ताज़ा खबर
 

द लास्ट कोच: लायक पिता

हमारे देश में असहाय बुजुर्गो के लिए कोई जगह नहीं। असंगठित क्षेत्र में काम कर चुके बुजुर्ग अगर हजार-दो हजार रुपए की पेंशन पर निर्भर रहें तो उन्हें एक वक्त की रोटी भी न मिले। हमारे सिस्टम ने ऐसे बुजुर्गों को मरने के लिए छोड़ दिया है। उनकी मुट्ठी में इतने रुपए भी नहीं धरे, जिससे वे अपना गुजर-बसर कर सकें। रही-सही कसर उनके परिवार ने पूरी कर दी है। वे अपने इलाज के लिए, अपने कपड़े के लिए और सोने के लिए घर में किसी कोने के लिए आज भी अपने परिवार की ओर मुंह ताकते हैं तो उन्हें दुत्कार मिलती है। वे करें भी तो क्या करें? द लास्ट कोच शृंखला में ऐसे बुजुर्गों की कहानी लेकर आए हैं संजय स्वतंत्र।

Author Published on: November 27, 2019 9:47 PM
(प्रतीकात्मक फोटो: रॉयटर्स)

इनकी उम्र यही कोई पचहत्तर साल। माथे पर चिंता की अनगिनत लकीरें, मगर होंठों पर बेहिसाब मुस्कान। जीवटता का इससे बड़ा क्या सबूत कि ये जिंदगी की सांझ में भी काम कर कर रहे हैं। क्या घर में कोई नहीं जो इनको दो वक्त खाना खिला दे? मेरे मन में कईसवाल घमड़ रहे हैं। ….. मेट्रो स्टेशन की ओर ऑटो चल पड़ा है। मैंने उनके सिर के पक चुके सभी बालों को देख कर संकोच के साथ कहा, इस उम्र में भी काम? यह तो आपके आराम करने का समय है। वे आॅटो चला रहे हैं। कुछ नहीं बोल रहे। शायद वे अपने भीतर की शक्ति बटोर रहे हैं। सलेटी रंग की वर्दी में कृशकाय शरीर। आंखों पर मोटा चश्मा यह बता देने के लिए काफी है कि ये जीवन का मीलों लंबा सफर तय कर चुके हैं। मगर फिर भी इस सफर का कोई अंत नहीं है।

देश में ऐसे अनगिनत बुजुर्ग हैं जिनकी देखभाल करने कोई वाला नहीं। या फिर ऐसे कई बुजुर्ग हैं जिन पर उनके बेटे ही बोझ बने हुए हैं। जिनसे दो रोटी की उम्मीद थी, उनके लिए ही कोई आॅटो चला रहा है तो कोई सब्जी बेच रहा है या फिर कोई खोमचा लगा रहा है। आप ऐसे लोगों को देखिएगा तो मोलभाव न कीजिएगा। ये बहुत लाचार लोग हैं। इनकी नजर कमजोर हो चुकी है। हाथ-पैर सलामत हैं इसलिए काम किए जा रहे हैं। ये सुबह निकल पड़ते हैं और शाम तक घर का चूल्हा जलने का इंतजाम कर लेते हैं। आपको इन पर तरस आ सकता है मगर इनके नालायक बेटों को नहीं।

…… लंबे इंतजार के बाद उनकी चुप्पी टूटी है। उनकी आंखें छलक आई हैं। वे बता रहे हैं, ……. क्या करें बाबू। जब बेटे को अपनी ही चिंता न हो तो जिंदगी भर परिवार का पेट भर चुके बाप को बुढ़ापे में भी काम करना पड़ता है। इस पर मैने पूछा, क्यों क्या हुआ? क्या बेटा काम नहीं करता? उन्होंने जवाब दिया, अगर काम करता, तो आज मुझे खटना नहीं पड़ता। कितना कहा, पढ़ ले बेटा। मगर वह नहीं पढ़ा। इसके बाद कितना कहा उससे, कहीं किसी फैक्टरी में नौकरी कर ले। मगर नहीं। जिसे बैठ कर खाने की आदत हो, वह भला क्या काम करेगा। तो मेरे सिर पर बैठा है। मेरा खून चूस रहा है। …… बुजुर्ग आॅटो चालक की व्यथा बह रही है मेरे मन के किसी कोने तक। पीड़ा की यह अविरल धारा इन बुजुर्गों के अपनों तक क्यों नहीं पहुंचती?

