर की थी उसने
कई प्रेम यात्राएं।
वह दूर क्षितिज तक
देखती है-
सूरज डूब गया है
समंदर की गोद में,
नहीं दिखाई देता
वह साथी भी
जो चला था कभी
साथ-साथ दूर तक।
उसकी मुट्ठियों में धरा
लाल फूल सूख गया है,
जिसकी खुशबू से
महकती थी जिंदगी।
वह लड़की-
बन जाना चाहती है
पीले पंखों वाली चिड़िया
आसमान छूकर
पूछना चाहती है वह
ईश्वर से कि
अच्छे लोगों के साथ
क्यों होता है बुरा।

कुछ देर मौन के बाद उसने कहा, फिर मिलूंगी। सी यू अगेन। डॉ अनामिका दूसरी सर्जरी के लिए आपरेशन टेबल की ओर बढ़ गई हैं। उसके लिए प्रेम से बढ़ कर है कर्तव्य।

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