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द लास्ट कोच: टूटे न ये रिश्ते की डोर

आज के दौर में जब रिश्तों की डोर कमजोर पड़ रही हो, भाई-भाई का सगा नहीं, भाई-बहन में प्यार नहीं। चचेरे-मौसेरे भाइयों-बहनों में आत्मीय संबंध नहीं। यहां तक कि पति-पत्नी के रिश्ते खोखले हो रहे हैं। कहने के लिए मित्रता बची है। ऐसे में सैकड़ों किलोमीटर दूर भाई के दोस्त के घर जाने की ललक साबित करती है कि मानवीय संबंधों की डोर आज भी सलामत है। लास्ट कोच शृंखला में सहयात्री बंगाली लड़की की कहानी बता रहे हैं संजय स्वतंत्र

Author Updated: August 28, 2019 8:01 PM
दिल्ली मेट्रो की प्रतीकात्मक तस्वीर। (Source: Express Photo by Oinam Anand)

इस समय आजादपुर मेट्रो स्टेशन की सीढ़ियां चढ़ रहा हूं। प्लेटफार्म पर ट्रॉॅली बैग खींचती उस गोरी-चिट्टी बंगाली लड़की ने पास आकर पूछा, यहां से गाजियाबाद के लिए मेट्रो मिल जाएगा क्या। मैंने कहा, नहीं। यहां से पहले राजीव चौक जाना पड़ेगा। फिर वहां से वैशाली की मेट्रो मिलेगी। यह जान कर वह निराश दिख रही है। ‘… कोई बात नहीं। मैं भी राजीव चौक ही जा रहा हूं। मैं अगली मेट्रो का रास्ता बता दूंगा।’ मैंने कहा। उसने एक पल के लिए मुझे ध्यान से देखा है। शायद मेरे भीतर के इनसान को टटोल रही है। स्वाभाविक ही है। क्योंकि कुछ पुरुषों की हैवानियत की वजह से ज्यादातर पुरुषों की विश्वसनीयता दांव पर लग गई है।

वह मेरे साथ चल पड़ी है। शायद उसे मुझ पर भरोसा हो गया है। मैं प्लेटफार्म नंबर एक के अंतिम छोर की ओर बढ़ रहा हूं। मैंने उससे पूछा, वैशाली से आगे कहां जाना है? वह बता रही है कि उसे गाजियाबाद में लाल कुआं जाना है। उसके पास ट्राली बैग है और कंधे पर झोला भी। दूर यात्रा पर निकली है। न जाने कहां से आई है। यह दिल्ली की तो नहीं लगती। अठारह-उन्नीस साल की युवा लड़की। हर पल सजग और सतर्क निगाहें। …हुडा सिटी सेंटर वाली आठ कोच की मेट्रो के आने की उद्घोषणा हो रही है। प्लेटफार्म पर मेट्रो लग गई है। दरवाजे खुल रहे हैं।

कोने की सीट पर बैठ गया हूं। वह मेरे साथ बैठ गई है। ‘तुम पढ़ती हो?’ मैंने बातचीत शुरू करने के इरादे से पूछा। उसने कहा, ‘हां सर। कोटा में मेडिकल परीक्षा की तैयारी कर रही हूं। कुछ समय निकाल कर भाई के दोस्त के घर गाजियाबाद जा रही हूं। फिर वहां एक दिन रह कर कल राजधानी एक्सप्रेस से कोलकाता चली जाऊंगी। वहां अपना घर है।’ ‘बड़ी लंबी यात्रा तुम्हारी। कोटा से गाजियाबाद और फिर कोलकाता’ मैंने मुस्कुराते हुए कहा। वह भी मुस्कुराई। ‘नहीं ऐसी कोई बात नहीं। इतनी लंबी यात्रा अब कर लेती हूं। डरती नहीं हूं। बस भटक न जाऊं। यही चिंता होती है’, उसने कहा।

… उसे विश्वास हो गया है कि मुझसे खुल कर बात कर सकती है। तभी उसके मोबाइल की घंटी बज उठी है। दूसरी तरह से पूछे गए सवाल पर उसने कहा, हां बैठ गई हूं मेट्रो में। कुछ देर में राजीव चौक पहुंच जाऊंगी। फोन करने वाला संभवत: उसके भाई का दोस्त है। वह उसे लाल कुआं आने का मार्ग बता रहा है। लड़की ने जवाब दिया, ‘परेशान मत होइए। मैं आ जाऊंगी। वैशाली उतरते ही फोन करूंगी आप को।’ … तभी उसके भाई ने भी फोन कर हिदायत दी है। उसे भी वही जवाब, ‘चिंता मत कीजिए। बच्ची नहीं हूं। पहुंच जाऊंगी सही पते पर।’ कम उम्र की बहन। भाई की चिंता स्वाभाविक है।