आजादपुर चौक के ट्रैफिक में हमारा आॅटो गुम हो गया है। सड़क पर रेंगते हुए हम मेट्रो स्टेशन की ओर बढ़ रहे हैं। ….. तो क्या फिर बेटे की शादी कर दी? मैंने पूछा तो उन्होंने कहा, क्या करते साहब। कब तक न करते। यही सोच के कर दी कि सिर पर जिम्मेदारी पड़ने पर शायद कुछ कामकाज कर लेगा। अपना कमाएगा और खाएगा। ……. मुझे इनकी बात सुन कर अचरज हो रहा है। बेरोजगार बेटे की शादी? वे बता रहे हैं, शादी के बाद दो बच्चे भी हो गए। मगर नालायक बेटे को अपने बच्चों की भी चिंता नहीं। क्या करता साहब? उन मासूम बच्चों पर रहम खाकर निकल पड़ता हूं काम पर, जिससे घर चले। बच्चे स्कूल जाएं। बहू रसोई संभाले। इस उम्मीद में काम किए जाता हूं कि उस दिन बेटे को जरूर अकल आएगी, जब मैं मर जाऊंगा। मगर जब तक जिंदा हूं, काम तो करना ही है। खुद के लिए और दो बच्चों के लिए। बात करते हुए हम मेट्रो स्टेशन के सामने पहुंच गए हैं। आॅटो से उतरते हुए मैंने पूछा, बाऊ जी, कितना कमा लेते हैं रोज? उन्होंने कहा, सब खर्चा निकाल कर यही कोई चार-पांच सौ रुपए। बस गुजारा हो जाता है।

मैं मेट्रो स्टेशन की सीढ़ियां चढ़ रहा हूं। कानों में आवाज गूंज रही है, बस गुजारा हो जाता है…. बस गुजारा हो जाता है। सच ही है आज के दौर में क्या गरीब और क्या मध्यवर्ग, सब गुजारा ही तो कर रहे हैं। जिंदगी चली जा रही है, यही क्या कम है? मैं प्लेटफार्म के आखिरी छोड़ पर पहुंच गया हूं। हुडा सिटी सेंटर की मेट्रो आने की घोषणा हो रही है। देखते ही देखते लास्ट कोच के दरवाजे खुल गए हैं। हमेशा की तरह मैं कोने वाली अंतिम सीट पर बैठ गया हूं। ठंडी खामोशी पसरी है कोच में। ज्यादातर यात्री अपने स्मार्टफोन में मशगूल है। मैंने आंखें मूंद ली हैं। आॅटो वाले का कातर चेहरा सामने आ गया है। उनकी लाचारी कोई देख पाएगा? ऐसे बुजुर्गो के लिए कोई तंत्र नहीं, जहां से इन्हें मदद मिल सके। असंगठित क्षेत्र में काम कर चुके ऐसे बुजुर्ग अगर हजार- दो हजार रुपए की पेंशन पर निर्भर रहें तो एक वक्त की रोटी भी न मिले।

हमारे सिस्टम ने ऐसे बुजुर्गों को मरने के लिए छोड़ दिया है। उनकी मुट्ठी में इतने रुपए भी नहीं धरे, जिससे वे अपना गुजर-बसर कर सकें। रही-सही कसर उनके परिवार ने पूरी कर दी है। वे अपने इलाज के लिए, अपने कपड़े के लिए और सोने के लिए घर में किसी कोने के लिए आज भी अपने परिवार की ओर मुंह ताकते हैं तो उन्हें दुत्कार मिलती है। वे करें भी तो क्या करें? ऐसे में वे किराए पर आॅटो लेकर निकल पड़ते हैं या फुटपाथ पर अपनी पत्नी के साथ सब्जी बेचने लग जाते हैं। किसी तरह गुजारा हो जाता है। क्या सचमुच वे जिंदगी जी पाते हैं या जिंदगी उन्हें घसीटते हुए मौत की तरफ ले जाती है।

… कई स्टेशन निकल गए हैं। कश्मीरी गेट स्टेशन आने वाला है। इसकी उद्घोषणा हो रही है। प्लेटफार्म पर लगते ही दरवाजे खुल गए हैं। सरदारजी भारी-भरकम थैले के साथ कोच में दाखिल हुए हैं। उनकी उम्र देख अपनी सीट छोड़ कर खड़ा हो गया हूं। वे थैले को अपने पैरों के सामने रख कर बैठ गए हैं। उनकी दाढ़ी बता रही कि ये सत्तर से क्या कम होंगे। …… तभी बगल में बैठे सज्जन उठ गए हैं। मुझे दारजी के बगल में बैठने की फिर से जगह मिल गई है।

मैंने दोबारा सीट पर बैठते हुए पूछा, इस उम्र में इतना बोझ? इस पर वे बोलें, क्या करें पुत्तर जी। हम किसी से मांग कर खा नहीं सकते तो काम ही करेंगे न? ….. क्या मतलब? मैंने पूछा तो दारजी बोले, कोई ना पुत्तरजी। रोटी नाल चटनी वास्ते काम करना ही है। बेटे खिलाएंगे नहीं, तो जब तक बाजुओं में दम है, हम मेहनत की दो रोटी सरदारनी के साथ खाएंगे, पर बेटों को नहीं कहेंगे कि साडा भी हक है घर में। जीवन भर उनके लिए किया, अब अपने लिए कर रहे। मेरे एक सवाल पर वे दिल की बात कह गए। नालायक बेटों के लायक पिता ऐसे ही होते हैं। वे किसी पर बोझ नहीं बनते। बच्चे दुख-सुख पूछें या न पूछें, मां-बाप उनकी खैरियत जरूर लेते हैं। लेकिन जब वे उपेक्षा करते हैं तब आंखों में आंसू होते हैं और दिल पर चट्टान जैसा बोझ।

…….. आज न्यू अशोक नगर मेट्रो स्टेशन की सीढ़ियों से उतरते हुए मन खिन्न है। बाहर निकलते ही रिक्शे वाले आवाज लगाने लगे हैं। बाबूजी…..बाबूजी….। कुछ कहे बिना एक रिक्शे पर बैठ गया हूं। रिक्शेवाले ने पलट कर मुझे देखा है। वह पूछ रहा है, कहां जाएंगे बाबू? मैं इस बुजुर्ग को देख कर सकते में हूं। ये दुबला-पतला रिक्शा वाला कैसे इस उम्र में सवारियों को ढोता होगा?। मुझे रिक्शे पर बैठने में संकोच हो रहा है। रिक्शे से उतर गया हूं मैं। यह देख कर उसने कहा, क्या हुआ बाबू? मैंने कहा, शरीर में जान नहीं। कैसे चलाते हैं आप रिक्शा? उनने जवाब दिया, न चलाऊं तो रोटी कैसी मिलेगी बाबू? पहले आप बैठ जाइए। कुछ पैसे मिल जाएंगे तो बड़ी मदद होगी।

रिक्शेवाले के बार-बार आग्रह करने पर फिर से बैठ गया हूं। उसने पैडल मारते हुए पूरी ताकत झोंक दी है। लग रहा है कि कुएं से कोई आवाज आ रही है। वह सीने में दम भरता हुआ बता रहा है, …… बाबू मैं पहले सब्जी की दुकान लगाता था। अच्छी चलती थी। बेटा भी बैठता था साथ में। मगर एक दिन बोला कि बहुत उमर हो गई बाबा, अब आराम करो। हमने सोचा लायक बेटा है। अब हाथ-पैर मारना बंद करना चाहिए। घर बैठना चाहिए। हम बूढ़ा-बूढ़ी आराम करने लगे। मगर धीरे-धीरे बेटे ने रोटी-पानी देना बंद कर दिया। एक दिन झुग्गी से भी निकाल बाहर किया। तब क्या करते बाबू। तब हमरी मलकिन बोलीं कि कुछ काम कर लो। तब से किराए का रिक्शा चलाए जा रहे हैं। यह कहत हुए उनने चुपके से आंसू पोंछ लिए हैं।