‘इतनी दूर कोटा से भाई के दोस्त के घर? कोई खास बात।’ मैने यूं ही पूछ लिया। उसने मेरी बात का बुरा नहीं माना। उसने मुस्कुराते हुए कहा, उनको लड़का हुआ है न। मैंने हंसते हुए पूछा, ‘मतलब?’ ‘जी मतलब ये कि पिछले साल उनकी शादी हुई थी। हाल में वे पापा बने है। तो मैं बच्चे को देखने जा रही हूं। वो हमारे भैया के खास दोस्त हैं। उनकी पत्नी मेरे लिए दीदी की तरह हैं।’ … सोच रहा हूं कि आज के दौर में जब रिश्तों की डोर कमजोर पड़ रही हो, भाई-भाई का सगा नहीं, भाई-बहन में प्यार नहीं। चचेरे-मौसेरे भाइयों-बहनों में आत्मीय संबंध नहीं। यहां तक कि पति-पत्नी के रिश्ते खोखले हो रहे हैं। कहने के लिए मित्रता बची है। ऐसे में सैकड़ों किलोमीटर दूर भाई के दोस्त के घर जाने की इस लड़की की ललक साबित करती है कि मानवीय संबंधों की डोर आज भी सलामत है। मुझे इसके दिल में ऐसा दीया जलता महसूस हो रहा है जो हर दिल में होना चाहिए और उसके पावन उजाले में बिखरते और गुम होते रिश्ते को सहेजना चाहिए।

अगला स्टेशन सिविल लाइंस है। लड़की ने सहसा पूछा, ‘सर हम पहुंचने वाले हैं राजीव चौक?’ ‘नहीं अभी नहीं’, मैंने उसे आश्वस्त किया, ‘अभी चार स्टेशन बाकी है। चिंत मत करो। मैं तुम्हें वैशाली की मेट्रो में बैठा कर ही आगे जाऊंगा।’ अब वह निश्ंिचत हो गई है। इस छोटी सी यात्रा में मैं अनजान नहीं रहा उसके लिए। उसने मोबाइल में सहेज कर रखी बच्चे की तस्वीर मेरे सामने रखते हुए कहा, ‘देखिए सर। इसी को देखने जा रही हूं। ये मेरा बैग देख रहे हैं न। इसमें इस बच्चे के लिए खिलौने और ढेर सारे कपड़े हैं। कितना प्यारा बच्चा है। बस इसी के लिए और दीदी से मिलने निकल पड़ी कोटा से। एक दिन गाजियाबाद रह कर कल कोलकाता चली जाऊंगी अपने घर। ये देखिए मेरा टिकट।’ उसने मोबाइल स्क्रीन पर अपना ई-टिकट दिखाया- कोलकाता राजधानी, कोच बी-3, सीट नंबर-14…

वह सहजता से अपने परिवार के बारे में बता रही है। इस लड़की का डाक्टर बनने का सपना है। कह रही है, सर मैंने गरीब लोगों को बीमरियों से मरते हुए देखा है। पैसे के अभाव में मेरी नानी मर गई। तभी मैंने संकल्प किया कि डाक्टर बन कर यथासंभव गरीबों का इलाज करूंगी। इतनी कम उम्र की लड़की में इतनी उदात्त भावना? सचमुच परोपकार की ऐसी भावना ज्यादातर मनुष्यों में हो, तो इस दुनिया को हम बेहतर बना सकते हैं। मुझे इस बच्ची पर स्नेह उमड़ आया है। बातें करते हुए कई स्टेशन निकल चुके हैं। उद्घोषणा हो रही है, अगला स्टेशन चावड़ी बाजार है। दरवाजे दायीं ओर खुलेंगे।