हम अशोक नगर मोड़ पर पहुंच गए हैं। तभी रिक्शे वाले ने कहा, वो देखिए बाबू। मेरा बेटा अपनी लुगाई के साथ बैठा सब्जी बेच रहा है। अरे ओ पिंटुआ…… रिक्शेवाले ने दम भर कर हांक लगाई तो मेरी नजर उसके बेटे पर गई है। उसने बाप को देख कर भी नजरें फेर ली हैं। नालायक बेटे ऐसे ही होते हैं। …… कुछ ही देर में रिक्शा दफ्तर के सामने खड़ा है। मैं जेब से तीस रुपए निकाल कर उसे किराया दे रहा हूं। बीस रुपए मेहनताना और दस रुपए चाय के। मैंने उनकी मुट्ठी में रुपए धरते हुए कहा, कहीं बैठ कर थोड़ा सुस्ता लीजिए। चाय पी लीजिए।

……. रिक्शे से उतरते ही मोबाइल की घंटी बज उठी है। यह मेरे पड़ोसी चिंटू का फोन है। क्या हुआ? यह पूछते ही वह फफक पड़ा, दादा….. हो दादा। आई नहीं रही। ….. आई यानी हमारे पड़ोस में रह रहीं सबसे बुजुर्ग महिला। यह सुन कर मैं सन्न हूं। वे इकलौते बेटे के साथ रह रही थीं हमारे बीच। बेटे को बहुत पढ़ाने की कोशिश की, मगर दसवीं तक की पढ़ाई भी वह पूरी नहीं कर सका। आई खुद जीवन भर सरकारी स्कूल में पढ़ाती रहीं। अपनी मेहनत, प्रतिभा और अनुशासन के बूते एक दिन प्राचार्य के पद तक पहुंचीं। रिटायर होने के बाद उसी बेटे के साथ रहीं जो पैसे मांग-मांग कर उन्हें खोखला करता चला गया। फिलहाल वे पेंशन से गुजारा कर रही थीं।

मुझे याद आ रही परसों रात दिल को छेद कर देने वाली आई की चीख। हम सब भाग कर उनके घर पहुंचे थे। कई बार आवाज लगाने पर काफी देर बाद उनके बेटे ने दरवाजा खोला। आई फूट-फूट कर रो रही थीं। सब ने पूछा, क्या हुआ। ऐसे क्यों रो रही हो? उनका जवाब था, देख लो इस कलयुगी बेटे को। पहले इसने बाप को मारा। अब यह राक्षस मेरा गला दबाता है। इस करमजले को सब कुछ दे दिया। अब यह मेरी पेंशन भी छीन लेना चाहता है। कह रहा है अपनी सारी पेंशन हर महीने दो। अच्छा रहता कि मैं निसंतान मर जाती या पैदा होते ही ये मर जाता। ……. यह इकलौते बेटे से आजिज आई एक मां बोल रही थी। यह सुन कर सभी हतप्रभ थे। पड़ोसी वकील साहब ने उनके बेटे को खींच कर दो-तीन झापड़ रसीद कर दिए। अपने खिलाफ माहौल देख कर वह गिरगिट की तरह रंग बदलने लगा। पहले उसने कहा, मैं मां का गला दबा सकता हूं भला? ये झूठ बोल रही है। …… फिर कुछ देर खामोश रहने के बाद मां के पैरों में गिर गया।

बूढ़ी मां ने बेटे को अपने से दूर करते हुए कहा, परे हट। मगरमच्छी आंसू न बहा। लोगों के सामने नाटक न कर। तुम सब सुन लो। किसी रात ये गला दबा कर मेरी हत्या कर देगा। सुबह मेरी लाश मिलेगी सबको। फिर यह चुपचाप मुझे फूंक डालेगा। किसी को कानों कान खबर न होगी। आई ने रोते हुए कहा तो चिंटू ने उनके बेटे के पीठ पर कई मुक्के जड़ दिए। वह वहीं धम्म से फर्श पर बैठ गया। चिंटू ने कहा, आज के बाद मां को मारा तो सीधे जेल जाएगा। तू पढ़ा-लिखा होता तो पता होता कि बूढ़े मां-बाप पर जुल्म करना अपराध है। इसकी सजा है। ……… तो समझाने-बुझाने के बाद बेटे ने हाथ जोड़ कर कहा था कि अब वह मां को तकलीफ नहीं देगा। इसके बाद आई को दिलासा देकर हम लोग लौट आए थे।

इसके बाद से हम आश्वस्त थे। यकीन था कि अब आई से दुर्व्यवहार नहीं करेगा उनका बेटा। मगर पड़ोस की चारदीवारी में क्या होता है, दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों में किसी को कहां पता चलता है? पड़ोस में कोई मर जाता है तो दीवार के इस पार हम खाना खा रहे होेते हैं। चैन की नींद सो रहे होते हैं। दो दिन बाद पता चलता है कि दीवार के उस पार तो लाश पड़ी थी। भारतीय समाज के संवेदनहीन होने की इससे निर्मम तस्वीर क्या होगी?

…… लोग अपने काम पर निकल गए थे। फिर कुछ लोगों ने ही फोन कर पड़ोसियों को बताया। अभी दफ्तर के सामने खड़ा हूं। चिंटू बोल रहा है……..दादा, आइ को उनके जालिम बेटे ने मार दिया। आज दोपहर तक वे घर से नहीं निकलीं तो हम लोग गए पता करने। देखा कि वे बिस्तर पर औंधी पड़ी थीं। मासूम बना उनका बेटा सबको बता रहा था….. मां सुबह से नहीं उठी है। देखिए न इनको क्या हो गया है। …… दादा उस अहसानफरामोश बेटे ने रात में ही मां का गला घोंट दिया। ऐसे मारा है कि कोई निशान तक नहीं। शायद तकिए से ही मुंह दबा दिया होगा। ….. ओह। मेरे मुंह में शब्द अटक गए हैं। बस इतना ही कहा है मैंने। गुस्से में मेरा खून सूख गया है।

कुछ पल की खामोशी के बाद चिंटू ने पूछा, दादा अब क्या करना है? पुलिस को फोन करूं या दाह-संस्कार की तैयारी? मैं जवाब देने की हालत में नहीं हूं। सिर्फ इतना कहा, साबित कैसे होगा? और हम लोग कौन होते हैं। उनकी बेटी को खबर कर दो। जब वो आ जाएगी तभी अंतिम संस्कार होगा। भाई ने तो खबर न की होगी डर के मारे। चिंटू बोला, दादा एक खबर छाप दीजिए- बुजुर्ग महिला की हत्या। …….अरे पगले खबर छाप कर क्या होगा? आई तो चली गईं। खबर छप जाए तो भी लौट कर आने से रहीं।

मैं चिंटू से बात करते हुए न्यूजरूम में आ गया हूं। कुर्सी पर बैठते ही आंसू छलक पड़े हैं। इस देश में न जाने कितने असहाय बुजुर्ग अपने घर में घुट कर मर जाते हैं। कोई भूख से तो कोई अकेलेपन से, कोई अपने ही बेटों के जुल्म से। मैं भीतर से बहुत कमजोर हूं। बहुत भावुक भी। कोई देख न ले। यह आदमी रोता भी है। मैंने टेबल पर गिरे आंसुओं को हथेलियों से पोंछ लिया है। खबरों के जंगल में खो गया हूं। डबडबाई नजरों के आगे धुंधली सी दिख रही कंप्यूटर स्क्रीन पर खबर है- संपत्ति के लिए बेटे ने बुजुर्ग पिता की जान ली…….। बच्चों के लिए ताउम्र संपत्ति जोड़ने वाले लायक पिता इसी तरह बेटों के हाथों मरते हैं।

‘द लास्ट कोच’ की दूसरी कड़ियां पढ़ने के लिए यहां क्लिक कर सकते हैं।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

Next Stories
1 नृत्योत्सव: स्वाति तिरुनाल को कलाकारों की नृत्यांजलि
2 जोहाना रॉड्रिग्स: ब्रेक डांस की दुनिया में उभरता नाम
3 रंगमंच: चुटीले संवादों के साथ व्यवस्था का स्याह पक्ष
ये पढ़ा क्‍या!
X