भैया के दोस्त बहुत मानते हैं तुम लोगों को? मैंने यूं ही पूछ लिया। लड़की ने कहा, हां बहुत सर। हमारे बाबा की मौत के बाद पिता की तरह खयाल रखा है। जब रिश्तेदारों ने भी मदद नहीं की तब साथ खड़े रहे। पैसा ही सब कुछ नहीं होता है न सर। कोई दुख बांट ले, इतना ही काफी है। अब तो दुख-सुख बांटने वाले भी कम ही बचे हैं। लोग एक दूसरे की मदद भी नहीं करते। इसमें भी स्वार्थ आ गया है। निस्वार्थ की भावना ही परमार्थ में बदल जाती है। है न सर? उसने सवाल किया। गोल चेहरे वाली यह लड़की कितनी बड़ी-बड़ी बातें करती है…… मैंने सोचा। अगला स्टेशन राजीव चौक है। इस उद्घोषणा ने हमारा ध्यान भंग कर दिया है। वह हड़बड़ा कर उठते हुए बोली, सर राजीव चौक आ गया? …….हां आ गया है। यही उतरना है, मैं सीट से उठते हुए बोला।

दरवाजे खुल गए हैं। मैं प्लेटफार्म पर आ गया हूं। वह मेरे साथ चल रही है। मैं सीढ़ियों पर चढ़ते हुए बोला, अब हमें प्लेटफार्म नंबर-तीन पर जाना है। जहां से तुम्हें वैशाली के लिए मेट्रो मिल जाएगी। प्लेटफार्म पर पहुंचने पर मैंने उससे कहा, हर इनसान पर भरोसा मत करना। गाजियाबाद जा रही हो। आटो-टैक्सी वाले को ऐसे जताना कि तुम यहां के लिए नई नहीं हो? ध्यान से जाना। कोई दिक्कत हो तो भैया के भाई से फोन पर बात करती रहना। मेरी बात सुन कर उसने हंसते हुए कहा, सर आप एकदम मेरे बाबा की तरह बोल रहे हैं। वे भी मुझे इसी तरह समझाते थे। सर इस यात्रा की यादों में आप भी शामिल रहेंगे। उसकी आंखें सजल हो उठी हैं। बहुत भावुक है यह लड़की। सच कहूं तो लड़कियों को ज्यादा भावुक नहीं होना चाहिए। और अजनबियों के लिए तो बिल्कुल नहीं।

देख रहा हूं वैशाली की ट्रेन प्लेटफार्म की ओर आ रही हैं। … लो तुम्हारी मेट्रो आ गई। मैंने उससे कहा। इस पर उसने पूछा, और आप सर? मैं इसके बाद आने वाली मेट्रो से जाऊंगा। मैंने उसके सिर पर हाथ रखते हुए कहा, अब जाओ। जीवन के किसी डगर पर फिर इसी तरह मिलना। ….. वह मेट्रो में सवार हो गई है। दरवाजे बंद हो रहे हैं। उसने हाथ हिला कर अलविदा कहा है। मैंने भी मुस्कुराते हुए हाथ हिला दिया है। मेट्रो चल पड़ी है। दरवाजे के पास खड़ी वह मुझे देख रही है। मैं मेट्रो के अंतिम डिब्बे को जाते हुए देख रहा हूं। वह मानवीय रिश्ते और सदाशयता की एक बारीक डोर अपने साथ ले गई है। अब नोएडा की मेट्रो आ रही है। मेरे कदम लास्ट कोच की ओर बढ़ रहे हैं। दरवाजे खुलते ही मैं खाली सीट पर बैठ गया हूं। मेरे बगल में पहले से बैठी युवती मोबाइल पर बात कर रही है।

वह कह रही है, सुबह से फोन कर रही हूं। कोई अता-पता ही नहीं तुम्हारा? तुम्हारा फोन ही नहीं मिल रहा। ऐसा तो कभी नहीं हुआ। मैं तुम्हारी रिश्तेदार नहीं, लेकिन दोस्त तो हूं न। चिंता तो होगी न। तुम पलट कर मुझे फोन तो कर देते। व्यस्त होने का मतलब ये नहीं कि एकदम से गायब हो जाओ। वह अपने दोस्त को लगातार डांटे जा रही है। उसे बोलने का मौका ही नहीं दे रही।…अगला स्टेशन मंडी हाउस है। इस उद्घोषणा ने उसकी बातचीत का क्रम तोड़ दिया है।

……करोलबाग से खरीदारी कर लौट रही हूं। सुबह से पागलों की तरह दौड़ रही हूं। तुम्हें मेरी जरा भी फिक्र नहीं। ठीक ही है, हमारा कौन सा रिश्ता है जो मेरी परवाह करो, यह कहते हुए वह भावुक हो गई है। उसने रूमाल से एकबारगी अपने आंसू पोंछ लिए हैं। उधर से चुप्पी छा गई है। …….एक पल रुक कर युवती ने कहा, काम में इतने व्यस्त थे तो एक मैसेज छोड़ देते। इतनी सफाई क्यों दे रहे हो बुद्धू। क्या लगता है, झूठमूठ में डांट रही हूं तुम्हें। इतना तो हक है न मुझे। या ये भी नहीं। बस चिंता हो रही थी और गुस्सा भी आ रहा था। अच्छा सुनो, तुमसे बिना पूछे एक शर्ट खरीदी है तुम्हारे लिए। मना मत करना। तुम्हारे जन्मदिन पर मेरी ओर से। इसे पहन कर केक काटना कल मेरे सामने। अच्छा लगेगा मुझे। सुन रहे हो न।

मैं आंखें बंद कर इसकी बात सुन रहा हूं। सोच रहा हूं कुछ रिश्ते आक्सीजन की तरह होते हैं। उससे जिंदगी चलती है। घुटन दूर होती है। ये रिश्ते अनाम होकर भी एक दूसरे के लिए संबल होते हैं। एक दूसरे की फिक्र में दिल न्योछावर रहता है। सचमुच कुछ रिश्ते शायद ऐसे ही होते हैं। मुझे उस लड़की की याद आ रही है जो कुछ देर में वैशाली पहुंचने वाली है। वह अपनी भावनाओं के महीन धागे लेकर रिश्ते को बुनने अकेले निकल पड़ी है। कोई खून का तो रिश्ता नहीं उस शिशु से, फिर भी उसके लिए हलकान हुए जा रही है। इधर, इस युवती का अपने मित्र से सहज ही संबंध रहा होगा। मगर फिर भी उसकी परवाह है, तो इसलिए कि कुछ रिश्ते वाकई दिल के होते हैं। इसे समझने के लिए सच्चा दिल होना चाहिए। …….. मेट्रो कुछ स्टेशन पार कर चुकी है।

अगला स्टेशन मयूर विहार है, ……उद्घोषणा हो रही है। दायीं ओर के दरवाजे खुल गए हैं। यह युवती सीट से उठ गई है। शायद उसका घर आ गया है। कोच में यात्री कम बचे हैं। रिश्तों की डोर पकड़ कर मैं अपने मन के आकाश में उड़ रहा हूं। उन सब भाई-बंधुओं, नाते-रिश्तेदारों को याद कर रहा हूं। जिनसे कम ही बात होती है। उनके यहां आना-जाना भी न के बराबर है। कभी मिलेंगे भी या नहीं कौन जाने। उन मित्रों को भी याद कर रहा हूं, जिनसे मुलाकात तो दूर, फोन पर भी कभी-कभार ही बात होती है। यह हालत करीबन हम सब की है। …..मेट्रो चल पड़ी है मेरे गंतन्य की ओर। कुछ ही देर में उद्घोषणा हो रही है-अगला स्टेशन न्यू अशोकनगर है। दरवाजे बायीं ओर खुलेंगे।

मैं सीट से उठ गया हूं। प्लेटफार्म पर मेट्रो पहुंच गई है। दरवाजे खुल गए हैं। मैं सीढ़ियों से उतर रहा हूं। देख रहा हूं, वह रिक्शा वाला मेरा इंतजार कर रहा है। क्यों है मेरे लिए ये बेसब्री? क्या लगता हूं मैं इसका। नीचे पहुंचने पर उसनेमुझे देखते ही कहा, बड़ी देर कर दिए बाबू। हां थोड़ी देर हो गई चलो अब, यह कहते हुए मैं रिक्शे पर बैठ गया हूं।

सामने बाजार से गुजरते हुए एक दुकान पर रेडियो पर गीत बज रहा है-
आदमी मुसाफिर है
आता है जाता है,
आते-जाते रस्ते में
यादें छोड़ जाता है।

सोच रहा हूं कि हम अपनी भावनाएं सूखने न दें तो रिश्ते की डोर मजबूत बना सकते हैं। आप कहीं भी रहें आप इस डोर से सबको बांधे रख सकते हैं। जीवन के सफर में किसी के मन में एक अमिट यादें छोड़ कर जा सकते हैं। चलिए हम सभी मिल कर टूटते-बिखरते रिश्तों को बचाएं।

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